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डायना ओरटिज़ ने अमेरिका की पोल कैसे खोल दी?

केला, दुनिया का सबसे ज़्यादा खाया जाने वाला फल. क्या इस विनम्र से फल को देखकर आप रक्तपात की कल्पना कर सकते हैं? सोच सकते हैं कि केला जियोपॉलिटिक्स का एक औज़ार हो सकता है? ये देशों को ग़ुलाम बना सकता है? इतना पावरफुल हो सकता है कि सरकारें बनाए और गिरा दे. आज जिस देश की कहानी हम आपको सुना रहे हैं, उसका प्रारब्ध भी इसी फल ने तय किया था.

बनाना मैन की कहानी

अंग्रेज़ी का एक टर्म है- बनाना रिपब्लिक. इसका मतलब होता है एक बदहाल, राजनैतिक तौर पर अस्थिर देश. जिसकी इकॉनमी और पॉलिटिकल सिस्टम पर विदेशी कंपनियों का कब्ज़ा हो. आप पूछ सकते हैं, शब्द का मतलब तो समझ आया. मगर इसमें ‘बनाना’ क्यों जुड़ा है? इसलिए कि ये टर्म जिन देशों के इतिहास से जुड़ा है, वहां यही बनाना, उर्फ़ केला, उनकी दुर्दशा का ज़रिया बना.

इस अतीत का मुख्य पात्र है, एक यहूदी शरणार्थी. नाम, सैम ज़ेमरे, उर्फ़ बनाना मैन. 1891 का साल था, जब सैम का परिवार रूस छोड़कर अमेरिका आया. तब सैम की उम्र थी, 14 साल. न फ़ॉर्मल स्कूली तालीम, न परिवार की प्रॉपर्टी. सैम के पास एक ही चीज थी- उसका दिमाग़. इसी दिमाग़ में आया एक बिज़नस आइडिया. सैम बंदरगाह जाता. वहां बड़ी फल कंपनियां बहुत पके हुए केलों को फेंक देतीं. ये सोचकर कि बाज़ार पहुंचते-पहुंचते वो केले किसी गत के नहीं रहेंगे. सैम इन्हीं केलों को चुनता. फिर ठेले पर रखकर दौड़ते-दौड़ते बाज़ार जाता. इससे पहले कि वो केले बिल्कुल गल जाएं, सैम उन्हें बेच देता.

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सैम ज़ेमरे. (तस्वीर: गेटी इमेजेज़)

एक कौड़ी की लागत नहीं. बस पांव की रेस के दम पर सैम ने तीन साल में लाखों रुपये बना लिए. अब उसने ख़रीदा एक पुराना जहाज़. सोचा, सीधा उत्पादकों से केले ख़रीदूंगा. सैम और उसका जहाज़ जा पहुंचा, हॉन्डुरस. सेंट्रल अमेरिका का एक ग़रीब देश. जहां ख़ूब केले उगते थे. सैम के जहाज़ हॉन्डुरस से सस्ती दरों पर केले उठाते और अमेरिका में बेचते. देखते-देखते सैम ने हॉन्डुरस में हज़ारों एकड़ ज़मीन ख़रीद ली. अपनी एक फ्रूट कंपनी बना ली.

हॉन्डुरस सरकार के तख़्तापलट की कहानी

जिस वक़्त सैम हॉन्डुरस में अपना मुकद्दर बना रहा था, उसी वक़्त हॉन्डुरस की अपनी नैया गोते खा रही थी. उसके ऊपर ब्रिटेन का मोटा कर्ज़ था. ब्रिटेन बोला, या तो तुम सीधे से कर्ज़ चुकाओ. या हम कर्ज़ वसूली के लिए ख़ुद आ जाते हैं. इस धमकी के बाद सीन में एंट्री हुई हॉन्डुरस के पड़ोसी, अमेरिका की. एंट्री की वजह, मनरो डॉक्ट्राइन. USA की ये पॉलिसी अमेरिकी महादेश में यूरोपियन साम्राज्यवाद का विरोध करती थी. इसी के चलते अमेरिकी सरकार ने हॉन्डुरस को फाइनैंस करने का फ़ैसला किया. इसमें उसकी मदद की, मशहूर बैंकर जे पी मॉर्गन ने.

