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क्या चीन की लैब से ही निकला था कोरोना वायरस?

तकरीबन 14 महीने हुए, जब से दुनिया कोविड-19 से जूझ रही है. दुनियाभर में अब तक 16 करोड़ से अधिक लोग कोरोना संक्रमित हो चुके हैं. इनमें से 33 लाख से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. कोविड केसेज़ के मामलों में भारत फिलहाल दूसरे नंबर पर है. इतना लंबा समय बीत गया. इतनी तबाही हुई. इसके बावजूद कोविड-19 से जुड़ा सबसे बुनियादी सवाल आज तक हल नहीं हो पाया. सवाल ये कि वायरस इंसानों तक पहुंचा कैसे? क्या ये कोई क़ुदरती आपदा है? या फिर प्रकृति से हुई किसी छेड़छाड़ का नतीजा? इन्हीं सवालों से जुड़ा एक पहलू है, लैब लीक थिअरी. क्या कोविड-19 वायरस किसी लैब से लीक हुआ?

ये थिअरी आप पहले भी सुन चुके होंगे. 2020 के पूरे साल कोविड से जुड़ी कई कन्सपिरेसी थिअरीज़ सर्कुलेट हो रही थीं. ये लैब लीक थिअरी उन्हीं में से एक थी. ये ट्रंप जैसे कन्सपिरेसिस्ट रुझान वाले लीडर्स की भी फेवरिट थी. वो इसके दम पर अपनी नाकामियों का ठीकरा चीन पर फोड़ना चाहते थे. ट्रंप कोविड से जुड़े कई और अनाप-शनाप दावे भी कर रहे थे. ऐसे में तर्कशील बिरादरी को लगा, ये थिअरी कोरी अफ़वाह है. वैज्ञानिक बिरादरी ने भी इसपर आपत्ति जताई.

Donald Trump
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कोविड से जुड़े कई अनाप-शनाप दावे कर रहे थे. (तस्वीर: एपी)

मगर अब एकबार फिर ये मुद्दा वापस लौट रहा है. साइंटिस्ट कम्युनिटी का कहना है कि इस थिअरी को नकारा नहीं जा सकता. इस पर जांच होनी चाहिए. सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप जैसे कन्सपिरेसिस्ट्स के चलते इस वाज़िब आशंका की गंभीरता ख़त्म हो गई? इससे जुड़ी साइंटिफ़िक डिबेट और जांच पटरी से उतर गई? क्या है लैब लीक थिअरी से जुड़े तर्क? क्या सच में इसका कोई आधार है?  विस्तार से बताएंगे आपको.

कोविड-19 की शुरुआत से जुड़ी दो मुख्य अवधारणाएं हैं. पहली थिअरी कहती है कि ये जंगली जीवों से जंप करके इंसानों में पहुंचा. हम पहले फटाफट ये थिअरी रीवाइज़ कर लेते हैं.

2002 में सार्स नाम की एक बीमारी फैली थी. ये बीटा-कोरोना वायरस फैमिली से जुड़ा एक संक्रमण है. ये वायरस चमगादड़ों में पाए जाते हैं. पता चला कि चमगादड़ों से जंप करके ये वायरस सीविट नाम के एक जीव में पहुंचा. सीविट जंगली जीव है. इसे पकड़कर बिक्री के लिए लाया गया एक वेट मार्केट. वेट मार्केट, यानी ऐसा बाज़ार जहां उपभोग की मंशा से ज़िंदा जीव ग्राहक के सामने काटे जाते हों. यहां वायरस इंसानों के संपर्क में आया और महामारी फैल गई.

इस परिस्थिति को शॉर्ट फॉर्म में समझिए ट्रिपल वी- वेट मार्केट, वाइल्डलाइफ़ और वायरस. बिल्कुल यही परिस्थिति वुहान में बनी. यहां एक वेट मार्केट है. कई जंगली और संरक्षित प्रजाति के भी जीवों की बिक्री होती थी. चीन ने बताया कि दिसंबर 2019 में इसी वुहान शहर से कोरोना फैलना शुरू हुआ. चीन ने ये भी बताया कि संक्रमण से जुड़े कई शुरुआती मामलों का लिंक वेट मार्केट से है.

