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एक कविता रोज़: वसंत में सब कुछ बहुत मोहक और आकर्षक हो गया है

प्रिय पाठको,

आज फरवरी का पहला और वसंत का पांचवां रोज़ है. फरवरी और वसंत दोनों ही प्रेम के महीने हैं. यह अलग बात है कि एक कवि कह गया है कि वसंत है, लेकिन फिर भी विपत्ति से बचा नहीं जा सकता. लेकिन इस कवि से बहुत पहले ही कविकुलगुरु कालिदास वसंत के विषय में एक पूरा चैप्टर लिख कर चले गए हैं — ‘ऋतुसंहार’ में.

इस मौसम में हम एक कविता रोज़ के बहाने अपनी परंपरा में उतर कर कुछ बड़े कवियों को और उनके प्यार से भरे हुए कुछ कविता-अंशों को याद करेंगे. इस सिलसिले की शुरुआत हम कालिदास से कर रहे हैं.

कालिदास ने तीन महान नाटक और चार महान काव्य लिखे हैं, लेकिन फिर भी कालिदास से हमारा परिचय पुराना हो रहा है. इसे नया करने की जरूरत है, सो यह बताना हो रहा है.

कालिदास जिस पेड़ पर बैठे थे, उसी की डाल को काट रहे थे… यों कह कर कालिदास को प्राय: विद्वान नहीं एक मूर्ख व्यक्ति के रूप में खूब मशहूर किया गया है. लेकिन इस बताने के पार अगर जाएं तो यह जान पाएंगे कि सारे सच्चे और अच्छे कवि यही तो करते हैं, वे जिस डाल पर बैठते हैं, उसी को काटते हैं. कभी-कभी तो वे शमी के पेड़ को कमल की पंखुड़ी की धार से काटने की कोशिश करते हैं और जब वैज्ञानिक वजहों से वे इस काम में नाकाम होते हैं, तब वे कहते हैं यह वैसे ही है जैसे दुख के पेड़ को सुख की आकांक्षा से काटना. मतलब – टोटल फेल्योर.

‘मुझे चांद चाहिए’ वाले सुरेंद्र वर्मा ने कालिदास की जिंदगी पर एक बहुत बड़ा जो नॉवेल लिखा, उसका नाम भी तो यही रखा : ‘काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से’.

खैर, कालिदास को अगर समझना है तो इतिहास के फरेब से नहीं किस्सों के सच से समझना होगा. कहते हैं कि कालिदास के मां-बाप का इंतकाल तब हुआ जब कालिदास बहुत छोटे थे. मामा के घर नंदीग्राम में वह पले-बढ़े.

एक रोज़ जब 22-23 बरस के कालिदास ने अपनी पहली किताब ‘ऋतुसंहार’ लिख ली, तब अपनी गर्लफ्रेंड मुग्धा को देखते हुए कालिदास ने कहा : ‘‘कितनी गर्मियों की लू झेली है मैंने. कितनी बरसातों में टिप-टिप बरसा पानी गाया है. कितनी बार सर्दियों में बगैर जैकेट और जूतों के रहा हूं. कितने मौसमों को बदलते देखा और इन मौसमों में कितने मनुष्यों को… तब यह ‘ऋतुसंहार’ लिख पाया हूं. दो बरस लगे इसे लिखने में. जो अनुभव बहुत मामूली माने जाते हैं, मैं उनमें एक नया अर्थ भरना चाहता था. पूरा एक बरस लगा टाइपिंग का खर्चा जुटाने में. अब क्या होगा इस पांडुलिपि का मुग्धा?’’

जैसे आजकल के लेखकों-कवियों-पत्रकारों के लिए अपने गांव-कस्बों से निकल कर दिल्ली या दूसरे बड़े शहरों में आना अनिवार्य हो जाता है, वैसे ही कालिदास के समय में भी था.

‘ऋतुसंहार’ लिखने के बाद नंदीग्राम का आकाश कालिदास के लिए बौना हो गया. वह उज्जैन जाने के लिए मचलने लगे.

जैसे कोई विक्रमशिला एक्सप्रेस के जनरल डिब्बे में बैठ कर भागलपुर से नई दिल्ली आए बिल्कुल वैसे ही कालिदास नंदीग्राम से उज्जैन आए.

आगे का किस्सा कुछ यों है कि उज्जैन के एक नामवर आचार्य-आलोचक ने बगैर पढ़े ही ‘ऋतुसंहार’ की पांडुलिपि रद्दी की टोकरी में डाल दी. उस दौर का सबसे बड़ा प्रकाशन-संस्थान भी ‘ऋतुसंहार’ को छापने के लायक नहीं समझता था.

लेकिन कालिदास लगे रहते हैं और अंतत: एक लंबे संघर्ष के बाद उन्हें सब कुछ मिलता है — राज्याश्रय, राजकुमारी, प्रकाशन, मंचन और इस आर्यावर्त का पहला राष्ट्रीय कवि बनने का गौरव.

*

अब कालिदास के कुछ कविता-अंश.  ‘ऋतुसंहार’ का छठवां चैप्टर वसंत पर है.

द्रुमा: सपुष्पा: सलिलं सपद्मं स्त्रिय: सकामा: पवन: सुगन्धि:।
सुखा: प्रदोषा दिवसाश्च रम्या: सर्व प्रिये! चारुतरं वसंते॥

वापीजलानां मणिमेखलानां शशाङ्कभासां प्रमदाजनानाम्।
चूतद्रुमाणां कुसुमान्वितानां ददाति सौभाग्यमयं वसंत:॥

अर्थात : पेड़ों पर पत्तियां कम फूल ज्यादा दिख रहे हैं. तालाबों और झीलों में कमल खिल उठे हैं. स्त्रियां प्यार से भर उठी हैं. हवाएं महकी हुई हैं और शामें अब ऐसी हैं कि घर लौटने की जल्दी नहीं है. ये दिन अच्छे लगने लगें हैं.

डियर, वसंत में सारी चीजें पहले से ज्यादा सुंदर हो गई हैं. वसंत ने ठहरे हुए पानी को, मणियों से बने कंगनों को, चांद की चांदनी को, सुंदर लड़कियों को, आम के पेड़ों को आनंद दे दिया है. कहने का मतलब है कि बहुत कुछ है जो वसंत में मोहक और आकर्षक हो गया है…

*

अब कालिदास के नाटक ‘विक्रमोर्वशीयम्’ का यह अंश देखें. यह भी वसंत के बारे में ही है :

वासार्थं हर संभृतं सुरभिणा पौष्पं रजो वीरुधां
किं कार्यं भवतो हृतेन दयितास्नेहस्वहस्तेन मे।
जानीते हि मनोविनोदनशतैरेवंविधैर्धारितं
कामार्तं जनमज्जनां प्रति भवानालक्षितप्रार्थनः॥

यहां दक्षिण से आने वाली हवा को वसंत का सबसे पक्का साथी बताते हुए कवि उससे कह रहा है कि तुम्हें अगर अपना शरीर महकाना है तो तुम डालियों पर खिले हुए और वसंत के मार्फत इकट्ठा किए हुए फूलों का पराग उठाकर क्यों नहीं ले जाते. मेरी प्यारी के हाथ का लिखा हुआ खत भला तुम्हारे किस काम आएगा? तुम तो खुद अंजना से प्यार कर चुके हो, इसलिए जानते ही होगे कि ऐसी मन बहलाने वाली चीजों को देखकर ही तो ‘लवर्स’ जिया करते हैं.

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