Submit your post

Follow Us

‘आज पेड़ मांग रहा है, कल को मेरी जान मांग लेगा. परसों कुछ और मांग लेगा.’

रामकुमार सिंह. राजस्थान के फतेहपुर से हैं. मौजूदा वक्त में मुंबई रहते हैं. फिल्मों में काम करते हैं. सरकार 3, जेड प्लस, भोभर जैसी फिल्मों की कहानी लिख चुके हैं. अनारकली ऑफ आरा में पत्रकार का रोल किए थे. कास्टिंग, म्यूजिक, प्रोडूसर वाले काम करते रहते हैं. इन दिनों लोककथाओं को दिलचस्‍प अंदाज में पुनर्पाठ के साथ ‘बातपोश’ नाम से पॉडकास्‍ट कर रहे हैं. एक कहानी रोज़ में आज पेश है रामकुमार सिंह की लिखी, सींव का पेड़. रामकुमार से उनके ई मेल indiark@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है.


सींव का पेड़

वो पेड़ था खेजड़ी का. खेत की ‘सींव’ से सटा हुआ. सींव और पेड़ के बीच की दूरी बस इतनी कि कच्‍ची सींव की जगह पक्‍की दीवार बना दी जाए तो भागती हुई गिलहरी पेड़ और सींव के बीच से निकल जाए लेकिन उसका पीछा करती बिल्‍ली उसमें फंस जाए.

सामान्‍य धारणा यह थी कि यह पेड़ अपने खेत के बीच में रघुनाथ और लच्‍छू के बापू हरचंद राम ने लगाया था लेकिन यह सच नहीं था. रेगिस्‍तान में सूखी-उदास जमीन पर खेजड़ी का पेड़ एक सपने की तरह उगता है. चुपचाप, अपने आप. वह आसमान की तरफ सिर उठाता है. ईश्‍वर और प्रकृति को चुनौती देता है कि हालत कितनी भी खराब हो, वह कम खा-पीकर भी सिर उठाएगा. एक दिन लहराएगा. खेजड़ी का पेड़ राजस्‍थान के सूखे में क्रांतिकारी की तरह मशाल उठाए खड़ा दिखता है. जैसे सारी आग, सारी आंधियों से वह अकेले लड़ सकता है. रेगिस्‍तान के आदमी के लिए वह हौसला है. जैसे कह रहा हो कि मैं यहां लड़कर अपने आपको बचा सकता हूं तो तुम्‍हें क्‍या दिक्‍कत है?

ऐसा ही कोई क्षण रहा होगा, जब हरचंद राम को शिशु दिनों में यह छोटा मुस्‍कराता हुआ पौधा दिख गया था. उसने उसे पाल पोषकर बड़ा किया था. उसके चारों तरफ कंटीले झाड़ लगाकर म‍वेशियों से बचाया. उसे कोई पांच साल तक हल की नोंक में फंसने से बचाया ताकि उखड़ ना जाए. धीरे धीरे यह बड़ा हो गया. इतना बड़ा कि इसे जितना लाड़ प्‍यार दिया गया था, उतना ही उसने उस परिवार में लौटाया भी. मार्च में पतझड़ के बाद जब नए पत्‍ते आते थे तो उनके साथ मिमझर से लदपद हो जाता था. कुछ ही दिनों में लटकती हुई सांगरी दिखती थी. यह दृश्‍य ही सारी थकान मिटाने के लिए काफी होता था.

आज इतने साल बाद सारा झगड़ा इस पेड़ को लेकर ही था.

कशमीर में तैनात जाट रेजीमेंट के सिपाही राजाराम चौधरी को खबर मिली कि उसका बाप बीमार है. उसे तुरंत गांव आना है. सरहद पर तनाव है, छुट्टी मिलना मुश्किल है लेकिन उसके कमांडिंग अफसर कैप्‍टन आलोक नायर की नजर में वो सबसे होनहार और अनुशासित सिपाही था. कैप्‍टन नायर ने उसे छुट्टी दे दी. कहा,

जाओ, लेकिन किसी भी वक्‍त वापस लौटने को तैयार रहना.’

राजाराम लच्‍छू का बड़ा बेटा था. जब गांव आया तो उसे पता चला कि उसे झूठ बोलकर गांव बुलाया गया है.

लच्‍छू की तबीयत एकदम ठीक थी. घर में झगड़ा हो गया था. खेजड़ी के पेड़ को लेकर. जिद कर ली थी कि वो पेड़ उसके हिस्‍से में आया था. गांव में पंचायत बैठ गई थी.

कोई और बात होती तो लच्‍छू का बड़ा भाई रघुनाथ मान जाता, लेकिन उसने उसूलों की घुट्टी पी रखी थी. बात पेड़ की नहीं है, लेकिन ऐसे धमका कर, ब्‍लैक मेल करके वो लच्‍छू को पेड़ नहीं लेने देगा. छोटा भाई है तो क्‍या हुआ?

‘आज पेड़ मांग रहा है, कल को मेरी जान मांग लेगा. परसों कुछ और मांग लेगा.’  

रघुनाथ अड़ गया. बोला,

‘सींव तो वहीं रहेगी जहां काका के सामने पंचों ने खींच दी थी.’

