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क्या यूपी पुलिस ने कस्टडी में अल्ताफ़ की हत्या कर दी?

सुरक्षा आपकी संकल्प हमारा

ये उत्तर प्रदेश पुलिस का मोटो है. उसकी वेबसाइट पर चस्पा रहता है. उसके बैनरों पर छपता है. बहुत पुराना हो गया है. अब इसमें बदलाव की ज़रूरत है. जैसे तालाब में ठहरे ठहरे पानी सड़ने लगता है, वैसे ही वेबसाइट पर चिपका मोटो भी अपना मतलब खोने लगता है. यूपी पुलिस के नए मोटो के लिए हमारा एक सुझाव है -”सुरक्षा आपकी संकल्प हमारा” की जगह कर दीजिए – सुरक्षा ”खास” की, ध्येय हमारा.

अपनी पूरी ताकत लगाकर खास लोगों की सुरक्षा करने वाली यूपी पुलिस जिस बेरहमी से आम लोगों से पेश आती है, उसकी एक और मिसाल अब हम लोगों के सामने है. जो यूपी पुलिस लखीमपुर खीरी मामले में पांच लोगों को गाड़ी से कुचलकर मार डालने के मुख्य आरोपी आशीष मिश्रा को तब तक पूछताछ के लिए थाने नहीं ला पाई जब तक सुप्रीम कोर्ट में मामला नहीं पहुंच गया, उसी यूपी पुलिस ने कासगंज में 8 नवंबर को एक 21 साल के लड़के को उसके घर से उठा लिया. लड़का सही सलामत पुलिस को मिला, लेकिन 9 नवंबर को परिवार को मिली एक लाश. और पुलिस के आला अधिकारियों का ऐसा बहाना, जिससे बेहतर पांचवीं के बच्चे होमवर्क भूल जाने पर बना लेते हैं.

रोहन बोत्रे, पुलिस अधीक्षक, कासगंज पुलिस ने बताया

“कोतवाली काशगंज में 366 प्रकरण के संदर्भ में एक व्यक्ति को लाया गया जिसका नाम अल्ताफ़ चाहत मियाँ है. उसे थाने में सुबह बुलाया गया था. पूछताछ के दौरान उसने वाशरूम जाने का अनुरोध किया. उसने एक काले कलर का जैकेट पहना हुआ था, जिसके हुड में लगे नाड़े से उसने अपने सर को वाशरूम में लगे नल से फ़ंसाकर खुद का गला घोंटने की कोशिश की. जब वो बहुत समय बाहर नहीं आया तो पुलिसकर्मी अंदर चले गये और उसे बेहोशी की हालत में पाया. कुछ देर बाद उसे मृत घोषित कर दिया गया. साथ में इस प्रकरण में जिन पुलिस कर्मियों की लापरवाही पाई गई है उनका सस्पेंशन किया जाएगा.”

ये कासगंज के पुलिस अधीक्षक रोहन बोत्रे हैं. पुलिस में कप्तान बनना आसान काम नहीं है. यूपीएससी की परीक्षा पास करनी पड़ती है. ट्रेनिंग पूरी करनी पड़ती है. कई तैनातियों के बाद जाकर एक अधिकारी किसी ज़िले का कप्तान, माने एसपी बन पाता है. लेकिन क्या रोहन बोत्रे जो कह रहे हैं, उसमें ऐसा कुछ भी है, जो हज़म होने लायक है?

अल्ताफ एक बहुत साधारण सा लड़का था. घरों में टाइल लगाने का काम करता था. अल्ताफ के पिता केंद्र या राज्य में मंत्री भी नहीं थे. इसीलिए तो जब एक परिवार ने अपनी बेटी खोने के संबंध में अल्ताफ का नाम लिया, तो पुलिस ने उससे ये नहीं कहा कि भैया आपके पास टाइम हो, तो बताइएगा, आपसे कुछ पूछना है. पुलिस तो अल्ताफ को उसके घर से उठाकर कासगंज की नदरई गेट चौकी ले गई.

