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प्रिंस सलमान के 'शुद्धिकरण' अभियान की चपेट में आई राजकुमारी 3 साल बाद जेल से रिहा हुई

अगर आप इंटरनेट पर फ़ैमिली ऑफ़ सऊद के बारे में सर्च करेंगे तो आपको कई रंग-बिरंगी रिपोर्ट्स मिलेंगी. मसलन, शाही परिवार की अमीरी, आलीशान लाइफ़स्टाइल, राजसत्ता की चमक-दमक आदि. इन सबके अलावा एक और बिंदु जो अक्सर चर्चा के केंद्र में रहता है, वो है शीर्ष पर पहुंचने के लिए जारी जद्दोजहद.

जद्दोजहद, जिसके लिए भाई अपने भाई को दिन-रात टॉर्चर करता है. कोई अपने करीबी के ख़िलाफ़ मौत का वॉरंट जारी कर देता है. तो कोई बहन को जेल में सड़ने के लिए मज़बूर करता है. कुल जमा बात ये कि हर किसी की सांस साज़िशों की नोक पर अटकी रहती है.

ये किसी थ्रिलर फ़िल्म या उपन्यास का प्लॉट नहीं है. ये असल खेल है, जो मिडिल-ईस्ट एशिया में दशकों से अनवरत चल रहा है. जानेंगे इस शाही परिवार की पूरी कहानी क्या है, इस परिवार के भीतर क्या-क्या साज़िशें होतीं है, और आज हम ये कहानी आपको क्यों बता रहे हैं? 

पहले बैकग्राउंड समझ लेते हैं

साल 1902 की बात है. अल-सऊद वंश के अब्दुल अज़ीज़ इब्न सऊद अपने 40 वफ़ादार साथियों के साथ रियाद के मिशन पर निकले. उससे पहले तक वे कुवैत में शरणार्थी बनकर रह रहे थे. इब्न सऊद के पुरखों ने दो बार सऊदी साम्राज्य की नींव रखी. इसके बावजूद उनकी नई पीढ़ी शरणार्थी का जीवन क्यों जी रही थी? इसके पीछे एक दिलचस्प कहानी है. 

अरब प्रायद्वीप दो प्राचीन सभ्यताओं के बीचोंबीच बसा है. पूरब की तरफ़ मेसोपोटामिया की सभ्यता थी तो पश्चिम में नील नदी घाटी की सभ्यता. इन दोनों सभ्यताओं की अपनी विशेषता थी. साथ में कमियां भी. अरब प्रायद्वीप के लोगों ने इस कमी में अपने लिए अवसर तलाश लिया. वे दोनों इलाकों में ज़रूरत का सामान मुहैया कराने लगे. जैसे, भारत से अरब सागर के ज़रिए मसाले आते और फिर उन्हें ऊंटों पर लादकर दूर-दराज़ के इलाकों में पहुंचाया जाता. पड़ोस के इलाकों में हमेशा सत्ता को लेकर उठापटक चलती रहती थी. अरब प्रायद्वीप पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ता था. उनका व्यापार हमेशा की तरह फलता-फूलता रहा. इसकी एक वजह ये भी रही होगी कि लगभग पूरा अरब प्रायद्वीप रेगिस्तान से घिरा हुआ था. इसलिए, विदेशी ताक़तें बड़ा रिस्क लेने के लिए तैयार नहीं थीं. 

इधर ये सब चल रहा था कि सातवीं सदी की शुरुआत में मक्का में इस्लाम का उदय हुआ. कुछ ही सालों के भीतर इस्लाम एशिया से लेकर यूरोप तक फैल गया. मक्का और मदीना इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थल बन गए. इस्लाम को मानने वाले लोगों की आवक बढ़ गई. इससे अरब प्रायद्वीप का बाकी दुनिया के साथ संपर्क बढ़ा. उनकी संस्कृति को नये आयाम मिले. 