हरचंद राम को यह पता होता कि इस पेड़ के पीछे उसके दोनों बेटे लड़ेंगे तो वो उसे उसी दिन कटवा देता, दोनों को आधी आधी लकड़ी बांट देता, जिस दिन दोनों भाइयों का बंटवारा हुआ था. खेत के बीच लाइन खींचते समय वो कुछ ऐसी जगह से गुजरी कि यह पेड़ बड़े भाई रघुनाथ के हिस्‍से में आया. लच्‍छू मन मसोस कर रह गया. उसका मन था कि खेत की पांती में बड़े भाई वाली जमीन की तरफ चला जाए. फिर उसने मन ही मन ‘रोहि़ड़ों’ का हिसाब लगाया कि उसकी पांती में बारह रोहिड़े हैं और रघुनाथ की पांती में आठ ही हैं. सींव पर एक खेजड़ी रघु की तरफ चली गई तो क्‍या हुआ? एक मलाल रह रहकर उठता था. खेजड़ी बड़ी थी. दो के बराबर. उस पर इतना लूंगा कि कम से कम बीसेक दिन बकरियों का चारा हो जाए. हर साल होली पर लटूम के मिमझर लगती. महीने भर में सांगरी से लदपद. वह खेजड़ी नहीं थी, घर का एक कमाऊ पूत थी, जिसको सब लाड़ करते हैं. उसी दिन लच्‍छू ने तय कर लिया था कि एक दिन वो इस खेजड़ी को अपनी तरफ करके रहेगा.

कई सालों में उसने धीरे धीरे सींव काटी. रघुनाथ की तरफ खिसकाई. पेड़ अब सींव के एकदम बीच में दिख रहा है. लच्‍छू ने ऐलान कर दिया है कि उसकी भले ही जान चली जाए, यह पेड़ शुरू से उसके हिस्‍से में था. ना था तो होना चाहिए था. अब तो बीच में दिखने भी लगा था. उस वक्‍त जमीन के नाप में गलती हुई. रघुनाथ ने बड़े होने का फायदा उठाया. उस पेड़ को षडयंत्र से अपनी तरफ कर लिया था. अब उसके बेटे बड़े हो गए हैं. उनके पास अब लाठी आ गई है तो भैंस भी उनकी होगी.

राजाराम ने दादा हरचंद राम को देखा था. जब वह बहुत छोटा था उसकी मां और चाची के बीच जमकर झगड़ा होता था. इसका एक ही उपाय हुआ. घर के बीच में एक दीवार खींच दी गई. अगले दिन गांव के लोग दादा के साथ खेत में गए. खेत के बीच एक लाइन खींच दी थी.

अकसर सरहद की रेखाएं खींची इसलिए जाती हैं कि झगड़ा खत्‍म हो जाए लेकिन होता उल्‍टा है. झगड़ा बढ जाता है. उस लाइन की ही तरह दोनों भाइयों के दिल में एक गहरी दरार पड़ गई थी.

गांव वालों का पुराना अनुभव था. झगड़े होते रहते थे. जानते थे, ऐसा हमेशा नहीं रहेगा.

रिछपाल प्रधान ने कहा,

‘सगे भाई हैं, कब तक दूर रह पाएंगे. शादी ब्‍याह में तो साथ आना ही होगा.’

लेकिन यहां सबके अनुमान गलत निकले. सुलह की गुंजाइश नहीं थी. दोनों को लगता था कि वो अपनी जगह सही हैं. लच्‍छू बेरोजगार था. गांव में ताश खेलता था. जिस शाम दारू पी लेता था, वो दिन घर के बच्‍चों के लिए मनोरंजन का होता था. टूटी फूटी इंगलिश बोलने लगता था. पार्वती से अपने प्‍यार का सार्वजनिक इजहार करने लगता था.

रात को चौक में जाकर चिल्‍लाने लगता था, पारो, आय लव यू डार्लिंग. आय लव यू वेरी मच. फिर जोर से चिल्‍लाता था, माई ब्रोदर हैज चीटेड विद मी. इसमें लच्‍छू की व्‍याकरण पर ध्‍यान दने वाला कोई नहीं था. घर का झगड़ा तो ठीक था लेकिन रघुनाथ को यह बुरा लगता था कि पूरे गांव में परिवार का तमाशा बन रहा है.

रघु दोनों घरों की बीच बनी दीवार से लच्‍छू को चुप होने की कहता. वहीं से इस परिवार के इतिहास के सफे खुलते. गांव वालों को नि:शुल्‍क ही वो सारी जानकारी मिल जाती, जो उनको जानना जरूरी नहीं थी. लच्‍छू को लगता था कि रघुनाथ बड़ा था. घर की सारी जिम्‍मेदारी उस पर छोड़कर वो शहर पढ़ने चला गया. लच्‍छू ने घर संभाला और खेती भी. इस जिम्‍मदारी ने उसे पढने लिखने से दूर रखा. वह गांव में उलझकर रह गया.

रघु की डाक विभाग में सरकारी नौकरी लग गई. बच्‍चे पढ़ लिख गए. आज रघुनाथ के बड़े बेटे किशन का शहर में अपना कारोबार है. उसकी बेटी मंजू यूनिवर्सिटी में टीचर लग गई. उसका पति भी उसी विश्‍वविद्यालय में पढाता है.

लच्‍छू का बड़ा बेटा बलबीर उसी की तरह निकला. उसे स्‍कूल और किताबें समझ में नहीं आई. खेती बाड़ी में रह गया. उसकी तकलीफ भी यही थी कि ताऊजी चाहते तो उन लोगों के लिए कुछ कर सकते थे. बलबीर से छोटा राजाराम सदा से ही समझदार था. सरकारी स्‍कूल में पढ़कर

बारहवीं पास की. सेना की भर्ती में एक बार भागने गया. घर की भूख के डर से इतना तेज भागा कि सबकी नजर में आ गया. वह सेना में भर्ती हो गया. उसे ताऊजी से कभी शिकायत नहीं रही. उसे पढता देख रघुनाथ ने कभी कहा था, शहर आ जाना चाहिए. आगे की पढाई करनी चाहिए लेकिन पढाई से मन उसका भी उचटा हुआ था. फौज की नौकरी ने उसमें काम कर दिया. रघुनाथ ने भी बाद में उससे जिद नहीं की. उसे लगा, सरकारी नौकरी लग गई है. धीरे-धीरे लच्‍छू का घर ठीक हो जाएगा.