मगर ये फ़ाइनैंसिंग इतनी निर्दोष तो थी नहीं. अमेरिका पैसे देता, तो बदले में हॉन्डुरस की पॉलिसी भी तय करता. वहां कारोबार करने वाली कंपनियों पर टैक्स बढ़ जाते. इसका असर सैम की कंपनी पर भी होता. उसका प्रॉफ़िट मार्जिन घट जाता. ऐसा न हो, इसके लिए सैम ने की प्लानिंग. हॉन्डुरस के पूर्व राष्ट्रपति मैनुअल बोनिला को अपनी साइड मिलाया. प्राइवेट सेना हायर की. और अमेरिका की नाक के नीचे हॉन्डुरस की सरकार का तख़्तापलट कर दिया.

सैम की कृपा से बनी सरकार ने उसके केले के कारोबार को खुला हाथ दे दिया. मुफ़्त ज़मीनें दीं, टैक्स में छूट दी. सैम उर्फ़ ‘बनाना मैन’ बन गया हॉन्डुरस का सबसे ताकतवर आदमी. आगे चलकर सैम ने अपने सबसे बड़े कॉम्पिटिटर ‘यूनाइटेड फ्रूट कंपनी’ में भी तख़्तापलट कर दिया. उसकी बागडोर हथिया ली.

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गाबरियेल गारसिया मार्केज़.

क्या था ये यूनाइटेड फ्रूट?

गाबरियेल गारसिया मार्केज़ की लिखी एक बेइंतहा ख़ूबसूरत क़िताब है- वन हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड. उसमें एक शहर है, माकोन्डो. शांत सा जंगल टाउन माकोन्डो. यहां एंट्री होती है, एक विदेशी कंपनी की. वो कंपनी केले बेचती है. उसके आने के बाद माकोन्डो, माकोन्डो नहीं रहता. अभिशाप बन जाता है. कंपनी माकोन्डो में बारिशों का मिजाज़ बदल देती है. नदियों की दिशा मोड़ देती है. वो अपने साथ लाती है, भाड़े के हत्यारे. कंपनी का क्रूर साम्राज्यवाद वहां की भ्रष्ट सरकार को भी जेब में कर लेता है. आम आदमी बेबात मारे जाते हैं. शोषित होते हैं. जब बनाना कंपनी माकोन्डो से विदा लेती है, तब वहां कुछ नहीं बचता. ‘वन हन्ड्रेड इयर्स ऑफ़ सॉलिट्यूड’ में एक जगह माकोन्डो का एक निवासी इस बर्बादी का इज़हार करते हुए कहता है-

हमने केले खाने के लिए एक अमेरिकी को अपने यहां न्योता था. देखो, ये न्योता हमें कितना भारी पड़ा. हम बर्बाद हो गए.

मार्केज़ की क़िताब में दर्ज उस बनाना कंपनी की कहानी ‘यूनाइटेड फ्रूट’ का ही इतिहास है. केले का कारोबार करने वाली ये कंपनी 20वीं सदी की एक सुपरपावर थी. लैटिन अमेरिका के करीब एक दर्ज़न देशों को इसने अपनी पर्सनल जाग़ीर बना लिया था. इसी एक्सट्रीम एक्सप्लॉयटेशन का एक प्लॉट था, ग्वाटेमाला.

One Hundred Years Of Solitude
गाबरियेल गारसिया मार्केज़ की लिखी क़िताब- वन हन्ड्रेड इयर्स ऑफ सॉलिट्यूड.

ग्वाटेमाला पूरी तरह आज़ाद कब हुआ?

सेंट्रल अमेरिका में बसा एक बेहद छोटा सा देश है- रिपब्लिक ऑफ़ ग्वाटेमाला. इसके पश्चिम और उत्तर में है मैक्सिको. पूरब में है, बलीज़. और दक्षिणपूर्व में हैं- अल सलवाडोर और हॉन्डुरस. कैलिफॉर्निया वाली साइड से नॉर्थ पसिफ़िक ओशन पकड़कर आगे बढ़ेंगे, तो मैक्सिको सिटी के पार सीधे ग्वाटेमाला के समुद्री तट पर पहुंच जाएंगे.

