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एक कविता रोज़ में पढ़िए अनामिका अनु की कविताएं

कविताओं से जुड़ा हमारा कार्यक्रम – एक कविता रोज़. आज के एपिसोड में हम आपको अनामिका अनु की कविताएं सुनाएंगे. अनामिका केरल में रहती हैं, पोएट हैं और क्या खूब लिखती हैं. उन्हें 2020 में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से भी नवाज़ा जा चुका है. इसके अलावा अनामिका हंस, समकालीन भारतीय साहित्य, स्त्रीकाल, चौथी दुनिया, और न जाने कितनी जगह छप चुकी हैं. आज के के कविता रोज़ में पढ़िए अनामिका अनु की कविताएं.

क्षमा

तुमने पाप मिट्टी की भाषा में किए

मैंने बीज के कणों में माफ़ी दी
तुमने पानी से पाप किए

मैंने मीन- सी माफ़ी दी
तुम्हारे पापा आकाश हो गए

मेरी माफ़ी पंक्षी
तुम्हारे नश्वर पापों को

मैंने जीवन से भरी माफ़ी बख्शी
तुमने गलतियां गिनतियों में की

मैंने बेहिसाब माफ़ी दी
तुमने टहनी भर पाप किए

मैंने पत्तियों में माफ़ी दी
तुमने झरनों में पाप किए

मैंने बूंदों में दी माफ़ी
तुमने पाप से तौबा किया

मैंने स्वयं को तुम्हें दे दिया
तुम सांझ से पाप करोगे

मैं डूबकर क्षमा दूंगी
तुम धूप से पाप करोगे

मैं माफ़ी में छांव दूंगी

नीरव, नि:शब्द पापों

को झिंगूर के तान वाली माफ़ी
वाचाल पापों को

को मौन वाली माफ़ी
वामन वाले पाप को

बलि वाली माफ़ी
तुम्हारे पाप से बड़ी होगी मेरी क्षमा

मेरी क्षमा से बहुत बड़े होंगे

वे दुःख…

जो तुम्हारे पाप पैदा करेंगे

मैं टूटने की तरकीब हूं

मैं टूटने की तरकीब हूं.

मैं बँधने का इशारा भी. मैं दो ध्रुवों को बांधकर चलती हूं. मैं विस्तार को लपेटकर संक्रीण गलियारों में खोया सच हूं. मैं असंबद्ध भाषाओं के बीच का विवेक हूं जो

दृष्टि सामंजस्य से अनकहे को समझाता है. मैं बार के कोने के टेबल पर बैठा हुआ एकांत हूं. मैं बैरे की प्रश्नवाचक दृष्टि का अनसुलझा,अव्यक्त उत्तर हूं. मैं हूं और इसका उत्सव गीत कोई भी नहीं. मैं नहीं रहूंगा उसका ऐसा मातम मचेगा मानो क्षण भर के लिए बस मैं ही था घर भर में.
एक हरी सब्जी सा फेंट दिया जाऊंगा पकते समय में और थोड़े से में कई रोटियों को खा लेने के अद्भुत साहस के साथ देवता आ बैठेंगे. मैं यीशु के चरणों पर नहीं गिरूंगी, राम के भी नहीं, मुझमें न अहिल्या है, न निरर्थक की वृत्तियां. मैं स्वयं का मातम मनाती एक कथा हूं जो लिख रही हैं ध्वनि की आवृत्तियां. मैं बदल दूंगी वाक्यों के अर्थ ,कथा के हर्ष और विषाद के क्षणों को,तुम्हारे मानचित्र को,तुम्हारे झूठे ढकोसले वाली दुनिया के बदरंग सच को भी.
एक दम घोंटते सत्य को विखंडित करते कई शब्द. एक ढिठाई जो हमेशा से सरोकार हीन थी, एक दीनता जो एक दिन निर्णय लेकर पहुंच गयी पहाड़ी पर और कविता कब कैसे खड़ी हो गयी पर्वतों का हाथ थामे. अब वह प्रपातों से नहीं डरती ,कलरव में केवल स्वर नहीं होता. इसमें ‌ गंध, संघर्ष और गति भी होती है.

