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कोका-कोला से भी ज़्यादा पिया जाने वाला पदार्थ धीरे-धीरे ज़हर बनता जा रहा है

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बड़े-बड़े कारखानों से जो ज़हरीले रेज़ीड्यू निकलते हैं, जो रासायनिक खाद और पेस्टीसाइड हम खेतों में डालते हैं, वो अंततः कहां जाते हैं? क्या वे हवा बनकर उड़ जाते हैं या उन्हें धरती निगल जाती है?


जी बिल्कुल सही! वो हवा बनकर उड़ जाते हैं और धरती भी उन्हें निगल लेती है. लेकिन कहानी यहीं पर ख़त्म नहीं होती. ये पदार्थ जब हवा बनकर उड़ते हैं तो हवा को ज़हरीला बनाते हैं. ये पदार्थ जब धरती के अंदर समाते हैं तो ज़मीन को बंजर करते हैं. ये अंडरग्राउंड पानी को ज़हरीला करते हैं, ये नदियों से लेकर ज़मीन से लेकर समुद्र तक को दूषित करते हैं. और ये ज़हर खाने, पानी, सांस के रूप में हमारे भीतर जाते रहता है. लब्बोलुआब ये कि अंततः ‘इसमें हमारा ही घाटा’ होता है, होता था और होता रहेगा.

Ground Water

बाकी दो चीज़ें यानी हवा और धरती को अभी के लिए छोड़ भी दें तो हमारे कर्मों के चलते केवल पानी ही इतना ज़हरीला हो चला है कि आप अगर तेज़ाब नहीं भी पी रहे हैं तो कम से कम पानी भी कतई नहीं ही पी रहे हैं. और जो पी रहे हैं, वो आपको बीमार, बहुत बीमार कर रहा है.

लोग बीमार पड़ रहे हैं. लोग मर रहे हैं. आसपास देखिए. हाहाकार मचा हुआ है. डायरिया से लेकर कैंसर तक के पेशेंट बढ़ रहे रहे हैं.

अंग्रेज़ी के एक प्रमुख समाचार पत्र दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन की एक बहुत डरावनी रिपोर्ट प्रकाशित की है. और ये डर ‘देश’ और ‘काल’ दोनों ही हिसाब से हम सबके बहुत नज़दीक है. फिर आप चाहे किसी भी कोने में रहकर ये स्टोरी पढ़ रहे हों. नाइट्रेट, फ्लोराइड, लौह, आर्सेनिक और लेड की पानी में बढ़ती मात्रा ने चिंताजनक स्तर को छुआ है.और देश के 50% से अधिक जिलों में भूजल तय मानकों से अधिक प्रदूषित हो चुका है.


कितना फैल चुका है ये ज़हर

केवल दिल्ली के ही 11 जिलों के भूजल में से 7 में फ्लोराइड की अधिकता, 8 में नाइट्रेट की अधिकता, 2 में आर्सेनिक और तीन में लेड की अधिकता पाई गई है.

भारत भर के भूजल की बात की जाए तो कुल मिलाकर 386 जिलों में अतिरिक्त नाइट्रेट की उपस्थिति के चलते भूजल दूषित हो चुका है. 335 जिलों में अतिरक्त फ्लोराइड, 301 जिलों में अतिरक्त लोहे, 212 अतिरिक्त खारेपन, 153 जिलों में अतिरिक्त आर्सेनिक, 93 जिलों में अतिरिक्त लेड, 30 जिलों में अतिरिक्त क्रोमियम और 24 जिलों में अतिरक्त कैडमियम के चलते भूजल दूषित हो चुका है.

Ground Water Delhi

सरकार के पाया कि हालांकि देश के प्रमुख हिस्सों में भूजल पीने योग्य है लेकिन फिर भी कई हिस्से ऐसे हैं जहां भूजल में एकाधिक जहरीले तत्वों की उपस्थिति की पुष्टि हुई है. और ये भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की स्वीकार्य सीमा से कहीं अधिक दूषित हैं.

केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के अनुसार पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भूजल में लगभग सभी प्रकार के विषाक्त तत्वों की उपस्थिति की पुष्टि हुई है.

वैज्ञानिकों की मानें तो करेला वो भी नीम चढ़ा वाली स्थिति है, क्यूंकि जहां एक तरफ धरती के ऊपर से रिस कर विषाक्त पदार्थ भूजल में जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जलस्तर कम होने से भी पानी वहां से निकाला जा रहा है जहां पर धरती के नीचे इन विषाक्त पदार्थों की प्रचुरता है.


