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अफगानिस्तान में अमेरिका के हारने और तालिबान के जीतने की कहानी

महान जर्मन दार्शनिक फ़्रेडरिक हीगल ने एक बार कहा था- इतिहास से हमने यही सीखा कि हमने कभी इतिहास से सबक नहीं लिया.

इतिहास से सबक न लेने पर क्या होता है? वही जो अफ़ग़ानिस्तान में हुआ. पहले सोवियत संघ और अब अमेरिका के साथ. वहां फिर से तालिबान का क़ब्ज़ा हो चुका है. ‘अफ़ग़ानों के रहनुमा’, ‘लोकतंत्र के प्रहरी’, ‘आतंकवाद के दुश्मन’ जैसे तमगे ओढ़ने वाले पहली फ़ुर्सत में रुख़सत हो चुके हैं.

अपने इतिहास के सबसे लंबे युद्ध से पीठ दिखाकर अमेरिका वापस लौट चुका है. बीस साल. चार राष्ट्रपति. 2300 सैनिकों की शहीदी. दो लाख से अधिक अफ़ग़ान नागरिकों की मौत. 150 खरब रुपये. और, नतीज़ा सिफ़र.

अफ़ग़ानिस्तान आज भी उसी कगार पर खड़ा है, जहां वो दो दशक पहले था. धार्मिक कट्टरता, हिंसा, भय और दिशा-शून्यता के साये में. इन सबका दोषी कौन है? आप एक नाम लीजिए. वो अपना दोष दूसरे पर डाल देगा.

चर्चा अफगानिस्तान की है तो सवाल होने स्वभाविक हैं कि अमेरिका ने तालिबान को गद्दी से क्यों और कैसे हटाया था? अमेरिका के अरबों-खरबों के खर्च के बावजूद तालिबान कैसे बचा रहा? उसकी सत्ता में वापसी कैसे हुई? और, तालिबान आगे क्या करने वाला है? चलिए बताते हैं-

साल 1983. उस वक़्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे रोनाल्ड रीगन. अफ़ग़ानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के चार बरस हो रहे थे. वहां अमेरिका सीक्रेट वॉर लड़ रहा था. ऑपरेशन साइक्लोन के ज़रिए मुजाहिदीनों को मदद दी जा रही थी. 1983 में मुजाहिदीन लीडर्स व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति रीगन से मिले. मुलाक़ात के बाद रीगन ने मुजाहिदीनों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ का नाम दिया और आगे मदद का वादा भी किया. ये पहली बार था, जब अमेरिका ने मुजाहिदीनों को सपोर्ट करने की बात स्वीकारी.

अठारह बरस बाद. साल 2001. मुजाहिदीनों में बिखराव हो चुका है. उनमें अलग-अलग गुट बन चुके हैं. उन सबमें सबसे ताक़तवर है, तालिबान. जो पांच बरस से अफ़ग़ानिस्तान में राज चला रहा है.

11 सितंबर 2001 को चार अमेरिकी विमानों की हाईजैक होती है. दो को वर्ल्ड ट्रेड टॉवर से टकरा दिया जाता है. एक विमान पेंटागन में क्रैश हुआ, जबकि चौथा विमान शहर से बाहर एक खेत में गिर गया. मरनेवालों की संख्या लगभग तीन हज़ार.

इस अटैक में शामिल 19 आतंकियों में से 15 सऊदी नागरिक थे. दो यूएई और एक-एक आतंकी ईजिप्ट और लेबनान से थे. इनमें से एक भी आतंकी अफ़ग़ानिस्तान से नहीं था.

फिर अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला क्यों किया?

दरअसल, 9/11 के हमले के मास्टरमाइंड के तौर पर ओसामा बिन लादेन का नाम सामने आ रहा था. अल-क़ायदा का सरगना. जो सोवियत संघ के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए अफ़ग़ानिस्तान आया था. बाद में उसने पाकिस्तान के पेशावर में अल-क़ायदा की स्थापना की थी. अल-क़ायदा और लादेन को अफ़ग़ानिस्तान में पनाह मिली. उनके ऊपर तालिबान का साया था.

यही अल-क़ायदा, 9/11 के हमलों में भी शामिल था. अमेरिका हमले का बदला लेना चाहता था. उसने तालिबान से कहा, लादेन को हमारे हवाले कर दो. यूएन ने भी यही अपील की. लेकिन तालिबान ने मना कर दिया. आख़िरकार, अक्टूबर 2001 में अमेरिका और ब्रिटेन ने मिलकर अफ़ग़ानिस्तान पर हमला शुरू किया. दो महीने में ही तालिबान की हालत पस्त हो गई. दिसंबर 2001 में मुल्ला ओमर कंधार छोड़कर भाग गया. इसके साथ ही तालिबान सरकार गिर गई.

