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एमबीबीएस कॉलेज से बाहरी जीवन तक पहुंचने की कहानी - धुंध

कानपुर स्थित युवा साहित्य प्रकाशन से लेखिका नीलम शर्मा की एक किताब आई है जिसका नाम है ‘धुंध’. ‘धुंध’ में नीलम शर्मा ने एमबीबीएस कॉलेज में स्टूडेंट्स की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द अपनी कहानी बुनी है. पढ़िए इस नीलम शर्मा की पुस्तक ‘धुंध’ का ये अंश –

धुंध

नीलम शर्मा

 

अनुराधा सिंह उर्फ अनु किताबों को अपने सीने से चिपकाये हुए तेज कदमों से लगभग भागती हुई सी कॉलेज की सीढियां चढ़ रही थी. पांच फीट पांच इंच लम्बी, गोरी, दुबली-पतली अनु नीली जींस और ब्लैक शर्ट में किसी का भी ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकती थी. आज उसका कॉलेज में पहला दिन था और पहले दिन ही वह आधा घंटा लेट हो गयी थी. वह तेजी से सीढियां चढ़ती हुई अपने क्लासरूम की ओर जा रही थी, तभी सामने से आते हुए किसी से टकरा गयी, उसकी किताबें जमीन पर बिखर गयीं थीं. उसने देखा सामने से टकराने वाला युवक उसके कॉलेज का ही स्टूडेंट था. वह चिल्लाकर बोली – “देखकर नहीं चल सकते आप!”

युवक बोला – “सॉरी मैं तो देखकर ही चल रहा था. मगर आप ही इतनी तेजी से आ रही थीं कि मुझे देख नहीं पायीं.”

अनु ने घूरकर उसकी ओर देखा.

युवक मुस्कुराया और उसने अपना हाथ अनु की ओर बढ़ाया “दिवाकर सिन्हा, सेकंड ईयर स्टूडेंट ऑफ एमबीबीएस.”

अनु ने भी बात को बढ़ाना उचित नहीं समझा, उसे ऐसे भी देर हो रही थी, अपना हाथ आगे बढाते हुए बोली – “अनुराधा सिंह फ्रॉम लखनऊ फर्स्ट इयर स्टूडेंट ऑफ मेडिकल.”

“ओह गुड”, दिवाकर बोला “इसका मतलब मैं आपका सीनियर हुआ.”

अनु – “जी”

दिवाकर – “कॉलेज कब ज्वाइन किया आपने?”

अनु – “आज पहला ही दिन है और पहले ही दिन आधा घंटा लेट हो गयी हूं.” अनु रुआंसी सी हो गयी.”

दिवाकर – “कोई बात नहीं, आज तो बस इंट्रोडक्शन क्लास ही होगी, आप परेशान न हों, आराम से क्लास में जाएं.”

अनु – “ओके थेंक यू. अब मैं चलती हूं बाय …….”

दिवाकर – “बाय अनुराधा, नाइस टू मीट यू !”

अनु मुस्कुराई और अपने क्लासरूम की ओर चली गयी. यह दिवाकर और अनुराधा की पहली मुलाकात थी. अनु के क्लासरूम में पहुंचने से पहले ही क्लास स्टार्ट हो चुकी थी. प्रो. वर्मा सभी स्टूडेंट्स का इंट्रोडक्शन ले रहे थे. अनु चुपचाप पीछे की सीट पर जाकर बैठ गयी. प्रो. वर्मा ने एक नजर अनु की ओर देखा और फिर व्यस्त हो गये.

कॉलेज आते-जाते अनु की दिवाकर से अक्सर मुलाकात हो जाती थी. अनु दिवाकर को देखकर हल्के से मुस्कुराती और फिर आगे बढ़ जाती. दिवाकर के मन में कई बार आया कि वह अनु को रोककर उससे बात करे, मगर अनु को रोकने का साहस वह नहीं कर पा रहा था. वह सिर्फ उसे आते-जाते हुए देखता रहता.

एक दिन शाम को जब अनु कॉलेज से हॉस्टल पहुंची तो उसने दिवाकर को अपने रूम में कुर्सी पर बेठा हुआ देखा. उसे दिवाकर को यहां देखकर आश्चर्य हुआ. वह हैरान होते हुए बोली – “आप यहां सर”

दिवाकर उसकी हैरानी को समझ गया और बोला –

“मुझे यहां देखकर आश्चर्य में पड़ गयी अनुराधा! तो अब तुम्हें ऐसा आश्चर्य प्राय: होता ही रहेगा. तुम्हारी रूममेट नीरा मेरी कज़िन है और मैं उससे मिलने अक्सर यहां आता रहता हूं. मगर यह मुझे बिलकुल भी नहीं पता था कि तुम नीरा की रूममेट हो. मैं तुमसे यहां पर पहली बार मिल रहा हूं.