अल्ताफ के पिता ने बेटे की मौत पर दिए बयान में एक बात कही कि जब पुलिस अल्ताफ को लेने आई, तब उन्होंने खुद ही उसे पुलिस के हवाले कर दिया. क्योंकि उसपर आरोप था. लेकिन जब पिता पुलिस चौकी गए, तब उन्हें वहां से फटकारकर भगा दिया गया –

इस वाकये के प्रत्यक्षदर्शी एक और हैरंतअंगेज़ दावा करते हैं. कि जब अल्ताफ पुलिस कस्टडी में था, तब लड़की के भाई ने धमकी दी थी कि पुलिस अल्ताफ को छोड़ देगी तो वो उसकी गरदन उतार देंगे

दरअसल, कुछ वक्त पहले अल्ताफ ने एक घर में टाइल्स लगाने का काम किया था. स्थानीय प्रेस के मुताबिक उस घर की लड़की लापता हो गयी. परिजनों ने आरोप लगाया अल्ताफ़ पर. कहा कि अल्ताफ़ उनकी लड़की को भगा ले गया. इसी के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई. अल्ताफ को लेकर दी गई धमकी और पुलिस पर दबाव को लेकर हम फिलहाल इस परिवार का पक्ष नहीं जानते हैं.

लेकिन हमारे पास पुलिस का पक्ष है, जो काफी कमज़ोर है. एसपी साहब कह रहे हैं कि अल्ताफ को थाने में ”अर्ली मॉर्निंग” बुलाया गया था. जबकि अल्ताफ के माता पिता के मुताबिक अल्ताफ को रात 8 बजे के करीब पुलिस अपने साथ ले गई थी. ये न ”अर्ली मॉर्निंग” था और न ही ”बुलाना.” बुलाया तो मोनू भैया को गया था. और वो आए भी तब थे, जब उन्हें आना था.

खैर, मोनू भैया की कहानी तो अभी कुछ दिन लंबी चलनी है. हम कासगंज की घटना पर ध्यान लगाते हैं. सबसे ज़्यादा विवाद इसी बात पर है, कि अल्ताफ की मृत्यु, आत्महत्या है या हत्या. कासगंज सदर कोतवाली के जिस वॉशरूम में अल्ताफ मिला, उसकी तस्वीरें दी लल्लनटॉप के पास हैं. इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर भी कई लोगों ने शेयर किया है.

ये तस्वीरें कई गंभीर प्रश्न उठाती हैं. वॉशरूम में दो से ढाई फीट के करीब ऊंचा एक नल है, जो प्लास्टिक के पाइप से जुड़ा है. इस पाइप पर अल्ताफ लटका हुआ है, उसके गले में जैकेट की डोरी है. ये नज़र आ रहा है कि अल्ताफ के वज़न से, पाइप अपनी जगह से हट गया है. फिर एक दूसरी तस्वीर है, जिसमें अल्ताफ नज़र नहीं आता. इस तस्वीर में पाइप ठीक नज़र आ रहा है.

अगर वाकई अल्ताफ को वॉशरूम से बाहर निकालने के बाद टोंटी या पाइप ठीक की गई है, तो ये एक बहुत गंभीर सवाल पैदा करता है – क्या क्राइम सीन से छेड़छाड़ हुई? अगर हां, तो किसके कहने पर?

अल्ताफ की मौत किन परिस्थितियों में हुई, और वो आत्महत्या थी या हत्या, ये अब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक जांच से ही मालूम चलेगा. ये सारे साक्ष्य अदालत में जाएंगे, जहां एक जिरह के बाद फैसला होगा. ये देखा जाएगा कि फांसी की जो कहानी यूपी पुलिस बता रही है, उसके आधार क्या हैं? अंदरूनी चोटें, गले पर निशानों के प्रकार और घटनास्थल की बारीक जांच में किन किन पहलुओं पर ध्यान दिया जाएगा,

अल्ताफ की मौत से जुड़ी कई जानकारियां आने में अभी वक्त है. लेकिन इतने कम वक्त में इस कहानी ने कई मोड़ भी लिए हैं. अल्ताफ का परिवार एक सुर में कह रहा था कि उसकी हत्या हुई है. तभी अल्ताफ के पिता का एक बयान वायरल होने लगता है, जिसमें वो कहते हैं कि उनके बेटे ने आत्महत्या ही की थी.