इस प्रदूषण से हमको क्या नुकसान हैं

# नाइट्रेट –

मेटहीमोग्लोबिनेमिया रोग या ब्लू बेबी रोग इसी नाइट्रेट की अधिकता के चलते होता है. नाइट्रेट की अधिकता से शरीर में मेटहीमोग्लोबिन की अधिकता होती है. मेटहीमोग्लोबिन, हिमोग्लोबिन का ही एक प्रकार है. ये भी हिमोग्लोबिन की तरह ऑक्सीजन को अपने साथ लेकर चलता है लेकिन जब कोशिकाओं को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है तो उसे उत्सर्जित नहीं करता है. तो इससे होती है शरीर में ऑक्सीजन की कमी. और ऑक्सीजन है जीवनदायनी. इसलिए इसकी कमी के चलते होते हैं ढेरों रोग. हृदय से लेकर मस्तिष्क तक के. मेटहीमोग्लोबिन नीले रंग का होता है इसलिए ही इसकी अधिकता से होने वाले रोग को ब्लू बेबी भी कहते हैं.

Dirty Picture

# आर्सेनिक –

पीने के पानी में आर्सेनिक की अधिकता से त्वचा, फेफड़ों, मूत्राशय और गुर्दे में कैंसर के बढ़ते जोखिमों के साथ-साथ हाइपरकेरेटोसिस और पिग्मेंटेशन परिवर्तन जैसे त्वचा संबंधी परिवर्तन से संभव हैं.

इसके अलावा पैरों और पैरों की रक्त वाहिकाओं की बीमारियां, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और प्रजनन संबंधित कई बीमारियां आर्सेनिक की देन हो सकती हैं.

# फ्लोराइड –

फ्लोराइड फ्लूरोइन से आता है, जो एक प्राकृतिक तत्व है. उचित मात्रा में लिए जाने पर ये दांतों और हड्डियों के लिए लाभदायक होता है लेकिन बहुत अधिक फ्लोराइड हड्डियों के लिए नुकसानदायक भी होता है. ये हड्डियों को कमज़ोर बनाता है. इस स्थिति को स्केलेटल फ्लोरोसिस कहा जाता है. इसके अलावा इस फ्लोराइड की बढ़ती प्रचुरता के प्रभाव से गठिया, थायरोइड, पुरुष और महिलाओं दोनों में बढ़ती नपुंसकता जैसी चीज़ें पाई गई हैं.

# लोहा –

हमारे शरीर में आयरन प्रोटीन से सुरक्षित रूप से बंधा रहता है, जिससे आयरन से होने वाले नुकसानों से शरीर बचा रहता है. लेकिन ज़्यादा हो गया तो ‘फ्री आयरन’ बढ़ने लगता है. फ्री आयरन मतलब शरीर में पाया जाने वाला वो लोहा जो प्रोटीन से नहीं बंधा. ये फ्री आयरन एक प्रो-ऑक्सीडेंट होता है. एंटी-ऑक्सीडेंट शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं, ठीक इसके विपरीत प्रो-ऑक्सीडेंट नुकसानदायक और ये कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

Waste Side Story

हेमोक्रोमैटोसिस रोग लौह-प्रचुरता के चलते होने वाला रोग है. हेमोक्रोमैटोसिस का इलाज न हो सकने की स्थिति में गठिया, कैंसर, मधुमेह और हार्ट-फेल के जोखिम बढ़ाता है.

(इंट्रेस्टिंग फैक्ट: शरीर में अतिरिक्त लोहे को बहार निकालने की कोई बढ़िया व्यवस्था नहीं होती. यदि आपके शरीर में लोहे की अधिकता है तो रक्त-दान न केवल औरों का (जिनको आपने खून दिया है) बल्कि आपका भी जीवन बढ़ा सकता है.)

# खारापन –

खारापन मतलब लवण की अधिकता. खारापन को आप चाहें तो ‘बंज़र-पन’ में भी अनुवाद कर सकते हैं. कहने का मतलब ये कि जहां जहां इस खारे पानी से सिंचाई होगी, वहां वहां धरती रेगिस्तान में बदलती जाएगी. अगर आपको ये कहा जाए कि मेसोपोटामिया की सभ्यता इसी के चलते नष्ट हुई थी तो ये एक गलत कथन न होगा.

# लेड –

इससे खतरनाक शायद ही कोई तत्व पानी में पाया जा सकता है. लेड बच्चों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर है. ज़्यादा एक्सपोजर सीधे मस्तिष्क और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर असर करता है – कोमा, आवेग और यहां तक की मौत का कारण बनता है. और लेड विषाक्तता से बच भी गए तो भी कम लेड भी कम हानिकारक नहीं है. मंदबुद्धि, व्यवहार संबंधी विकार जैसे असर इसके उदाहरण हैं. लो आईक्यू, ध्यान में कमी, असामान्य व्यवहार में वृद्धि हुई लेड एक्सपोजर के जाया हैं. ये एनीमिया, उच्च रक्तचाप, गुर्दे रोग, इम्यूनोटोक्सिसिटी और विषाक्तता का कारण बनता है. सबसे दुखद बात ये कि लेड के नुकसानदायक प्रभाव अपरिवर्तनीय हैं.