लच्‍छू के घर की बदहाली को लेकर रघुनाथ का पक्ष यह था कि बार-बार की कोशिशों के बावजूद लच्‍छू ने पढाई करना जरूरी समझा ही नहीं. आए दिन स्‍कूल में किसी भी बच्‍चे को पीट देता था. लच्‍छू को स्‍कूल भेजना भी बाकी बच्‍चों के लिए खतरा बन गया. अपने मां बाप की नाक में दम कर रखा था. रघुनाथ बड़ा था. सब देख रहा था. उस पर बड़ा भाई होने का दबाव था. मेहनत की. पढाई की. नौकरी की. लच्‍छू के दोनों बेटों को शहर बुलाया. उन्‍हें पढाने लिखाने की कोशिश की लेकिन ताई जी से बच्‍चों को हमेशा शिकायत रही. वापस गांव लौट गए. जब कभी रघुनाथ गांव आता था तो लच्‍छू और रघुनाथ में तू तू मैं मैं हो ही जाती थी.

इन बच्‍चों की स्‍मृतियां ऐसी ही बन गई थीं. बचपन में जो झगड़े इन बच्‍चों ने देखे थे, उसमें उनको मजा आता था. लच्‍छू के दोनों बेटे बलबीर और राजाराम आकर किशन को जगा लेते थे कि उठो, ताऊजी और पापा का झगड़ा फिर शुरू हो गया है. वो इन बच्‍चों के लिए मनोरंजन का घंटा होता था.

उन्‍होंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा आएगा, जब वे खुद भी इस महाभारत के किरदार हो जाएंगे. रघुनाथ जब तक शहर में रहा, उसकी जमीन पर लच्‍छू खेती करता रहा. उस खेत से शहर में रघुनाथ के लिए गेहूं, बाजरा और दालें आती थीं. सूखी सांगरी भी और मानसून के दिनों में हरी सब्जियां भी. रघुनाथ ने इसके अलावा कोई हिसाब नहीं पूछा. वो हमेशा बड़े भाई की मुद्रा में रहा. छोटी मोटी बातों की परवाह ना करने वाला.

दिक्‍क्‍त तब शुरू हुई, जब नौकरी से रिटायर होने के बाद रघुनाथ ने गांव में जाकर रहना तय किया. लच्‍छू यह मानकर चल रहा था कि ना तो रघुनाथ अब गांव लौटकर आएगा और ना ही उस जमीन पर कोई दावेदारी करेगा. मगर रघुनाथ के इस फैसले से उसको खटका हो गया कि खेत अब वापस रघुनाथ को देना होगा. रघुनाथ की पत्‍नी शारदा ने मना किया था कि इतने बरस शहर में रहने के बाद गांव में कैसे रह पाएंगे? रघुनाथ नहीं माना. उसको लगता था कि जिन लोगों के बीच बचपन बीता, उन्‍हीं के साथ उसका बुढापा बीतना चाहिए.

अब रघुनाथ अपने भाई की आंख में किरकिरी बन चुका था. उसने कई बार सोचा कि बात बस एक पेड़ की ही तो है, वह लच्‍छू को दे देगा लेकिन उसे अंदर से लगता था कि यह गलत है. यह पराजित हो जाना है. कोई धमकी देकर कैसे उसके हिस्‍से का पेड़ ले सकता है. भले ही वह सगा भाई क्‍यों ना हो?

अब राजाराम आ गया है तो गांव से सब पंच एक साथ बैठे हैं. राजाराम ने कहा,

अगर उसकी बटालियन में यह पता चल गया कि उसे झूठा तार देकर बुलाया गया है तो उसकी खैर नहीं.

वो सीधा लच्‍छू के खिलाफ हो गया. उसने कहा,

‘मामूली सी बात के लिए मुझे यहां बुला लिया. यह भी कोई झगड़ा है? मेरी याद में तो पेड़ ताऊजी की तरफ था. आज अगर वो नहीं दे रहे हैं तो क्‍या गलत है?’

इस बात ने आग में घी डालने का काम किया. भाई बलबीर चिल्‍लाया,

ताऊजी के कहणे से ही जांटी ताऊजी की हो गई क्‍या?

राजाराम बोला,

‘हां और अगर अपनी भी है तो एक जांटी के पीछे सब कुछ दांव पर लगा दोगे क्‍या?’

‘तुम लोग एक कशमीर के पीछे क्‍यों वहां पड़े हो? आ जाओ छोड़कर सब कुछ. सौंप दो उसको पाकिस्‍तान को.’

बलबीर जोर से बोला.

राजाराम चौंक गया,

कहां की बात कहां ले जा रहे हो, भाई जी? कहां कशमीर और कहां ये खेजड़ी का पेड़?’

इस बार लच्‍छू उनके बीच कूद गया,

‘जो ऐसे ही दिल बड़ा रखते हैं ना राजिया, दुनिया नहीं छोड़ती उनका जांघिया. तेरा भी यही होगा देखणा. तू जो ताऊजी का चमचा बण्‍या फिरता है. तू मर गया हमारे लिए लेकिन देखणा, जांटी तो हम लेकर रहेंगे, यह हमारे काम आएगी. चाहे जो कीमत देणी पड़े.’

उस दिन पंचायत बिना फैसले के खत्‍म हो गई.

राजाराम ने कह दिया कि सुबह उसको वापस जाना पड़ेगा. दो दिन की छुटटी थी, इस फालतू काम के लिए उसको बुलाना ही नहीं था. रात को घर में फिर राड़ हुई. राजाराम बोला, वो पिछले दस साल से सेना में यहां से वहां धक्‍के खा रहा है. पता नहीं, कितने साल और यह सब चलता रहेगा? झगड़े का कोई हल कभी निकलता नहीं. सबको एक दिन एक जाजम पर बैठकर सुलह की ही तरफ आना होता है.