फिर तारीख़ आई 05 दिसंबर 2001 की. इस दिन जर्मनी के बॉन में एक समझौता हुआ. इसके तहत, अफ़ग़ानिस्तान की कमान नाटो गठबंधन के हाथ में दे दी गई. और, तय किया गया कि वॉरलॉर्ड्स को मज़बूत किया जाएगा. हामिद करज़ाई को अफ़ग़ानिस्तान का राष्ट्रपति नियुक्त किया गया. ये व्यवस्था अस्थायी थी.

शुरुआती महीनों में अमेरिका के नेतृत्व वाली नाटो सेना ड्राइविंग सीट पर थी. उन्होंने तालिबान को शहरों से खदेड़ दिया था. अमेरिका को लगा, मामला फ़िट. अब आगे बढ़ते हैं. उसे कुछ और जगहों पर टांग अड़ानी थी. जैसे कि इराक़. मार्च 2003 में सद्दाम हुसैन को हटाने के लिए ‘ऑपरेशन इराक़ी फ़्रीडम’ शुरू किया गया. अब अमेरिका को संसाधन की ज़रूरत इराक़ में थी. उसने अफ़ग़ानिस्तान को ‘विजयी किला’ मान लिया था. इसलिए, फ़ोकस को इराक़ पर डाइवर्ट कर दिया गया.

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हथियारों के साथ बैठा एक तालिबान लड़ाका. फोटो- PTI

जानकारों का कहना है कि तालिबान के साथ लड़ाई का ये टर्निंग पॉइंट था. ये अमेरिका की भारी भूल भी थी. कैसे? तालिबान शहरों से ज़रूर खदेड़ा गया था. लेकिन ग्रामीण इलाकों में उसकी मौज़ूदगी बरकरार थी. तालिबान के बड़े नेता पाकिस्तान से पूरा धंधा चला रहे थे. अमेरिका ने कभी पाकिस्तान पर ज़ोर ही नहीं दिया कि वो अपने यहां आतंकियों को शरण देना बंद करे.

अमेरिका की ख़ुशफ़हमी ने तालिबान को जीवनदान दे दिया था. तालिबान ने इसका जमकर फायदा उठाया. उसने अपने नियंत्रण वाले इलाकों की घेराबंदी शुरू कर दी. साथ ही, सैनिकों और आम नागिरकों पर होने वाले बम धमाकों की संख्या अचानक से बढ़ गई. वो भी कई गुणा. इन सबके बारे में व्हाइट हाउस को बार-बार चेतावनी दी जाती रही. लेकिन उन्होंने उस पर कान नहीं दिया. ‘सब चंगा सी’ वाली धुन पर व्हाइट हाउस झूमता रहा.

अफ़ग़ानिस्तान वॉर, अमेरिकी इतिहास के सबसे स्वीकार्य युद्धों में गिना जाता है. पहली बार लोग अफ़ग़ानिस्तान पर हमले की मांग कर रहे थे. उन्हें किसी भी क़ीमत पर लादेन से बदला लेना था. ये तो हुई जनता के गुस्से की बात. इस गुस्से को बहाना बनाकर अमेरिका की सरकार ने कुछ और ही खेल खेला.

प्रतिष्ठित अमेरिकी अख़बार द वॉशिंटन पोस्ट 31 अगस्त को एक किताब लॉन्च कर रहा है. दी अफ़ग़ानिस्तान पेपर्स: अ सीक्रेट हिस्ट्री ऑफ़ द वॉर.

पोस्ट के हाथ अफ़ग़ानिस्तान वॉर से जुड़े कुछ गोपनीय दस्तावेज़ लगे हैं. इस किताब का कुछ हिस्सा इंटरनेट पर भी है. दावा किया गया है कि बुश, ओबामा और ट्रंप, इन तीनों ने मिलकर अमेरिकी जनता को मूर्ख बनाया. उन्हें अफ़ग़ान वॉर का नतीज़ा पहले से पता था. कोई इसका ज़िम्मा अपने सिर पर लेने के लिए तैयार नहीं था.