तभी नीरा ट्रे में तीन कप चाय लेकर आ गयी. वह मुस्कुराते हुए अनु से बोली –

“अनु तुम मेरे भइया से मिलो. ये दिवाकर भइ्या हैं, फर्स्ट ईयर के टॉपर हैं भइया, और भइया ये अनु है मेरी प्यारी सी दोस्त और रूममेट.”

दिवाकर- “नीरा, मैं तुम्हारी रूममेट से पहले ही मिल चुका हूं.”

नीरा – “कहां भइया ?”

दिवाकर ने नीरा को अपनी और अनु की मुलाकात के बारे में बताया तो तीनों हंसने लगे.

नीरा – “अनु तुम्हें अगर अपनी स्टडी में कोई भी प्रॉब्लम हो या फिर किसी भी चीज की जरूरत हो तो तुम निःसंकोच दिवाकर भइया से कह सकती हो. मेरे हर मर्ज की दवा हैं भइया.

अनु – “बिलकुल, तुम्हारे दिवाकर भइया की कभी जरूरत पड़ेगी तो जरुर बताउंगी.”

दिवाकर- “तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है अनुराधा, वैसे अगर तुम्हें कोई ऐतराज न हो तो मैं तुम्हें अनु कह सकता हूं?”

अनु – “जी, मुझे अच्छा लगेगा.”

इस मुलाकात के बाद दिवाकर अक्सर अनु के हॉस्टल आ जाता था. एक दिन शाम के समय नीरा कहीं बाहर गयी थी और अनु अपना सिर पकड़े अपनी किताबों में उलझी हुई थी. तभी दिवाकर ने दरवाजा नॉक किया. अनु ने उठकर दरवाजा खोला, देखा सामने दिवाकर खड़ा था.

“हेलो अनु कैसी हो?” दिवाकर ने गर्मजोशी से कहा. “नीरा नहीं दिखाई दे रही है.” उसने चारों तरफ देखकर कहा.

अनु – “नीरा श्वेता के पास गयी है उसे कुछ काम था उससे, अभी थोड़ी देर में आ जाएगी. आप बेठिये.”

दिवाकर अंदर आ गया और बेठते हुए बोला –

“तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है अनु? कोई प्रॉब्लम तो नहीं हो रही किसी सब्जेक्ट को लेकर?”

अनु – “ठीक चल रही है, मगर बायोकेमिस्ट्री में मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है. मैं पिछले दो घंटे से एक ही टॉपिक पढ़ रही हूं मगर मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है. पता नहीं कैसे होगा यह सब मुझसे.”

दिवाकर – “तुम परेशान मत हो अनु, मुझे बताओ कौन सा टॉपिक?”

अनु ने किताब लाकर दिवाकर के सामने रख दी. उसने किताब देखी और बोला –

“ये चैप्टर तो बहुत इज़ी है अनु, मैं तुम्हें अभी समझा देता हूं.”

दिवाकर ने बहुत ही आसानी से पूरा चैप्टर अनु को समझा दिया. अनु खुश होती हुई बोली –

“माई गॉड! आपने कितनी आसानी से समझा दिया सर, मैं इसे लेकर शाम से परेशान थी. क्लासरूम में जब मैंने त्रिपाठी सर से पूछा था तो कहने लगे, अभी नयी हो, रूम पर जाकर सेल्फ स्टडी करो, सब समझ में आ जायेगा. ”

दिवाकर – “कोई बात नहीं अनु, तुम बिलकुल परेशान मत होना. तुम्हें जहां भी समझ में ना आये, मुझे बताना. मैं स्वयं आकर तुम्हें पढ़ा दिया करूंगा. और हां अनु, यह सर मत कहा करो, मुझे अनकम्फर्टेबल लगता है. बस दिवाकर कहा करो.” कहकर दिवाकर हल्के से हंसा.

अनु – “थेंक यू _…….. दिवाकर.”

