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ड्रोनः खिलौनों की तरह उड़ाए जाते थे, अब आतंक का सामान बन गए हैं

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के लिए एक नया सिरदर्द पैदा हो गया है. इसका नाम है ड्रोन. दरअसल, बीते सप्ताहांत जम्मू के एयरफोर्स स्टेशन पर ड्रोन के जरिए बम गिराए गए थे. बताया गया है कि ये हमला दो ड्रोन्स की मदद से किया गया था. वहीं, इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस हमले के अगले दिन सुरक्षा बलों ने जम्मू के ही एक दूसरे इलाके कालूचक में दो ड्रोन्स को स्पॉट किया था और उन पर फायरिंग की थी. भारत में पहली बार ड्रोन के जरिए भारतीय सेना के ठिकाने को निशाना बनाया गया है. इस घटना ने लोगों के मन में ड्रोन को लेकर नई जिज्ञासा पैदा कर दी है. वे जानना चाहते हैं कि आखिर ये ड्रोन होते क्या हैं? इन्हें उड़ाने के क्या कुछ नियम-कायदे भी हैं? और पाकिस्तान से भारत में घुसने वाले ड्रोन भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को चकमा कैसे दे रहे हैं? इस रिपोर्ट में इन तमाम बातों पर चर्चा करेंगे.

ड्रोन सिस्टम का उस्ताद अमेरिका

साल 2015. हॉलीवुड की एक फिल्म रिलीज हुई. आई इन द स्काई (Eye in the Sky). एलेन राइखमैन, हेलेन मिरेने और एरॉन पॉल जैसे सितारों से सजी ये फिल्म हमें ड्रोन पायलटों की दुनिया में ले जाती है. ये दुनिया के एक कोने में बैठकर खतरनाक ड्रोन्स के जरिए दुश्मन पर बम बरसाते रहते हैं. उनके लिए ये सब एक वीडियो गेम सरीखा है. अमेरिका इस युद्ध में माहिर है. अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ पूरी लड़ाई ही ड्रोन के जरिए लड़ रहा है. उसने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सीरिया, ईराक, यमन और सोमालिया जैसे देशों में जम के ड्रोन मिसाइल स्ट्राइक किए हैं. अमेरिका के सबसे खतरनाक ड्रोन में शामिल है एमक्यू-1 प्रेडिएटर (MQ-1 Predator). ये ड्रोन 20 फीट लंबे और 10 टन वजन के साथ उड़ सकते हैं. ये एक बार में कई घंटों तक हवा में रहते हुए कई किलोमीटर दूर मिसाइल बरसा सकते हैं. लेकिन ये तो हुई मिलिट्री ड्रोन की बात. यहां मामला उन छोटे ड्रोन्स का है जो बिना खबर लगे तहलका मचा रहे हैं.

Drones
MQ-9B भी एक बेहद घातक ड्रोन सिस्टम है जिसे अमेरिका के जनरल एटॉमिक्स नाम के फर्म द्वारा बड़े हमलों के लिए तैयार किया गया है. (फोटो – इंडिया टुडे)

ड्रोन होते क्या हैं?

एक ऐसा रोबोट जो उड़ सकता है. तेजी से उड़ने के साथ ही जरूरत पड़ने पर वो अपने साथ कुछ सामान भी ले जा सकता है. इसे दूर से ही कंट्रोल किया जा सकता है. ये ड्रोन है. अमूमन चार पंखों से लैस ड्रोन बैटरी के चार्ज होने पर लंबी उड़ान भर सकते हैं. इन्हें एक रिमोट या खासतौर पर बनाए गए कंट्रोल रूम से उड़ाया जा सकता है. वैसे ड्रोन नर मधुमक्खी को कहा जाता है. असल में ये नाम खास तरह से उड़ने के कारण ही इसे मिला है. ड्रोन बिल्कुल मधुमक्खी की तरह उड़ते हैं और एक जगह पर स्थिर रहकर मंडरा भी सकते हैं. चूंकि हवाई जहाज की तरह इसके भीतर बैठकर इसे नहीं उड़ाया जाता है, इसलिए इसे अनमैंड एरियल वीकल (Unmanned Aerial Vehicle) या UAV भी कहते हैं.

ड्रोन उड़ाने का कोई नियम-कायदा?

