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क्या है पैरलल, डिजिटल और क्रिप्टो करेंसी?

हर किसी के क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) को लेकर बहुत से सवाल हैं. ये क्या है, कैसे काम करती है, कहां मिलती है वग़ैरह-वग़ैरह. और इन्हीं सारे सवालों के जवाब आसान भाषा में देने के लिए हम लेकर आए हैं क्रिप्टोकरेंसी से जुड़ी सीरीज़ ‘एक नया पैसा’.

# 1) ‘क्रिप्टोकरेंसी’ में ‘करेंसी’-

‘क्रिप्टोकरेंसी’ शब्द, दो शब्दों से मिलकर बना है. ‘क्रिप्टो’ और ‘करेंसी’. हमको करेंसी, मनी या पैसे को लेकर अलग-अलग डेफ़िनेशन, और दर्शन सुनाई देते रहे हैं. लेकिन इसे आसान तरीक़े से एक कहानी से समझिए=

राजू के खेत में जमकर आलू उगे. उसने इन आलुओं को इकट्ठा करने के लिए पड़ोस के सोनू से हेल्प ली. इसके एवज़ में राजू ने एक कागज़ पर थैंक्स लिखा और राजू को पकड़ा दिया. अब सोनू के पेट में एक दिन दर्द हुआ, तो वो डॉक्टर के पास गया. डॉक्टर ने उसका इलाज कर दिया. इसके एवज़ में सोनू ने राजू से लिया थैंक्यू नोट डॉक्टर को पकड़ा दिया. फ़ाइनली जब डॉक्टर को भूख लगी तो वो राजू के पास गया. राजू ने कुछ आलू डॉक्टर को दे दिए और कहना न होगा कि इस एहसान के एवज़ में उसको जो थैंक्स वाला नोट मिला था, वो उसी का दिया हुआ था. उसने वो नोट फाड़ कर फेंक दिया और अब राजू, सोनू और डॉक्टर में से कोई भी किसी के एहसान तले नहीं दबा था. तो ऐसे यह ‘थैंक्यू’ इन सबके बीच की करेंसी हो गई.

मग़र सोचिए क्या होता कि सोनू बेईमान होता और आलू की खेती में हेल्प किए बिना ही एक थैंक्यू का नोट बना लेता और अपना इलाज करवा लेता? तो इसलिए अब थैंक्स नोट में एक मुहर लगना शुरू हुई, जो तीनों की देखरेख और सहमति से लगती थी. यूं गिनती भर के ‘थैंक्स नोट’ छापकर सबमें बांट दिए गए. इसको उस काल्पनिक देश में करेंसी या मुद्रा कहा जाने लगा. यूं आप समझ सकते हैं कि बाकी सभी डेफ़िनेशंस के अलावा ‘किसी का एहसान चुकाकर उऋण होना ही दरअसल करेंसी है.’  

बहरहाल, तीन लोगों में तो यह सिस्टम चल सकता है, लेकिन पूरे देश के लिए यह सिस्टम मेंटेन करना चुनौती का काम है. ऐसे में एक बड़ी पंचायत बनाई गई. इसे नाम दिया गया सेंट्रल बैंक. करेंसी कैसी दिखेगी, कैसे, कब और कहां छपेगी यह सब करने का जिम्मा इसके ऊपर आया. इस तरह से एक देश में करेंसी का सिस्टम तैयार हुआ.

तो करेंसी के बारे में जानने के बाद क्या हम क्रिप्टोकरेंसी समझने के लिए तैयार हैं? काफ़ी हद तक. लेकिन पहले आइए डिजिटल करेंसी और पैरलल करेंसी भी समझ लें. क्यूंकि क्रिप्टो ये दोनों ही है. तो चलिए फिर से एक काल्पनिक उदाहारण से शुरू करते हैं.

# 2) पैरलल करेंसी:

लल्लन का एक छोटे से शहर में मशहूर रेस्टोरेंट है. यहां आपको काउंटर से 500 के गुणांक में टोकन ख़रीदने होंगे. मतलब 500, 1,000 या 1,500 रुपए के. इनसे अपने बिल का भुगतान करना होगा और जो पैसे बचेंगे वो आपको वापस नहीं किए जाएंगे, बल्कि उसके बदले भी आपको टोकन ही दिए जाएंगे. जैसे 480 का खाना खाया तो 20 रुपए का ‘लल्लन टोकन’ वापस मिलेगा. इन टोकन्स को आप, जब अगली बार लल्लन के रेस्टोरेंट में खाने जाएं तो, कैश करवा सकते हैं.

