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'तुम आ जाओ, कि जैसे सालों की देरी के बाद अदालत का फ़ैसला आए'

निखिल सचान ने आईआईटी निकाला. आईआईएम भी. इन जैसे लड़कों के कारण ही जाने कितने रामबिहारी टेक्निकल कॉलेज में पढ़ने वालों को बाप घर से निकाल देते हैं. हम निखिल सचान को ऐसे जानते हैं कि वो किताबें लिखते हैं. हिंदी की किताबें, जिनके कवर की फोटो को फिल्टर लगाकर इंस्टाग्राम पर डालो तो कोई चूं नहीं करता. निखिल कानपुर के हैं. आइए आज एक कविता रोज़ में पढ़ते हैं उनकी कविता – तुम आ जाओ.


तुम आ जाओ

तुम आ जाओ,

कि जैसे छुट्टी की घंटी बजे
और बच्चें ख़ुशी से भागते आएं
मटकते, खिलिखाते, किलकिलाते, उतराते
पैंट की बद्धी, बुस्शर्ट, बस्ता संभाले
स्कूल की हज़ार गप्पी बात लिए,
मां के गले लग जाएं

तुम आ जाओ,

कि जैसे सालों की देरी के बाद
अदालत का फ़ैसला आए

और किसी सूदखोर से लड़-झगड़कर
एक बेचारे सच्चे आदमी को
जनम भर की फंसी हुई पूंजी, ज़मीन
असल और सूद के साथ मिल जाए

तुम आ जाओ,

कि जैसे पहाड़ों में सीना फुलाकर
कोई महबूब का नाम चिल्लाए
उसकी आवाज़ गूंज कर लौट आए
और सब ओर से उस पर बे-इंतहा बरसे
बिखरे, टूटे, छिटके, चिपटे
और उससे कस के लिपट जाए

तुम आ जाओ,

कि जैसे आंगन में बिन-पूछे-बुलाए
खोई हुई गौरैया चली आए
अपनी चोंच से गर्दन काढ़े, तिनका खाए,
सांस भरे और ऊन का गुल्ला हो जाए
बुद्धू जैसी घंटों घूरे
चूं-चूं कर के बोले-बताए

तुम आ जाओ,

कि जैसे किसी को बे-मौसम बुखार आए
और देह के रोम-रोम में समा जाए
उसे तपाए, तोड़े, कपाए, सताए
माथे तक चढ़ जाए
दवा, डाक्टर, जंतर-तंतर, होमियो-एलो
सबको धता बताए

तुम आ जाओ,

कि जैसे होली में गांव के घर-घर
‘जोगीरा-सा-रा’ गाती
टोली में झूमती फ़ाग आए
भांग, अबीर, मंजीरा, ढोलक
झांझर, गुझिया, कान्हा, राधा,
पंचम सुर में धैवत गाए

तुम आ जाओ,

जैसे किसान के खेत में मूसलाधार बारिश आए
मजदूर की आंख में नीद पसर आए
सरहद से किसी का फ़ौजी आए
मौसम की फसल में बाली आए
बारिश में भुट्टे की महक आए
बच्चे को छुट्टे की खनक आए
सुबहों को सूरज की धनक आए

तुम आ जाओ,

कि जैसे तुम हर बार
आती हो
और तुम्हारा आना
हिंदी की सबसे ख़ूबसूरत क्रिया
बन जाती है!


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