भारत में ड्रोन उड़ाने के नियम हैं. सरकार के सिविल एविएशन मिनिस्ट्री ने 2018 में ड्रोन को लेकर अपनी पहली पॉलिसी जारी की थी. इसमें ड्रोन को उड़ाने को लेकर कई तरह के नियम-कायदे बनाए गए थे. इन्हें नई जरूरतों को हिसाब से 2020 में फिर से बदला गया है.

सरकार ने ड्रोन को रेग्युलेट करने के लिए उसे पांच सेग्मेंट में बांटा है और हरेक के उड़ान के लिए नियम बनाने का प्रस्ताव रखा है. ये पांच सेग्मेंट हैं – नैनो, माइक्रो, स्मॉल, मीडियम और लार्ज.

वजन के हिसाब से ड्रोन की पांच कैटिगरी हैं.

# नैनो (250 ग्राम या उससे कम)
# माइक्रो (250 ग्राम से 2 किलो)
# स्मॉल (2 किलो से 25 किलो)
# मीडियम (25 किलो से 150 किलो)
# लार्ज (150 किलो से अधिक)

– ड्रोंस को 400 फीट से ज़्यादा ऊंचाई पर नहीं उड़ा सकते हैं.

– फिलहाल ड्रोंस केवल दिन की रोशनी में ही उड़ाए जा सकते हैं.

ड्रोन की उड़ान के लिए हवाई क्षेत्र को तीन भागों में बांटा गया है-

# रेड ज़ोन (जहां पर ड्रोन उड़ाने की अनुमति नहीं है.)

# येलो ज़ोन (जहां पर कुछ नियमों के साथ ड्रोन उड़ाने की अनुमति है.) और

# ग्रीन ज़ोन (इस ज़ोन में ड्रोन उड़ाने की अनुमति है.)

– नैनो को छोड़ कर बाकी चार कैटगरीज़ में आने वाले ड्रोंस उड़ाने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना ज़रूरी है. हर ड्रोन के लिए एक यूनिक आइडेंटिफिकेशन नंबर जारी किया जाएगा, जिससे कि हर ड्रोन और उसके मालिक की आसानी से पहचान की जा सके. राष्ट्रीय तकनीकी शोध संगठन (एनटीआरओ) और केंद्रीय खुफिया एजेंसियों के ड्रोन्स को भी पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है.

– सेकेण्ड हेंड ड्रोन बेचने वाले को अपना यूआईएन रद्द करवाना करना होगा और खरीदने वाले को नया यूआईएन इश्यू करवाना होगा.

– पायलट एक समय में एक से ज़्यादा ड्रोन नहीं उड़ा सकता.

– यलो ज़ोन में ड्रोन उड़ाने के लिए ‘फ्लाइट प्लान’ जमा करवाना होगा और साथ ही एयर डिफेंस क्लियरेंस/फ्लाइट इनफॉर्मेशन सेंटर नंबर होना भी ज़रूरी होगा.

– स्मॉल, मीडियम और लार्ज ड्रोंस उड़ाने के लिए ड्रोन का न्यूनतम मानकों को पूरा करना और ड्रोन उड़ाने वाले का प्रशिक्षित होना ज़रूरी है.

– हवाई अड्डों के आसपास का पांच किलोमीटर का इलाका, अंतरराष्ट्रीय सीमा के आसपास का 25 किलोमीटर का इलाका, दिल्ली के विजय चौक के आसपास का पांच किलोमीटर का इलाका, राज्य सचिवालयों के आसपास का तीन किलोमीटर का इलाका, गृह मंत्रालय द्वारा चिह्नित रणनीतिक स्थानों और महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों के इर्द-गिर्द का दो किलोमीटर का इलाका, सामरिक और युद्ध के हिसाब से संवेदनशील जगहों के आसपास का तीन किलोमीटर का इलाका ‘नो ड्रोन ज़ोन’ में आएगा. मतलब यहां पर ड्रोन उड़ाना सख्त मना होगा.

– इनमें से किसी नियम का उल्लंघन करने पर ड्रोन को जब्त किया जा सकता है, ड्रोन रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है. इस पॉलिसी में नियम को तोड़ने पर एयरक्राफ्ट एक्ट 1934, एयरक्राफ्ट रूल्स और आईपीसी की धाराओं के अंतर्गत सज़ा और ज़ुर्माने का भी प्रावधान है.

भारत सरकार की तरफ से ड्रोन को लेकर साफ-साफ गाइडलाइंस 2020 में ही जारी कर दी गई हैं.
भारत सरकार की तरफ से ड्रोन को लेकर साफ-साफ गाइडलाइंस 2020 में ही जारी कर दी गई हैं.

