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क्या इस बार भी 1996 की तरह बीजेपी-कांग्रेस किसी के हाथ सत्ता नहीं लगेगी?

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Abhishek Kumarयह लेख दी लल्लनटॉप के लिए अभिषेक कुमार ने लिखा है. अभिषेक दिल्ली में रहते हैं और सिविल सेवाओं की तैयारी करते हैं. रहने वाले बिहार के हैं. फिलहाल वो अलग-अलग कोचिंग संस्थानों में छात्रों को पढ़ाते हैं. पुरानी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ना और पुराने अखबारों से सियासत की चीजों को खोजकर निकालना इनका शगल है.

पिछले साढ़े 4 साल के बीजेपी शासन के बाद अब जो तस्वीर उभर रही है उसमें एक बात साफ दिखती है. और वो ये कि नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता में गिरावट आई है. क्या यह गिरावट सत्ता के क्रियाकलापों का जनता की ओर से किए गए मूल्यांकन की स्वाभाविक परिणति है या जनता द्वारा 5 साल बाद बदलाव करने की नैसर्गिक इच्छा की अभिव्यक्ति की संभावना है? जाहिर है इस सवाल का जवाब 2019 के जनादेश में ढूंढने की कोशिश होगी.

1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खाते में 136 सीटें ही आई थीं. और स्थितयां ऐसी बनीं कि तीसरे मोर्चे की सरकार बन गई.

ऐसी ही परिस्थिति 1996 के लोकसभा चुनाव में भी पैदा हुई थी, जब लोगों ने नरसिंह राव के आर्थिक सुधार, पंजाब समस्या का समाधान, मिड डे मील जैसे युगांतकारी कार्यों को तरजीह देने के बजाय हवाला कांड, लक्खुभाई पाठक केस, झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत काण्ड के मुद्दों को जनमत की अभिव्यक्ति के लिए आधार माना और बिना कोई ठोस विकल्प दिए कांग्रेस को 136 सीटों (कश्मीर में चुनाव के बाद 4 सीटें बढ़ गई थी) के साथ लोकसभा में दूसरे नंबर की पार्टी बनाकर सत्ता से बाहर कर दिया. बीजेपी वाजपेयी के नाम के सहारे 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी ज़रूर, लेकिन बहुमत के आंकड़े 267 सीटों से काफी दूर थी. इनमें भी कश्मीर की 6 सीटों पर चुनाव नहीं हुए थे और नरसिंह राव, बीजू पटनायक और वाजपेयी दो सीटों से चुने गए थे, जिके बाद उन्होंने क्रमशः नंदयाल, कटक और गांधीनगर की सीट खाली कर दी थी.

सरदार हरकिशन सिंह सुरजीत की वजह से तीसरा मोर्चा साकार हो पाया था.
सरदार हरकिशन सिंह सुरजीत की वजह से तीसरा मोर्चा साकार हो पाया था.

ऐसी परिस्थिति में कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत ने जनता दल (46), वाम मोर्चा (53), सपा (16), तेलगुदेशम (16), असम गण परिषद (5), द्रमुक (17) और जीके मुपनार की तमिल मनीला कांग्रेस (20) को संयुक्त मोर्चे के बैनर तले इकठ्ठा किया. वाजपेयी की 13 दिन की बीजेपी सरकार बहुमत के अभाव में गिर गई. तब 173 सांसदों के संयुक्त मोर्चे को नरसिंह राव की कांग्रेस का समर्थन हासिल हुआ. देवगौड़ा और गुजराल के नेतृत्व में बारी-बारी से संयुक्त मोर्चा की दो अल्पजीवी सरकारें चलीं और फरवरी 1998 में मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गई. इस लोकसभा ने पौने दो साल में हीं तीन प्रधानमंत्री देखे और 4 विश्वासमत प्रस्तावों का सामना किया.

तीसरे मोर्चे की सरकार के मुखिया के तौर पर पहले एचडी देवगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल के हाथ में सत्ता आई थी.
तीसरे मोर्चे की सरकार के मुखिया के तौर पर पहले एचडी देवगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल के हाथ में सत्ता आई थी.

1996 में ऐसा इसलिए हुआ था कि जनता ने विकल्प का चुनाव किए बिना कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया था. अब अगर 2019 में नीरव मोदी, रफाएल और मायावती की तरह मोदी द्वारा मूर्तियों पर पैसे की बर्बादी जैसे मुद्दे चुनावों पर हावी होते हैं तो फिर 1996 जैसे ही चुनावी नतीजे आ सकते हैं और ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि फिलहाल कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व पर जनता का इकबाल कायम होता नहीं दिख रहा है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस परिस्थिति में जनादेश की सूरत कैसी हो सकती है और सरकार का गठन कैसे संभव हो सकता है? कुछ संभावित परिदृश्यों पर नजर डालते हैं :-

परिदृश्य 1:- यदि कांग्रेस लोकसभा में (2004 की तरह) सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती है तो केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनेगी और भाजपा के विरोध में खड़े क्षेत्रीय दल कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार का हिस्सा बनेंगे. इस परिप्रेक्ष्य में चंद्रबाबु नायडु की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात को देखा जा सकता है.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की थी.
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू ने हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की थी.

परिदृश्य 2:- अगर भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरती है तो सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि भाजपा बहुमत के आंकड़े से कितनी दूर रहती है. अगर भाजपा की सीटें 200 से ज्यादा होंगी तो उसके मौजूदा सहयोगी दलों के अलावा भी कुछ क्षेत्रीय दल सहयोग करने के लिए मिल जाएंगे. ऐसे में बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन जाएगी.

परिदृश्य 3:- अगर भाजपा 1996 की तरह 150-160 सीटों के आसपास अटकती है, तब लोकसभा में दूसरे नंबर की पार्टी कांग्रेस को सहयोग करने में क्षेत्रीय दलों में स्वाभाविक हिचक होगी. उस वक्त बीजेपी को रोकने के लिए कोई तीसरा मोर्चा बन सकता है और कांग्रेस उसका समर्थन कर सकती है. लेकिन यहां तीसरे मोर्चे के दलों को इकठ्ठा करने के लिए एक ‘हरकिशन सिंह सुरजीत’ की ज़रूरत होगी. लेकिन अभी की जो स्थितियां हैं, उसमें सुरजीत जैसी शख्सियत टॉर्च लेकर खोजने से भी नहीं दिखाई देती है.

पूरा आम चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के बीच है, जिसमें क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.
पूरा आम चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी के बीच है, जिसमें क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी.

ऐसे में ये साफ दिख रहा है कि लोकतंत्र का महापर्व यानि आम चुनाव जितना दिलचस्प होगा, चुनाव के बाद सरकार बनाने के लिए होनेवाला साम-दाम-दंड-भेद उससे कहीं ज्यादा दिलचस्प हो सकता है.


 

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