उसके बाद दिवाकर लगभग हर रोज अनु के हॉस्टल आने लगा. अनु को भी जब कभी कुछ पूछना होता तो वह दिवाकर को कॉल करके बुला लेती या फिर दिवाकर खुद ही आ जाता था. धीरे धीरे दिवाकर और अनु का यह रोज का रूटीन सा बन गया था. शाम को दिवाकर अनु के पास आ जाता. एक-दो घंटे दोनों साथ पढ़ाई करते, उसके बाद दोनों कभी कैंपस में तो कभी कैंपस से बाहर खाली सड़कों पर देर तक घूमते रहते. अनु खुश थी कि दिवाकर की वजह से उसकी पढ़ाई अच्छी हो रही थी और दिवाकर खुश था कि उसे अनु का साथ मिल जाता था. दिवाकर किसी न किसी बहाने अनु से मिलने आ जाता और फिर देर तक उसके साथ रहने की कोशिश करता. नीरा इस बात को समझ रही थी. वह दिवाकर को कहना तो चाहती थी, मगर जाने क्या सोचकर चुप रही?

समय तेजी से बीत रहा था. अब एनुअल एग्जाम करीब आ गये थे. दिवाकर अनु की पढ़ाई पर बहुत अधिक ध्यान देने लगा था. इस कारण उसको अपनी पढ़ाई भी प्रभावित हो रही थी, मगर दिवाकर खुश था कि वह अनु को वक्त दे पा रहा है. वह अनु से कहता कि “तुम्हारी फर्स्ट ईयर क्लास में कोई न कोई रैंक जरुर आएगी’ अनु को खुश देखकर दिवाकर को बहुत खुशी मिलती थी. एग्जाम की तैयारी के लिए कॉलेज एक महीने के लिए बंद कर दिया गया था. अब दिवाकर का अधिक से अधिक समय अनु के साथ ही बीतने लगा था. इस कारण दिवाकर अपनी पढ़ाई बिलकुल भी नहीं कर सका था. और जब रिजल्ट आया तो अनु के अस्सी प्रतिशत मार्क्स आये जबकि टॉप करने वाला दिवाकर मुश्किल से पास हो पाया था.

दिवाकर के खराब मार्क्स देखकर उसके सभी दोस्त हैरान थे. वे इसकी असली वजह समझते हुए भी दिवाकर से कुछ कह नहीं पाते थे, मगर जब नीरा से रहा नहीं गया तो उसने एक दिन मौका देखकर दिवाकर से कह ही दिया, “दिवाकर भइया, अनु की वजह से आप अपना करियर मत खराब करो, इस सबसे आपके हाथ कुछ नहीं आएगा. आप अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. उसकी मदद के कारण अपना करियर बर्बाद कर लेना कहां तक सही है भइया?”

दिवाकर – “नीरा ऐसा कुछ नहीं है, तुम गलत समझ रही हो. मैं उसकी थोड़ी सी मदद करने की कोशिश कर रहा हूं बस और कुछ नहीं है. तुम चिंता मत करो देखना फाइनल ईयर में मैं फिर से टॉप करूंगा.”

नीरा – “ईश्वर करे ऐसा ही हो!”

रिजल्ट आने के बाद कॉलेज की छुट्टियां हो गयी थी. सभी लोग अपने-अपने घर चले गये थे. नीरा और अनु भी अपने घर चलीं गयीं थीं. मगर दिवाकर इस बार छुट्टियों में घर नहीं गया. वह हॉस्टल में ही रुक गया था. दिवाकर का सोचना था कि इस बार घर जाकर समय खराब नहीं करूंगा, बल्कि हॉस्टल में रहकर अपनी पढ़ाई करूंगा.

गर्मी के मौसम में दिल्ली में शामें अक्सर सुहावनी हो जाती हैं. दिन भर की उमस के बाद शाम को पश्चिमी हवाएं वातावरण को सुखद बना देती हैं. मगर जब किसी अपने की कमी महसूस होने लगे तो वही शामें जैसे गुजरने का नाम ही नहीं लेती, बल्कि काटने को दौड़ती हैं. ऐसा ही कुछ हाल दिवाकर का था. दिवाकर की शामें प्राय: अनु के साथ ही गुजरती थीं.