फिर आई 17वीं शताब्दी. तब तक इस्लामी साम्राज्य अलग-अलग धाराओं में बंट चुका था. उनके बीच इस्लाम की मूल अवधारणा को लेकर मतभेद शुरू हो चुके थे. उसी कालखंड में एक धार्मिक विद्वान हुए, शेख मोहम्मद इब्न अल-वहाब. वो इस बात का प्रचार करने लगे कि इस्लाम अपनी मूल सोच से भटक चुका है. उसमें सुधार की ज़रूरत है. उनकी बातों का तगड़ा विरोध हुआ. स्थानीय धर्म प्रचारक उनकी जान लेने पर उतारू हो गए. उन्हें लगा कि ये आदमी उनकी जमी-जमाई गद्दी को छिन्न-भिन्न कर देगा. 

अल-वहाब को जान का ख़तरा महसूस हुआ तो वे अल दिरियाह शहर चले गए. वहां पर मोहम्मद बिन सऊद का शासन चल रहा था. अल-वहाब ने शरण मांगी. बिन सऊद उनसे खासे प्रभावित थे. उन्होंने शरण देने के साथ-साथ इस्लाम की मौलिकता लौटाने का भी वादा किया. इसी गठबंधन के तहत पहले सऊदी स्टेट की स्थापना हुई. उन्होंने 18वीं सदी के अंत तक अरब प्रायद्वीप के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था. 

सऊदी अभियान से ऑटोमन साम्राज्य को ख़तरा महसूस हुआ. उन्होंने सऊदी स्टेट के ख़िलाफ़ सेना उतार दी. ऑटोमन सेना ने अल दिरियाह को पूरी तरह तबाह कर दिया. उन्होंने पूरे शहर को समतल बना दिया था. अल दिरियाह में निबाह करना नामुमकिन था. 1818 तक पहले सऊदी स्टेट के चैप्टर पर दी एंड का पट्टा लटक चुका था. हालांकि, ये पूर्ण विराम नहीं था. उनका पुनर्जन्म होना बाकी था. 

ये हुआ छह बरस बाद. जब एक और सऊदी सरदार तुर्की अब्दुल्ला अल-सऊद आगे आए. उन्होंने अल-दिरियाह से कुछ मील दूर पर नई राजधानी बसाई. ये जगह थी रियाद. तुर्की ने 1824 में रियाद में दूसरे सऊदी स्टेट की स्थापना की. उन्होंने कुछ समय के भीतर सभी हारे हुए इलाकों को अपने नियंत्रण में ले लिया. ऑटोमन साम्राज्य को बाहर जाना पड़ा. तुर्की और उनके बेटे फ़ैसल के शासनकाल में सऊदी स्टेट की खूब तरक्की हुई. खेती और व्यापार का सिलसिला चल निकला. दशकों तक शांति भी बरकरार रही. लेकिन ऑटोमन साम्राज्य ने हार नहीं मानी थी. वे फिर लौटे. एक बार फिर से मार-काट का दौर चलने लगा. 1891 में फ़ैसल ने हथियार डाल दिए. वो अपने परिवार के साथ कुवैत निकल गए. उनके साथ उनका 15 साल का बेटा अब्दुल अज़ीज़ भी था. वो इस अपमान को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था. उसे अपना साम्राज्य किसी भी कीमत पर हासिल करना था.

मक्का-मदीना पर भी कब्जा 

अब्दुल अज़ीज़ का रियाद अभियान सफ़ल रहा. महज 40 साथियों के दम पर उसने रियाद को जीत लिया. रियाद को मुख्यालय बनाने के बाद अब्दुल अज़ीज़ ने बाकी इलाकों को भी अपने नियंत्रण में लेना शुरू कर दिया. 1925 तक मक्का और मदीना पर भी उसका क़ब्ज़ा हो चुका था. अब्दुल अज़ीज़ ने आपस में लड़ रहे कबीलों को एक करने का काम किया.

और फिर, 23 सितंबर 1932 को शाही आदेश के तहत किंगडम ऑफ़ सऊदी अरब की स्थापना की गई. अरबी इसकी राष्ट्रभाषा बनी और कुरान संविधान. सऊदी अरब शरिया लॉ के हिसाब से चलता है. 

