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लिटरेचर फेस्टिवल में पाए जाने वाले एक फेस्टिवलखोर की वसीयत

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अविनाश मिश्र बता रहे हैं, लिटरेचर फेस्टिवल्स के अंदर का हाल. पढ़िए.


साल बीत रहा है. बीतते-बीतते जब बिल्कुल बीत चुका होगा तब मैं याद करूंगा कि इस साल मैं कितने लिटरेचर फेस्टिवल्स में आया-गया. कितने सेशंस में मैंने वही-वही बातें कीं और वही-वही चेहरे देखे.

दरअसल, मैं एक रोज एक लिटरेचर फेस्टिवल में ही मरा हुआ पाया जाऊंगा. बहुत मुमकिन है कि ‘लोकप्रिय बनाम गंभीर साहित्य’ जैसे अगंभीर विषय पर चल रहे सेशन में गंभीर हृदयाघात होने की वजह से ही मेरी मृत्यु हो.

‘‘आज एक चर्चित साहित्य-कला विश्लेषक का एक साहित्य उत्सव में हृदयाघात होने के कारण देहांत हो गया’’

यों अगर हुआ तब यह खबर यहीं पर खत्म हो जाना चाहेगी— मैं इतने वर्ष, इतनी बीवियां, इतने बच्चे पीछे छोड़कर… जैसी कुछ और मामूली जानकारियां देकर. लेकिन ये खबरें क्या जानें, मैं जानता हूं खुद को अपने आखिरी क्षण तक. मैं सुरेंद्र मोहन पाठक के बगल में ही तड़प रहा होऊंगा, लेकिन वह ‘कोलाबा कॉन्सपिरेसी’ की बिक्री के आंकड़े बताने में इतना खो जाएंगे कि आस-पास का सब कुछ उनके लिए अस्तित्वहीन हो जाएगा.

बाद इसके अगले सेशन के लिए जब कुर्सियां घटाई-बढ़ाई जा रही होंगी, मैं मर चुका होऊंगा. फेसबुक पोस्ट्स रो रही होंगी. लेकिन ये पोस्ट्स क्या जानें, मैं जानता हूं खुद को अपने आखिरी क्षण तक… बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती तकलीफ के बीच बढ़ती उन जटिलतम और गोपनीय पर्तों को जो उधेड़े जाने पर आंखों में आंसू ला देती हैं. मैं सघन से सघनतम करता जा रहा हूं इन जटिलतम और गोपनीय पर्तों को.

‘घर’ मेरे लिए एक ‘डिस्टर्बिंग एलिमेंट’ है, वहां नींद तक एक संघर्ष है. इसलिए मैं खुद को देर रात तक लिटरेचर फेस्टिवल्स में व्यस्त रखता हूं. नगर और नागरिकताओं से परे, राजधानी और राजधानियों से परे, राष्ट्र और राष्ट्रीयताओं से परे कहीं न कहीं कोई न कोई लिटरेचर फेस्टिवल चला ही करता है.

जब से लिटरेचर फेस्टिवल्स का चलन शुरू हुआ है, मैं ठीक से कभी घर नहीं लौटा हूं. इस दौरान मैंने जो सेशन किए हैं वे इतने एकरस और अनक्रिएटिव रहे हैं कि समझदार व्यक्तित्व मेरा नाम देखकर ही किसी लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं जाने का फैसला कर लेते हैं, यह भूलकर कि इस तरह तो वे कभी किसी लिटरेचर फेस्टिवल में नहीं जा पाएंगे. क्योंकि मैं सब जगह छाया हुआ हूं — एक विकल्पवंचित मांसाहारी समय में — मुफ्त सुविधाओं पर झपटता हुआ.

वैसे साहित्यिक मुझे ‘हीगेल और भारतीय सचेतनताएं’ या ‘अधुनातन सभ्यता और अस्मिता’ जैसी किताबों के लिए या ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘फायर’ और ‘परफ्यूम’ की फिल्म समीक्षा के लिए या ‘उल्हास कशालकर’ के शास्त्रीय गायन पर विश्लेषण के लिए या रतन थियम के नाटक ‘नाइन हिल्स वन वैली’ पर आलेख के लिए या अंजोली इला मेनन की ‘गुजरात सीरीज’ पेंटिंग एग्जिबिशन और सोनल मानसिंह की नृत्य प्रस्तुति ‘सर्चिंग फार के’ की रिपोर्टिंग के लिए या मीडिया, साहित्य, संस्कृति और विचार को बढ़ावा देने वाली मेरी गतिविधियों के लिए भी जानते रहे हैं. लेकिन यह लिटरेचर फेस्टिवल्स की बाढ़ आने से पूर्व की बात है.

चर्चित कथाकार वंदना राग जी मेरे ही शहर की हैं और मैं उनसे बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं. लिटरेचर फेस्टिवल्स की बाढ़ के बीच हिंदी के मुत्तालिक उनके मन में कुछ ख्याल आए हैं और उन्होंने कहा है :

‘‘पहले ही आगाह कर दूं कि मैं फेस्टिवल्स के खिलाफ नहीं हूं. अवसान पर पहुंची भाषा और साहित्यिक सभ्यता में प्राण फूंकने का बेहद जरूरी काम ये फेस्टिवल्स कर सकते हैं और प्रयास तो इनके कलेवर में संलग्न है ही. लेकिन दिक्कत इनके फॉर्मेट में तब झलकती है या झलक रही है जब ये हिंदी भाषा साहित्य को अंग्रेजी के बरअक्स दोयम दर्जे का स्टेटस देकर उसे किसी कोने में संपन्न होने के लिए छोड़ देते हैं.’’

वंदना जी, फैब इंडिया के कुर्ते मुझे कभी पसंद नहीं थे. इसलिए मैं प्राय: जींस-टी शर्ट में ही इन फेस्टिवल्स में नजर आया हूं. मौसम कोई भी हो मैं सदा गर्म रहा हूं और अपने आस-पास भी गर्मी बनाए रखी है. इसे आप हिंदी की गर्मजोशी नहीं तो और क्या कहेंगी?

लिटरेचर फेस्टिवल्स भी अब गली-गली में होने लगे हैं. यानी अब गली-गली में लोग हिंदी साहित्य को जान रहे हैं. और अब आखिर आप इनसे क्या चाहती हैं?

कॉस्मेटिक आयोजनों से इतर जाकर हम हिंदी और अपनी प्रादेशिक भाषाओं को अंग्रेजी के समक्ष उसके अगल-बगल रख साहित्यिक उत्सव मनाते तो साहित्य और समाज के लिए हिंदी का कहन भी मानीखेज और दस्तावेजी हो जाता.’’

वंदना जी, जब मेरी मृत्यु के बाद लोग आपकी इन बातों से सहमत हों तब आप मेरी रूह पर रहम कीजिएगा क्योंकि एक लातिन अमेरिकी कहावत है कि मृत व्यक्तियों के विषय में निंदनीय नहीं कहना चाहिए.

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