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एक कविता रोज़ में पढ़िए 'परमाणु बम'

आश्चर्य आकलन करने जैसा कुछ था नहीं वहां. न आदमी की विलक्षण कल्पनाशीलता की कोई जगह थी!

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पेशे से पत्रकार देवांशु कुमार झा ने अपने समय की ‘वाचालता’ को, उसके ‘डेसीबल’ को काफी नज़दीक से देखा, सुना और जिया है. आपकी कविताओं की पुस्तक में संकलित कविताएं (जैसे – गौरैया, शरद, स्मृतियां, धूप, भिखारी आदि) इसके टाइटल – ‘समय वाचाल है’, को जस्टिफाई करती हैं. प्रस्तुत कविता ‘परमाणु बम’ उसी संकलन की एक ‘कुछ-कुछ रिपोर्ताज’ शैली में लिखी कविता है.

कविता की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दिनों के रिपोर्ताज की तरह होती है, और कविता अपने अंत तक आते-आते भावनात्मक हो जाती है. अतः इसे ‘एंटी-वॉर पोएम’ कहा जा सकता है. कविता अपने प्रारब्ध में जहां कवि के पत्रकारिता-अनुभव के चलते घटनाओं का चित्रण हूबहू कर सकने में पूर्णतया सक्षम है वहीं वह अंत तक आते आते युद्ध और उसकी प्रासंगिकता पर महत्वपूर्ण प्रश्न-चिन्ह लगा के अपनी परिणीति को प्राप्त होती है.

युद्ध की अपनी सीमाओं के बीच
वहां जीवन वैसा ही चल रहा था
जैसा कि जीवन में युद्ध चलता रहता है
बच्चे अपने बचपन में थे
और युवा विचार कर रहे थे कि
जल्द ही जापान को इस जद्दोजहद से निजात मिल जाए शायद
महिलाएं सुबह के बाद दोपहर की फ़िक्र में थीं
और बूढ़ों में से कुछ देख रहे थे अखबार
जहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध की रपट छपी थी
जर्मनी के उखड़ चुके पांवों की छाया
इन सभी क्रियाकलापों, विचारों के बीच ही
आसमान में एक परिंदा मंडराया था
बच्चों ने कौतुहल से उसे देखा
बुजुर्गों ने झांका संशय के झरोखों से
और युवा पहचान करने में व्यस्त रहे कि
चिड़िया देश की है या पर्यटक पक्षियों में से है कोई एक
बस इससे पहले और इसके बाद
कभी किसी चिड़िया ने इतनी लंबी यात्रा तय नहीं की
न ही समय कभी भी एक क्षण में छिटक सका
आश्चर्य की उतनी आंखें
न धरती ने अपनी गर्मी से कभी
उतने हत्यारे बादल पैदा किये
न ज्वालामुखी विस्फोटों के लावे
उतने लाल दिखे कभी, यहाँ तक कि
अमावस की अनंत रातें मिलकर भी
उतना स्याह अंधेरा न कर सकीं
ये सब हुआ पर
आश्चर्य आकलन करने जैसा कुछ था नहीं वहां
न आदमी की विलक्षण कल्पनाशीलता की कोई जगह थी
न अगस्त के माह में चली अननुभूत प्रचंड लू को समझने का था अवसर
अगर कुछ था तो सिर्फ यह कि
धरती ने मनुष्य को विज्ञ बनाने में जितने वर्ष खर्च किए
और जितने संसाधनों को दिल खोलकर लुटाया
मनुष्य ने उसे एक क्षण में सूद समेत वापस लौटा दिया था.

समय वाचाल है - मुखपृष्ठ
समय वाचाल है – मुखपृष्ठ

पुस्तक का मूल्य दो सौ रूपये मात्र है और आप इसे प्राप्त करने के लिए प्रभात प्रकाशन  से संपर्क कर सकते हैं.


 

वीडियो में देखें पत्रकार सलमान रुश्दी के रोने का किस्सा


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