जब संक्रमण फैलाने वाले वायरस की जांच हुई, तो ये भी बीटा-कोराना फैमिली के विषाणु निकले. ऐसे में सबसे तगड़ी आशंका यही बनी कि ये महामारी भी वाइल्डलाइफ़ से जंप करके इंसानों तक पहुंची है. हालांकि वेट मार्केट से शुरुआत होने की थिअरी में एक तगड़ा शुबहा भी है. क्या? बाद के दिनों में हुई जांच से पता चला कि कोविड के बिल्कुल शुरुआती केसेज़ में से कई का इस वेट मार्केट से कोई संबंध नहीं था. ये हुई पहली थिअरी.

अब हाइपोथिसिस यानी लैब थिअरी पर

दक्षिण-पश्चिम चीन में युन्नान नाम का एक प्रांत है. यहां टोंगगुआन नाम का एक शहर है. यहां तांबे की एक खाली पड़ी खदान है. जून 2012 की बात है. कुछ मज़दूरों को यहां काम पर लगाया गया. उनकी ड्यूटी थी, खदान में मौजूद स्लैग को हटाना.

Tongguan Map
दक्षिण-पश्चिम चीन का टोंगगुआन शहर. (तस्वीर: गूगल मैप्स)

धातु निकालने के बाद चट्टान का जो अवशेष बचता है, उसी को स्लैग कहते हैं. इसे हटाने के क्रम में छह मज़दूर बीमार पड़ गए. इन्हें सूखी खांसी, बुख़ार, सांस लेने में तकलीफ़ जैसे लक्षण थे. इन्हें इलाज़ के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया. छह में से दो श्रमिकों की जल्दी ही मौत हो गई. बाकी चार में से एक करीब पांच महीने तक हॉस्पिटलाइज़ रहने के बाद मर गया. यानी उस रहस्यमय बीमारी के चलते छह में से तीन मज़दूरों की मौत हो गई. ये भी पता चला कि खदान में काम करने वाले चार और मज़दूरों के भीतर सार्स जैसे ही एक अज्ञात वायरस के प्रति ऐंटीबॉडी विकसित हो गई थी. यानी, वो किसी संक्रमण की चपेट में आए थे.

इस घटना के लगभग छह महीने बाद की बात है. चीन के कुछ वैज्ञानिक इस खदान में पहुंचे. इनमें ‘बैट वुमन’ के नाम से चर्चित चीन की जानी-मानी महामारी विशेषज्ञ ‘शी हंगली’ भी शामिल थीं. शी ‘वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी’ में काम करती हैं. करीब 16 सालों से चमगादड़ों में पाए जाने वाले विषाणुओं पर रिसर्च कर रही हैं.

शी और उनकी टीम ने खदान से सैंपल्स जमा किए. खाली खदान में चमगादड़ों की भी ख़ूब बसाहट थी. टीम ने यहां मौजूद तकरीबन 276 चमगादड़ों के मल का नमूना लिया. चमगादड़ों का ऐनल स्वैब भी जमा किया गया. इन सैंपल्स को जांच के लिए वुहान लैब लाया गया. जो छह खदान मज़दूर बीमार हुए थे, उनके सैंपल्स को भी जांच के लिए इस लैब में भेजा गया.

Shi Zhengli
चीन की जानी-मानी महामारी विशेषज्ञ शी हंगली वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी’ में काम करती हैं. (तस्वीर: एपी)

क्या पता चला इस जांच से?

वायरस पर होने वाले शोध से जुड़ा एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल है- वायरोलॉजिका सिनिका. 2016 में शी और उनकी टीम ने इसमें अपनी एक रिपोर्ट प्रकाशित की. शी ने बताया कि उन्होंने सार्स जैसे एक नए कोरोना वायरस स्ट्रेन को खोजा है. उन्होंने इस नए स्ट्रेन को नाम दिया- RaBtCoV/4991.

