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क्या है मायन कैलेंडर, जिसके आधार पर दुनिया की तबाही की भविष्यवाणी हो रही है?

इस खबर की शुरुआत इन तस्वीरों से करते हैं. पिरामिड की शक्ल में बनी आकृति, जिसमें ऊपर तक सीढ़ियां बनी हैं. सबसे ऊपर एक छोटा सा गुंबद बना है. दिखने में ये एक सामान्य सा मंदिर लगता है. अमेरिका के पास ही एक देश है- ग्वाटेमाला. वहीं पर ये तिकाल नाम की जगह है. 1970 के दशक में ग्वाटेमाला के जंगल में जमीन की खुदाई करने पर ये पूरा मंदिर निकला. हैरानी हुई कि जहां कोई नहीं रहता है वहां मंदिर कहां से आया. आर्कियोलॉजिस्ट ने जब इस मंदिर की उम्र मालूम कि तो और भी ज्यादा हैरानी हुई क्योंकि ये करीब डेढ़ हजार साल पुराना था. और फिर ग्वाटेमाला में कई और जगह खुदाई हुई तो ना सिर्फ मंदिर बल्कि पूरे के पूरे शहर मिले. जमीन के नीचे दबे किले मिले जिनका आर्किटेक्चर भी अद्भुत था. कहां से आए थे ये क़िले ?  ज़मीन के नीचे दफ्न ये शहर किसके थे ?

ये मायन सभ्यता के शहर थे. माया लोग यहां रहते थे. माया, ये हिंदी का सा नाम लगता है लेकिन भारत से 15 हजार किलोमीटर दूर सेंट्रल अमेरिका में इस सभ्यता का वजूद था. ज़मीन से जो शहर मिले थे उनकी दीवारों पर कैलेंडर उकेरे गए थे. माया लोगों ने दिन-रात, महीना, साल की गणना करने का अपना तरीका विकसित कर रखा था. इन्हीं कैलेंडर को मायन कैलेंडर कहते हैं. और इसी मायन कैंलेंडर से अब दुनिया की तबाही की भविष्यवाणी की जा रही है.

मायन कैलेंडर.
मायन कैलेंडर.

मायन कैलेंडर कयामत की बात किस तरह से कहता है, उस पर आएंगे लेकिन पहले मायन सभ्यता समझ लेते हैं. सिंधु घाटी सभ्यता या मेसापोटामिया की सभ्यता की तरह ही माया सभ्यता थी जिसकी अब सिर्फ निशानियां बची हैं. आज के सेंट्रल अमेरिका के कई देशों में इस सभ्यता के शहर थे. इस नक्शे से समझिए. उत्तरी अमेरिका यानी USA वाला इलाका और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप यानी ब्राजील, कोलोंबिया, चिली जैसे देशों का इलाका. इनके बीच का हिस्सा सेंट्रल अमेरिका कहलाता है. सेंट्रल अमेरिका में मेक्सिको, ग्वाटेमाला, बेलिज़ जैसे देश आते हैं.

America

आज के इन्हीं देशों की जगह कभी माया सभ्यता थी. और इस सभ्यता की कहानी शुरू होती है आज से करीब 4000 साल पहले. उस वक्त दुनिया के और हिस्सों की तरह ही सेंट्रल अमेरिका में भी मानव की रिहायश थी. यहां के लोग जानवरों का शिकार करके पेट भरते थे. आर्कियोलॉजिस्ट के मुताबिक, आज से 3800 साल पहले इन लोगों ने बस्तियां बनाना शुरू किया. धीरे-धीरे गांव बनने लगे. और आबादी बढ़ने के साथ ये गांव शहरों में तब्दील हो गए. यानी आज से 3800 साल पहले से लेकर 18 सौ साल पहले तक लगभग 2 हजार साल के पीरियड में लेटिन अमेरिका में माया सभ्यता के शहर विकसित हो चुके थे. ‘द माया’ किताब में येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइकल कोय लिखते हैं कि मायन लोगों की खेती करने की तकनीक बहुत ही गजब की थी. पूरे माया एरिया में सघन आबादी वाले शहर हुआ करते थे. सिटी स्टेट की अवधारणा थी. यानी एक शहर का एक राजा हुआ करता था, वही उसका पूरा साम्राज्य था. दूसरे शहर का दूसरा राजा होता था. इस तरह से कई शहर से थे. शहरों में पक्के मकान थे. बड़ा सा किला हुआ करता था. मंदिर जैसी धार्मिक जगह थीं. और दीवारों पर तरह तरह की कलाकृतियां उकेरी गई थी.