तो कालांतर में लल्लन के गांव के लोग इस टोकन को भी रुपए की तरह ही ट्रीट करने लगते हैं. जैसे अगर कहीं उसी शहर में पान खाने गए तो पान वाला करेंसी के अलावा ‘लल्लन टोकन’ भी स्वीकार करता था. यूं धीरे-धीरे उस छोटे से शहर के लिए ‘लल्लन टोकन’, एक समानांतर मुद्रा बन गई. अब चूंकि, लल्लन और उसका ये छोटा शहर भारत में ही बसे थे, तो ये बताना ज़रूरी है कि-

इस तरह की कोई भी पैरलल करेंसी यहां, भारत में अवैध है. कारण कई हैं. जैसे इसमें RBI का रेगुलेशन नहीं है. इसका इस्तेमाल अवैध काम के लिए हो सकता है, वग़ैरह-वग़ैरह.

क्रिप्टोकरेंसी पर देशों में अलग-अलग नियम और कानून हैं क्रिप्टोकरेंसी पर देशों में अलग-अलग नियम और कानून हैं (फोटो सोर्स- Getty Images)
क्रिप्टोकरेंसी पर देशों में अलग-अलग नियम और कानून हैं (फोटो सोर्स- Getty Images)

ये ‘अवैध’ वाले मुद्दे पर फिर अगले एपिसोड्स में वापस आएंगे, पहले ‘लल्लन-सिनेरियो’ पूरा डिस्कस कर लें. और पैरलल करेंसी के बाद डिजिटल करेंसी भी समझ लें.

# 3) डिजीटल करेंसी:

अब कंप्यूटर क्रांति के बाद लल्लन के इस शहर में भी बाकी शहरों की तरह ही कैश का कारोबार बहुत कम हो गया. यूं लल्लन को लगभग सभी लोग ऑनलाइन पेमेंट ही करने लगे. अब लल्लन ने ज़ारी किए ‘लल्लन डिजिटल टोकन’. बोले तो एक रेंडम, कंप्यूटर-जनरेटेड कोड. जिसका टोकन या पर्ची की तरह कोई ‘स्वरूप’ नहीं है. ’लल्लन डिजिटल टोकन’ कोई यूनीक नंबर है, जो लल्लन आपके व्हाट्सऐप या मेल पर फ़ॉर्वर्ड कर देता है. 

ये ’लल्लन डिजिटल टोकन’ यूनीक इस मायने में है कि हर एक व्यक्ति को और हर राशि के लिए दिया जाने वाला ये नंबर किसी भी दूसरे नंबर से अलग है. तो जब आप ये नंबर अगली बार ‘लल्लन रेस्टोरेंट’ के काउंटर पर बताओगे तो पता चल जाएगा कि इसकी वैल्यू कितनी है. और जो चेंज बचा, उसके एवज़ में भी लल्लन दूसरा कोई यूनीक रेंडम नंबर आपको दे देगा.

अब इन रेंडम नंबर के साथ भी वही होता है जो अतीत में लल्लन के ऑफ़लाइन टोकन के साथ हुआ था. इनसे भी गांव में ख़रीद फ़रोख़्त शुरू हो जाती है. ये नंबर, वैसे भी ऑफ़लाइन टोकन से ज़्यादा सिक्योर हैं. क्यूंकि टोकन में इतने सिक्योरिटी फ़ीचर्स थोड़े न थे कि आप उसके नक़ली वर्ज़न नहीं छाप सकते. लेकिन ‘डिजिटल टोकन’ तो कुछ और नहीं, बस रेंडम नंबर हैं. जो केवल लल्लन को ही पता हैं. बल्कि उसे भी नहीं, सिर्फ़ उसके कंप्यूटर को पता हैं. बस लल्लन तो इतना जानता है कि ये कंप्यूटर रेंडम ताले-चाबी के जोड़े तैयार कर रहा है. हर जोड़े की एक वैल्यू. हर जोड़े का ताला कंप्यूटर ख़ुद अपने पास रख रहा है और चाबी कस्टमर को दे दे रहा है.

ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी वो तकनीक है जिसके चलते क्रिप्टोकरेंसी का डिजिटली सुरक्षित तरीके से लेनदेन होता है (प्रतीकात्मक फोटो - इंडिया टुडे)
ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी वो तकनीक है जिसके चलते क्रिप्टोकरेंसी का डिजिटली सुरक्षित तरीके से लेनदेन होता है (प्रतीकात्मक फोटो – इंडिया टुडे)

और यूं आप ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ के कॉन्सेप्ट को अगर अच्छे से समझ गए, मछली जैसे पानी को समझती है, तो आप ‘डिजिटल करेंसी’ को भी अच्छे से समझ जाएंगे. 