अमेरिका में लेड-मिश्रित पेट्रोल बेचा जाने लगा था. लोगों में इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद इसे बैन कर दिया गया. और इस दौरान अमेरिकी लोगों के शरीर में लेड की मात्रा में जो परिवर्तन हुए वो आशान्वित करते हैं.
अमेरिका में लेड-मिश्रित पेट्रोल बेचा जाने लगा था. लेकिन लोगों में इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद इसे बैन कर दिया गया. और इस पूरे दौरान अमेरिकी लोगों के शरीर में लेड की मात्रा में जो परिवर्तन हुए वो आशान्वित करते हैं.

# क्रोमियम –

खुराक, एक्सपोजर अवधि, और क्रोमियम के अलग अलग प्रकार क्रोमियम के प्रतिकूल स्वास्थ्य प्रभाव को प्रभावित करते हैं. जो कि निम्न में से कोई भी हो सकते हैं –

दमा, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, क्रोनिक इरिटेश, क्रोनिक फेरींगिटिस, पुरानी राइनाइटिस, रक्त-संकुलन या हायपरेमिया, ट्रेकोब्रोनकाइटिस.

पीने के पानी में क्रोमियम का स्तर आमतौर पर कम होता है, लेकिन दूषित पानी में खतरनाक क्रोमियम, हैग्जावलेंट क्रोमियम हो सकता है. क्रोमियम (VI) मानव स्वास्थ्य के लिए एक खतरा है. इससे होने वाले रोगों में शामिल है – स्किन रेशेज़, पेट की बीमारियां और अल्सर, श्वांस-प्रणाली की समस्यायें, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, फेफड़ों का कैंसर.

क्रोमियम लेड के साथ मिलकर लेड क्रोमैट बनाता है जो कैंसर-जन्य है.

# कैडमियम –

कैडमियम एक विषाक्त धातु है जो पर्यावरण में स्वाभाविक रूप से पाई जाती है. कैडमियम कई स्वास्थ्य समस्याओं का उत्पादन करता है और एक ज्ञात कैंसरजन (कैंसर करने वाला पदार्थ) है.

कैडमियम का मानव शरीर के लिए कोई उपयोग नहीं है और ये कम स्तर पर भी ज़हरीला है. शरीर पर कैडमियम के असंख्य नकारात्मक प्रभाव हैं और यह लगभग सभी प्रणालियों को प्रभावित कर सकता है जिनमें कार्डियोवैस्कुलर, प्रजनन, गुर्दे, आंखें और यहां तक कि मस्तिष्क भी शामिल है.

सांकेतिक चित्र
सांकेतिक चित्र

कैडमियम का केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर बहुत ही हानिकारक प्रभाव पड़ता है. कैडमियम न्यूरॉन-सेल की मृत्यु का कारण बनता है. (न्यूरॉन्स मस्तिष्क की कोशिकाएं हैं जो सूचनाओं को प्रसारित करती हैं, अगर वे प्रभावित होती हैं तो मस्तिष्क और शरीर के पूरे कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.


इस भूजल के प्रदूषण का इलाज क्या है

दी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के साथ बातचीत में एसएएनडीआरपी (बांध, नदियों और लोगों का दक्षिण एशियाई समूह) के जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर ने इस प्रदूषण को रोकने के लिए कुछ चीजें बताईं जिनका सार यूं है कि –

# हमें सबसे पहले स्वीकार करना होगा कि यदि जल जीवन के लिए लाइफलाइन है तो भूजल, जल के लिए लाइफलाइन है और भूजल के दूषित होने की दिक्कत वाकई में एक बड़ी दिक्कत है.

# जहां पर भूजल पहले से ही दूषित हो चुका है, वहां पर तो वाटर-ट्रीटमेंट ही इलाज है. लेकिन,

# ‘इलाज करने से सावधानी बरतना बेहतर’ की तर्ज़ पर ‘ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट’ ही इस पूरी दिक्कत को जड़ से हल कर सकता है.

# ‘ग्राउंड वाटर मैनेजमेंट’ में वर्षा जल के संग्रहण जैसे बेसिक लेकिन कारगर उपाय शामिल हैं. हमें रिचार्ज सिस्टम की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता है. कृत्रिम रिचार्ज तंत्र बनाने की जरूरत है.

Water Contamination

# भूजल नियामक तंत्र को कानूनी रूप से सशक्त बनाने की आवश्यकता है. इसमें सहकारी समितियों, ग्राम-सभाओं और जलस्तर से संबंधित संस्थाओं को भूजल उपयोग को नियंत्रित करने और उसे रिचार्ज कर सकने के लिए सुसज्जित और सशक्त बनाना शामिल है.

# इंडस्ट्रीज के लिए भी कठोर नियम बनाने और इस बात की निगरानी करने की आवश्यकता है कि वो नियम कड़ाई से लागू हो रहे हैं.


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