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मुझे पछतावा बस धोनी पर ख़ुद के क्रूर होने का है

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No son of bitch that ever won the Nobel Prize ever wrote anything worth reading afterwards.

1954 में हेमिंग्वे ने एक इंटरव्यू में जब ये कहा, तब तक उन्हें नोबेल मिलने की कोई बात सुनाई नहीं दी थी. फिर उसी साल ये हुआ कि हेमिंग्वे को साहित्य का नोबेल मिल गया. किताब थी- द ओल्ड मैन ऐंड द सी. इसके बाद फिर कभी हेमिंग्वे ने कोई उपन्यास नहीं लिखा. कोई फिक्शन नहीं लिखा. शायद इस डर से भी न लिखा हो कि अब वो पहले जैसा न लिख पाएं. शायद फिर कोई नया बेस्ट न बना पाएं. एक मास्टरपीस गढ़ देने से वाहवाही तो मिलती है. मगर उस हासिल किए हुए से और आगे, और ऊंचा जाने की उम्मीदों का बोझ भी तो होता है. उम्मीद उपजाऊ होती है. बोझ बोझ होता है, अवांछित.

10 जुलाई को हुए इंडिया- न्यू ज़ीलैंड मैच में आउट होकर पवेलियन लौटते धोनी
10 जुलाई को हुए इंडिया- न्यू ज़ीलैंड मैच में आउट होकर पवेलियन लौटते M S Dhoni

24 घंटे होने को हैं. मगर धोनी का वो रन आउट, कांख में बल्ला दबाए मैदान से लौटते धोनी का चेहरा आंख से ओट नहीं हुआ. नाक के एक बगल से सांस में ऑक्सिजन भरते हैं. नाक के दूसरे बगल से वो कार्बन डाई ऑक्साइड होकर निकल जाता है. एक में जीवन है, एक में उसका विसर्जन. दोनों इतने अगल-बगल. सेकंड के किसी सूक्ष्म हिस्से से बिल्कुल आगे-पीछे. समझ नहीं आ रहा, धोनी की वो तस्वीर दोनों में से क्या है? जीवन या विसर्जन? वो जो भी है, साथ है. रहेगी.

फोटो: इंडिया टुडे
फोटो: इंडिया टुडे

शायद 2004 का साल था, जब धोनी ने अपना पहला नैशनल वन-डे खेला था. झारखंड बन चुका था तब. उस वक़्त हम बिहारियों के पास क्या था? लोग कहते थे- बिहार में बस दो चीजें बची हैं, एक बाढ़ दूसरी बालू. और ऐसे में आए धोनी. रांची का लड़का. जिसके घरवाले कभी उत्तराखंड के होते थे. झारखंड और उत्तराखंड, दोनों का दावा था उस लड़के पर. एक कहता, हमारा है. दूसरा कहता- असली में तो हमारा है. बिहार को इस दावे में भी हिस्सा नहीं मिला. लेकिन अभाव किसी के देने का इंतज़ार नहीं करता. उसमें उतना सब्र नहीं होता. तो हम बिहारी मान बैठे. धोनी अपना है.

बड़ों की ये हालत थी. हम तो फिर बच्चे ठहरे, ऐसी भावनाओं पर बच्चों का कॉपीराइट होता है. तो यूं ‘हमारे यहां का’ वाले इस अल्हड़पने से मुहब्बत शुरू हुई. जिससे मुहब्बत होती है, उसकी सामान्य सी हरकतें भी अदा लगती हैं. जैसे, धोनी का ग्लव्ज उतारकर विकेट के पीछे वो आधी खड़ी आधी बैठी मुद्रा में हिलना. विकेटकीपिंग में इतना सौंदर्य होता है, ये पहले कभी महसूस नहीं हुआ. ‘सचिन है न’ वाले भरोसे का दौर अतीत हो जाने की घड़ी में भी धोनी सबसे बड़ी राहत थे. सचिन के ‘शानदार खिलाड़ी, बुरा कप्तान’ वाले मलाल के सामने भी धोनी हिमालय होते गए. जितनी मुश्किल, उतना शांत. आपा नहीं खोना, प्रेशर में नहीं आना. फिर टी-20 वर्ल्ड कप और 2011 वाली हिस्ट्री. धोनी वाली लिस्ट लंबी होती गई.