बलबीर उस पर चिल्‍लाया कि तेरे जैसे विभीषण की वजह से तो सारी जायदाद ताऊजी ले जाएंगे,

तू फौजी है, तेरी अकल तेरे अफसरों को सैल्‍युट मारते मारते खत्‍म हो गई.’

दोनों की बीवियों ने देखा. छोटे बच्‍चों ने देखा. यह एक सिलसिला था. वे दोनों भी अपने बाप और ताऊजी को ऐसे ही देखते रहे थे. यह सच था कि फौजी की बात को गांव में कोई गंभीरता से लेता नहीं. उसके बारे में गांव में यह मान ही लिया जाता है कि उसे सिर्फ हुकुम की गुलामी आती है. अपनी कोई सोच नहीं होती. गांव की छोड़ो, खुद उसका बाप और भाई उसके खिलाफ हो गए. पूरे गांव में लोगों की चर्चा में दो फाड़ हो गए.

जो रघुनाथ की तरफ थे, वे कहने लगे, किसी भी दिन गांव में कोई भी कह देगा कि उसका किसी चीज पर दिल आ गया. जो मालिक ही नहीं है उसको खेजड़ी कैसे दे दी जाए?

जो रघुनाथ के खिलाफ थे, वे बोले,

‘अरे खेजड़ी किसी और को नहीं देनी है. अपने ही मां जाए भाई को देनी है. इसमें इतना क्‍या सोचना? ऐसा भी क्‍या उसूल कि भाई-भाई में बैर करा दे.’

गांव में ऐसी बहस के बीच में जाकर बैठ जाएं तो आपको दोनों ही पक्षों की बातों में दम लगेगा. लोगों ने दोनों को समझाने की कोशिश की लेकिन वे माने नहीं. अब गांव वालों ने कहा, इस खेल को रोक नहीं सकते तो दर्शक बनकर इसका मजा लेना चाहिए. गांव में ऐसे मौकों के लिए दो तरह के लोग मिलेंगे. एक, आग में पानी डालने वाले और दूसरे, आग में घी डालने वाले. उनको भाइयों की छीनाझपटी देखने में अजीब सा सुख मिलता है. कसर उन्‍होंने भी नहीं छोड़ी, कुछ ने लच्‍छू के कान भरे कि रघुनाथ की हेकड़ी निकालने का उसके पास एक उपाय तो है. कुछ रघुनाथ के पाले में चले गए.

अगली सुबह राजाराम वापस डूयटी के लिए निकल गया. कहता गया, पंच जो फैसला करेंगे, वो उसे मान लेगा. अगले दिन भी पंचायत किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो लच्‍छू ने अपना ब्रह्मास्‍त्र चलाने का निश्‍चय किया.

रघुनाथ के खेत में जाने का रास्‍ता लच्‍छू के खेत से होकर गुजरता था. लच्‍छू के बेटे बलबीर ने कह दिया की रघुनाथ या उसके परिवार का कोई आदमी अगर उसके खेत में घुसेगा तो वह उसकी टांगें तोड़ देगा.

रघुनाथ ने कहा,

‘खेत का रास्‍ता है. कानून के हिसाब से कोई रोक नहीं सकता.’

वो सुबह सुबह अपनी जेळी उठाकर खेत जाने को हुआ. लच्‍छू के खेत में पैर रखा. बलबीर ने ललकार दिया,

‘बाबा, खोपड़ी खोल दूंगा गंडासी से. अब इस खेत से गुजर नहीं सकते.’

रघुनाथ ने अनसुनी की तो बलबीर गंडासी लेकर पीछे भागा. जैसे तैसे करके बूढ़े रघुनाथ ने अपनी जान बचाई. वह हांफने लगा था. अब लड़ाई खतरनाक मोड़ पर जा चुकी थी. रघुनाथ पढा लिखा तो था लेकिन पढा लिखा आदमी भी जिद पर आता है तो उसकी मति मारी जाती है. पढ़े लिखे भी मूर्खताओं के चंगुल में बहुत तेजी से फंसते हैं.

लच्‍छू को यह समझ में आ गया कि पंचायत उसको पेड़ नहीं लेने देगी तो उसने भग्‍गू की बताई तरकीब आजमाने की सोची, ‘खेजड़ी तेरी नहीं तो, उसकी भी मत रहणे दे. जड़ों में पांच सेर लूण गेर दे कि जांटी पंद्रह दिन में सूख जाएगी.’

उस रात चुपचाप जाकर खेजड़ी की जड़ों में नमक दे दिया. पानी से घोल के जमीन को वापस समतल कर दिया. बहुत आसानी से उनकी यह करतूत पकड़ी नहीं जा सकती. एक दिन पहले रास्‍ता रोक लिए जाने के बाद रघुनाथ इस लड़ाई को पंचायत से आगे ले गया. कस्‍बे के सदर थाने पहुंच गया. एसएचओ को पैसे खिलाए. लच्‍छू और उसके बेटे बलबीर के खिलाफ हत्‍या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कराने की कोशिश की.

एसएचओ ने कहा,

‘जब डराना ही है तो एक बार इतना आगे जाने की जरूरत नहीं है. दोनों को शांतिभंग में एक दिन के लिए अंदर कर दूंगा. उनको बस यह बात समझ में आ जाए कि रास्‍ते चलते आदमी पर हमला करने का अंजाम क्‍या होता है?’

खेत में खेजड़ी के पेड़ में लूण देकर आए लच्‍छू और बलबीर रात को देर से घर आए. सुबह बाप बेटे बेखौफ सो रहे थे कि मुंह अंधेरे खाकी वर्दी वालों ने दबोच लिया. वे भागने का मौका देख ही नहीं पाए. पुलिस जब उनको घर से उठा रही थी तो अपने दरवाजे पर खड़ा रघुनाथ उन्‍हें देख रहा था. वो पुलिस को खरीदकर लाया था. पुलिस की जीप में बैठते हुए बलबीर ने घूरकर रघुनाथ को देखा. उन आंखों से लग रहा था कि बात अब समझौते वाली लाइन से आगे निकल चुकी है.