इस रिपोर्ट के कुछ मेन पॉइंट्स आप भी जान लीजिए-

– जिन जॉर्ज डब्ल्यु. बुश ने इस वॉर की शुरुआत की, उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में अपने मिलिटरी कमांडर का नाम तक नहीं पता था. बुश उनसे मिलने तक का टाइम नहीं निकाल पाते थे.

– रोनाल्ड न्यूमन जुलाई 2005 में अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के राजदूत बनकर पहुंचे. उन्हें ज़ल्दी ही वहां की स्थिति का अंदाज़ा लग गया था. उन्होंने सीक्रेट संदेश भेजा कि 2006 की शुरुआत में तालिबान के हमलों में बढ़ोत्तरी होगी. न्यूमन ने ये भी सलाह दी कि ये बात पब्लिक को बता देनी चाहिए, ताकि उन्हें झटका ना लगे. लेकिन इस सलाह को भी दरकिनार कर दिया गया. उल्टा, बुश ने मीडिया के सामने कहा कि सब बढ़िया चल रहा है. उनके कमांडर्स ने भी अपनी पीठ ख़ुद ठोंक ली. उनका दावा था कि तालिबान का कोई वजूद नहीं बचा.

– 2006-07 में यूएस मिलिटरी ने स्वतंत्र समीक्षा के लिए रिटायर्ड जनरल बैरी मैककैफ़्री को अफ़ग़ानिस्तान बुलाया. बैरी ने नौ पन्नों की रिपोर्ट पेश की. इसमें उन्होंने लिखा,

‘तालिबान की हार का दावा भ्रामक है. ये लड़ाई अभी और बिगड़ने वाली है.’

उन्होंने ये भी लिखा कि अफ़ग़ान आर्मी महाभ्रष्ट, अक्षम, अप्रशिक्षित और नशे की लत से परेशान है. अगले 14 सालों के बाद भी अफ़ग़ानिस्तान को उनके भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता. तालिबान के बारे में उन्होंने लिखा कि वो अमेरिकी सैनिकों के निकलने का इंतज़ार कर रहा है.

बैरी की बात बाद में सच साबित हुई. अमेरिकी सरकार ने उनकी रिपोर्ट को न तो कभी सावर्जनिक किया और न ही उस पर अमल किया.

– फ़रवरी 2007 में बगराम एयर बेस पर तालिबान ने आत्मघाती हमला किया था. इस हमले में 23 लोग मारे गए थे. उनमें दो अमेरिकी नागरिक भी थे. हमले के वक़्त अमेरिका के उप-राष्ट्रपति डिक चेनी भी बेस पर ही मौज़ूद थे. घटनास्थल से लगभग एक किलोमीटर दूर. इस हमले के बाद तालिबान ने बढ़िया प्रेस कॉन्फ़्रेंस बुलाई. और कहा कि हमले का टारगेट डिक चेनी ही थे.

अमेरिकी अधिकारियों ने क्या किया? उन्होंने अपना फ़ेलियर छिपाने के लिए कहा कि तालिबान झूठ बोल रहा है. इस ट्रिप के बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी थी. और, उनका रूट अंत समय पर बदला गया था.

असलियत क्या थी? दस्तावेज़ों से पता चला है कि डिक चेनी की उस ट्रिप में कुछ भी सीक्रेट नहीं था. अंदर की हर ख़बर तालिबान के पास थी. अगर हमलावर ने चूक न की होती तो डिक चेनी इस हमले का शिकार हो सकते थे.

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिका के फ़ेल होने का एक ताज़ा उदाहरण सुन लीजिए. कुछ दिनों पहले जो बाइडन के पास एक खुफिया रिपोर्ट पहुंची. खुफिया एजेंसियों ने दावा किया कि तालिबान को काबुल पर क़ब्ज़ा करने में 30 से 90 दिनों का वक़्त लग सकता है. अमेरिका ने उसी हिसाब से अपने लोगों को निकालने की तैयारी की थी. हुआ क्या? तालिबान को काबुल पर क़ब्ज़ा करने में नौ दिन भी नहीं लगे. इसके बाद जो अफरा-तफरी मची है, उसकी ज़िम्मेदारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है.

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वापस लौटते सुरक्षाबलों के जवान. फोटो- आजतक

इतनी बात हो ही गई है तो अमेरिका की असफ़लता की एक और कहानी सुनिए.

