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भोजपुरी अश्लील गाने: सिंगर कल्पना पटवारी को मुन्ना पांडे का जवाब

भोजपुरी संगीत में अक्सर पाई जाने वाली अश्लीलता की जवाबदेही तय हो रही है.

भोजपुरी गानों की गायिका कल्पना पटवारी पर अश्लीलता फैलाने के आरोप और जवाब में उनके लिखे आर्टिकल ने इधर माहौल गरमा दिया है. डबल मीनिंग गानों की वजह से भोजपुरी की गिरती साख पर बहस हो रही है. साथ ही इसकी जवाबदेही भी तय करने की कोशिश हो रही है. इसी क्रम में कल्पना पटवारी भी निशाने पर हैं. खुद पर हुए हमलों के जवाब में कल्पना पटवारी ने एक आर्टिकल लिखा, जो ‘दी लल्लनटॉप’ अपने पाठकों को पढ़वा चुका है. उस आर्टिकल के जवाब में दिल्ली यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, डॉक्टर मुन्ना पांडे ने भी कुछ लिखा है. हम आपको वो भी पढ़वा रहे हैं. हर बहस के तमाम पक्षों को स्पेस देने की लल्लनटॉप की परंपरा आगे भी जारी रहेगी. पढ़िए डॉक्टर मुन्ना पांडे का कल्पना पटवारी को जवाब:

कल्पना जी, इसी लल्लनटॉप पर हिंदी में और डेली ओ पर अंग्रेजी में आपका जवाब पढ़ने को मिला. आपके जवाब का इंतजार था. थोड़ी देर हुई लेकिन कोई बात नहीं. चलेगा. आपने जवाब से ज्यादा बचाव में हथियारों का इस्तेमाल किया है और आखिर में कहा है कि आपने सम्मान खोया ही नहीं तो क्यों उसकी वापसी के लिए कोशिश की जाए, जबकि आपके जवाब सिर्फ और सिर्फ बचाव के हथियार की तरह हैं.

हम भोजपुरीभाषी यह पहले से जानते हैं कि तीन कुतर्की हथियार हैं आपके पास. आप उन्हीं तीनों का इस्तेमाल करेंगी. वही आपकी सीमा होगी.

एक तो आपने कहा है कि आप स्त्री हैं, इसलिए विरोध हो रहा है.
दूसरी जगह आपके सिपहसलार ने कहा सिर्फ स्त्री नहीं, पिछड़ी जाति की हैं.
अब आगे एक हथियार है कि आप अल्पसंख्यक हैं, इसलिए आप पर हमले हो रहे हैं.

आपको लग रहा होगा कि भावुकता के ये सारे हथियार बहुत मजबूत हैं, जो आपका बचाव भी करेंगे और आप सामनेवाले को चूपवा भी देंगी. लेकिन जैसे आपके पहले के सारे ​हथियार फुस्स हुए हैं, उससे ज्यादा भोथरे और जंगदार हथियार हैं यह सब. इसमें ही आपने जोड़ दिया है कि आपकीे लोकप्रियता के कारण हमले हो रहे हैं. आपको तो मालूम ही होगा कि आपके ही सौजन्य से कहा गया था कि भोजपुरी भाषा जंग लगी हुई भाषा थी, जिसे आपके आने के बाद धार मिली. जिन लोगों ने भोजपुरी को जंग लगी हुई भाषा कहा था, उन्होंने तो 24 घंटे के अंदर ही अपनी बात वापस ले ली. यकीन कीजिए, भोजपुरी तो जंगदार भाषा साबित नहीं हो सकी आपके सिपहसलारों के कुतर्क से, लेकिन आपके सारे हथियार, तथ्य और तर्क, दोनों से जंगदार साबित होंगे.

कल्पना की निंदा कर रहे वर्ग का कहना है कि वो सामाजिक स्वीकार्यता के लिए भिखारी ठाकुर जैसी भोजपुरी अस्मिता का इस्तेमाल कर रही हैं.

कल्पना जी, आपने कहा है कि एक गैंग द्वारा आपको निशाना बनाया जा रहा है. क्या आपने या आपके लोगों ने सोशल मीडिया को अच्छे से नहीं देखा? जिस दिन एक अखबार में यह बात छपी कि आप ना होती तो भिखारी को कौन जानता और आपके आने से पहले भोजपुरी जंग लगी हुई भाषा थी, वह तो कल्पना के सौजन्य से धार मिली, तो उस दिन अखबार को घेरनेवाले और इस पर प्रतिक्रिया देने वाले कौन लोग थे? फिर से देखिएगा, किसी ने कमेंट को हटाया नहीं है. जौहर शफियाबादी, ध्रुव गुप्त से लेकर न जाने कितने ऐसे लोग थे, जिन्होंने इसकी नींदा की थी. ऐसे ही कई मौके आए हैं, जब भोजपुरीभाषी एक मंच पर आ जाते हैं. आप कह रही हैं कि आपने 16 साल भोजपुरी को दिए हैं और बतौर कलाकार जैसे आपके लिए 30 भाषाएं हैं, वैसी ही एक और भाषा भोजपुरी है. लेकिन जरा फर्क है. भोजपुरी भाषा के रूप में एक अलग विस्तार लिए हुए है.