सूरज उगने के साथ गांव में खबर फैल गई. यह पहला मौका था, जब गांव में पुलिस आई थी. रिछपाल प्रधान ने कहा,

‘यह जो भी हो रहा है, ठीक नहीं है. पुलिस ने एक बार गांव का रास्‍ता देख लिया तो इनके मुंह खून लग जाएगा.’

लेकिन अब तो तीर कमान से निकल चुका था. एसएचओ ने पूरे दिन बाप-बेटे की रगड़ाई की. रात को लॉकअप में रखा. अगली सुबह धमकाकर छोड़ दिया. पुलिस उठाकर ले गई, गांव में यह बदनामी बड़ी थी. लच्‍छू और बलबीर शर्म के मारे घर से बाहर नहीं आए. रघुनाथ ने सोचा कि इलाज हो गया है. बाप और बेटे को एक साथ एसएचओ ने मारा था. दोनों एक दूसरे की नजर में गिर गए थे. एसएचओ मां बहन की गालियां दे रहा था. दोनों की आत्‍मा के भीतर एक गहरा दंश था. बलबीर अब ताऊ रघुनाथ को माफ नहीं कर सकता था. लच्‍छू को लगने लगा था कि इस भाई से कसाई अच्‍छा. उनके भीतर नफरत एकदम उफान पर हो गई. वे दोनों घर में बंद हो गए.

उस दिन बड़ी मुश्किल से राजाराम फोन मिला पाया.

लच्‍छू और बलबीर ने उससे बात करने से मना कर दिया. राजाराम ने अपनी घरवाली सुगणी से बात की. पूरा माजरा समझ में आ गया कि हुआ क्‍या है? घर की औरतों ने उस आसन्‍न संकट को सूंघ लिया था. राजाराम को बता दिया था कि दोनों एकदम घुन्‍ने से चुप हो गए हैं. ना किसी से बात करते हैं, ना किसी की सुनते हैं. ना किसी से मिलते हैं. चुपचाप अपने कमरे में पड़े रहते हैं. रघुनाथ गांव में छाती चौड़ करके घूमने लगा. उस दिन रिछपाल से उसकी कहा सुनी हो गई.

रिछपाल ने कहा,

‘गांव में गांव के कायदे से रहना सीखो रघुनाथ. यह नहीं कि पैसे के जोर पर पुलिस कचहरी करने लगो. सब ऐसे करने लगेंगे तो गांव में रह क्‍या जाएगा? घर के झगड़े घर में सुलझ जाएं तो अच्‍छा है.’

रघुनाथ ने कहा,

‘ना घर में सुलटे, ना पंचों से सुलटे. लातों भूत बातों से नहीं मानते प्रधानजी.’

शहर से बेटे किशन का फोन आया तो रघुनाथ ने कुछ नहीं बताया लेकिन उसकी मां ने सब बता दिया. किशन बाप पर नाराज हुआ कि बुदि़ध मारी गई है. रसूख और पैसे में इतने बावले हो गए हैं कि यह भूल गए कि वो छोटा भाई है. बलबीर आपके बेटे जैसा है. रघुनाथ को लगता था कि लड़ाई उसूल की है, तो उसे अंजाम पर पहुंचाना जरूरी है. खेत जाने का रास्‍ता निर्बाध हो गया. गर्व के भाव से वो रोजाना खेजड़ी के पेड़ को देखता. उस दिन अचानक उसने देखा कि ऊपर से चार डालियां नीचें लटक रहीं हैं. जैसे किसी की नजर लगी हो. रघुनाथ के चेहरे पर खेजड़ी को देखकर चिंता की लकीरें आ गईं. अगली सुबह तो कुछ और डालियां भी लटकी थीं. अगले पांच दिन में तो खेजड़ी का जैसे दम सूख गया हो. उसको कुछ समझ में नहीं आया. गांव में यह खबर आग की तरह फैली. बुजुर्गों ने कहा,

दोनों भाइयों के बीच ‘आंख का पाणी’ ही मर गया तो अब पेड़ भी हरा रहकर क्‍या करता?

किसी ने कहा,

‘इस घर के अच्‍छे कर्म अब खत्‍म हुए. पेड़ का सूखना यही बताता है.’

उस दिन राजाराम का फिर फोन आया. लच्‍छू ने फिर बात करने से मना कर दिया. राजाराम ने सुगणी को कहा,

‘बॉर्डर पर हालत ठीक नहीं है. छुट्टी मिलनी मुश्किल है. पर तू भाई और बापू का ध्‍यान रखणा. मैं जल्‍दी ही आऊंगा.’

जून की गर्मी थी. देखते देखते ऐसे लगने लगा जैसे यह पेड़ कभी हरा था ही नहीं. हर दिन गुजरने के साथ यह सूखना बढता गया. गांव में लोग दबे मुंह यह भी बात करने लगे कि यह सब रघुनाथ के पापों का फल है. अपने ही भाई को जेल भेज दिया. बलबीर की बीवी ने उसे समझाने की कोशिश की कि जो बीत गया उसे भूल जाओ. अब ना वो पेड़ रहा. उसे तो तुम लोगों ने जला ही डाला. हिसाब बराबर हो गया.बलबीर एकदम चुप्‍पी साधे था.

‘हिसाब बराबर कैसे हो सकता है?

उसने मन ही मन सोचा.

जब एसएचओ उसकी आंखों के सामने लच्‍छू को पीट रहा था तो उसका बाप निरीह सा उसे देख रहा था. थानेदार से गालियां खा रहा था. वह कुछ नहीं कर पाया. वह डर क्‍यों गया था? ऐसे जीने का भी क्‍या फायदा कि आंखों के सामने उसके बाप को कोई पीट रहा है क्‍योंकि उसने वर्दी पहन रखी है. उसके रोम रोम में अपने ताऊ के खिलाफ जहर भर गया.

