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क्या इतने बुरे हालात हैं कि लोगों ने साबुन-तेल-मंजन खरीदना कम कर दिया है?

क्यों इकॉनमी में खपत कम हो रही है? क्यों लोग साबुन-तेल तक खरीदना टाल रहे हैं? क्या ये मुसीबत लगातार बढ़ती जा रही है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो इन दिनों बाजार से लेकर सरकार तक हिलाए हुए हैं. लोग अपने अंटी का पैसा नहीं निकाल रहे हैं. जो थोड़ी- बहुत बचत है, उसे लोग खर्च ही नहीं कर रहे. नतीजा, साबुन-तेल-मंजन जैसे सेक्टर यानी फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स माने FMCG में भी गिरावट है. मार्केट रिसर्च फर्म नीलसन ने इस बाबत एक रिसर्च किया. इसके मुताबिक फाइनेंशियल ईयर 2019 के पहले तीन महीनों यानी अप्रैल, मई और जून में इस सेक्टर में 10 फीसदी की गिरावट रही. ये गिरावट बीते 9 महीने से देखी जा रही है.

नीलसन के रिसर्च में और क्या?
नीलसन के सर्वे की 5 खास बातें हैं-

1- परिवारों ने अपना खर्च कम कर दिया है.
2- कारोबारी साल 2019-20 के पहले 6 महीनों के दौरान माने अप्रैल से सितंबर के बीच FMCG सेक्टर की ग्रोथ 12 फीसदी रहेगी. पहले इसके 13-14 फीसदी रहने के आसार थे.
3- साल 2019-20 में FMCG सेक्टर की ग्रोथ 9-10 परसेंट रह सकती है.
4- फूड कैटेगरी माने आटा, तेल, बिस्किट वगैरह की ग्रोथ 10 से 11 फीसदी तक रहेगी.
5- पर्सनल केयर कैटेगरी माने शैंपू फेसवॉश वगैरह और होम केयर कैटेगरी माने फ्लोर क्लीनर वगैरह की बिक्री 7-8 फीसदी के आस-पास रहेगी.

घर का सामान क्यों नहीं खरीद रहे लोग?
1- नीलसन के मुताबिक सरकारी पॉलिसी और मॉनसून कमजोर होने का असर पड़ रहा है.
2- महंगाई का असर भी लोगों की खरीदारी पर पड़ रहा है. साल की शुरुआत में महंगाई दर 1.9 फीसदी थी. जून में ये बढ़कर 3.18 परसेंट हो गई.
3- गिरावट की सबसे बड़ी वजह है गांवों में पैसे का अभाव. ग्रामीणों की आमदनी में लगातार गिरावट है.
4- ग्रामीण इलाकों में FMCG प्रोडक्ट की बढ़त में दोगुनी गिरावट है.
5- FMCG प्रोडक्ट खरीदने में ग्रामीण इलाकों की हिस्सेदारी 37 फीसदी है. मतलब ये कि देश भर में जितने भी एफएमसीजी प्रोडक्ट बिकते हैं, उनमें से 37 फीसदी गांवों में बिकते हैं.
6- अभी तक का ग्रामीण इलाकों की ग्रोथ शहरों से 3 से 5 फीसदी ज्यादा रहती थी. पर अब 9 महीने से इसमें तेजी से गिरावट आ रही है.
7- अब ग्रामीण और शहरी इलाकों में FMCG प्रोडक्ट्स की बिक्री की ग्रोथ करीब-करीब बराबर हो गई है.
8- ग्रामीणों की आमदनी घटने की मुख्य वजह से पैदावार का घटना. माने फसल की उपज कम हो गई है. साथ ही बैमौसम बारिश ने भी खेती-किसानी का हाल खराब किया है.
9- ग्रामीण इलाकों में सरकारी खर्च में भी कमी आई है. मनरेगा जैसे प्रोजेक्ट में भुगतान समय पर नहीं हो रहे हैं. इस वजह से ग्रामीणों के पास नकदी का संकट है.
10- ग्रामीण इलाकों में मांग कम होने से पूरा सेक्टर लड़खड़ा गया है.
11- हाल में आए आर्थिक सर्वे 2018-19 के मुताबिक बीते साल किसानों का अनाज सस्ता रहा. इससे किसानों ने पैदावार कम कर दी. साथ ही उपभोग पर खर्च भी कम कर दिया. इससे इको़नमी स्लो हुई.
12- नीलसन के मुताबिक एफएमसीजी पर जीएसटी का भी बड़ा असर पड़ा है. जीएसटी लागू होने की वजह से छोटे मैन्युफैक्चरर्स का बिजनेस धीमा पड़ा है.
13- रिसर्च फर्म नोमुरा की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों की सैलरी में धीमी बढ़ोतरी होने से भी एफएमसीजी प्रभावित है. सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद भी कर्मचारियों की तनख्वाह धीरे-धीरे बढ़ाई जा रही है.
14- कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से लोगों का खर्च तेल पर बढ़ा है.
15- नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों के संकट की वजह से ग्राहकों को लोन नहीं मिल पा रहा है. इन सबका असर भी बाजार पर पड़ रहा है.

यूपी और एमपी का क्या योगदान है?
नीलसन के मुताबिक FMCG की ग्रोथ को नीचे लाने में उत्तरी और पश्चिमी इलाकों का बड़ा रोल है. उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और असम में सबसे ज्यादा गिरावट है. मतलब ये कि इन क्षेत्रों में मांग बेहद कम रही.

कैसे सुधरेंगे हालात?
1- सुस्ती के बीच FMCG कंपनियां बिक्री बढ़ाने के लिए कुछ उपाय कर रही हैं. वे कम दाम वाले छोटे पैक बाजार में उतार रही हैं. कंपनियां अपना डिस्ट्रीब्यूशन भी दुरुस्त करने में जुटी हैं. वे मार्केटिंग पर भी खर्च बढ़ा रही हैं.
2- आर्थिक सर्वे में सुझाव दिया गया है कि उपज के दाम बढ़ाने होंगे. इसी रास्ते से किसानों और ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है. इससे उनकी खर्च करने की क्षमता बढ़ेगी. और उपभोग बढ़ेगा.


वीडियोः बजट और इकॉनमिक सर्वे के आंकड़ों में 1.7 लाख करोड़ का फर्क कैसे आया? |दी लल्लनटॉप शो| Episode 256

 

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