इस बयान पर जब प्रेस ने अल्ताफ की मां से प्रश्न किया, तो उन्होंने कहा कि ये बयान दबाव में दिलवाया गया था. उनके बेटे की हत्या ही हुई है.

हाई प्रोफाइल या मीडिया में चर्चित मामलों में दबाव क्या होता है, अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. इस दबाव को लेकर दी लल्लनटॉप ने एक डॉक्टर से बात की. ये एक शासकीय अस्पताल में कार्यरत हैं और कई पोस्टमॉर्टम्स कर चुके हैं. इनकी पेशेवर राय अदालती कार्यवाही में इस्तेमाल भी की गई है. पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर डॉक्टर साहब ने हमें वक्त दिया. हमने पूछा कि क्या हाई प्रोफाइल, या विवादित मामलों में डॉक्टर्स पर या फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स पर अपनी राय बदलने का दबाव रहता है.

डॉक्टर ने इसके जवाब में बताया कि प्रायः डॉक्टर अपनी पेशेवर राय देने के लिए स्वतंत्र होते हैं. सिर्फ हाई प्रोफाइल मामलों में ही दबाव जैसी स्थिति बनती है. और ये दबाव आम तौर पर स्थानीय प्रशासन और राजनीति से आते हैं. कई बार जब पहले से मालूम हो, तब पूरी प्रक्रिया की वीडियो रिकॉर्डिंग होती है और एक पैनल भी निगरानी करता है. वीडियो अनकट होता है. ऐसे में किसी गड़बड़ की आशंका कम हो जाती है.

जब डॉक्टर्स पर दबाव पड़ता है, तो कई बार वो खुद भी किसी झंझट में फंसने से बचने के लिए वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग कर देते हैं. ये नियम है कि अगर डॉक्टर चाहें तो पोस्टमॉर्टम की वीडियो रिकॉर्डिंग की मांग कर सकते हैं. ये डॉक्टर का अधिकार है और ऐसा होने पर प्रशासन को रिकॉर्डिंग करवानी भी पड़ती है.

बात की दिशा दबाव और विवाद की दिशा में इसीलिए गई क्योंकि यूपी पुलिस का लंबा इतिहास रहा है, जहां उसकी कस्टडी में लोगों की मौत हुई. और पुलिस कहानियां बनाती रही. इसी साल अक्टूबर में आगरा के जगदीशपुरा थाने के मालखाने में 25 लाख की चोरी हुई. इल्ज़ाम लगा थाने में ही सफाई करने वाले अरुण कुमार पर. अरुण को पुलिस अपने साथ ले गई. पुलिस का कहना है कि अचानक अरुण की तबीयत खराब हुई और उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हुई. यहां भी परिवार का कहना था कि अरुण को थाने में बेमुरौवत पीटा गया, जिसके चलते उसने दम तोड़ दिया.

सितंबर से पहले अक्टूबर के महीने में चलिए. गोरखपुर के एक होटल में सोमवार 27 सितंबर की आधी रात को पुलिस ने दबिश डाली. इस दौरान कानपुर के एक प्रॉपर्टी डीलर मनीष गुप्ता की संदिग्‍ध परिस्थितियों में मौत हो गई. इस मामले पर जब द लल्लनटॉप ने जिले के एसएसपी डॉ. विपिन ताडा से बातचीत की थी तो उन्होंने मनीष के गिरने की वजह से चोटिल होने की बात कही थी. उनका कहना था कि पुलिस जब होटल में जांच के लिए पहुंची तो मनीष नशे की हालात में बेड से गिरे और उन्हें चोट लगी, जिसकी वजह से उनकी मौत हुई. इसे लेकर एसएसपी ताडा ने आधिकारिक बयान भी जारी किया था.

जब सीसीटीवी फुटेज निकली, तब दूध का दूध, पानी का पानी हो गया. फिर यही यूपी प्रशासन था, जिसने अपने पुलिस कर्मियों को निलंबित किया. लेकिन यूपी पुलिस की फुर्ती ऐसी, कि पहले सभी आरोपियों को नामज़द नहीं किया जाता. जब नामज़द किया जाता है, तब वो फरार हो जाते हैं. यूपी पुलिस, यूपी में ही फरार चल रही यूपी पुलिस को नहीं खोज पाती.