इस स्ट्रेन का कोविड-19 से भी कोई कनेक्शन है क्या? जी, बिल्कुल है. दिसंबर 2019 में जब कोरोना की शुरुआत हुई, उसके दो महीने बाद शी ने नेचर पत्रिका में एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने बताया कि ये नया वायरस 2013 में खदान से जमा किए गए वायरस सैंपल से बहुत मिलता है. 2013 में जमा किए गए वायरस का नाम है RATG13. वुहान लैब ने इसकी जेनेटिक सिक्वेंसिंग की थी. इसका जेनेटिक स्ट्रक्चर कोविड-19 वायरस से बहुत मिलता है. कई एक्सपर्ट मानते हैं कि RATG13 कोविड-19 वायरस का प्रोजेनिटर हो सकता है. प्रोजेनिटर को समझिए वायरस का पूर्वज.

वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी

अब आते हैं इस डिबेट के एक ज़रूरी पहलू पर, जिसका नाम है- वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी. ये बायो रिसर्च करने वाली एक प्रयोगशाला है. बायोसेफ्टी में सबसे टॉप मानक है- BSL 4. वुहान चीन की पहली BSL 4 प्रयोगशाला है. इसके भीतर ख़तरनाक संक्रमणों से जुड़े शोध होते हैं. रिसर्च के मकसद से यहां विषाणुओं को स्टोर करके भी रखा जाता है. 2013 में शी और उनकी टीम ने खदान से जो सैंपल जमा किए थे, उन्हें भी इस लैब में स्टोर करके रखा गया था.

यहां इन वायरस सैंपल्स पर जो शोध और प्रयोग हुए, उनमें ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ भी शामिल है. ये क्या चीज है? ये है, विषाणुओं के भीतर जेनेटिक इंजिनियरिंग करना. वायरस पर शोध करने वाले वैज्ञानिक विषाणुओं की प्रवृत्ति, उनके स्वभाव पर रिसर्च करते हैं. इसी क्रम में आती है ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ की भूमिका.

Wuhan Institute Of Virology
वुहान स्थित वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ वायरॉलजी (तस्वीर: एएफपी)

 

एक प्रजाति से दूसरे प्रजाति में वायरस का जंप करना. क्रॉसओवर करके इंसानों तक पहुंचना. म्यूटेट करना, ये क़ुदरती प्रक्रिया है. मगर ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ में वैज्ञानिक ख़ुद ही इस प्रक्रिया को ट्रिगर करते हैं. वो एक कंट्रोल्ड सेट-अप में वायरस को होस्ट जीव के भीतर बार-बार पास करते हैं. उनमें म्यूटेशन करवाते हैं. उन्हें ताकतवर बनाते हैं.

इनमें ऐसे वायरस भी शामिल हो सकते हैं, जिन्होंने अभी तक इंसानों में जंप नहीं किया है. ऐसे वायरस, जिन्हें क़ुदरती तौर पर इंसानों के भीतर जंप करने में अभी दशकों लगेंगे. यानी ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ के तहत विषाणु के भीतर जानबूझकर ऐसे बदलाव किए जाते हैं, जो प्रकृति जनित नहीं हैं. कृत्रिम हैं.

मसलन, साल 2012 में साइंस मैगज़ीन में एक शोधपत्र छपा. इसमें एन्फ्लूएंजा वायरस के एयरबोर्न ट्रांसमिशन को लेकर फेरेट नाम के जीवों में प्रयोग किया गया था. इसके लिए साइंटिस्ट्स ने एक एन्फ्लूएंजा वायरस को मोडिफ़ाई किया. फेरेट्स को बार-बार उनसे संक्रमित करवाया. कई बार म्यूटेट होने के बाद वायरसों की एक ऐसी स्ट्रेन तैयार हुई, जो हवा के मार्फ़त फेरेट्स में संक्रमण फैला सकती थी. वायरस की ये नई स्ट्रेन ऐसी थी, जिसपर कई मौजूदा ऐंटीवायरल दवाएं बेअसर थीं.

Influenza Airborne 2012
साल 2012 में एन्फ्लूएंजा वायरस के एयरबोर्न ट्रांसमिशन को लेकर फेरेट नाम के जीवों में प्रयोग किया गया था.

सवाल है कि ऐसी प्रक्रिया का लाभ क्या है?

