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टाइट जीन्स पहनकर ऑटोमेटिक कार चलाना जानलेवा है

अक्सर बुजुर्गों को कहते सुना है – बेटा शरीर को चलाते रहा करो, नहीं तो ज़ंग लग जाएगी. इसके बाद की समझाइश ये कि हमारा शरीर एक मशीन है. शरीर के अंग इस मशीन के पुर्ज़े हैं. जिस पुर्ज़े का इस्तेमाल न किया जाएगा, उसमें ज़ंग लग जाएगी.

बुज़ुर्ग हमें टाइट जीन्स पहनने से भी मना करते हैं. बुज़ुर्ग तो बहुत कुछ बताते हैं लेकिन मैं आपको ये सब क्यों बता रहा हूं? कारण है टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर.

ऑटोमेटिक कार में लॉन्ग ड्राइव आपके लिए खतरनाक साबित हो सकती है.

यही खबर दैनिक भास्कर में भी छपी है – टाइट जींस पहनकर युवक ने ऑटोमेटिक कार चलाई, थक्का जमने से कार्डियक अरेस्ट

क्या है इस खबर में?

सौरभ शर्मा नाम के एक नौजवान हैं. उम्र है 30 साल. दिल्ली में रहते हैं. पिछले महीने ये लॉन्ग-ड्राइव पर ऋषिकेश निकल गए. अपनी लग्ज़री ऑटोमेटिक कार में. इस लॉन्ग-ड्राइव के चक्कर में वो मरते-मरते बचे. किसी एक्सीडेंट के कारण नहीं. बैठे रहने के कारण.

फिल्म खिलाड़ी 786 का एक गाना भी है - लॉन्ग ड्राइव पे चल. (सोर्स - रॉयटर्स)
फिल्म ‘खिलाड़ी 786’ का एक गाना भी है – लॉन्ग ड्राइव पे चल. (सोर्स – रॉयटर्स)

हुआ क्या कि कार में बइठे-बइठे सौरभ के बाएं पैर में ब्लड क्लॉट हो गया. ब्लड क्लॉट होना मतलब खून के थक्के जम जाना. पैर से ये थक्के टहलते-टहलते उनके फेफड़ों में चले गए. उनके फेफड़ों, दिल और दूसरे हिस्सों में खून का बहाव कम होने लगा. और दिल का दौरा पड़ गया. बेहोशी की हालत में इनको हॉस्पिटल पहुंचाया गया. डॉक्टरों ने 45 मिनट तक CPR दी. दवाई वगैरह दी. तब जाकर हालत संभली.

ऑटोमेटिक कार, टाइट जीन्स और खून के थक्के

सौरभ की इस ब्लड क्लॉटिंग का कारण है उनकी ऑटोमेटिक कार और टाइट जींस.

कई स्टडीज़ हैं जो कार में बैठे रहने से ब्लड क्लॉटिंग का खतरा बताती हैं. ये बात फ्लाइट, ट्रेन वगैरह के लिए भी उतनी ही सही है. जहां भी लंबी देरी तक बैठे रहना पड़ता है, वहां के लिए सही है.

नॉर्मल गाड़ी चलाते समय हमारे दोनो पैर हिल-डुल रहे होते हैं. दाहिना पैर ब्रेक और एक्सीलरेटर का काम देखता है. और बायां पैर क्लच संभालता है. ऑटोमेटिक कार में गेयर बदलने वाला काम ऑटोमेटिक होता है. इसमें क्लच दबाने वाला सिस्टम ही नहीं होता. इसलिए बायां पैर फुर्सत हो जाता है. और यही फुर्सत दिक्कत वाली बात है.

राइट - ऑटोमैटिक गाड़ी में तीन मोड होते हैं. D से ड्राइव, N से न्यूटरल, और R से रिवर्स. (सोर्स - विकिमीडिया)
लेफ्ट -मैनुअल वाली गाड़ी में कई गेयर होते हैं. क्लच दबा के गेयर बदलते हैं.
राइट – ऑटोमैटिक गाड़ी में तीन मोड होते हैं. D से ड्राइव, N से न्यूटरल, और R से रिवर्स. (सोर्स – विकिमीडिया)

WHO की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पैर में लंबी देरी तक हलचल न होने से ब्लड क्लॉटिंग का रिस्क बढ़ जाता है.

दरअसल हिलते-डुलते रहने से हमारी नसों में खून बहता रहता है. जहां लंबी देर के लिए हलचल कम हुई, वहां खून का बहाव भी कम होगा. और जहां खून का बहाव कम हुआ, वहां ब्लड क्लॉट होने लगेगा. मतलब खून के थक्के बन जाएंगे. ये खून के थक्के बह-बहाकर इधर-उधर निकल लेते हैं. और डेंजर खड़ा हो जाता है. टाइट जीन्स खून के बहाव में और दिक्कत करता है. इसलिए टाइट जीन्स भी ब्लड क्लॉटिंग का एक फैक्टर है.

लेकिन यार खून तो पानी टाइप होता है न? फिर ये ब्लड क्लॉट क्यों हो जाता है?

ब्लड क्लॉटिंग – वरदान बना अभिशाप

हमारे गांव के पास नहर है. नहर में पानी बहता है. जब कहीं बीच में नहर फूट जाती है, तो पानी लीक होने लगता है. जहां से नहर फूटती है, वहां बहुत सारी रेत की बोरियां लगा दी जाती हैं. ये रेत की बोरियां इस लीक होते हुए पानी को रोकने का काम करती हैं.

