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'इस प्रकार लिखा जाना ही पुरालेख होता है'

प्रिय पाठको,

वसंत और प्यार के महीने फरवरी का आज आखिरी दिन है. वैसे महीना कोई भी हो विपत्ति और दुर्घटनाओं से नहीं बचा जा सकता यों एक कवि कह गया है. फिर भी हमने कोशिश की कि एक कविता रोज़ में फरवरी के इस पूरे महीने को वसंत और प्रेम से भर सकें.

हिंदी कविता कैसे आज यहां तक पहुंची है, इसकी एक झलक गए 27 दिनों में आपने देखी.

इस दरमियान संस्कृत, अपभ्रंश, मैथिली, हिंदवी, सधुक्कड़ी, ब्रज, अवधी, राजस्थानी जैसी भाषाओँ-बोलियों और भक्तिकाल, रीतिकाल, छायावाद, प्रगतिवाद, नई कविता जैसे काव्य-आंदोलनों से होते हुए आधुनिक कविता के लीजेंड कवियों को आपने पढ़ा. जैसे :

कालिदास, राजशेखर, भर्तृहरि, सरहपा, अब्दुल रहमान, विद्यापति, अमीर खुसरो, कबीर, सूरदास, जायसी, मीरा, तुलसीदास, बिहारी, घनानंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, सुमित्रानंदन पत्र , महादेवी वर्मा, अज्ञेय, भवानी प्रसाद मिश्र, हरिवंश राय बच्चन, धर्मवीर भारती, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, नागार्जुन, शमशेर.

अब इस सीरीज का समापन हम आज की हिंदी-कविता में लगभग भुला दिए गए कवि नरेश मेहता से कर रहे हैं.

नरेश मेहता (15 फरवरी 1922 – 22 नवंबर 2000) ने 10 कविता-संग्रह, 4 खंड-काव्य, 3 कहानी-संग्रह और 7 उपन्यासों समेत साहित्य की करीब-करीब सारी विधाओं में लिखा.

संशय की एक रात (काव्य), यह पथ बंधु था (उपन्यास), जलसाघर (कहानी-संग्रह), मुक्तिबोध : एक अवधूत कविता (विचार-स्मरण) उनकी कुछ यादगार कृतियां मानी जाती हैं.

भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित नरेश मेहता की प्रतिनिधि कविताओं के चयन (जहां जहां क्षितिज है) के संपादक आलोक श्रीवास्तव इस चयन की भूमिका में कहते हैं :

‘‘हिंदी आलोचना के एकायामी रुझान और पाठकीय समाज के अभाव ने जहां एक ओर नरेश मेहता के काव्य को साहित्य की मुख्यधारा के हाशिए पर डाल दिया वहीं साहित्यिक मठों, पुरस्कारदाता सत्ताओं और गद्गद श्रद्धालुओं की जमात ने उनकी रचना के ऊपरी स्तरों को महिमामंडित करने का काम किया.’’

यहां हम बहुत हर्ष और गर्व के साथ जिंदगी और प्रकृति के राग को गाने वाले अनूठे कवि नरेश मेहता की एक कविता ‘धूप की भाषा’ से इस सीरीज का समापन करते हैं. यह कविता इस मौसम और इस मौके की नजाकत के बिल्कुल अनुकूल है. पढ़िए :

धूप की भाषा-सी
खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया!
शॉल-सा
कंधों पर पड़ा यह फाल्गुन
चैत्र-सा तपने लगेगा!

केश सुखा लेने के बाद
ढीला जूड़ा बना
तुम तो लौट जाओगी,
परंतु तुम्हें क्या पता, कि
तुम—
इस गवाक्ष आकाश और
बालुकणों जैसे रिसते
इस नि:शब्द समय से कहीं अधिक
मुझमें एक मर्म
एक प्रसंग बन कर लिखी जा चुकी हो
प्रिया!
इस प्रकार लिखा जाना ही पुरालेख होता है

हवा, तुम्हारा आंचल
मुझमें मलमली भाव से टांक गई है
जैसे कि पहली बार
मेरे आकाश को मंदाकिनी मिली हो
भले ही अब यहां कुछ भी न हो
फिर भी
तुम्हारी वह चीनांशुक-पताका
कैसी आकुल पुकार-सी लगती है
जैसे कि उस पुकार पर जाना
इतिहास में जाना है—
जहां प्रत्येक पत्थर पर
अधूरे पात्र
और आकुल घटनाएं
अपनी भाषा की तलाश में कब से थरथरा रही हैं

इससे पूर्व, कि
यह उजाड़ रूपमती महल लगे
समेट लो अपनी यह वैभव-मुद्रा
इसलिए धूप की भाषा-सी
खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया!
इतिहास में जाकर फिर लौटना नहीं होता!
***

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