किताब का कवर पेज.
‘द माया’ किताब का कवर पेज.

इतिहासकारों के मुताबिक मायन सभ्यता में नर बलि हुआ करती थी और इसी से जुड़ा एक खेल भी था. इस खेल के लिए मायन सभ्यता के शहरों में एक बॉल कोर्ट होता था. इसमें शहर के सबसे अच्छे एथलीट हिस्सा लेते थे. कठोर रबर से एक फुटबॉल जितनी बड़ी बॉल तैयार की जाती थी. कहा जाता है कि इस बॉल के अंदर इंसान की खोपड़ी भी रखी जाती थी. और फिर इस बॉल से दो टीमें खेलती थीं. खेल के बाद नरबलि होती थी. इस तरह के खेल बहुत बड़े सांस्कृतिक आयोजन हुआ करते थे जिन्हें देखने के लिए शहरभर के लोग इकट्ठा होते थे.

मायन सभ्यता
मायन सभ्यता में नर बलि की परम्परा.

अब आइए 8वीं शताब्दी में. यानी आज से करीब 1300 साल पहले. इसी दौरान मायन सभ्यता खत्म होना शुरू हो गई. 100 साल के भीतर सेंट्रल अमेरिका में बने सभी मायन सभ्यता के शहर उजड़ गए. माना जाता है कि 9वीं शताब्दी के बाद कोई मायन शहर आबाद नहीं रहा था. लेकिन इतने समृद्ध तरीके से बने शहर क्यों उजड़ गए थे? लोग कहां चले गए थे? किसी को नहीं मालूम. आर्कियोलॉजिस्ट के पास सिर्फ अनुमान है. वैसे ही अनुमान जैसे हड़प्पा सभ्यता के दफ्न होने को लेकर हैं.

शोधकर्ताओं का मानना है कि शायद आपस में युद्ध करके ही माया लोगों ने अपना खात्मा कर लिया. या फिर आबादी बढ़ने के बाद पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया होगा और फिर बाढ़ की वजह शहर तबाह हो गए होंगे या शहर मिट्टी के नीचे दफन हो गए होंगे. ये सिर्फ अनुमान हैं. किसी के पास पक्का प्रमाण नहीं है. लेकिन शहरों के उजड़ जाने के बाद भी माया लोगों का वजूद पूरी तरह से नहीं मिटा. जैसे रोम के मिट जाने के बाद भी रोमन नहीं मिटे वैसे ही माया लोगों ने भी कम ज्यादा अपना वजूद बचाए रखा.

Mayan (1)

16वीं शताब्दी में यूरोपीय लोग ग्वाटेमाला और मेक्सिको में पहुंचने लगे. ये वहां के मायन मूलनिवासियों के लिए खतरनाक साबित हुआ. यूरोपीयन लोगों के पहुंचने से वहां कई बीमारियां फैलने लगी और मायन लोग मरने लगे. इसके अलावा यूरोपीय लोगों ने मायन को जबरदस्ती ईसाई बनाना शुरू कर दिया है. ये मायन लोगों के लिए नए तरह का चैलेंज था, लेकिन इसके बावजूद भी कुछ तादाद में मायन लोग बच गए. आज मेक्सिको, ग्वाटेमाला, बेलिज़ जैसे देशों में माया मूलनिवासी रहते हैं. ग्वाटेमाला के एक करोड़ 40 लाख लोगों में 40 फीसदी माया हैं.

मायान लोगों के साथ ही उनका कैंलेडर भी बच गया. वही मायन कैलेंडर जिसके आधार पर आज दुनिया की तबाही की भविष्यवाणी हो रही है. इसी कैलेंडर को आधार बनाकर साल 2012 में भी दुनिया को डराया गया था. तब कहा गया था कि 21 दिसंबर 2012 को दुनिया खत्म हो जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. तो कयामत की भविष्यवाणी करने वालों ने कहा कि उनसे कैलेंडर पढ़ने में चूक हो गई.

तो क्या है ये मायन कैलेंडर ?

मायन कैलेंडर चांद के मासिक च्रकों और सूरज के सालाना चक्रों की गणना करके बनाया गया है. इसमें 13 दिन, 20 दिन और 260 दिन का का वक्त गिना जाता है. 20 तरह के कैलेंडरों से वक्त गिना जाता है. इनमें से तीन कैलेंडर सबसे अहम हैं. एक लॉन्ग काउंट, दूसरा ज़ोल्किन और तीसरा हाब.