कभी अनु को पढ़ाते हुए तो कभी उसके साथ कैंपस की खाली सड़कों पर घूमते हुए. जब अनु चली गयी तो दिवाकर की शामें खाली रहने लगी. उसे अनु की कमी खलने लगी थी. उसे पहली बार अनु के लिए अपने दिल में बेचैनी महसूस हो रही थी. वह घबरा गया कि कहीं वह उससे प्यार तो नहीं करने लगा है. वह बेसब्री से एक-एक दिन गिनकर अनु के लौटने का इंतजार करने लगा. मगर जब उससे रहा नहीं गया तो उसने अनु को फोन करने का निर्णय लिया कि आज वह अपनी बात अनु से जरुर कहेगा, सोचकर दिवाकर ने अनु के फोन पर कॉल लगाई मगर अनु का फोन बंद आ रहा था. दिवाकर का मन नहीं माना तो उसने अनु को उसके घर के फोन पर कॉल लगाई. कॉल अनु ने ही रिसीव की, बोली – “हैलो, हू इज स्पीकिंग ?”

दिवाकर – “अनु मैं दिवाकर बोल रहा हूं. कैसी हो तुम?”

अनु – “मैं ठीक हूं दिवाकर.”

दिवाकर – “अनु कब तक वापस आ रही हो? अनु अब जल्दी वापस आ जाओ, तुम्हारे बिना यहां सब खाली-खाली लग रहा है. अनु मैं हॉस्टल की छत पर अकेला बैठा चांद को देख रहा हूं. बादलों के बीच घिरा चांद बहुत खूबसूरत लग रहा है. अनु तुम भी अपनी छत पर आ जाओ और देखो चांद कितना खुबसूरत है! अनु हम दोनों एक साथ चांद देखते हें, मुझे लगेगा मैं चांद के साथ तुम्हें देख रहा हूं, मैं तुम्हें महसूस कर लूंगा अनु.” दिवाकर और भी जाने क्या क्या कहता जा रहा था ?

दिवाकर की बातों से अनु घबरा गयी थी. इससे पहले दिवाकर ने कभी भी उससे इस तरह की बातें नहीं की थी. दिवाकर को बातें उसे समझ में नहीं आ रहीं थीं. आज उसका व्यवहार भी अनु को बदला हुआ सा लग रहा था. अनु अब दिवाकर से और बात नहीं करना चाहती थी बोली –

“दिवाकर मम्मी आ रही हैं, अभी मैं फोन रखती हूं.” अनु ने बहाना बनाकर फोन रख दिया.

अनु के लिए ये दिवाकर का बिलकुल नया रूप था. दिवाकर के इस रूप से अनु को थोड़ा सा डर लगा. दिवाकर अनु को अच्छा लगता था, मगर एक दोस्त से ज्यादा उसके बारे में उसने कभी नहीं सोचा था. अनु परेशान सी काफी देर तक दिवाकर के बारे में सोचती रही, मगर उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. फिर अनु ने सोचा, “अभी बीस दिन की छुट्टियां बची हुई हैं अगर दिवाकर फिर से इस तरह की बात करता है तो मुझे उसे स्पष्ट बता देना होगा कि मैं उसके बारे में एक दोस्त से ज्यादा कुछ भी नहीं सोचतीं हूं. एक निर्णय पर पहुंचकर अनु अपने कमरे में सोने चली गयी.

दिवाकर ने आवेश में आकर अनु को फोन तो कर दिया था मगर अनु से बात करने के बाद उसे घबराहट महसूस हो रही थी. “पता नहीं वह क्या क्या सोच रही होगी मेरे बारे में.” दिवाकर परेशान सा बहुत देर तक हॉस्टल की छत पर टहलता रहा फिर उसने अपने पेंट की जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाई और छत के एक किनारे खड़े होकर पीने लगा. वह सोचता रहा, मगर अब तीर कमान से निकल चुका था और उसे वापस नहीं लाया जा सकता था.

वह नीचे कमरे में आ गया और किताब उठाकर कुछ पढने की कोशिश करने लगा, लेकिन पढ़ाई में उसका मन नहीं लग रहा था. वह जाकर बिस्तर पर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा. मगर नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी. दिवाकर पूरी रात बिस्तर पर करवटें बदलता रहा.

अनु सुबह सोकर उठी तो एकदम तरोताजा थी. आज उसकी ममेरी बहन सारिका उसके पास आने वाली थी. वह उसके स्वागत की तैयारियों में लग गयी. दिवाकर की बात उसके दिमाग से निकल चुकी थी. थोड़ी देर बाद सारिका आ गयी और अनु उसके साथ बातों में व्यस्त हो गयी. सारिका आई.आई.टी. मुम्बई से बी.टेक. कर रही थी. दोनों अपने अपने हॉस्टल से जुड़े अनुभव एक दूसरे को बताने लगीं.


प्रकाशक- युवा साहित्य प्रकाशन, कानपुर

मूल्य-175


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