जब तालिबान सत्ता में नहीं था, तब उसकी कमाई अफ़ीम की खेती से मिलने वाले टैक्स पर निर्भर थी. सालाना लगभग 15 अरब रुपये. अमेरिका ने सोचा, अगर इसको बर्बाद कर दिया जाए तो तालिबान के इनकम का सोर्स बंद हो जाएगा. 2017 में ‘ऑपरेशन आयरन टेम्पेस्ट’ शुरू किया गया. अफ़ीम के खेतों और लैब्स पर हवाई हमले शुरू हुए. लेकिन जो लैब्स बर्बाद किए जाते, वो मेकशिफ़्ट लैब्स होते. उन्हें कुछ ही दिनों में दोबारा खड़ा कर दिया जाता था.

इस ऑपरेशन पर तकरीबन 70 हज़ार करोड़ रुपये खर्च हुए. लेकिन उन्हें मनमाफ़िक नतीजा नहीं मिला. उल्टा, अफ़ीम का उत्पादन और बढ़ गया. अफ़ग़ानिस्तान की जीडीपी का एक-तिहाई अफ़ीम की खेती से आता है. ये बिजनेस लगभग छह लाख लोगों को रोजगार देता है. जब लोगों के खेतों पर हमला हुआ तो उनका गुस्सा सरकार के ख़िलाफ़ और बढ़ गया. नतीजतन, तालिबान की पैठ मज़बूत होती रही. थक-हारकर अमेरिका को अपना ऑपरेशन बंद करना पड़ा.

एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि, इस बार अफ़ग़ान सेनाओं ने इतनी ज़ल्दी हथियार कैसे डाल दिए?

अमेरिका हमेशा ये दावा करता रहा कि उसने 20 बरस में तीन लाख अफ़ग़ान सैनिकों को ट्रेन किया है. इसी के दम पर जो बाइडन ये कहते रहे कि अफ़ग़ानिस्तान को बचाने की ज़िम्मेदारी वहां के लोगों की है. फिर ये तीन लाख सैनिकों ने तालिबान से मोर्चा क्यों नहीं लिया?

इस सवाल का जवाब बीबीसी की एक रिपोर्ट में मिलता है. तालिबान से जुड़े एक मौलवी ने बयान दिया था,

तालिबान धर्म, जन्नत और ग़ाज़ी के लिए लड़ता है. जबकि अफ़ग़ान सैनिक पैसों के लिए. तालिबान सैनिक अपना सिर कटाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, पुलिस और सेना क्या खाकर हमारा मुक़ाबला करेगी?

अफ़ग़ानिस्तान के संदर्भ में इस दावे में काफी वजन है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन लाख सैनिकों का दावा ग़लत है. कई अफ़सर इतने भ्रष्ट हैं कि उन्होंने अज्ञात नाम पर वेतन उठाए हैं. ऐसे सैनिकों की संख्या हज़ारों में है. उन्हें ‘घोस्ट सोल्ज़र्स’ कहा जाता है.

इसके अलावा, सरकार और निचले तंत्र के बीच कोई संपर्क नहीं है. कई शहरों में सरकार की उपस्थिति के नाम पर दो-तीन इमारतें थीं. वहां दर्ज़न भर सैनिक तैनात थे. उनके हथियार डालते ही शहर पर तालिबान का क़ब्ज़ा हो गया.

एक और बात पता है? रूसी मीडिया एजेंसी के मुताबिक, अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी देश छोड़ते वक़्त अपने साथ चार गाड़ियों में पैसे और बाकी चीज़ें भरकर ले गए. कुछ पैसे उन्होंने इसलिए छोड़ दिए, क्योंकि गाड़ियों में जगह खत्म हो गई थी.

ज़ाहिर सी बात है, जब आपका लीडर ही हाथ खड़े कर दे. तो मनोबल अपने-आप खत्म हो जाता है. आधी से ज़्यादा लड़ाई आप वहीं हार जाते हैं. अफ़ग़ान लोगों को धोखा देने में कोई पीछे नहीं रहा है. अपने क्या और पराये क्या!

अब आगे क्या होगा?

अमेरिका की वापसी के बाद चीन को अपने पैर फैलाने का मौका मिल गया है. चीन ने कहा है कि वो तालिबान के साथ दोस्ताना संबंध बनाने के लिए तैयार है. इससे पहले तालिबान ने कहा था कि वो उइग़र मुस्लिमों को अपने यहां शरण नहीं देगा. चीन को और क्या ही चाहिए?

उसे बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव में अफ़ग़ानिस्तान की दरकार थी. तालिबान के आने से उसका मकसद आसानी से पूरा हो जाएगा. चीन को मानवाधिकार उल्लंघन और आज़ाद ख़यालों से वैसे भी कोई लेना-देना नहीं है. अब अफ़ग़ानिस्तान में उसको टक्कर देने वाला कोई नहीं बचा.