‘ताऊजी को पैसे का घमंड आ गया. वे उसूल की बात करते हैं. क्‍या यह उसूल है कि अपने छोटे भाई पर झूठा मुकदमा कर दे?’

बलबीर जितना सोचता, वह अवसाद और उदासी के गहरे समंदर में और डूब जाता. उस छोटे से कमरे के कोने में चौदह इंच का रंगीन टीवी दुनियाभर के बारे में तरह-तरह की खबरें बता रहा था, लेकिन बलबीर ने पिछले कई दिन से टीवी देखा ही नहीं. कमरे में बिजली की फिटिंग ऐसी थी कि एक ही बटन से पंखा और टीवी चलते थे. पंखा चलाते थे तो टीवी चलता रहता था. एकदम धीमी धीमी आवाज में.सुगणी ने राजाराम को फोन कर दिया कि उससे दोनों की हालत देखी नहीं जाती. दोनों बस अपने-अपने कमरे में दुबके पड़े हैं. गांव में ये किसी से बात नहीं कर रहे लेकिन पूरा गांव इनके बारे में बात कर रहा है.

‘झगड़ा कितना ही बड़ा हो, भाई को भाई पुलिस से कैसे पिटवा सकता है?’ मंदिर के बाहर बने चबूतरे पर बैठे सुखबीर काका ने कहा.

‘कलयुग आ गया है, अब भाई भाई का प्रेम कहां रहा?’ 

बिरजेस बोला.

‘रावण को उसके भाई विभीषण ने धोखा दिया. बाली को सुग्रीव ने राम जी के साथ मिलकर मरवाया. यह तो बरसों से होता आया है. पांडवों ने अपणे ही भाइयों के खिलाफ खूनखराबा किया. बात कलयुग की नहीं है बिरजेस. आदमी की जात ही खराब है. हमसे ज्‍यादा मिलजुलकर तो हमारी बकरियां रहती हैं.’

हरलाल ने मनुष्‍य जाति पर ही सवाल उठा दिया. और यह बहस कलयुग से चलकर सतयुग, द्वापर त्रेता का सर्कल पूरा करते हुए वापस वर्तमान तक आती. वर्तमान में भी इतना करीब कि पाकिस्‍तान और भारत के सरहद उसमें शामिल हो गई कि हमारे बाप दादाओं के समय ये भी तो भाई ही थे.

‘अब कौन गारंटी लेता है कि एक दिन दोनों भाई वापस एक थाळी में साथ बैठकर खाना खाएंगे?’

फौज से रिटायर्ड सुखबीर काका ने पूछा. सुखबीर काका ने दुनिया देखी थी. वो सोमालिया में भारत की शांति सेना में सूबेदार रहकर आया था.

‘सुक्‍खी काका, समझ में नहीं आ रहा कि आप रघुनाथ और लच्‍छू की बात कर रहे हो कि भारत और पाकिस्‍तान की?’

‘तू कुछ भी समझ ले. बात तो एक ही है. मेरी तो दुनिया के झगड़े देखने में ही कट गई.’

‘अरे, एक बात कैसे है? पाकिस्‍तान एक नंबर का हरामजादा है. उसकी तो कुटाई होती रहणी चाहिए.’

‘तो करवा दी रघुनाथ ने लच्‍छू की पिटाई. इसमें गलत क्‍या हुआ?’

सुखबीर बोला,

‘जब झगड़ा होता है तो कोई सोचता है क्‍या? जिसके पास ताकत होती है वो कूट देता है. अमेरिका ने इराक को कूट दिया. सीरिया में कूटा, लीबिया में कूटा.’

युद्ध की जरूरत और तर्क वितर्क पर बात इतनी गर्म हो जाती कि सुखबीर काका का पारा उबलने लगता. उसे लड़ाई के नाम से चिढ़ होती थी. उसे गुस्‍सा आता था कि मंदिर के बाहर चबूतरे पर बैठकर लडाई की बातें करने और बॉर्डर पर गोलियों का सामना करने में बहुत फर्क होता है.

अकसर इस बहस में सुखबीर काका को डरपोक कहा जाता, जिसने दो लडाइयां अपनी आंखों से देखी, लड़ीं. फौजी होकर भी वो कह रहा था कि लड़ाई फालतू की चीज है. लड़ाइयों से कभी कोई हल नहीं निकलते. समस्‍याएं उलझती ही हैं.

इस बहस में कोई बीच-बचाव ना करे तो चौपाल पर भी महाभारत हो जाए. सुखबीर काका के अलावा कोई ऐसा नहीं होता था जो यह कहता हो कि हमें बलबीर, लच्‍छू और रघुनाथ को एक साथ बिठाकर बात करानी चाहिए. सुखबीर का मजाक उड़ाया जाता,

‘काका, तू फौजी आदमी है. तेरे में अकल नहीं रही. गांव के झगड़े ऐसे नहीं सुलटते. अगली किसी शादी में देखणा, दोनों भाई एक थाळी में खाएंगे.’

उधर, शहर में किशन इस बात से परेशान था कि एक तो रघुनाथ उसकी मर्जी के खिलाफ वापस गांव जाकर बैठ गया. ऊपर से यह लड़ाई और मांड दी. उसने कहा,

‘बापू, आपको लच्‍छू काका के घर जाकर माफी मांगनी चाहिए.’

रघुनाथ इस बात से ही परेशान हो गया कि उसका अपना बेटा इस लड़ाई में उसके साथ नहीं है. रघुनाथ ने कह दिया,

‘माफी किस बात की? अभी तो उस पर पेड़ सुखाने को मुकदमा करूंगा.’