सऊदी अरब में राजतंत्र है. इसे चलाने वाली फ़ैमिली को ‘हाउस ऑफ़ सऊद’ के नाम से जाना जाता है. इस शाही परिवार में 15 हज़ार से अधिक सदस्य हैं. इन सदस्यों का ताल्लुक पहले सऊदी स्टेट के संस्थापक मोहम्मद बिन सऊद से है. सऊदी की सत्ता और संसाधनों पर इसी परिवार का नियंत्रण है. इसी वजह से हाउस ऑफ़ सऊद को दुनिया के सबसे अमीर शाही परिवार में गिना जाता है. 

हाउस ऑफ़ सऊद में भले ही 15 हज़ार से अधिक मेंबर हों, लेकिन धन-दौलत और वैभव के बड़े हिस्से पर दो हज़ार सदस्यों का नियंत्रण है. ये सदस्य आधुनिक सऊदी किंगडम के संस्थापक अब्दुल अजीज़ के वंशज हैं. 

सऊदी अरब में सबसे बड़ा पद है राजा का. उसके बाद क्राउन प्रिंस का नंबर आता है. क्राउन प्रिंस ही सऊदी अरब में अगले राजा बनते हैं. इस वजह से क्राउन प्रिंस का पद हमेशा से साज़िशों का केंद्र रहा है. 

किंग अब्दुल अज़ीज़ ने अपने बेटे सऊद बिन अब्दुल अजीज़ को क्राउन प्रिंस बनाया था. हालांकि वो ताउम्र दूसरे बेटे फ़ैसल को सबसे काबिल मानते रहे. इसको लेकर दोनों बेटों में मतभेद चलते रहे. जब किंग अब्दुल अज़ीज़ मरने की कगार पर पहुंचे, तब उन्होंने सऊद और फ़ैसल को अपने पास बुलाया. उन्होंने दरख़्वास्त की.

‘तुम दोनों भाई हो. अब तो लड़ना बंद कर दो.’

लेकिन ऐसा नहीं हुआ

सऊद ने 1953 से 1964 तक शासन किया. लेकिन वो कभी चैन से कुर्सी पर नहीं बैठ पाए. फ़ैसल ने उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर कर दिया था. इसके बाद भी क्राउन प्रिंस की कुर्सी को लेकर झगड़े चलते रहे. हालिया झगड़ा मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS का है. 

जनवरी 2015 में सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ सऊदी अरब के राजा बने. उन्होंने किंग अब्दुल अज़ीज़ के अंतिम बेटे मुक़रीन को क्राउन प्रिंस बनाया. मुक़रीन क्राउन प्रिंस के पद पर तीन महीने ही रह पाए. उनकी जगह पर मुहम्मद बिन नायफ़ यानी MBN को क्राउन प्रिंस बनाया गया.

मगर MBN का ओहदा बढ़ने के साथ-साथ सऊदी में एक और भी चीज हो रही थी. एक आदमी था, जो MBN की जड़ खोदकर उनकी जगह लेना चाहता था. कौन था ये आदमी? ये शख्स था, किंग सलमान का बेटा MBS. यानी, मुहम्मद बिन सलमान. किंग सलमान बस दिखावे के सुल्तान थे. असली सत्ता MBS के ही पास थी.

जनवरी 2015 में डिफेंस मिनिस्टर. फिर अप्रैल 2015 में डेप्युटी क्राउन प्रिंस. MBS लगातार अपनी प्रोफाइल बढ़ाते जा रहे थे. MBS जितने ताकतवर होते गए, MBN और उनके वफ़ादार उतने ही कमज़ोर होते गए.

21 जून 2017 को MBS ने क्राउन प्रिंस मुहम्मद बिन नायफ़ का तख़्तापलट कर दिया. बिन नायफ़ को नज़रबंद कर दिया गया. उस दौरान उन्हें रात में सोने नहीं दिया जाता था. उन्हें किसी से मिलने की इजाज़त भी नहीं थी. न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, हाउस अरेस्ट के दौरान उन्हें रस्सी से उलटा लटका कर रखा जाता था. उसके बाद से वो कभी सहारे के बिना चल नहीं सके. बाद में उन्हें गिरफ़्तार करके जेल भेज दिया गया. उनके ऊपर गद्दारी और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे. हालांकि, कभी उनके ऊपर आधिकारिक तौर पर कोई चार्ज़ नहीं लगाया गया.