छोटे ड्रोन, जिन्हें पकड़ना मुश्किल काम है

ये नियम-कायदे उन लोगों पर तो लागू करवाए जा सकते हैं जो देश में ड्रोन उड़ा रहे हैं. लेकिन सीमापार से हमला करने वालों का क्या. उनसे निपटने के लिए बॉर्डर पर रडार और एंटी ड्रोन जैमर का इंतजाम किया गया है. तो फिर ये घुस कैसे आते हैं? असल में फिलहाल भारत में ड्रोन को रोकने के लिए जिस तरह की तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है वो फुल प्रूफ नहीं है. रडार की ड्रोन को डिटेक्ट कर पाने की भी सीमा है.

# साइज में छोटा होने पर रडार ये फर्क नहीं कर पाते कि ये कोई चिड़िया है या ड्रोन.
# बार-बार फ्रिक्वेंसी चेक करने का झंझट रहता है.

होम मिनिस्ट्री से जुड़े एक अधिकारी ने बताया,

“ पाकिस्तान की सीमा पर ड्रोन काफी चिंता का विषय रहे हैं. कई तरह के तकनीकी उपाय आजमाए गए हैं लेकिन कोई फुल प्रूफ तरीका नहीं है. बॉर्डर एरिया पर एंटी ड्रोन जैमर भी ज्यादा काम नहीं करते. लेकिन भविष्य के खतरों को देखते हुए ऐसे जैमर संवेदनशील जगहों पर लगाया जा सकते हैं. वैसे ड्रोन से निपटने के लिए अलग तरह की तकनीक आ रही हैं. इनके बारे में सोचने का वक्त आ गया है ”

जब आतंकी संगठनों ने ड्रोन से डराया

साल 2016-17. इस्लामिक आतंकवादी संगठन ISIS या इस्लामिक स्टेट का खौफ बढ़ता जा रहा था. ईराक से लेकर सीरिया तक ये कहर ढा रहा था. इस बीच ISIS के एक प्रोपेगैंडा वीडियो ने दुनियाभर की नींद उड़ा दी. इस वीडियो में इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों को ड्रोन के जरिए शहरों में खास लोकेशन पर बम गिराते दिखाया गया था. ये बमबारी किसी खास मिलिट्री ग्रेड ड्रोन से नहीं, बल्कि अमूमन मार्केट में मिलने वाले सस्ते और छोटे ड्रोन के जरिए की जा रही थी. इस नए तरीके का खतरा था.

हालांकि आतंकी संगठन के हाथों में ड्रोन लगने का ये कोई नया वाकया नहीं था. दुनिया में सबसे पहले ड्रोन पर जिस आतंकी संगठन का हाथ पड़ा उसका नाम था हिजबुल्ला. ईरान का समर्थन करने वाले लेबनान के हिजबुल्ला ने नवंबर 2004 में इजरायल के ऊपर से मिरसाद 1 ड्रोन उड़ाया. हालांकि ये सिर्फ खोज-खबर लेने का मिशन था. लेकिन इसने आतंकवादियों को दहशत पैदा करने का एक हथियार दे दिया था. साल 2006 में जब इजरायल और लेबनान में युद्ध हुआ तो हिजबुल्ला ने 40-50 किलो विस्फोटक के साथ तीन अबाबील नाम के ड्रोन भेजे. हालांकि इन्हें इजराइली एफ-16 ने मार गिराया.

साल 2012 आते-आते ये हथियार फिलिस्तीनी आतंकी संगठन हमास के हाथ लग गया. जब इजरायल पर ड्रोन से हमले हुए तो उसने कई ड्रोन स्टेशनों को निशाना बनाया. 2014 में हमास ने अपनी सालाना परेड में भी ड्रोन का प्रदर्शन किया. इसके बाद जैश अल फतह और अल-कायदा ने भी सर्विलांस ड्रोन के फुटेज जारी करते हुए ये दावा किया कि उनके पास भी ड्रोन मौजूद हैं. लेकिन 2017 के बाद इस्लामिक स्टेट के ड्रोन सामने आने के बाद दुनियाभर की एजेंसियां इस बड़े खतरे को लेकर चौकन्नी हो गई हैं.


वीडियो – जम्मू एयरपोर्ट स्थित एयरफोर्स स्टेशन के अंदर दो धमाके के बाद छत उड़ी

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