मैं कोट्टारक्करा तंपुरान (राजा) का रामनाट्टम हूं, मैं

मंदिरों में पुष्प बटोरती स्त्रियों की दासीअट्टम हूं.

आश्वासन की तरह प्रेम बरसा और उसने चाहा विश्वास भीगे ,क्या संभव था? जब तक प्रेम विश्वास के साथ नहीं उखाड़ता जड़ता के बोध को व्यक्ति प्रेम नहीं करता.
जिनके के लिए प्रेम खेल है उनको प्रेम में खिलौने मिले।जिनके लिए प्रेम श्रद्धा थी, उन्हें प्रभु मिले. जिनके लिए साहचर्य ,उन्हें साथी मिले. जिनके लिए समर्पण उन्हें स्वर्ग और जिनके लिए समय था, उन्हें जीवन के कुछ और वर्ष. जिनके लिए डर था उन्हें स्मृतियां मिली. जिनके लिए साहस, उन्हें साथ मिला. जिनके लिए

सबकुछ उसे सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रेम मिला.

डाॅक्टर नायर की फ़िल्टर काॅफ़ी

उदास पलों में झूले झूलती हूं. जब इसकी रस्सी नई थी तो रंग पीला, चमकीला पीला था. नायलाॅन की रस्सी. चंद बारिशों की मार और धूप का दुलार क्या पाया, ऊपर से धूसर हो गयी, भीतर अब भी पीला बचा है. संभावनाएं बाहर से निर्वासित होकर भीतर की ओर प्रस्थान कर लेती है. वह आंखों में काजल नहीं लगाती भीतर में कितनी सजी आंखें हैं और कितने दृश्यों का है आना जाना.
बादाम के कोलम पत्ते नारियल के तने को सहला रही हैं ,स्पर्श की कौन-सी परिभाषा इनकी अनुभूतियों में लिखी है ,मूकता की पोटली खोलकर जानना आसान नहीं.
टकाचोर और आम के पल्लवों के बीच कौन-से ध्वन्यात्मक सिलसिले हैं ,कौन से रसों को पीकर ये तितलियां काली और सफ़ेद रही फुदकती हवा में.

डस्टर से जब भी पोंछती हूं ब्लैक बोर्ड बायोटेक्नोलॉजी

लिखते-लिखते मन साउदर्न ब्लाॅटिंग पर अटक जाता है.

चयनात्मक विस्मृतियों के लिए क्या डी एन ए उत्तरदायी है…

डाॅ नायर नहीं मानते और कहते रहते हैं

ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसॉर्डर होता है कुछ लोगों में

लेखकों में भी होता होगा

उनकी पत्नी दस बार नहा कर बाहर निकली हैं

आंखों से पूछती है मुझसे

आज फिर बारिश होगी?

मैं मुस्करा देती हूं

रसोई से अवियल की गंध आ रही है

जाॅर्जिया ओ’ कीफ़ के चित्र

लीनियस ने कहा

जननांग तय करेगा तुम्हारा वर्ग
शिष्टभाषा में वेश्यालयों को फूलों का बाज़ार कहते हैं

कान और कलाई पर फूल लगाए पुरूष

आलपीन गूंथे गुलाब
मर्द का शरीर मानव का शरीर है

यह मानक है

अन्य शरीर

तुलनात्मक अध्ययन की वस्तु

अंतर क्या है?

क्यों है?