किशन ने कहा,

‘यह लडाई कहीं नहीं पहुंचगी. मैं इसमें आपके साथ नहीं हूं.’

दोनों घरों के बीच दीवार थी. सन्‍नाटे को चीरती हुई टीवी की आवाज थी. सुगणी कमरा बुहारने गई तो देखा, पंखा चल रहा है, टीवी चल रहा है. कमरे में कोई भी नहीं. ना बलबीर, ना लच्‍छू. दोनों पिछले दो महीने से घर से बाहर निकलना भूल गए थे. आज कहां चले गए? बिना बताए. सुगणी को चिंता हुई. वह झाडू के लिए पंखा बंद करने को हुई कि टीवी की आवाज से चौंक कर उसने उधर देखा. कश्‍मीर में आर्मी के कैंप में कुछ आतंकवादियों के घुस आने की खबर थी. सेना और उनके बीच मुठभेड़ चल रही थी. सुगणी के भीतर एक मुठभेड़ शुरू हुई. वह सुन्‍न सी थी. राजाराम वहीं तो है.

‘पर वह यहां क्‍यों होगा? कशमीर तो बहुत बड़ा है.’

उसके एक मन ने कहा.

‘कशमीर में है तो तो वह यहां भी हो सकता है, जहां मुठभेड़ चल रही है?’

उसके दूसरे मन ने कहा.

उसने झाडू फेंक दी. अपने ब्‍लाउज के दुबके फोन को निकाला. राजाराम को मिला दिया.राजाराम को फोन करना बेकार था. आधी बार बंद ही मिलता था. आज भी बंद मिला. उसने झुंझलाकर फोन वापस रख लिया. गुस्‍से में आकर पंखे का बटन बंद किया. टीवी भी बंद हो गया. सन्‍नाटा और गहरा हो गया. कुछ पक्षियों की आवाज के अलावा गांव में कोई आवाज नहीं आ रही थी. एक मरघट की शांति. इस वक्‍त, अभी तो सुबह के दस बजे हैं. गांव में यह शांति आम थी लेकिन सुगणी को डर लग रहा था. रघुनाथ के कंधे पर पानी की पांच लीटर की कैटली थी. खेत के रास्‍ते में था. अपनी धुन में था. परिंदों के लिए पानी के ‘तगरे’ वह खेत में हमेशा रखता था. एक दो दिन के अंतराल पर उनमें पानी भरने के लिए जाना ही होता था.

रघुनाथ ने लच्‍छू के खेत में पैर रखा था, लेकिन उसकी नजर दूर से ही सूखे हुए उस खेजड़ी के पेड़ पर थी. उसका दिल बैठा जा रहा था. सूखे हुए पेड़ को देखकर उसने अनुमान लगा लिया था कि कुछ गड़बड़ है. पिछले दिनों में आंधियों ने वहां का दृश्‍य बदल दिया था. यह पकड़ पाना मुश्किल था कि पेड़ की जड़ें खोदकर उसमें नमक डाल दिया गया है.

‘क्‍या हुआ होगा?’

रघुनाथ सोच ही रहा था. उसी वक्‍त उसने लच्‍छू की आवाज सुनी,

‘देख बलबीर, भाग नहीं पाए. आज बच गया तो दुबारा मौका नहीं आणा?’

रघुनाथ ने सिर उठाया और देखा, बलबीर गंडासी लिए उसकी तरफ दौड़ रहा है. वह दूसरी तरफ भागा तो लच्‍छू के हाथ में दो आंगली जेळी थी. एकदम बांस की लाठी की तरह लंबी और मजबूत. लच्‍छू उसके ज्‍यादा करीब आ गया था.

पांच लीटर बोझ कम करने के लिए रघुनाथ ने पाणी की केटली फेंक दी थी. लेकिन बूढे पैर मिटटी में फंस रहे थे. वह सींव पार कर लगभग खेजड़ी के पेड़ के करीब पहुंच गया. सोचा, उसकी आड़ लेगा तो शायद उसे बात करने का समय मिल जाय और बच जाए. वह तने की ओट में जाने को ही था कि उसके पैरों पर लच्‍छू ने ‘जेळी’ खींचकर मार दी. लड़खड़ाकर रघुनाथ गिरा. उसका मुंह मिटटी में फंस गया.

‘लच्‍छू, मत मार, तेरा बड़ा भाई हूं. माफ कर दे.’ मौत सामने देखकर रघुनाथ एक बार गिड़गिड़ाया.

लच्‍छू कुछ सोचे उससे पहले ही बलबीर पहुंच गया. ‘खचाक!’ गंडासी रघुनाथ के सिर के बीचोंबीच थी. बलबीर जवान था. पूरी नफरत उसने उस खोपड़ी में उतार दी. खून की धार ऐसे फूटी कि वहां पूरी जमीन वहां लाल हो गई. उसमें बलबीर भी रंग गया और लच्‍छू भी.बलबीर ने लच्‍छू को देखा. लच्‍छू की आंखों में पानी था. चेहरे पर लगा खून आंसुओं से मिलकर नीचे आ रहा था.

‘दो खून की सजा भी तो एक ही बार होगी बापू. आप यहां संभालो. मैं थानेदार को भी नहीं छोडूंगा.’

बलबीर वहां से भाग छूटा. चौक में झाडू लगाती सुगणी के सामने आसमान से काला सांप आकर गिरा. वह एक बार तो डर गई. पर उसमें कोई हचलल नहीं देख उसने आसमान की तरफ देखा. एक चील मंडरा रही थी. वह उसके पंजों से छूट कर गिरा था. डरी हुई पहले से ही थी. भागी हुई कमरे में गई.पंखे का बटन चालू किया. टीवी पर खबर आ रही थी. चार आतंकवादी ढेर हो गए हैं. दो जवान मारे गए हैं. एक का नाम बुधाराम और दूसरे का राजाराम है. एक झुंझनू का है. दूसरा सीकर का. सुगणी गश खाकर कमरे में गिर गई.