ग्वाटेमाला ज्वालामुखी, पहाड़ और समुद्री तटों का देश है. पुरातत्ववेत्ता मानते हैं कि पूरे सेंट्रल अमेरिका में इंसानों की सबसे पुरानी बसाहट ग्वाटेमाला से शुरू हुई. करीब 14 हज़ार साल पहले एशिया से गए कुछ मानव यहां आकर बसे. एक हज़ार ईसा पूर्व में इंसानों ने यहां गांव बसाना शुरू किया. आगे चलकर करीब 250 ईस्वी के आसपास पड़ोसी मैक्सिको में शुरू हुई माया सभ्यता ग्वाटेमाला पहुंची. माया सभ्यता बहुत उन्नत सिविलाइज़ेशन थी. इनकी भाषा में एक शब्द था- गुआतेज़मला. इसका मतलब होता है, माउंटेन दैट वॉमिट्स वॉटर. माने, पानी की उल्टी करने वाला पहाड़. कहते हैं, इसी शब्द से ग्वाटेमाला को अपना नाम मिला है.

16वीं सदी की बात है, जब ग्वाटेमाला साम्राज्यवाद के चंगुल में आया. स्पैनिश आक्रमणकारियों ने उसपर कब्ज़ा कर लिया. भयंकर ख़ून-ख़राबे के सहारे इसे न्यू स्पेन का हिस्सा बना लिया गया.

मायन सभ्यता
माया सभ्यता

करीब 300 साल की ग़ुलामी के बाद 1821 में ग्वाटेमाला को स्पेन से आज़ादी मिली. दो बरस बाद उसने UPCA, यानी ‘यूनाइटेड प्रोविन्सेज़ ऑफ़ सेंट्रल अमेरिका’ को जॉइन कर लिया. ये UPCA सेंट्रल अमेरिकी देशों की एक यूनिट थी. इसमें ग्वाटेमाला के अलावा कोस्टा रिका, अल सलवाडोर, हॉन्डुरस और निकारागुआ भी थे. UPCA का ये अरेंजमेंट करीब 16 साल तक रहा. इसके बाद 1839 में ग्वाटेमाला पूरी तरह आज़ाद हो गया.

अब कहानी फ़ॉरवर्ड करके आते हैं 1954 के साल पर

इस वक़्त ग्वाटेमाला के राष्ट्रपति थे, कर्नल हाकोबो अरबेन्ज ग़ुजमैन. हम-आप शायद अंग्रेज़ी की स्पेलिंग देखकर उन्हें जैकोबो कहें. मगर ग्वाटेमाला की स्पैनिश ज़ुबान में वो हाकोबो कहे जाते हैं. कर्नल हाकोबो सुधारवादी लीडर थे. वो देश में भूमि सुधार करना चाहते थे. ताकि भूमिहीन किसानों को खेती के लिए ज़मीन मिले. इस भूमि सुधार के निशाने पर थी, यूनाइटेड फ्रूट. वही केले बेचने वाली अमेरिकी कंपनी, जिसका हमने शुरुआत में ज़िक्र किया था.

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कर्नल हाकोबो अरबेन्ज ग़ुजमैन.

यूनाइटेड फ्रूट के लैटिन अमेरिकी साम्राज्य का कोहिनूर था ग्वाटेमाला. कंपनी ने ग्वाटेमाला की कमज़ोर और भ्रष्ट राजनैतिक लीडरशिप को ख़ूब भुनाया. तकरीबन पूरे ग्वाटेमाला की ज़मीन पर यूनाइटेड फ्रूट की मनॉपली हो गई. कर्नल हाकोबो कंपनी के इस प्रभुत्व को ख़त्म करना चाहते थे. उन्होंने तय किया कि यूनाइटेड फ्रूट को नैशनलाइज़ किया जाएगा. उसकी ज़मीनें भूमिहीनों में बांटी जाएंगी.

यूनाइटेड फ्रूट चुपचाप ये कैसे होने देता?

