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डिंको सिंह: भारतीय बॉक्सिंग का वो सितारा, जिसे पहले भाग्य और फिर भगवान ने छोड़ दिया

‘मैंने दो सपने देखे थे. एक तो आज पूरा हो गया है लेकिन एक सपना बाकी है अभी.’

डिंको सिंह, 17 दिसंबर 1998, बैंकॉक, थाईलैंड.

ये बातें बोलते वक्त सिर्फ 19 साल के डिंको के चेहरे पर बेहद प्यारी मुस्कान थी. इन्हें मुस्कुराते देखकर लगता ही नहीं था कि दुनियाभर के दिग्गज बॉक्सर रिंग में इनके आगे पस्त हो जाते हैं. लेकिन ये सच था. डिंको बिना तैश में आए बड़े से बड़े बॉक्सर को ध्वस्त करने का ज़िगरा रखते थे. और उन्होंने ये बातें वर्ल्ड नंबर तीन और वर्ल्ड नंबर पांच बॉक्सर्स को हराकर एशियन गेम्स का गोल्ड मेडल जीतने के बाद कही थीं.

यह 1982 के बाद एशियन गेम्स में भारत का पहला बॉक्सिंग गोल्ड मेडल था. और मुझे आज भी यकीन है कि इसे डिंको के अलावा कोई और नहीं ला सकता था. वही डिंको, जिन्हें शुरुआती टीम में चुना ही नहीं गया था. क्योंकि भारत में बॉक्सिंग के रहनुमाओं का मानना था कि हल्के भारतीय बॉक्सर किसी काम के नहीं हैं. इनसे कुछ नहीं होना. और इस सोच को मजबूत करता था एशियाड में हमारा रिकॉर्ड. हमने हल्की कैटिगरीज में यहां कुछ खास किया नहीं था.

Thailand गए Dingko

लेकिन उस वक्त के बॉक्सिंग फेडरेशन के प्रेसिडेंट एके मट्टू नहीं माने. वो डिंको के लिए लगे रहे. उनका मामला लेकर इंडियन ओलंपिक असोसिएशन तक पहुंच गए. और फिर आया सर्विसेज स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड (SSCB)  यानी सेना से जुड़े एथलीट्स का BCCI. SSCB ने डिंको के आने-जाने, रहने-खाने और किट का खर्च खुद देने की पेशकश कर दी. हालांकि इसकी जरूरत नहीं पड़ी. डिंको का सलेक्शन हुआ और वो थाईलैंड पहुंच गए.

लेकिन वहां पहुंचने के बाद भी उनकी हैसियत घर के कोने में पड़े उस पुराने टाइपराइटर जैसी थी, जो वहां था तो जरूर लेकिन उसके होने या ना होने से किसी को फ़र्क नहीं पड़ता. ख़ैर, डिंको ने इसका लोड नहीं लिया. क्योंकि उन्होंने ऐसे ही हाल में तो अपनी बॉक्सिंग शुरू की थी. जहां लोग उनका वजूद भी नहीं स्वीकारते थे. डिंको ने इस बारे में बाद में एक इंटरव्यू में बताया था.

‘मुझे IOA (इंडियन ओलंपिक असोसिएशन) की ओर से टी-शर्ट, ट्रैकसूट, साजो-सामान जैसा कुछ नहीं मिला था. मुझे ये सब काफी बाद में, सेमीफाइनल में वर्ल्ड नंबर तीन थाई बॉक्सर को पीटने के बाद मिला.’

1996 में हुए ओलंपिक के ब्रॉन्ज़ मेडलिस्ट सोन्ताया वोंगप्रात्स को हराकर डिंको फाइनल में पहुंचे. वहां उन्होंने ’96 के ओलंपिक के सिल्वर मेडलिस्ट उज़्बेकिस्तान के तिमुर तुल्याकोव को मात देकर गोल्ड मेडल जीत लिया. इस मैच में डिंको इस कदर हावी थे कि तिमुर ने मुकाबले के बीच से ही हटने का फैसला कर लिया.

Sydney में सब खत्म!

डिंको का पहला सपना इस तरह पूरा हुआ. लेकिन वो कहते हैं ना, जिंदगी की सड़क बड़ी ऊबड़-खाबड़ होती है. और इसी सड़क पर डिंको का दूसरा सपना टूट गया. साल 2000 के सिडनी ओलंपिक में वह अपना पहला ही मैच हार गए. अंतिम-16 में उन्हें यूक्रेनी बॉक्सर ने 14-5 से हरा दिया.