कोहली के साथ धोनी (फोटो: इंडिया टुडे)
कोहली के साथ धोनी (फोटो: इंडिया टुडे)

यूं ही होते-होते कितना आगे आ गए न हम. सिल्की लहराते बालों वाले माही से सफ़ेद दाढ़ी वाले एम एस तक. ‘कौन है गर्लफ्रेंड’ से शादी की तस्वीरों और फिर जीवा के साथ खेलते हुए उसके विडियोज़ तक. कितनी आबाद जर्नी देखी है हमने. इस सफ़र का गर्व गीता का ज्ञान वाली आत्मा सा है. अजर-अमर. न आग इसे जला सकती है, न पानी इसे भिगो सकता है. ये मोहनजोदाड़ो की सभ्यता है. 5000 बरस बाद भी इसके निशान बचे रहेंगे, ये तब भी सिलेबस में पढ़ाई जाएगी.

‘हम दिल दे चुके सनम’ में वनराज एक केस का क़िस्सा सुनाता है. केस, जिसमें साबित करना होता है कि जो सीढ़ियां नीचे से ऊपर जाती हैं, वही सीढ़ियां ऊपर से नीचे आती हैं. फिल्म का सीन, वनराज की इस बात में सबको हास्य दिखता है. शायद देखने वालों को भी दिखा हो. मुझे छोड़कर. मुझे जाने क्यों इतनी सामान्य बात सुनकर भी अलग सी एक घबराहट हुई थी. वैसी ही घबराहट जैसी मैदान पर सचिन के आख़िरी दिनों में होती थी. वैसी ही, जैसी अब धोनी के लिए हो रही है. पिछला कुछ वक़्त धोनी के लिए भारी था. मगर क्या ये सीढ़ियां नीचे जाने सा भार है? पता नहीं. हो सकता है, ऐसा न हो. वो वक़्त आने में अभी देर हो. मगर हो सकता है, सीढ़ियां सच में नीचे लौट रही हों. ऐसा हो भी अगर, तो क्या ये इंसानी नहीं होगा?

धोनी, जर्सी नंबर 7 (फोटो: इंडिया टुडे)
धोनी, जर्सी नंबर 7 (फोटो: इंडिया टुडे)

मुझे पछतावा बस ख़ुद के क्रूर होने का है. इतनी क्रूरता कि फॉर्म में न होने, पहले की तरह न खेल पाने के लिए उसको कोस दिया. उसकी खिल्ली उड़ाई! मेरी खिल्लियों का भी भार होगा कल उसपर, जब वो रन आउट होकर मैदान से लौट रहा था. मुझे अफ़सोस है. मैं शर्मिंदा हूं. धोनी की उस तस्वीर ने मुझे छोटानागपुर की जंगली लाल चींटियों की तरह भमोर लिया है. मैं कल से सोच रही हूं, आख़िरी बार उसके मैदान से लौटने के पल का संवेग कैसा होगा? ठीक-ठीक तो नहीं पता, मगर वो बिना शक़ बुढ़ापे जितना क्रूर होगा. सब कुछ पहला सा क्यों नहीं हो जाता, ये वाला कष्ट होगा उसमें. शायद यही सब सोचते हुए हेमिंग्वे याद आए थे. बेस्ट से बेस्ट क्या दोगे ख़ुद को? दुनिया को? बेस्ट तो खुद सुपरलेटिव होता है.

धोनी इन ऐक्शन (फोटो: इंडिया टुडे)
धोनी इन ऐक्शन (फोटो: इंडिया टुडे)

धोनी का क्रिकेट बचा है अभी. उसकी एक्सपायरी डेट नहीं आई अभी. हम इतना करें कि भरोसा रखें. उस इंसान में इतना स्वाभिमान है कि जिस दिन उसे अपने अंदर का खिलाड़ी थका महसूस होगा, उस दिन वो बाय बाय करता हुआ चल देगा. और जाने की उस घड़ी में उसके चेहरे पर एक सुंदर हंसी होगी. होठों से बढ़कर आंखों की पुतलियों तक फैली हुई.


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