अगले दिन घर के बीच बनी दीवार के दोनों तरफ दो लाशें पड़ी थीं. कोहराम मचा है. रघुनाथ की लाश पोस्‍टमार्टम होकर आई है. थोडी ही देर पहले सिपाही राजाराम की लाश आई है. सेना की गाडि़यां हैं. अंतिम यात्रा की तैयारियों के बीच रिछपाल प्रधान ने पांच छह जवान लड़कों को जिम्‍मा दिया कि दो चिताओं के लिए लकडि़यां काटनी हैं. सूखा पेड़ एक ही है. रिछपाल ने किशन से पूछा. किशन ने पेड़ को काटने के लिए कह दिया. सींव का पेड़ इतना बड़ा है कि दो चिताओं के काम आ जाएगा.

अपने ताऊ के साथ राजाराम की अंतिम यात्रा गांव से गुजरी. लच्‍छू के हाथों में हथकड़ी थी. कोर्ट ने बेटे के अंतिम संस्‍कार में आने की अनुमति दी है. बलबीर फरार है. किशन बदल बदल कर भाई और पिता को कंधा दे रहा है. भीतर एक तूफान है. सींव की राड़ में दो जानें चली गई हैं. सुखबीर की आंखें नम हैं. बिरजेस आज सुखबीर काका से नजर नहीं मिला पा रहा है.

औरतों के रोने का कोहराम ऐसा है कि दिल कांप जाए. रोती हुई सुगणी को पांच औरतें काबू कर रही हैं. इस डरावने कारुणिक रुदन को भीड़ के समवेत स्‍वर ने दबा दिया है. यह स्‍वर है- ‘भारत माता की जय.’ ‘शहीद राजाराम अमर रहे.’

शमशान में दो चिताएं हैं. सींव के पेड़ से बनाई दो चिताएं. किशन ने पहले रघुनाथ को मुख‍ाग्नि दी फिर राजाराम को. वह रो पड़ा.

लच्‍छू किशन के पैरों में जाकर बैठ गया. किशन ने उसे उठाया. सहारा दिया. पुलिस ने लच्‍छू को पीछे की तरफ खींच लिया. सेना के जवानों ने बंदूकों से सलामी दी. गोलियों की आवाज सुनकर परिंदे डर गए. वे गांव छोड़कर दूर उड़ गए. आसमान में एक ही नारा गूंज रहा था, ‘भारत माता की जय.’


वीडियो देखें: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता: खाली समय में

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

IPL सिर पर है, पर टीम मालिकों की नज़र इंग्लैंग-ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ पर क्यों टिकी है?

IPL सिर पर है, पर टीम मालिकों की नज़र इंग्लैंग-ऑस्ट्रेलिया सीरीज़ पर क्यों टिकी है?

UAE में सिर्फ मुंबई इंडियंस के खिलाड़ी ही टेंशन फ्री होकर प्रैक्टिस कर रहे हैं.

विधायक विजय मिश्रा, जिन्हें यूपी पुलिस लाने लगी तो बेटियां बोलीं- गाड़ी नहीं पलटनी चाहिए

विधायक विजय मिश्रा, जिन्हें यूपी पुलिस लाने लगी तो बेटियां बोलीं- गाड़ी नहीं पलटनी चाहिए

चलिए, विधायक जी की कन्नी-काटी जानते हैं.

नेशनल हैंडलूम डे: और ये है चित्र देखो, साड़ी पहचानो वाली क्विज

नेशनल हैंडलूम डे: और ये है चित्र देखो, साड़ी पहचानो वाली क्विज

कभी सोचा नहीं होगा कि लल्लन साड़ियों पर भी क्विज बना सकता है. खेलो औऱ स्कोर करो.

सौरव गांगुली पर क्विज़!

सौरव गांगुली पर क्विज़!

सौरव गांगुली पर क्विज़. अपना ज्ञान यहां चेक कल्लो!

कॉन्ट्रोवर्सियल पेंटर एमएफ हुसैन के बारे में कितना जानते हैं आप, ये क्विज खेलकर बताइये

कॉन्ट्रोवर्सियल पेंटर एमएफ हुसैन के बारे में कितना जानते हैं आप, ये क्विज खेलकर बताइये

एमएफ हुसैन की पेंटिंग और विवाद के बारे में तो गूगल करके आपने खूब जान लिया. अब ज़रा यहां कलाकारी दिखाइए.

'हिटमैन' रोहित शर्मा को आप कितना जानते हैं, ये क्विज़ खेलकर बताइए

'हिटमैन' रोहित शर्मा को आप कितना जानते हैं, ये क्विज़ खेलकर बताइए

आज 33 साल के हो गए हैं रोहित शर्मा.

क्विज़: खून में दौड़ती है देशभक्ति? तो जलियांवाला बाग के 10 सवालों के जवाब दो

क्विज़: खून में दौड़ती है देशभक्ति? तो जलियांवाला बाग के 10 सवालों के जवाब दो

जलियांवाला बाग कांड के बारे में अपनी जानकारी आप भी चेक कर लीजिए.

बजट का कितना ज्ञान है, ये क्विज़ खेलकर चेक कर लो!

बजट का कितना ज्ञान है, ये क्विज़ खेलकर चेक कर लो!

कितना नंबर पाया, बताते हुए जाना. #Budget2020

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

संविधान के कितने बड़े जानकार हैं आप?

ये क्विज़ जीत लिया तो आप जीनियस हुए.

क्रिकेट के पक्के वाले फैन हो तो इस क्विज़ को जीतकर बताओ

क्रिकेट के पक्के वाले फैन हो तो इस क्विज़ को जीतकर बताओ

कित्ता नंबर मिला, सच-सच बताना.