उसकी अमेरिकी सरकार और प्रशासन तक सीधी पहुंच थी. उस दौर में अमेरिका के कई सीनियर अधिकारियों का यूनाइटेड फ्रूट के साथ सीधा वास्ता था. कुछ पारिवारिक संबंधों के चलते कंपनी लीडरशिप से जुड़े थे. और कुछ कंपनी के बड़े शेयरहोल्डर्स में शामिल थे.

ऐसे में जब यूनाइटेड फ्रूट ने अमेरिकी सरकार पर दबाव बनाया, तो वो तुरंत मदद के लिए राज़ी हो गई. इस रज़ामंदी के पीछे दो वजहें थीं. एक, यूनाइटेड फ्रूट का साम्राज्य बचाकर अपने वित्तीय हित सुरक्षित करना. दूसरा, कर्नल हाकोबो की वामपंथी सरकार को रास्ते से हटाना.

ये दोनों हित साधने के लिए अमेरिका ने क्या किया?

इस वक़्त अमेरिका के राष्ट्रपति थे- आइज़नहावर. उन्होंने अपनी ख़ुफ़िया एजेंसी CIA को काम पर लगाया. ऐसे मौकों के लिए CIA की हैंडबुक में सबसे जांचा-परखा फॉर्म्युला था- तख़्तापलट. इसी फ़ैशन में उसने ग्वाटेमाला के लिए तैयार किया एक स्पेशल प्रोग्राम. इसका नाम था- ऑपरेशन पीबीसक्सेस.

Dwight Eisenhower
तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़नहावर.

इसके तहत CIA ने कर्नल हाकोबो की सरकार के खिलाफ़ एक प्रॉपेगैंडा कैंपेन शुरू किया. उन्हें डिस्क्रेडिट करने के लिए रेडियो प्रोग्राम बनाए गए. छापामार हवाई जहाज़ों से ग्वाटेमाला में जगह-जगह सरकार विरोधी पर्चियां गिराई गईं. भाड़े के सैनिकों को हायर करके ‘फ्रीडम फाइटर्स’ नाम की सेना बनाई गई. साथ ही साथ, कर्नल हाकोबो की सरकार को डिप्लोमैटिकली भी बिल्कुल अनटचेबल बना दिया गया.

CIA की इन कोशिशों को कामयाबी मिली 1954 में. इस बरस 4 जुलाई को सबसे महान लोकतंत्र का दंभ भरने वाले अमेरिका ने अपना 278वां इंडिपेंडेंस डे मनाया. इसी के चार दिन बाद 8 जुलाई, 1954 को उसने ग्वाटेमाला की लोकतांत्रिक सरकार गिरा दी. वहां अपने मोहरे ‘कर्नल कार्लोस अरमास’ के नेतृत्व में सैन्य हुकूमत कायम करवा दी.

पता है, अर्जेंटीना का एक 26 बरस का जवान लड़का था. इस तख़्तापलट के समय वो घूमने के लिए ग्वाटेमाला आया हुआ था. इस कू को देखकर उसे अमेरिकी पूंजीवाद से नफ़रत हो गई. उसने अमेरिकन कैपिटलिज़म के खिलाफ़ हथियार उठा लिया. गुरिल्ला लड़ाका बन गया. इस बारे में बताते हुए उसने अपनी मां से कहा- मां, बस उसी तारीख़ से मुझे यकीन हो गया कि दुनिया तर्क और विवेक से नहीं चलती. उस लड़के का नाम था- चे ग्वेरा.

Che Guevara
चे ग्वेरा.

ख़ैर, इस विषयांतर के बाद फिर लौटते हैं तख़्तापलट पर

क्या इसके बाद ग्वाटेमाला में अमेरिकी साज़िशों का अंत हो गया? नहीं. उस तख़्तापलट ने ग्वाटेमाला में रक्तपात का एक सिलसिला शुरू किया. वहां सिविल वॉर छिड़ गया. लेफ़्टिस्ट विद्रोहियों ने सैन्य हुकूमत के खिलाफ़ हथियार उठा लिए. इनसे निपटने में CIA ने मिलिटरी लीडरशिप की हर मुमकिन मदद की. CIA की मदद से ग्वाटेमालन गवर्नमेंट अपनी आबादी के साथ भीषण अपराध करती रही. वॉइलेंस और काउंटर वॉइलेंस का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो गया. करीब 36 बरस बाद जब ये गृह युद्ध ख़त्म हुआ, तब तक ग्वाटेमाला उजड़ चुका था. दो लाख से ज़्यादा लोग मारे जा चुके थे. हज़ारों लोग लापता कर दिए गए थे.