MBN के बाद किंग सलमान ने MBS को नया क्राउन प्रिंस घोषित कर दिया था. जो साज़िश MBS ने अपने चचेरे भाई के ख़िलाफ़ रची थी, वैसा उनके साथ ना हो, इसके लिए शुद्धिकरण अभियान शुरू किया गया. उन्हें जिससे भी ख़तरा महसूस हुआ, उनके ऊपर सही-ग़लत आरोप लगाकर जेल में डाला जाने लगा.

MBS के इसी अभियान की चपेट में हाउस ऑफ़ सऊद की एक राजकुमारी भी आई. प्रिंसेस बसमाह. वो आधुनिक सऊदी अरब के दूसरे सुल्तान किंग सऊद बिन अब्दुल अज़ीज़ की सबसे छोटी बेटी है. किंग सऊद की सौ से ज़्यादा संतानें हुईं. प्रिंसेस बसमाह का जन्म 1963 में हुआ था. उस समय उनके पिता के कुर्सी पर आख़िरी दिन चल रहे थे.

प्रिंसेस बसमाह की पढ़ाई-लिखाई लेबनान के बेरूत में हुई. फिर वो लंदन गईं. वहां से सऊदी अरब आने के बाद उन्होंने संवैधानिक सुधारों की वकालत शुरू की. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में लिखा. जब 2011 में मिडिल-ईस्ट में अरब क्रांति हुई, तब उन्होंने इसे सही ठहराया था. वो महिलाओं को बुनियादी अधिकार देने की मांग करती रहीं. उन्होंने सऊदी अरब के शरिया कानून का भी विरोध किया था.

उनका क्रांतिकारी अभियान तब तक ठीक चला, जब तक कि वो MBS की नज़र में नहीं आईं थी. 2018 में बसमाह ने एक इंटरव्यू में MBS की आलोचना कर दी. इस इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि जो कोई उसके साथ नहीं देता, उसे दरकिनार कर दिया जाता है.

इस इंटरव्यू के कुछ महीनों बाद सऊदी एजेंट्स ज़ेद्दाह में उनके घर आए. उन्होंने बसमाह और उनकी बेटी अल-शरीफ़ को अरेस्ट कर लिया. दोनों को तब से रियाद के पास बनी एक जेल में रखा गया था. 

आज ये कहानी क्यों?

दरअसल, सऊदी अरब सरकार ने प्रिंसेस बसमाह बिंत सऊद और उनकी बेटी को जेल से रिहा कर दिया है. बसमाह को मार्च 2019 में अरेस्ट किया गया था. वो अपनी बेटी के साथ इलाज के लिए स्विट्ज़रलैंड जा रहीं थी. गिरफ़्तार किए जाने के बाद उन्हें रियाद के पास अल-हयार जेल में रखा गया था. प्रिंसेस बसमाह और उनकी बेटी लगभग तीन साल तक जेल में रहीं. इस दौरान उनके ऊपर ना तो कोई आरोप लगाया गया और ना ही कोई मुकदमा ही चलाया गया. 

अप्रैल 2020 में उन्होंने सऊदी अरब के किंग सलमान और क्राउन प्रिंस MBS से रिहाई की गुहार लगाई थी. उनके ट्विटर फ़ीड पर एक ट्वीट दिखा. जिसमें उन्होंने जेल से छोड़े जाने की दरख़्वास्त की थी. ट्वीट में लिखा गया था कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया है और उन्हें इलाज की सख्त ज़रूरत है. कुछ दिनों के बाद वो ट्वीट गायब हो गया. 

अब जाकर उन्हें और उनकी बेटी को रिहाई मिली है. हालांकि, अभी ये पता नहीं है कि उन्हें इलाज के लिए बाहर जाने की अनुमति मिलेगी या नहीं. आज तक दुनिया को इस सवाल का जवाब भी नहीं मिला है कि बसमाह और उनकी बेटी को जेल भेजा क्यों गया था? ये सवाल शाही परिवार के उन लोगों के भी हैं, जो MBS के एकाधिकार की जंग में या तो जेल में सड़ रहे हैं या अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं.


वीडियो- दुनियादारी: वर्ल्ड वॉर की चिट्ठियों से युद्ध के बारे में क्या पता चलता है? 

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