वेजाइना

तलवार की म्यान
तुम्हें पता है सखि

गर्भाशय के पीछे कौन है

एक पुरूष हैं

जेम्स डगलस
योनि की बाहरी परत पर

बार्थोलिन का नाम लिखा है

जी स्टाॅक पर

अर्न्स्ट ग्रैफ़ेनबर्ग

अंडाशय के क़रीब

गैब्रिएल फैलोपियन
योनि की झिल्ली में यूनानी देवता हाइमेन

वह संभोग की प्रथम रात्रि का भोग
हिस्टीरिया और हिपोक्रेटस

तुम जानती हो शीथ का अर्थ

लैटिन भाषा का वह‌ शब्द…
सखि! तुम्हें याद है

स्वीडन का एना कोस्तोविक्स

स्नॉप का स्निपा में रूपांतरण

पुरूष जनेंगे स्त्री शब्द

क्लेटोरिस को बंद करो
देवताओं को आराम दो

इनकी कारस्तानियों को भी

इनके ज्ञान की सीढ़ी हटाकर

चलो मिट्टी पर नाम लिखते हैं

 

कोच्चि फ़ोर्ट से

काम और अध्यात्म के बीच लटका क्रूस हूं

बजती घंटी की भीतरी दीवार का घर्षण हूं

कड़क से टूट कर चूर हुई धूप का बिखरा, टूटा फैलाव हूं
नारियल के पत्ते की फटी छांव,

चर्चगीत, कोच्चि फ़ोर्ट की शांत सुबह के बीच

बेचैन मानसिक आंदोलन

करूण कैरोल मेरे अंदर

उम्मीद के येशु का जन्म

आमीन इस तरह से कहा जाता है

कि मेरा शिशु खिलखिला उठता है

कोच्चि फोर्ट में बिनाले

एसपिन हाॅल के पास

मेरा येशु जन्म लेता है

येशु की जन्मस्थली मेरी आत्मा

प्रार्थना की धुन

उत्सव गीत

कोई न पूछे

मेरे शिशु का पिता कौन है?

संबंधों को पिछली रात पोतों में भरकर बहा दिया था

खारे समुद्र में

रवाना होते जहाज़ों में स्टील की कीलें, ज़ंजीरें

क्रूस और हथौड़ा

मेरा येशु खिलखिला रहा है

मैं वर्जिन सिनेमा हूं

मैं वर्जिन सिनेमा हूं

न रिचर्ड ब्रेनसन वाली

न एम जी एम वाली

मरी देवकन्या

को होगा पूर्वाभास

मैं चारूलता के म्यूजिक रूम

से देख रही हूं अपराजित देवी,

कापुरूष, महापुरूष, नायक और

सारा संसार
तीन कन्या चिड़िया खाना में आगंतुकों

की कर रही है प्रतीक्षा

शतरंज की चाल चल रही है क़िस्मत

जन अरण्य में एक भी मनुष्य नहीं

जो रूदन का जवाब सांत्वना से दे

और मौत का जीवन से

 

मेरे गर्भ में रहना

मेरे गर्भ में रहना

स्त्री या पुरुष होकर मत आना

न‌ ही किन्नर

बाहर चरित्र तौलने के बड़े-बड़े तराज़ू लगे हैं

जीभ की बाट पर तौले जाओगे तुम

धर्मयुद्ध में ख़र्च हुआ

एक मात्र सामान

नैतिकता के बट्टें थें
गर्भ की दीवार बहुत कोमल है

रौशनी वहां कम है

यहां की दीवारें सख़्त

रौशनी सिर्फ़ और सिर्फ़ आंखें चौंधियाने वाली
तुम वहीं रहना, चूसना मेरे कोख में उपलब्ध रस

मैं कविता सुनाऊंगी

तुम सुनना

अपनी उंगली से मेरे शिशु

कोख की अंतः भित्ति पर लिखना

तुम कविता

मैं अंतः सिक्त और पुनर्जीवित होना चाहती हूं

मैं स्वार्थी नहीं हूं

यहां बाहर कुछ भी ठीक नहीं है

मैं जेल में हूं

गर्भ में हो तुम

और कंठ में घिस कर तेज हो चुका इंक़लाब


 

 

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