इससे वायरस नाम के दुश्मन को बेहतर समझने में मदद मिलती है. उसके मकैनिज़म और मज़बूत होने की प्रक्रिया को अडवांस में जानकर डिफेंस के बेहतर तरीके विकसित किए जा सकते हैं. इस प्रक्रिया में फ़ायदे तो हैं, मगर जोख़िम भी बहुत ज़्यादा है. अगर ग़लती से कोई हादसा हुआ, तो एक अनजान वायरस इंसानों तक पहुंच सकता है. नई महामारी फैल सकती है. ऐसी महामारी, जिसका इलाज़ भी न हो दुनिया के पास.

इसी जोख़िम के चलते ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ की नैतिकता पर सवाल उठते हैं. कितनी भी सावधानी बरती जाए, मगर प्रक्रिया के फुल प्रूफ़ होने की गारंटी नहीं दी जा सकती. ऐक्सिडेंट का जोख़िम रहेगा ही. इन्हीं जोख़िमों के चलते वैज्ञानिकों का एक धड़ा इस प्रक्रिया का विरोध करता है. उनका कहना है कि कितनी भी सावधानी बरत लो, प्रयोगशालाओं को एयरटाइट बनाना मुश्किल है. इसी के चलते 2014 में ओबामा प्रशासन ने गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च को अपने यहां बैन कर दिया था. हालांकि ट्रंप ने दोबारा इसे शुरू करवा दिया.

Barack Obama
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा. (तस्वीर: एपी)

अब फिर से आते हैं वुहान लैब पर

वहां खदान से मिले कोरोना सैंपल्स को स्टोर करके रखा गया था. उनपर ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ रिसर्च भी चल रही थी. हमने आपको वुहान लैब की महामारी विशेषज्ञ शी के बारे में बताया था. उन्होंने जाने-माने कोरोना वायरस शोधकर्ता राल्फ़ बैरिक के साथ मिलकर एक प्रयोग शुरू किया. राल्फ़ यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलिना में काम करते हैं. शी और राल्फ़ की टीम चमगादड़ों में पाए जाने वाले विषाणुओं की क्षमता बढ़ाने पर प्रयोग कर रही थी. ताकि ये देखा जा सके कि ये वायरस इंसानों को किस तरह और किस क्षमता से संक्रमित कर सकते हैं.

इसी क्रम में आया नवंबर 2015

इस महीने राल्फ़ और शी की टीम ने एक नया वायरस बनाया. इसे बनाने के लिए उन्होंने सार्स वन के वायरस का बैकबोन लिया. इसके स्पाइक प्रोटीन को चमगादड़ों में पाए जाने वाले एक वायरस SHC014-CoV से रीप्लेस कर दिया. नतीजतन, एक ऐसा नया वायरस तैयार हुआ जो इंसान की श्वासनली कोशिकाओं को संक्रमित कर सकता था.

Ralph Baric
जाने-माने कोरोना वायरस शोधकर्ता राल्फ़ बैरिक.

कई रिसर्चर्स का मानना है कि ये वायरस कोविड-19 वायरस का एक प्रोटोटाइप हो सकता है. आगे के सालों में भी शी और वुहान लैब की उनकी टीम ने कोरोना वायरस की जेनेटिक इंजिनियरिंग का काम जारी रखा. ये रिसर्च हुई, इसका सबूत है अमेरिका स्थित एक सरकारी स्वास्थ्य संस्था के रेकॉर्ड्स. इस संस्था का नाम है- नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एलर्जी ऐंड इनफेक्शियस डिजिज़ेस. शॉर्ट में, NIAID.

ये अमेरिका के नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ हेल्थ का हिस्सा है. ओबामा सरकार ने अमेरिका में ‘गेन ऑफ़ फंक्शन’ रिसर्च को बैन कर दिया था. मगर चीन में ऐसा कोई बैन नहीं था. इसी दौर में NIAID ने कोरोना वायरस पर चल रही शी की रिसर्च को फंडिंग दी. और उसी फंडिंग के रेकॉर्ड में शी की रिसर्च का भी ब्योरा दर्ज है. इसमें दर्ज है कि शी की टीम एक ऐसा नोवेल कोरोना वायरस बना रही थी, जिसमें इंसानी कोशिकाओं को संक्रमित करने का ज़बर्दस्त माद्दा हो. एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस शोध में कोविड-19 जैसा विषाणु तैयार करने का माद्दा था.

