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एक कविता रोज़: दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता

दिसंबर धीरे-धीरे गुजर रहा है. इस महीने पर हिंदी में कुछ सुंदर कविताएं हैं. इनके कवियों ने इस महीने की कई रंगतें अपने हर्फ़ों में उकेरने की कोशिश की है. निर्मला गर्ग ने तो अपने एक कविता-संग्रह का नाम ही ‘दिसंबर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगता’ रखा है. निर्मला हिंदी की चर्चित कवि हैं. एक कविता रोज़ में पढ़िए इसी संग्रह से उनकी एक कविता.

***

दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता

दिसंबर सर्द है ज्यादा इस बार
पहाड़ों पर बर्फ गिर रही है लगातार
दिसंबर का महीना मुझे आख़िरी नहीं लगता
आख़िरी नहीं लगती उसकी शामें

नई भोर की गुजर चुकी रात नहीं है यह
भूमिका है उसकी

इस सर्द महीने के रूखे चेहरे पर
यात्रा की धूल है
फटी एड़ियों में इस यात्रा की निरंतरता

दिसंबर के पास सारे महीने छोड़ जाते हैं
अपनी कोई न कोई चीज
जुलाई बारिश
नवंबर पतझड़
मार्च सुगम संगीत
तेज ठंड ने फिलहाल धकेल दिया है सभी चीजों को
पृष्ठभूमि में

‘पारा शून्य छूते –छूते रह गया है’
समाचारों में बताया गया
ऐसी ही एक सुबह मैं देखती हूं
एक तस्वीर
रात है…
कुहरा छाया है
अनमना हो आया है कुहरे में बिजली का खंबा
चादर ओढ़े फुटपाथ पर कोई सो रहा है
नीचे लिखा है :
जिन्हें नाज है हिन्द पर…!

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