Mayan (2)

इसमें हाब कैलेंडर के हिसाब से मायन सभ्यता में खेती होती थी. ज़ोल्किन कैलेंडर में 13-13 दिन की 20 अवधियां गिनी जाती हैं. ये धार्मिक रीति रिवाजों के लिए था और तीसरा कैलेंडर जिसे लॉन्ग काउंट यानी लंबी गिनती वाले कैलेंडर के हिसाब से ही अभी दुनिया का अंत बताया जा रहा है. इसमें 5,126 साल गिने जाते हैं. यानी मायन मान्यताओं के मुताबिक, ये मानव सभ्यता के चक्र की शुरुआत से लेकर अंत तक की अवधि है. अब इसी के हिसाब से कहा जा रहा है कि 21 जून 2020 को दुनिया खत्म हो जाएगी. हालांकि ये उन लोगों का इंटरप्रटेशन है जिन्होंने ना तो इस कैलेंडर को बनाया और ना ही काम में लिया. इसके उलट मायन सभ्यता के लोग वजूद खत्म हो जाने वाली ये थ्योरी नहीं मानते. नेशनल ज्योग्राफिक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, माया लोग नहीं मानते कि कैलेंडर पूरा होने से दुनिया खत्म हो जाएगी. उन्हें लगता है कि इसके बाद नए सिरे से एक युग की शुरुआत होगी. यानी असल में ये एक भ्रामक दावा है. कॉन्स्पीरेसी थ्योरी देने वाले कुछ लोगों का एडवेंचर है. दुनिया खत्म होने जैसा कुछ नहीं है.

माया सभ्यता के लोगों से भारत का संबंध

माया लोगों में एक एथनिक ग्रुप है- केकिची माया. इनका कहना है कि 20 हजार साल पहले इनके पूर्वज भारत वाले हिस्से से ही सेंट्रल अमेरिका में गए थे. इनके मुताबिक नागालैंड के नागा लोगों ने ही माया सभ्यता शुरू की थी. कई इतिहासकार अध्ययन भी कर रहे हैं कि भारत और मायन सभ्यता में कितनी समानता रही है. ग्वाटेमाला में इस विषय पर इतिहासकारों और आर्कियोलॉजिस्ट की कई कॉन्फ्रेंस भी हो चुकी हैं.

बीएम बिरला साइंस सेंटर, हैदराबाद के स्कॉलर बी.जी सिद्धार्थ ने भारतीयों और मायन लोगों के बीच समानता पर एक शोध प्रकाशित करवाया था. इसमें उन्होंने कई तरह की समानताएं गिनवाई थीं. इस शोध के मुताबिक- हिंदू पौराणिक ग्रंथों में जिस तरह से समुद्र मंथन का जिक्र है, वैसा ही जिक्र मायन ग्रंथों में भी है. माया सभ्यता में भी स्वस्तिक का जिक्र मिलता है. इसके अलावा कमल, हाथी और दूसरे चिन्ह जिस तरह भारतीय सभ्यता में काम में लिए जाते हैं वैसा ही मायन सभ्यता में भी मिलता है. मायन और हिंदू ग्रंथों में पूजा का तरीका भी मिलता जुलता है. बी जी सिद्धार्थ ये भी गिनवाते हैं मायन कैलेंडर की शुरुआत 3112 BC से होती है. इसके आस-पास ही भारतीय मान्यताओं में कलियुग की शुरुआत मानी जाती है. कलियुग की शुरुआत 3102 बीसी से मानी जाती है. इसके अलावा महाभारत के किरदार अर्जुन का मित्र माया होता है जो शिल्पकला में निपुण होता है. बी.जी सिद्धार्थ के रिसर्च पेपर के मुताबिक अर्जुन के मित्र माया का ताल्लुक मायन लोगों से ही था.

होमो सेपियंस की शुरुआत एक ही जगह से मानी जाती है. इसलिए हो सकता है सेंट्रल अमेरिका और प्राचीन भारत के लोगों में भी कोई समानता रही हो, ऐसा मानने में कोई गुरेज नहीं हो सकता. लेकिन मायन सभ्यता एक कैलेंडर के झूठे इंटरप्रटेशन से खत्म हो जाएगी ये हजम नहीं होता है और नहीं होना चाहिए क्योंकि अब हमारे ज्ञान का स्रोत विज्ञान से निकलता है.


वीडियो देखों: 21जून को दुनिया खत्म होने पर ‘मायन कैलेंडर’ क्या कहता है?

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