पाकिस्तान ने भी तालिबान की वापसी का स्वागत किया है. तालिबान को पहले से ही आईएसआई का समर्थन मिलता रहा है. प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कहा है कि तालिबान ने ग़ुलामी की बेड़ियों को तोड़ दिया है. उनका इशारा अमेरिकी प्रभुत्व की तरफ था.

तालिबान के पास अब दो महाशक्तियों को हराने का अहंकार है. अब उसकी मनमर्ज़ी और वीभत्स रूप में सामने आएगी. काबुल की दीवारों पर से महिलाओं की तस्वीरें मिटाई जाने लगीं है. राजधानी में सब अस्त-व्यस्त है. अफ़ग़ान सेना ने अपने हथियार डाल दिए हैं. काबुल एयरपोर्ट पर भगदड़ मची है. लोग किसी भी तरह देश छोड़कर निकल जाना चाहते हैं. तालिबान का नए विचारों को प्रश्रय देने का दावा पल-पल झूठा साबित हो रहा है. अफ़ग़ान जनता गुहार लगा रही है, समर्थ देशों ने कान में रूई का गोला ठूंस लिया है.

इस पूरी कहानी का सार समझना हो तो किसी अफ़ग़ान नागरिक के बेबस चेहरे को गौर से देख लीजिए. जिस पर साफ़-साफ़ दिखता है,

जो कोई हमें जिससे बचाने आया, वो उसी के हाथों बेचकर चला गया.

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बांग्लादेश में गायब हो रहे राजनीतिक कार्यकर्ता

ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) ने बांग्लादेश में गायब होने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की लिस्ट जारी की है. रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में विपक्षी दल से जुड़े कम-से-कम 86 लोग गायब हो चुके हैं. इनमें बिजनेसमैन, छात्र नेता और विपक्षी पार्टी के नेता शामिल हैं. ये सारे कांड प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के कार्यकाल में हुए हैं. शेख़ हसीना जनवरी 2009 से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हैं. उन पर आरोप है कि उन्होंने विरोध को दबाने के लिए इन लोगों को गायब करवाया. HRW ने यूनाइटेड नेशंस और दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मांग की है कि वे बांग्लादेश में स्वतंत्र जांच शुरू करें. फिलहाल, इस रिपोर्ट पर बांग्लादेश सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया है.

वापस लौट रहा है हाथियों का दल

आपको हाथियों के दल वाली कहानी याद है? जो अपने प्राकृतिक परिवेश से बाहर निकल आया था. युन्नान प्रांत से निकलने के बाद ये हाथी उत्तर की तरफ़ बढ़ गए थे. जंगली हाथी भोजन की तलाश में अपने परिवेश से निकलते रहते हैं. वे ज़ल्दी ही लौट भी आते हैं. लेकिन इन हाथियों का ज़ल्दी लौटने का कोई इरादा नहीं था. ये पलायन अभूतपूर्व था. रास्ते में इन्होंने ख़ूब हुड़दंग मचाया. घरों में घुसकर खाना मांगने से लेकर कीचड़ में लोटने और शराब के गोदाम में धावा बोलने तक, ये चर्चा में बने रहे. अब ताज़ा ख़बर ये है कि ये हाथी वापस अपने घर लौट रहे हैं. पूरे 17 महीने बाद. इस दौरान उन्होंने लगभग एक हज़ार किलोमीटर की दूरी तय कर ली है. जानकारों का कहना है कि सूखे और जंगलों की कटाई की वजह से उनके खाने पर संकट था. इसलिए, वे नए ठिकानों की तलाश में निकले थे. एक बात पता है, उनकी सुरक्षा के लिए क्या-क्या इंतज़ाम किए गए थे? सीजीटीएन की रिपोर्ट के अनुसार, हाथियों के सफ़र में कोई बाधा न आए, उसके लिए डेढ़ लाख लोगों को रास्ते से हटाया गया. 973 ड्रोन्स और 25 हज़ार से अधिक स्टाफ़्स को भी निगरानी में लगाया गया था. जिस रूट से भी उनका जाना तय होता था, वहां का ट्रैफ़िक रोक दिया जाता था. सेफ़ पासेज़. समझ रहे हैं! एकदम राजसी ठाट-बाट.


 

वीडियो- दुनियादारी: चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव’ की ये सच्चाई आपको हैरान कर देगी!

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