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'कभी नदी-सी बहती है कभी कहानी कहती है'

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प्रिय पाठकों,

आज ही के दिन यानी 16 अप्रैल को (साल 1853) भारत में पहली पैसेंजर ट्रेन चली थी- मुम्बई से थाणे के बीच. यह एक ऐतिहासिक घटना थी. यातायात के एक बेहद ज़रूरी साधन के रूप में ट्रेन हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा बनी. हमारे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में रेल और रेल यात्राएं इस तरह घुली मिली हैं कि हिन्दी सिनेमा या बॉलीवुड ने रेल की पृष्ठभूमि पर कई फ़िल्में बना डालीं. गाने भी फिल्माए गए. इसके अलावा हिन्दी में कविताएं भी लिखी गईं.

हिन्दी के मशहूर ग़ज़ल लेखक कान्ति मोहन सोज़ ने ग़ज़लों,  गीतों के अलावा बाल-कविताएं भी लिखी हैं.

एक कविता रोज़ में आज पढ़िए यह कविता-

रेलगाड़ी

छुक-छुक छुक-छुक रेल चली,
हू-हू करती रेल चली.

बस्ती इधर, उधर जंगल,
चुप्पी इधर, उधर हलचल.

बालू इधर, उधर दलदल,
जमना इधर, उधर चम्बल.
करती ठेलम-ठेल चली,
हू-हू करती रेल चली.

बस्ती हो या वीराना,
अपना हो या बेगाना.

दाना हो या दीवाना,
फ़र्क नहीं इसने जाना.
सबसे करती मेल चली,
छुक-छुक करती रेल चली.

कभी नदी-सी बहती है,
कभी कहानी कहती है.

कभी खड़ी ही रहती है,
शीत-घाम सब सहती है.
आह नहीं मुंह से निकली,
छुक-छुक करती रेल चली.

पगली-सी चिल्लाती-सी,
रह-रह शोर मचाती-सी.

दिल की आग छिपाती-सी,
हंसकर धुआं उड़ाती-सी.
तन पर सब-कुछ झेल चली,
छुक-छुक करती रेल चली.

चलो रेल के संग चलें,
बनकर सदा दबंग चलें.

मन में लिए उमंग चलें,
बनकर वायु-तरंग चलें.
चलो कि जैसे रेल चली,
करती ठेलमठेल चली.

छुक-छुक करती रेल चली


(साल 2016 का नवम्बर. इस गुनगुने महीने में ‘आज तक’ ने एक दो दिवसीय साहित्य उत्सव के बहाने कुछ सरगर्मियाँ पैदा कीं. इन सरगर्मियों को बढ़ाने में एक बड़ा किरदार ‘लल्लनटॉप कहानी कॉम्पिटिशन’ का भी रहा. यह हिन्दी के इतिहास में पहला मौक़ा था जब साहित्य के किसी समारोह में इस तरह की कोई प्रतियोगिता आयोजित की गयी. कहानी मौके़ पर ही लिखनी थी-हिन्दी में और देवनागरी लिपि में-आयोजकों द्वारा दी गयी कलम और कॉपी पर. कहानी अपने मनचाहे विषय पर लिखने की छूट थी. सुबह से शाम तक का वक़्त था-एक मौलिक और सर्वथा अप्रकाशित-अप्रसारित कहानी गढ़ने-रचने के लिए. इस प्रक्रिया में देश के अलग-अलग स्थानों से आये क़रीब 500 कहानीकारों ने हिस्सा लिया और कहानी लिखी. इन कहानियों में से 16 कहानियाँ चुनकर यह किताब बनी है. इस चयन के बारे में बेशक यह कहा जा सकता है कि इसमें कहानीकार नहीं कहानियाँ पढ़ने को मिलेंगी. इस सन्दर्भ में और स्पष्टीकरण आत्मप्रशंसा में ले जायेगा. इसलिए इससे बचते हुए ये कहानियाँ अब आपके सामने हैं…)

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एक कविता रोज़ में पढ़िए कुछ कविताएं:

एक कविता रोज़: मैं तुम्हारे ध्यान में हूं!

ठोकर दे कह युग – चलता चल, युग के सर चढ़ तू चलता चल

एक कविता रोज: चीनी चाय पीते हुए

चाहे बोलो, चाहे धीरे-धीरे बोलो, स्वगत गुनगुनाओ, चाहे चुप रह जाओ


वीडियो देखें:

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