शी ने लैब में ऐसा कोई विषाणु बनाया या नहीं, हम पक्के से नहीं जानते. इसलिए कि चीन ने वुहान लैब के रेकॉर्ड्स सील कर दिए. उन्हें पब्लिक नहीं किया. मगर इस रिसर्च की डिवेलपमेंट के बारे में हमें थोड़ी जानकारी है. कैसे? शी को फंड देने वाले उनके एक सहयोगी ने 9 दिसंबर, 2019 को इसका ज़िक्र किया था.

ये महामारी शुरू होने के ठीक पहले की बात है. शी के एक फंडर ने एक इंटरव्यू में वुहान लैब के भीतर चल रहे शोध की सफलता बताई. कहा कि वुहान लैब की रिसर्च टीम ने 6-7 साल की मेहनत के बाद सार्स जैसे 100 से ज़्यादा कोरोना विषाणुओं को खोजा है. इनमें से कुछ प्रयोग के दौरान इंसानी कोशिकाओं के भीतर दाखिल होने में सफल रहे. वो सार्स जैसी बीमारियां फैला सकते हैं. ये ऐसी बीमारियां हैं, जिन पर वैक्सीन का असर नहीं होता.

अब इन जानकारियों को दिसंबर 2019 में वुहान से शुरू हुई कोविड-19 महामारी से जोड़कर देखिए. आशंका मज़बूत हो जाती है. इन्हीं जानकारियों के संदर्भ में कई वैज्ञानिक ऐक्सिडेंटल लैब लीकेज़ की आशंका जता रहे हैं. उनका कहना है कि ये आशंका इतनी निराधार नहीं कि इसे खारिज़ कर दिया जाए.

यहां एक ज़रूरी बात याद रखनी चाहिए. साइंटिस्ट कम्युनिटी लैब से हुए ऐक्सिडेंटल लीकेज़ की आशंका पर बात कर रही थी. मगर एक समानांतर अफ़वाह ये चल पड़ी कि चीन ने सोची-समझी साज़िश के तहत प्रयोगशाला के भीतर ये वायरस बनाया है. जबकि साइंटिस्ट कम्युनिटी कह रही थी कि जैविक हथियार नहीं था.

मगर ट्रंप जैसे लीडर्स ने कन्सपिरेसी को बढ़ावा दिया. दुनिया के आगे कोविड-19 से जुड़ी अफ़वाहों से निपटने की चुनौती थी. ऐसे में साइंटिस्ट कम्युनिटी का एक धड़ा सामने आया. उन्होंने लैब लीकेज़ की आशंका को खारिज़ कर दिया. इसे अफ़वाह बताया. इसमें मशहूर साइंस जर्नल लैनसेट में छपे फरवरी 2020 का एक लेख बहुत चर्चित है. इसमें महामारी विशेषज्ञों के एक ग्रुप ने लिखा कि कोविड-19 वाइल्डलाइफ़ से शुरू हुआ. इसकी प्राकृतिक शुरुआत को नकारने वाली तमाम थिअरीज़ की वो निंदा करते हैं.

The Lancet Report Feb 2020
साइंस जर्नल लैनसेट में फरवरी 2020 का एक लेख.

मगर क्या लैनसेट का ये तर्क सटीक था?

साइंटिस्ट कम्युनिटी के ही कई लोग इसपर सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि फरवरी 2020 महामारी का शुरुआती दौर था. तब तो बहुत सीमित जानकारी थी वैज्ञानिकों के पास. ऐसे में बिना पर्याप्त शोध के ऐक्सिडेंटल लैब लीकेज़ की आशंका को नकारना ग़लत था.

