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ज़ोरदार किस्साः कैसे बलराज साहनी जॉनी वॉकर को फिल्मों में लाए!

ये कहानी शुरू होती है जब बलराज साहनी छह महीने जेल में रहकर आए थे. जेल गए थे क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. नारे लगा रहे थे, पुलिस ने पकड़ लिया और छह महीने जेल में रहे. इस बीच भी कभी-कभार बाहर जाने की अनुमति मिलती थी.

बलराज साहनी के मन में हमेशा समाज, पॉलिटिक्स, एक्टिंग और फिल्मों को लेकर कई-कई तरह के विचार आते रहते थे. वे बहुत ज्यादा सोचते थे. अपनी आत्म-आलोचना बहुत करते थे. जब कुछ सहन नहीं कर पाते थे तो बोल देते थे. हालांकि जब गलत होते थे तो मानते थे कि उन्होंने गलती की. जेल गए उससे पहले फिल्म इंडस्ट्री और लोगों का रवैया उनके प्रति कुछ और था, लेकिन जेल में रहने के दौरान उन्हें इस दुनिया का दूसरा ही चेहरा देखने को मिला. इस दौरान किसी ने उनके परिवार की वित्तीय मदद नहीं की. जब वे एक दिन के लिए जेल से बाहर आए होते तो लोगों की आंखें उन्हें काटने को दौड़ती थीं, उनकी फुसफुसाहट उन्हें जलाती थी.

लौटे तो बलराज बहुत गुस्से से भरे हुए थे. वे मानसिक और शारीरिक रूप से थके हुए थे. वे भारतीय जननाट्य मंच के प्रमुख सदस्य हुआ करते थे लेकिन अब वहां के लोग भी उन्हें पसंद नहीं करते थे. उनकी नजरों में बलराज गद्दार थे. खैर, अब बंबई का फिल्म उद्योग ही उनके लिए ले-देकर आखिरी डेस्टिनेशन था. तब प्रोड्यूसर के. आसिफ के साथ उनकी फिल्म ‘हलचल’ (1951) की शूटिंग चल ही रही थी जिसमें वे जेलर का रोल कर रहे थे और दिलीप कुमार, नरगिस, जीवन अन्य भूमिकाओं में थे.

बलराज ने इसी शूट के दौरान पहली बार बदरू को देखा था.

शूटिंग के बीच लंच टाइम होता तो कई बार दिलीप कुमार, के. आसिफ और टीम के अन्य लोग उसे बुलाते थे. वो एक्सट्रा था. अपनी मिमिक्री से उन सबको हंसाता था. शराबी की एक्टिंग बहुत अच्छे से करता था. फुटपाथ पर सामान बेचने वालों या देसी दवाइयां बेचने वालों की आवाजें भी बहुत अच्छे से निकालता था.

एक दिन बलराज किन्हीं चीजों को लेकर बहुत ज्यादा निराश हो गए थे. बेचैनी इतनी पढ़ गई कि उनकी इच्छा हुई किसी से बात करें ताकि मूड बदले. वे बदरूद्दीन के पास गए और अपना दिल उसके आगे खोलकर रख दिया. उन्होंने फिर बदरू से भी पूछा, “तुमको ये लोग यहां कितना रुपया देते हैं?” उसने कहा, “दिन के पांच रुपये, जिसमें से सप्लायर एक रुपया ले लेता है.”

बलराज ने पूछा, “क्या इन चार रुपयों में उन मिमिक्री वाले एक्ट की फीस भी शामिल है जो तुम यहां करते हो?” इस पर शर्मिंदा होते हुए बदरू ने कहा, “अरे नहीं!” उस पर बलराज ने कहा, “तो फिर तुम्हे शर्म नहीं आती इन लोगों के सामने गधे की तरह व्यवहार करते हुए?” बलराज जेल के समय की अपनी कड़वाहट निकाल रहे थे लेकिन बदरू ने कहा, “आप ठीक कहते हैं साहब! लेकिन मैं लाचार हूं. मैं इन बड़े लोगों को नाराज तो नहीं कर सकता न.” इस पर बलराज साहनी बोले, “बकवास! मैं देखता हूं कि तुम्हे वैसा काम यहां मिले जैसे के तुम हकदार हो. बस उससे पहले ये जरूरी है कि तुम अपने अंदर के टैलेंट की कद्र करना सीखो. ये यहां बैठे निठल्ले लोग इस टैलेंट की प्रशंसा करने की काबिलियत नहीं रखते.”

ये बात तो आई-गई हो गई और बदरू छोटे-मोटे काम करके अपने परिवार का पेट पालता रहा जो इंदौर से बंबई अपने परिवार के साथ आया. पिता मिल में काम करते थे. जब काम करने लायक नहीं रहे तो घर बैठ गए. अब ये बदरू नाम का युवक ही था जो अकेला घर चलाता था. बेस्ट की बसों में कंडक्टर का काम करने से लेकर फुटपाथ पर सामान बेचने जैसे कई काम उसने किए. इस दौरान बलराज साहनी अपनी मोटरसाइकिल पर माहिम इलाके से गुजरा करते थे जहां नुक्कड़ पर या इधर-उधर बदरू दिख जाया करता था. कई बार वो उन्हें रोकता भी और याद दिलाता कि आपने मुझे क्या वायदा किया था. इस पर बलराज यकीन दिलाते कि वे भूले नहीं हैं.

लेकिन जल्द ही वो मौका भी आया.