चलिए इसके वास्ते ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ को थोड़ा और रिफ़ाइन करते हैं. इस ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ के साथ दिक्कत ये है कि लल्लन तो चेक कर सकता है कि कोड सही है या ग़लत है, पर कोई पान वाला या फिर परचून वाला इन कोड्स या डिजिटल टोकन की जेन्युइनटी कैसे चेक करे? और इस बात की लल्लन को भी क्या पड़ी. लल्लन ने ट्रेडिंग या लेन-देन के लिए ये ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ ज़ारी किए भी नहीं थे.

तो माना अगर आपको ये टास्क दें कि ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ को ‘डिजिटल-करेंसी’ में कैसे बदलें, तो आपको सुनिश्चित करना होगा कि-

चाबी एक के पास रहे लेकिन ताला दुनिया में हर उस बंदे के पास रहे, जो इस डिजिटल करेंसी में लेन-देन कर रहा हो.

इससे हो गई एक दिक्कत सॉल्व. अब एक अंतिम दिक्कत. करेंसी के बारे में आपको पता है कि, ऐसा तो है नहीं कि एक बार इस्तेमाल करने के बाद वो ख़राब हो जाए. तो दिक्कत ये कि-

‘क्या एक बार इस्तेमाल हुआ ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है?’

बिलकुल किया जा सकता है. मतलब कोई लल्लन के पास इस चाबी रूपी कोड को लेकर आए तो लल्लन इस कोड को कंप्यूटर में चेक करे. सही निकले तो ग्राहक को उतने मूल्य का सामान दे दे और इस चाबी या इस कोड या डिजिटल टोकन को अलग रख दे, किसी और को देने के लिए. और जब सबके पास ताला होगा तो हर कोई ये कर सकता है. मतलब ‘लल्लन डिजिटल टोकन’ से ‘डिजिटल करेंसी’ बन चुकी इस चाभी को अब आप करेंसी की तरह ही किसी को दे कर शॉपिंग कर सकते हैं, जब तक चाहें अपने पास रख सकते हैं या किसी से पेमेंट ले सकते हैं.

लीजिए हो गई डिजिटल करेंसी तैयार. 

बिटकॉइन एक क्रिप्टोकरेंसी है (फोटो साभार - इंडिया टुडे)
बिटकॉइन एक क्रिप्टोकरेंसी है (फोटो साभार – इंडिया टुडे)

# 4) डिजिटल ट्रांजिक्शन v/s डिजिटल करेंसी 

देखिए डिजिटल ट्रांजिक्शन तो हम ख़ूब करते आए हैं. किसी को NEFT या RTGS ट्रांसफ़र करना हो, PAYTM के माध्यम से भुगतान करना हो , या क्रेडिट कार्ड के माध्यम से अमेज़न, मिंत्रा या फ़्लिपकार्ट में शॉपिंग करनी हो,  इन सभी डिजिटल ट्रांजिक्शन के बैकग्राउंड में करेंसी होती है. बस लेन-देन ऑनलाइन हो रहा. मतलब अगर आपने डिजिटली दिल्ली से अल्मोड़ा किसी को पैसे ट्रांसफ़र किए, तो वो वहां के माल रोड वाले SBI ATM से कैश निकाल सकता है. ये हुआ डिजिटल-ट्रांजिक्शन या डिजिटल लेन-देन. जबकि लल्लन के डिजिटल कूपन का, या यूं कहें कि डिजिटल करेंसी के पूरे कॉन्सेप्ट का ही कंप्यूटर के बाहर कोई मोल नहीं. उसके बेस में कोई भी करेंसी, रुपया, डॉलर या यूरो नहीं है, या कम से कम ऐसा होना आवश्यक शर्त नहीं है.

अच्छा, अब क्रिप्टो करेंसी को हम समझेंगे अगले एपीसोड में, अच्छे से. और अगले एपिसोड में जानेंगे करेंसी, ऐसेट और इन्वेस्टमेंट के बीच में अंतर. तब तक के लिए विदा.


पिछला वीडियो देखें: क्रिप्टो करेंसी, बिटकॉइन और डिजिटल करेंसी में क्या अंतर है?

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