लैनसेट के उस आर्टिकल पर एक और विवाद है. इस आर्टिकल को लिखने वाले ग्रुप के अगुआ थे पीटर दासज़ाक. वो न्यू यॉर्क स्थित इकोहेल्थ अलायंस के प्रेज़िडेंट हैं. ‘दी बुलेटिन ओआरजी’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पीटर के संगठन का वुहान लैब से सीधा कनेक्शन है. वुहान लैब में शी के नेतृत्व में कोरोना वायरस पर जो रिसर्च चल रही थी, उसे फंड देने वालों में पीटर का संगठन भी शामिल था. हमने आपको शी के एक फंडर द्वारा 9 दिसंबर, 2019 को दिए गए एक इंटरव्यू की बात बताई थी. जिसमें उस फंडर ने रिसर्च की सफलता पर बात की थी. वो फंडर और कोई नहीं, ख़ुद पीटर दासज़ाक थे.

ऐसे में उनका लिखा आर्टिकल सीधे-सीधे कन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंट्रेस्ट का मसला था. पीटर ने अपने आर्टिकल में वुहान लैब के साथ अपने कनेक्शन का खुलासा नहीं किया. जबकि नैतिकता और प्रफेशनलिज़म का तकाज़ा था कि वो पाठकों को ये जानकारी दें. ऐसे में सोचिए. अगर लैब लीक वाली थिअरी सही साबित हुई, तो पीटर पर भी सवाल उठते. तो क्या इसीलिए वो लैब लीक की आशंका को नकारकर अपना भी बचाव कर रहे थे?

Peter Daszak
पीटर दासज़ाक न्यू यॉर्क स्थित इकोहेल्थ अलायंस के प्रेज़िडेंट हैं.

पीटर ख़ुद एक महामारी विशेषज्ञ हैं. वो उस धड़े का हिस्सा हैं, जो गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च का पक्ष लेते हैं. भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए प्राकृतिक प्रक्रिया में छेड़खानी करके नए और ताकतवर वायरस तैयार करते हैं. पीटर जैसे वैज्ञानिक इसे सुरक्षित प्रक्रिया बताते हैं. जबकि तमाम साक्ष्य हैं, जो इस प्रक्रिया के दौरान दुर्घटना होने की आशंका जताते हैं. अगर ये बात साबित हो गई कि कोविड-19 भी ऐक्सिडेंटल लैब लीकेज़ से फैला, तो गेन-ऑफ़ फंक्शन के सपोर्टर्स को बड़ा झटका लगेगा.

जो भी हो, कोविड-19 के नैचुरल ऑरिजन की थिअरी दुनिया में हावी हो गई. कन्सपिरेसिस्ट्स की निराधार बातों के चलते लैब लीकेज़ वाली थिअरी सस्ती अफ़वाह जैसी लगने लगी. मगर फिर फरवरी 2021 में एक बार फिर इस थिअरी ने सिर उठाना शुरू किया. क्यों? क्योंकि लंबे इंतज़ार के बाद WHO की एक टीम को वायरस के शुरुआत की जांच के लिए वुहान जाने का मौका मिला.

चीन ने इस टीम के कामकाज में बहुत बाधा पहुंचाई. ऐलान किया गया कि लैब थिअरी में कोई दम नहीं मिला. मगर इसी टीम के कुछ सदस्यों ने लौटकर कहा कि लैब लीकेज़ एक वजह हो सकती है. इसी धड़े में शामिल हैं, ऑस्ट्रेलिया के प्रफ़ेसर डोमिनिक ड्वायर. वो भी वुहान गई WHO टीम का हिस्सा थे. उन्होंने लौटकर कहा कि लैब की भूमिका को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता. ये भी कहा कि ऐक्सिडेंटल लीकेज़ की बात सच हो सकती है.

इस पक्ष के वैज्ञानिक मानते हैं कि लैब लीक की थिअरी और कन्सपिरेसी थिअरी में बड़ा बुनियादी अंतर है. कन्सपिरेसी साइड इसे जान-बूझकर किया गया लीकेज़ कहता है. जबकि होना ये चाहिए कि लैब लीकेज़ की आशंका को ऐक्सिडेंटल मानकर जांच हो. वो भी किसी स्वतंत्र संस्था द्वारा. वैज्ञानिकों के स्वतंत्र दल द्वारा.