ये आंकड़े आपको ज़ुल्म की असली सूरत नहीं बताएंगे. असली सूरतेहाल के लिए आपको ग्वाटेमालन लैंडस्केप का हिस्सा बन गईं सैकड़ों सामूहिक कब्रों की तस्वीरें देखनी चाहिए. वहां खुदाई में निकलने वाले नरकंकालों की मुंडियां देखनी चाहिए. जिनके ऊपर बंधे कपड़े के अवशेष उनका हश्र बताती हैं. बताती हैं कि कैसे यातनाएं देकर, ब्लाइंडफोल्ड करके उन्हें कुल्हाड़ी से काट डाला गया था. आपको सुननी चाहिए 13 साल के नाहमन की कहानी. CIA से मदद पाने वाले उसी के हमवतन सैनिकों ने नाहमन को पीटते-पीटते उसकी पसलियां तोड़ दी थीं. उसका लीवर फाड़ डाला था. नाहमन की क़ब्र पर लगे पत्थर पर आज भी दर्ज है- मैं तो सिर्फ़ एक बचपन चाहता था, मगर उन्होंने मुझे ये भी नहीं दिया.

हम आज क्यों बता रहे हैं ये इतिहास?

इसलिए बता रहे हैं कि बीते रोज़ अमेरिका से एक मौत की ख़बर आई. वॉशिंगटन के एक अस्पताल में एक मरीज़ ने कैंसर से दम तोड़ा. इनका नाम था, डायना ओरटिज़. उनकी मौत 19 फरवरी को हुई, मगर ख़बर बाहर आई 21 फरवरी को. कौन थीं डायना? 62 साल की डायना रोमन कैथलिक चर्च की नन थीं. उन्हीं के चलते ग्वाटेमाला में की गई अमेरिकी ज़्यादतियों का पर्दाफ़ाश हुआ था.

क्या कहानी है डायना की?

ये बात है, 1989 की. उन दिनों मिशनरी के काम से सिस्टर डायना ग्वाटेमाला में पोस्टेड थीं. यहां वो ग्वाटेमाला के कबीलाई बच्चों को पढ़ाया करती थीं. इस वक़्त ग्वाटेमाला में सिविल वॉर चल रहा था. रोज़ाना दर्जनों लोग अगवा किए जाते, मारे जाते. 2 नवंबर, 1989 की बात है. उस रोज़ डायना चर्च कंपाउंड स्थित अपने घर में थीं. ग्वाटेमालन सिक्यॉरिटी फ़ोर्स के कुछ लोग यहां पहुंचे. उन्होंने डायना को किडनैप किया और एक यातना शिविर ले गए.

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19 फ़रवरी 2020 को डायना ओरटिज़ की मौत हो गई है.

मिलिटरी के लोग डायना से वामपंथी कबीलाइयों के नाम जानना चाहते थे. ये जानकारी लेने के लिए डायना को भीषण अमानवीय यातनाएं दी गईं. उनका गैंगरेप हुआ. फ़ोर्स के लोगों ने सिगरेट से 111 बार उनका शरीर दागा. उन्हें सड़ी-गली लाशों से भरे गड्ढे में रखा गया. चूहों से नुचवाया गया. उन्हें एक क़ैदी को कुल्हाड़ी से काटने के लिए मजबूर किया गया.

डायना भी शायद किसी सामूहिक क़ब्र में काटकर फेंक दी जातीं. मगर क़िस्मत से वो भाग गईं और अमेरिका लौट आईं. यहां आकर पता चला, गैंगरेप के चलते वो प्रेगनेंट हो गई हैं. डायना नन थीं. अबॉर्शन करवाना उनकी धार्मिक चेतना के विरुद्ध था. मगर वो उस यातना की निशानी को जन्म नहीं देना चाहती थीं. उन्होंने गर्भपात करवा लिया.