‘नीचा नगर’ (1946) के डायरेक्टर चेतन आनंद ने अपने छोटे भाई देव आनंद के साथ मिलकर नवकेतन फिल्म्स बैनर शुरू किया था. इसी के तहत वे ‘बाज़ी’ नाम से फिल्म बनाना चाह रहे थे. इसमें देव आनंद हीरो का रोल करने वाले थे. गुरु दत्त ने इसकी कहानी लिखी थी और वे ही इसे डायरेक्ट करने वाले थे. इसका स्क्रीनप्ले लिखने के लिए बलराज साहनी को लाया गया. बलराज ने इसे लिखने के लिए छह महीने का टाइम लिया. गुरु दत्त बेसब्र हो रहे थे कि फिल्म जल्द से जल्द शुरू करें लेकिन बलराज ने अपना टाइम लिया क्योंकि उन्हें पता था कि एक बार शूटिंग शुरू होने के बाद उन्हें अपने पात्रों और स्क्रिप्ट के साथ कुछ भी करने को नहीं मिलेगा.

इस स्क्रिप्ट को लिखते हुए बलराज ने एक किरदार बदरू के लिए खासतौर पर लिखा. ये शराबी का कैरेक्टर था जिसे करने में बदरू उस्ताद था. अब बलराज ने रोल तो लिख लिया था लेकिन दिक्कत ये थी कि प्रोड्यूसर और डायरेक्टर को कैसे मनाएं इस कैरेक्टर को लेकर.

बहुत सोचने के बाद बलराज को एक जोरदार आइडिया आया. उन्होंने बदरू को बताया और दोनों रेडी हो गए. अगले दिन चेतन आनंद, देव आनंद, गुरु दत्त और बलराज चेतन के कैबिन में बैठे थे और ‘बाज़ी’ की स्क्रिप्ट पर बातें कर रहे थे तभी उन्हें बाहर ऑफिस में शोर सुनाई दिया. बताया गया कि एक शराबी जबरदस्ती अंदर घुस आया है और वो क्लर्क लोगों को परेशान कर रहा है. अब वो शराबी कैबिन के दरवाजे तक पहुंच गया था. फिर वो अंदर आ गया और सीधे देव आनंद के पास चला गया और बकवास करने लगा.

ये आदमी शराब के नशे में अपनी बेइज्जती करवा रहा था जिसे देखना वहां मौजूद सब लोगों के लिए बहुत ज्यादा मज़ेदार था. करीब आधे घंटे तक कैबिन वाले सब बड़े लोग हंसते-खिलखिलाते रहे. अपनी बातों से वो सबको एंटरटेन करता रहा. आखिर में चेतन को लगा कि अब बहुत हो चुका है. उन्होंने बोला कि इसको उठाकर बाहर फेंक दो. और यही वो पल था जब बलराज साहनी ने बदरू को कहा कि अपने दर्शकों को अब सलाम पेश करो!

और ये क्या, ये शराबी एक क्षण में सामान्य हो गया. उसमें बदलाव इतनी तेजी से हुआ कि बलराज साहनी के सब साथी अपनी आंखों पर यकीन नहीं कर पा रहे थे. सबके मुंह खुले के खुले रह गए. चेतन अब बलराज की ओर विस्मय से देखने लगे. तो उन्होंने बताया कि ये एक परफॉर्मेंस था और ये सारा करतब एक नाटक था जो उन सब लोगों को बदरू का टैलेंट दिखाने के लिए किया गया था. बस फिर क्या था, चेतन ने वो रोल तुरंत बदरू को दे दिया.

बस इस दिन के बाद बदरू को जिंदगी में पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ी. फुटपाथ पर सामान बेचने और स्टार लोगों के आगे विदूषक बनकर तसरने वाले इसी युवक को बाद में जॉनी वॉकर के नाम से जाना गया. बलराज साहनी ने याद किया था, “बस यहीं से बदरू के शानदार करियर की शुरुआत थी. उसके लाखों फैन उसे जॉनी वॉकर के नाम से जानते हैं. बाज़ी रिलीज होने के बाद जॉनी वॉकर को कभी पलटकर देखना नहीं पड़ा. इस फिल्म में शराबी का छोटा सा रोल उसे लाइमलाइट में ले आया और एक ही साल के अंदर वो सफलता के शीर्ष पर पहुंच गया. उसकी लोकप्रियता इतनी हो गई कि इस दौड़ में उसने मुझे बहुत-बहुत पीछे छोड़ दिया.”

बाद में जॉनी वॉकर ने करीब 300 फिल्मों में काम किया. करियर के शुरुआती दौर में ऐसी कोई बड़ी फिल्म नहीं थी जो उन्हें कास्ट किए बिना पूरी हो जाती हो. फिल्म में हीरो की कास्टिंग बाद में होती थी और जॉनी की पहले. 1951 में शुरू हुआ उनका फिल्म करियर 1997 में रिलीज हुई कमल हसन स्टारर ‘चाची 420’ तक चला. अपनी इस आखिरी लोकप्रिय फिल्म में भी वे शराबी मेकअप आर्टिस्ट के रोल में ही नजर आए और खूब हंसाकर गए.

हिंदी सिनेमा के प्रमुख कलाकारों में से एक जॉनी हमें बलराज साहनी की ही देन हैं.

फिल्म चाची 420 में जॉनी वॉकर और कमल हसन.
फिल्म चाची 420 में जॉनी वॉकर और कमल हसन.

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