Dominic Dwyer
ऑस्ट्रेलिया के प्रफ़ेसर डोमिनिक ड्वायर वुहान गई WHO टीम का हिस्सा थे. (तस्वीर: एएफपी)

यहां स्वतंत्र पर ज़ोर देने का कारण चीन है. लैब लीकेज़ की बात अभी साबित नहीं हुई. मगर इसकी आशंका तो है. इस आशंका की जांच ज़रूरी है. इसलिए नहीं कि चीन को विलेन बनाया जा सके. बल्कि इसलिए ताकि ऐसे हादसे आगे न हो सकें. मगर क्या चीन ऐसा होने देगा? वो भी WHO जैसी कमज़ोर संस्था के मार्फ़त? WHO कहने को स्वतंत्र है. मगर वो अपनी फंडिंग के लिए सदस्य देशों पर निर्भर है. चीन उसका बड़ा फ़ंडर है. इसीलिए चीन का प्रभाव भी ज़्यादा है.

इस प्रभाव का नुकसान हम पहले ही उठा चुके हैं. कैसे? चीन ने जानबूझकर कोरोना वायरस लीक नहीं किया. लेकिन उसने महामारी की असली तस्वीर दुनिया से छुपाई. चीन को संक्रमण की शुरुआत से पता था कि वुहान में फैल रही बीमारी इंसानों से इंसानों में फैलती है. यानी, संक्रामक है. इसके संक्रमण की दर भी काफी ज़्यादा है. मगर उसने ये बातें छुपाईं. उसने वुहान में व्यापक हो चुके संक्रमण पर भी पर्दा डाला. ताइवान ने WHO को आगाह भी किया. मगर WHO ने इसकी अनदेखी की.

चीन इस महामारी की अपडेट WHO को देता था. और WHO रट्टू तोते की तरह वही जानकारी दुनिया को पास करता था. इसके चलते शुरुआती दौर में कोरोना को नियंत्रित करने की कोई तैयारी ही नहीं हो पाई. बाद के दिनों में कोविड-19 के शुरुआत पर जांच की मांग उठी. तब भी WHO चीन के आगे दब्बू बना रहा. इसीलिए कई एक्सपर्ट कहते हैं कि कोविड के ऑरिजन की जांच WHO के बस की बात नहीं.

WHO ने लैब लीकेज़ की थिअरी पर अब तक गंभीरता से जांच नहीं की. जबकि कई साइंटिस्ट्स कह रहे हैं कि इस आशंका की मुकम्मल जांच किए बिना इसे खारिज़ करना एक ब्लंडर है. यहां ध्यान रखिए कि जिस तरह नैचुरल ऑरिजन के पक्षधर बड़े विशेषज्ञ हैं. उसी तरह लैब लीकेज़ की आशंका जताने वाले धड़े में भी बड़े महामारी एक्सपर्ट शामिल हैं.

कोविड की प्राकृतिक शुरुआत से जुड़े साक्ष्य अब भी इतने मज़बूत नहीं कि उसे ही एकमात्र सत्य माना जाए. अभी तक हम वायरस के चमगादड़ों से इंसानों तक पहुंचने की चेन नहीं खोज पाए हैं. ये स्पिलओवर कैसे हुआ? कौन सा जीव इसका माध्यम बना? वायरस वुहान कैसे पहुंचा? ये ज़रूरी सवाल अनसुलझे हैं.

ये पुष्ट हो चुका है कि 2013 में युन्नान प्रांत की खदान से मिले वायरस सैंपल्स कोविड-19 से बहुत मेल खाते हैं. अगर कोविड-19 की शुरुआत प्राकृतिक कारणों के चलते हुई, तो इसे सबसे पहले युन्नान प्रांत में फैलना चाहिए था. मगर ये फैलना कहां शुरू हुआ? युन्नान से लगभग 1,500 किलोमीटर दूर वुहान में. वही शहर, जहां के लैब में कोरोना वायरस को मज़बूत बनाने के ख़तरनाक प्रयोग हो रहे थे. क्या इतने तगड़े संयोग के बावजूद बिना सही जांच के इस तर्क को खारिज़ किया जा सकता है?


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