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एक कविता रोज़: क़त्ल करने की जगह हमेशा मौजूद रहती है घर में

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करीब तीस बरस के गौरव सोलंकी यू.पी. के मेरठ में पैदा हुए. बचपन राजस्थान के हनुमानगढ़ के एक शांत कस्बे संगरिया में बीता. साल 2008 में रुड़की से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हुए. बाद इसके दिल्ली आए और साहित्य-सिनेमा-समाज पर लिखकर खूब मशहूर हुए. भारतीय ज्ञानपीठ से कविताओं की एक किताब आई, लेकिन कहानियों की किताब हिंदी की साहित्यिक राजनीति के चलते नहीं आ पाई. इससे त्रस्त होकर साहित्य-लेखन की घाटियों में फिलहाल संन्यासी बने हुए गौरव मुंबई में रहते हैं और सिनेमा-लेखन में रम रहे हैं. ‘अगली’ के गाने लिख चुके हैं. आज एक कविता रोज़ में पढ़िए गौरव की यह कविता…

क़त्ल करने की जगह हमेशा मौजूद रहती है घर में

कमरे दो हों या हज़ार
क़त्ल करने की जगह हमेशा मौजूद रहती है घर में
मैं एक फंदा बना कर बैठा रहा कल सारी रात
कि तुम जगोगी जब पानी पीने

मैंने अपनी इस आस्था से चिपककर बिताई वह पूरी रात
कि गले में कुछ मोम जमा हुआ है मेरे और तुम्हारे
और वही ईश्वर है
जो हमें बोलने, उछलने और खिड़की खोलकर कूद जाने से रोकता है
वही रोकता है जम्हाई लेने से भी कभी-कभी
पर कसाई होने से नहीं

कैसे बिताई मैंने कितनी रातें, इस पर मैं एक निबंध लिखना चाहता हूं
इस पर भी कि कैसे देखा मैंने उसे सोते हुए,
सफेद आयतों वाले लाल तकिये पर उसके गाल,
वह मेरे रेगिस्तान में नहर की तरह आती थी

वह जब सांस लेती थी तो मैं उसके नथुनों में शरण लेकर मर जाना चाहता था
उसकी आंखें उस फ़ौजी की आंखें थीं, जिसने अभी लाश नहीं देखी एक भी
और वह हरा फ़ौजी ट्रक में ख़ुद को लोहे से बचाते हुए चढ़ रहा है
जैसे बचा लेगा

यूं वो इश्क़ में खंजरों पर चली

अजायबघरों की तरह देखे उसने शहर
सुबह से रात तक पसीना पोंछते,
कभी ख़ुद की, कभी दूसरों की देह नोचते लोग
और आत्मा महज़ एक उपकरण थी
जिसे जब बच्चों को डराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा रहा होता था
तो कोई भी कवि किसी भी शब्द की जगह रख देता था उसे

हम जब इतने क़रीब लेटे थे एक रात
और द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान की किसी कहानी की तरह
ब्रेड का एक सूखा टुकड़ा हमारे बीच पड़ा था,
मैंने उससे कहा कि काश मैं तुम्हारे लिए एक अंगीठी ला सकता
और आपको विश्वास न हो भले ही, विश्वास पाना मेरा काम भी नहीं,
लेकिन उससे लंबे समय तक कभी किसी और बात ने नहीं किया मुझे उदास

मैं जब हंसता था
तो वह परियों की तरह सोती थी

फिर मैं बार-बार उसका अपहरण कर लाता रहा
माफ़ी मांगने और माफ़ करने को हम कुछ ज़्यादा ही गंभीरता से लेने लगे
मौत के सिरहाने भी की हमने कई दफ़े
एक-दूसरे के अपराध की बातें, बेशर्मी से

वो मुझ पर बरसने के लिए समंदर में डूबती रही महीनों
और इससे ज़्यादा मुझे याद नहीं

एक औरत एक थैला लेकर अतीत में जा सकती है
मुझे अकेले भी नहीं आता यह

मुझे टाई ठीक से बांधना सिखाया मेरी मां ने,
एक हाथ से तोड़ना रोटी का कौर
लेकिन नसीब उसका कि
मोहब्बत के बारे में वह कुछ ख़ास नहीं जानती थी

वैसे भी प्यार के गीतों के ख़िलाफ़ एक साज़िश में
गैर-इरादतन ही सही, पर मुब्तिला हूं मैं लगातार
और जब आप इस सावधानी के साथ सो रहे हों
कि सुबह उठते ही किसी बिच्छू पर न पड़े पैर
तो मुझे नहीं लगता कि ख़ुशबुएं पहचानने की कोई कला आपके साथ सोएगी

उसने मुझे घर चुना, मैंने उसमें खोदे गड्ढ़े
उसका जिस्म जीतने की ज़िद में उसकी आत्मा लौटाई मैंने कई मर्तबा
पर पसीने से इस कदर भीगा था मेरा गला
मुझे ऐसे डराया था ऊंचे कद के कुछ लड़कों ने स्कूल में
कि मैं उसे चूमता था तो इम्तिहान देता था जैसे

नल से पानी पीते हुए
मैं अब भी पीछे मुड़कर देखता हूं बार-बार पेड़ों की तरफ़,
अंधेरे में पायल बजती हैं मेरी छाती पर,
कोई औरत ज़रा नरमी से मेरा हाथ पकड़े
तो मुझे लूट सकती है किसी भी सरकार की तरह,
यहां मैं अपने अपाहिज होने का कहूं
तो आपको इश्तिहार लगेगा कोई

ख़ैर, अगर आप उस रात पर ही अटके हैं
जब क़त्ल करने की जगह मौजूद थी हमारे बीच
तो हुआ यूं कि सुबह ज़हर मिलाया मैंने उसकी चाय में
और फिर मैं ब्रश करने गया
क्योंकि ऐसे क्या देखता उसे मरते हुए?

पूरे वक़्त एक पैन था उसके हाथ में
और जब मैं लौटकर आया तो वह एक घोड़े पर लेटी थी,
अपनी नज़र पर मुझे यक़ीन नहीं हालांकि

वो चादर उसकी
जब धुलने गई तो धोबी ने कहा कि
पचास बार लिखा है इस पर आपका नाम
***

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