इसके बाद शुरू हुआ डायना का मिशन

उन्होंने ठान लिया कि वो अपने साथ हुए अपराध के भागीदारों का पर्दाफ़ाश करेंगी. इस केस का समूचा ब्योरा जमा करेंगी. यहीं पर सामने आई CIA की भूमिका. कैसे? डायना को टॉर्चर करने में ग्वाटेमाला के तीन सैनिक शामिल थे. इनके अलावा एक चौथा आदमी भी था. उसे बाकी लोग ‘अलज़ेन्ड्रो’ कहकर बुला रहे थे. उसके बोलने का लहजा अमेरिकन था. डायना की किडनैपिंग के दूसरे दिन ये अलज़ेन्ड्रो टॉर्चर कैंप आया था. उसने ग्वाटेमालन सैनिकों से कुछ सीक्रेट बात की. इसके बाद वो डायना के पास आया. बोला-

सॉरी, आपको ग़लतफ़हमी में पकड़ लिया गया था. चलिए, मैं आपको एक सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचा देता हूं.

अलज़ेन्ड्रो ने डायना को एक कार में बिठाया. डायना को यकीन था कि सेफ़ पैसेज़ के नाम पर वो उन्हें ठिकाने लगाने जा रहा है. रास्ते में एक जगह कार ट्रैफ़िक सिग्नल पर रुकी. मौका देखकर डायना कार से कूद पड़ीं. वो घंटों एक दुकान में छुपी रहीं. बड़ी मुश्किल से उन्होंने चर्च के अपने साथियों से संपर्क किया. उन्हीं की मदद से वो अमेरिका आ सकीं.

डायना को यकीन था कि हो-न-हो. वो अलज़ेन्ड्रो और कोई नहीं, CIA का ही एजेंट था. उसकी आधिकारिक पहचान के लिए डायना ने ‘फ्रीडम ऑफ़ इन्फॉर्मेशन ऐक्ट’ के तहत आवेदन डाला. मगर बात नहीं बनी. जस्टिस डिपार्टमेंट से भी डायना को मदद नहीं मिली. हारकर 1996 के साल डायना वाइट हाउस के बाहर धरने पर बैठ गईं. उनका एक ही सवाल था-

मुझे टारगेट क्यों किया गया, इसका जवाब चाहिए मुझे. बताओ कि ग्वाटेमाला के जिस डिटेंशन कैंप में मुझे टारगेट किया जा रहा था, वहां एक अमेरिकी नागरिक क्या कर रहा था? उस टॉर्चर कैंप तक उसकी पहुंच कैसे थी?

अमेरिकी सरकार झूठा बताकर डायना को डिस्क्रेडिट करने की कोशिश करने लगी. टॉर्चर होने की उनकी कहानी को फ़र्जी साबित किया जाने लगा. ये कोशिशें कामयाब भी हो जातीं शायद, अगर अमेरिकी मीडिया ने ये मुद्दा ज़ोर-शोर से न उठाया होता. इस मामले ने इतना तूल पकड़ा कि सरकार को झुकना पड़ा. अमेरिकन गवर्नमेंट को ग्वाटेमाला में CIA की भूमिका से जुड़े गोपनीय दस्तावेज़ पब्लिक करने पड़े. और इस तरह सामने आई अमेरिकी सरकार द्वारा ग्वाटेमाला में करवाए गए ख़ौफ़नाक अपराधों की कहानी. आगे चलकर UN के एक आयोग ने भी इसकी पुष्टि की. इसने अपनी रिपोर्ट में ग्वाटेमाला के अमानवीय घटनाक्रम में CIA समेत अमेरिकी सरकार की कई शाखाओं की मिलीभगत का पूरा कच्चा-चिट्ठा दुनिया के सामने रखा.

सिस्टर डायना की कहानी विस्तार से जाननी हो, तो उनकी लिखी क़िताब पढ़िए. इसका नाम है- दी ब्लाइंडफोल्ड आइज़: माय जर्नी फ्रॉम टॉर्चर टू ट्रुथ. इसे पढ़िएगा और उस साहसी महिला के ज़ज्बे को सैल्यूट कीजिएगा. अपनी ही सरकार से लड़कर उसका पर्दाफ़ाश करने, उसे शर्मसार करने की हिम्मत हर किसी में नहीं होती.


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