देखने में ये हार नॉर्मल लगती है. लेकिन थी नहीं. इस हार के बाद डिंको का करियर खत्म ही हो गया. उन्होंने बाद में वापसी की कोशिशें जरूर कीं, लेकिन सफल नहीं हो पाए. सिडनी की हार के बाद डिंको गुमनामी में खो गए. जून 2001 में उन्होंने नेशनल कैंप में आने की कोशिश तो की, लेकिन फिटनेस सर्टिफिकेट के अभाव में उन्हें वापस लौटा दिया गया. रिटायरमेंट के कई साल बाद डिंको ने एक इंटरव्यू में बॉक्सिंग में सफल होने के लिए दो चीजें बेहद जरूरी बताई थीं,

‘भाग्य और ऊपरवाले का आशीर्वाद’

ऊपरवाले का तो नहीं पता, लेकिन 21 सितंबर, सन 2000 को भाग्य निश्चित तौर पर डिंको से ख़फा था. इतना ख़फा था कि उनका करियर ही खत्म कर दिया. इस हार के दौरान डिंको की पुरानी चोट उभर आई. उन्हें तुरंत प्रभाव से बॉक्सिंग से दूर होना पड़ा. जो बॉक्सर पूरी दुनिया जीतने की क्षमता रखता था, वो सिस्टम से हार गया.

काम नहीं आया सिस्टम

सिडनी ओलंपिक से ठीक पहले, साल 1999 में इम्फाल में नेशनल गेम्स हुए. यहां डिंको को फाइनल में बिरजू साहा से भिड़ना था. लेकिन बिरजू ने अपना नाम वापस ले लिया. इधर डिंको को देखने के लिए हजारों लोग इकट्ठा हो चुके थे. ऐसे में अधिकारियों ने उन्हें आंध्र के बॉक्सर स्रीरामुलु से भिड़ा दिया. डिंको ने यह मैच तो बेहद आसानी से जीत लिया, लेकिन इस जीत के दौरान उनकी कलाई टूट गई.

और भारतीय बॉक्सिंग के मालिकों ने इसी टूटी कलाई के साथ, डॉक्टर्स की सलाह के ख़िलाफ उन्हें ट्रेनिंग के लिए क्यूबा भेज दिया. इतना ही नहीं, इस टूर पर जाने से पहले उस समय की खेल मंत्री उमा भारती के साथ एक सम्मान समारोह भी करवाया. डिंको से अवॉर्ड भी बंटवाए. बताते तो यहां तक हैं कि सिडनी ओलंपिक में भी वह चोटिल ही थे. लेकिन भारतीय बॉक्सिंग संघ अपने स्टार बॉक्सर को हर हाल में ओलंपिक में भेजना चाहता था.

किस्मत भी रूठ गई

बॉक्सिंग करियर खत्म होने के कुछ साल बाद डिंको कोच बन गए. नए बॉक्सर्स को संवारने लगे. लेकिन भाग्य के बाद अब बारी ऊपरवाले की थी. ऊपरवाले ने भी डिंको से मुंह मोड़ लिया. 2014 में उन्हें हेपेटाइटिस हो गया. किसी तरह इलाज करा रहे डिंको साल 2016 में बेहतर इलाज के लिए दिल्ली आए. लेकिन यहां किसी भी अस्पताल ने उन्हें भर्ती नहीं किया. इस बारे में एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था,

‘मैं पिछले दो साल से हेपेटाइटिस से जूझ रहा हूं. मैंने दिल्ली के सभी बड़े अस्पतालों से अनुरोध किया था. मैं गुड़गांव के अस्पतालों तक भी गया, लेकिन किसी ने मुझे भर्ती नहीं किया. स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAI) जहां मैं अभी काम करता हूं, उन्होंने इलाज के लिए मुझे 50,000 रुपये दिए थे. लेकिन इसके बाद भी किसी अस्पताल ने मुझे भर्ती नहीं किया.’

लगभग 10 दिन तक भटकने के बाद आखिर में एक मणिपुरी डॉक्टर ने डिंको को पहचाना. अपने हीरो को पहचानने के बाद उस डॉक्टर ने डिंको को एडमिट कर उनका इलाज शुरू किया. लेकिन अगले ही साल डिंको को लिवर कैंसर हो गया. डिंको के इलाज में घर बिक गया. इसके बाद भी पैसे पूरे ना पड़ने पर गौतम गंभीर, विजेंदर सिंह जैसे एथलीट्स ने डिंको की मदद की. कई साल तक लिवर कैंसर से जूझने के बाद 10 जून, गुरुवार को डिंको का निधन हो गया. वह सिर्फ 42 साल के थे.

# 1 जनवरी 1979 को जन्मे डिंको सिंह का परिवार बेहद गरीब था. बचपन में ही उनके माता-पिता ने उन्हें अनाथालय में दे दिया था.

# कई भारतीय बॉक्सर्स डिंको को अपना प्रेरणास्त्रोत बताते हैं, इनमें दिग्गज बॉक्सर मेरी कॉम भी शामिल हैं.

# 1998 में डिंको ने एशियन गेम्स का गोल्ड जीतकर इंडियन बॉक्सिंग का चेहरा ही बदल दिया. उनसे प्रेरित होकर दर्जनों बॉक्सर निकले, और आज हर कंपटीशन में झंडे गाड़ रहे हैं.

# लंबे वक्त से स्पोर्ट्स कवर कर रहे हरपाल बेदी के शब्दों में कहें तो-

1998 में डिंको एशियन गेम्स में गोल्ड ना जीतते तो शायद हमारी बॉक्सिंग अभी भी स्ट्रगल ही कर रही होती.


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