ऐसे दर्जनों और मामले हैं. और इतिहास भी बहुत पुराना है. याद कीजिए मायावती का मुख्यमंत्री कार्यकाल. 2011 में उत्तर प्रदेश में मायावती की सरकार में NRHM घोटाले में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपी रहे डॉ. वाईएस सचान की 22 जून 2011 को जेल में ही संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. डॉ सचान के शरीर पर कई गहरे जख्म थे. मौक पर पहुंचे पुलिस महानिरीक्षक (जेल) वी.के. गुप्ता और अन्य अधिकारियों ने उनकी मौत को आत्महत्या बताया था. साथ ही ये भी कहा था कि डॉ. सचान ने जेल अस्पताल के शौचालय में बेल्ट से फांसी लगाकर जान दी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने डॉ. सचान की मौत का कारण जख्मों से हुए खून के अत्यधिक रिसाव को माना और गले पर बेल्ट के निशान को मौत के बाद का जख्म बताया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से जाहिर था कि डॉ. सचान की मौत आत्महत्या नहीं है, लेकिन सरकार बार-बार इसे आत्महत्या बता रही थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन जिला जज लखनऊ शिवानंद मिश्र ने जेल में डॉ. सचान की मौत का संज्ञान लेते हुए न्यायिक जांच का आदेश दिया था.

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट राजेश उपाध्याय ने 24 जून से जांच शुरू की. 12 जुलाई को सीजेएम ने जांच रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष पेश की, जिसमें डॉ. सचान की मौत के बारे में सरकार के दावों को गलत बताते हुए इसे पूरी तरह से हत्या का मामला बताया.

लौटते हैं कासगंज के मामले पर. कासगंज में एक जान चली गई है, तो पुलिस डंडा फटकार रही है. पांच पुलिस कर्मियों को ससपेंड कर दिया गया है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस न्यायमूर्ति राजेश बिंदल के पास एक वकील का खत भी पहुंच गया है, कि कासगंज मामले में SIT जांच हो, जिसके अध्यक्ष हाईकोर्ट के एक सेवारत जज हों.

उधर मामले पर राजनीति भी चल रही है, यूथ कांग्रेस अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास ने ट्वीट्स के एक सिलसिले में कासगंज की घटना पर सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि टोंटी और उसके नीचे का डिब्बा कैसे सलामत है. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि पुलिस जो कार्रवाई कर रही है, वो सिर्फ दिखावटी है. AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी ने मांग की है कि अल्ताफ के परिवार को मुआवज़ा मिले.

और सत्तारुढ़ भाजपा के नेताओं ने क्या कहा? उसकी जगह आपको ये याद करना चाहिए कि कैलाश विजयवर्गीय ने विकास दुबे वाले मामले में गाड़िया पलटने की बात को इस तरह कहा था, जैसे वो न्याय का कोई नया फॉर्मूला हो.

सीएम योगी आदित्यनाथ ने 9 नवंबर को ही अपराधियों के सीने में गोली मारकर उन्हें परलोक भेजने की बात कही थी.

अब ये सोचने का वक्त आ गया है कि हम अपराध कुचलने के नाम पर कानूनी प्रक्रियाओं के उल्लंघनों का जिस तरह बचाव करते हैं, उनका उत्सव मनाते हैं, उसने हमारी पुलिस को कैसा बनाकर रख दिया है. जल्द ही सोच लीजिएगा. क्योंकि याद रखिए, अगर किसी दिन पुलिस से आपका पाला पड़ गया, और आप खास नहीं हुए, तो आपके साथ कुछ भी हो सकता है. और उसके बाद आप मुआवज़े, एक सदस्य को नौकरी, एसआईटी, एसआईटी की जांच की हाईकोर्ट द्वारा अध्यक्षता जैसे चक्करों में अपना जीवन बिता देंगे. हम चाहेंगे कि हम गलत साबित हो जाएं. लेकिन ऐसा हो पाएगा, ऐसा लगता नहीं.


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