हमारे गांव में इत्ती बड़ी नहर नहीं है. ये गुजरात की कोई नहर है. (सोर्स - विकिमीडिया)
हमारे गांव में इत्ती बड़ी नहर नहीं है. ये गुजरात की कोई नहर है. (सोर्स – विकिमीडिया)

अपने शरीर में भी कुछ ऐसा ही सीन होता है. यहां अपनी नसों में खून बहता है. खून पूरे शरीर में सिंचाई करता है. बहुत कीमती चीज़ है. जब कभी खेलते-कुंदराते समय हमें चोट लग जाती है, तो नसों से खून लीक होने लगता है. खून लीक न हो इसका जुगाड़ अपने खून में ही रहता है. जहां चोट लगती है वहां भी ‘रेत की बोरियां’ इकट्ठी होकर उसे बहने से रोकती हैं.

धोका ने खाना. नीले वाले प्लेटलेट्स हैं. और गुलाबी वाले हैं रेड ब्लड सेल्स. (सोर्स - विकिमीडिया)
धोका न खाना. नीले वाले प्लेटलेट्स हैं. और गुलाबी वाले हैं रेड ब्लड सेल्स. (सोर्स – विकिमीडिया)

थोड़ा सा बायोलॉजी की किताब में झांक लेते हैं. जिस लाल रंग की चीज़ को हम खून बोलते हैं, वो बेसिकली चार चीज़ों से बनता है –
1. रेड ब्लड सेल्स – इन्हीं में बैठ के ऑक्सीजन सब जगह पहुंचती है.
2. व्हाइट ब्लड सेल्स – ये सिक्योरिटी गार्ड लोग हैं. इन्फेक्शन वगैरह से रक्षा करते हैं.
3. प्लाज़्मा – इसमें पोषक तत्व, हार्मोन्स और बाकी के प्रोटीन्स सफ़र करते हैं.
4. प्लेटलेट्स – यही प्लेटलेट्स हैं अपनी ‘रेत की बोरियां’. इनका यही काम होता है – खून को बहने से रोकना.

Platelet Response Animation.gif
L से मतलब है लिगेंड. लिगेंड प्लेटलेट्स को इकठ्ठा होने का सिग्नल देते हैं. प्लेटलेट्स P वाली चीज़ है. जैसे जैसे प्लेटलेट्स इकठ्ठी होती हैं. वो लिगेंड छोड़ती हैं. इससे और ज़्यादा प्लेटलेट्स को इकठ्ठे होने का सिग्नल मिलता है. (सोर्स – विकिमी़डिया)

अगर प्लेटलेट्स न हों, तो छोटी-मोटी चोट से ही बहुत सारा खून बह जाएगा. प्लेटलेट्स हमारी जान बचाती हैं. लेकिन यही प्लेटलेट्स बिना ज़रूरत के कहीं इकट्ठी हो जाएं, तो दिक्कत हो जाती है. इसी दिक्कत का नाम है – ब्लड क्लॉटिंग या खून का थक्का बनना.

ये खून के थक्के घूमते-फिरते तैरते रहते है, और कहीं फंस जाते हैं. ये अच्छी बात नहीं है. पूरा शरीर खून की बदौलत चल रहा हैं. हमारे शरीर में ऑक्सीजन भी खून से ही सप्लाई होती है. जहां खून नहीं पहुंचेगा, वहां का काम बंद हो जाएगा. अगर ये थक्का हमारे दिल के पास कहीं फंस जाए तो बहुत हो जाएगी. जानलेवा गड़बड़

अपना दिल जो है, वो खून पहुंचाने वाली मोटर है. अगर इसके आसपास ब्लड क्लॉट हो जाए तो ये मोटर बंद पड़ जाती है. और ये मोटर बंद हुई मतलब सब खल्लास. फिनिश.

आशिकों का दिल. हिंदी का ह्रदय. अपने लिए बहुत ज़रूरी है. तभी तो हीरा ठाकुर कहते हैं - दिल मेरे तू दीवाना है. (सोर्स - विकिमीडिया)
आशिकों का दिल. हिंदी का ह्रदय. अपने लिए बहुत ज़रूरी है. तभी तो हीरा ठाकुर कहते हैं – दिल मेरे तू दीवाना है. (सोर्स – विकिमीडिया)

खून बढ़ियां से बहता रहे इसके लिए ज़रूरी है कि सब पुर्ज़े चलते रहें. दो-तीन घंटे तक पैरों को एक जगह रखना डेंजरस चीज़ है.

हमारे शरीर का इवॉल्यूशन(विकास) जंगलों में हुआ है. जहां हम भागते-फिरते शिकार करते थे. मशीनें और कारें ये सब अभी-अभी की चीज़ें हैं. सौ-दो सौ साल पुरानी. इस शरीर की डिज़ाइन अभी भी वही पुरानी वाली है. इसलिए अपने शरीर को थोड़ा हिलाते-डुलाते रहा करिए. स्ट्रेच करते रहा करिए.


वीडियो – साइंसकारी: बस या कार में ट्रैवल करते समय उल्टी क्यों आती है?

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