आपको तो मालूम ही होगा कि अभी देश में 23 जिले हैं, जो भोजपुरीभाषी हैं. इन जिलों की डेमाग्राफी देखी हैं कभी? कहां से कहां तक और कैसे आड़े-तीरछे हैं. यहां से वहां तक. बीच में दूसरी भाषा के इलाके आते हैं और फिर भोजपुरी. दरअसल भौगोलिक तौर पर बिखराव होने के बावजूद इन 23 जिलों में, दुनिया के कई देशों में और देश के कई शहरों में भोजपुरी भाषियों को एक समुदाय के रूप में जोड़े रहने का काम यह भाषा ही करती रही है.

आपके सौजन्य से, आपकी खुशामदी में इस भाषा की जीवंतता, सक्रियता और अस्मिता पर प्रहार हुआ था तो एक बड़े अखबार को कोसने में, उसे अपने वाक्य वापस लेने को बाध्य करने के लिए कितने लोग सामने आए थे, देख लीजिएगा. ऐसी बातें नहीं कर पाएंगी. आपके लिए 30 अन्य भाषाओं की तरह भोजपुरी भी अपना नाम कमाने और दाम बनाने का एक जरिया है, जो इस माटी में जन्मे—पले हैं, उनके लिए यह माई भाषा है, अस्मिता और पहचान की रेखा. माई भाषा जानती हैं न!

आरोप है कि कल्पना ने भोजपुरी में जैसे गाने गाए हैं और अब जो वो कह रही हैं, उसमें जमीन-आसमान सा अंतर है.

कल्पना जी, आपने कहा है कि आप स्त्री हैं, इसलिए आप पर हमले हो रहे हैं. गजब की बात की हैं आप. आप तो ऐसे कह रही हैं जैसे आप पहली महिला कलाकार हैं, जो गैर भोजपुरी होकर भोजपुरी गायकी कर रही हैं इसलिए सबको परेशानी हो रही है. आपको विंध्यवासिनी के बारे में तो मालूम ही होगा. आपने तो 16 साल दिए हैं. पांच दशक होने को हैं, शारदा सिन्हा इस भाषा से एकाकार होकर इसे सिर्फ समय ही नहीं दे रहीं, अपनी पूरी उर्जा, अपनी पूरी निष्ठा इसे दे रही हैं. विजया भारती भी कलाकार हैं. वे भी भोजपुरी भाषी नहीं हैं. भोजपुरी गाती हैं. कभी इन महिला कलाकारों पर इस तरह के आरोप लगे या इनका विरोध हुआ?

अगर किसी कलाकार के स्त्री होने से या गैर भोजपुरी होने से उसका विरोध होना होता, तो आप तो सिर्फ 16 सालों से अपना समय दे रही हैं, छह सात दशक से ये कलाकार भोजपुरी की सेवा कर पूरी दुनिया में उंचाई पर ले जा रहे हैं. शारदाजी तो एक धारा के खिलाफ ही ‘जगदंबा घर में दियारा बार अईनी हे’ गीत लेकर आयी थी और तब से न जाने कितने भोजपुरी गीतों को कितनी ऊंचाई दी. पूरी दुनिया में फैलाया. और यह कोई अनहोनी बात नहीं. कलाकार के लिए भाषा से ज्यादा महत्वपूर्ण भाव होता है.

शारदा सिन्हा, भोजपुरी गायकी का बड़ा नाम.

कल्पना जी, कोक—वोक स्टूडियो का हवाला जैसा आपने कुछ दिया है. मेघाश्रीराम डाल्टन को तो जानती ही होंगी. जरूर जानती होंगी. एक ही पेशे में हैं और मेघा भी देश में जानी जाती हैं. अपने तरीके की अनोखी और जानदार शानदार गायिका हैं. मेघा आपसे पहले कोक स्टूडियो गई थीं और माटी के इन्हीं गीतों को लेकर. सुन लीजियेगा. ‘ओही रंगरेजवा रंग हई चुनरिया’ वाला गाना गाया था. उस गीत की मिठास और अंदाज गजब का है. मगही, पलमुआ और भोजपुरी के मिलानवाला गीत है वह. यह काम आपके पहले भी हुआ, आपने भी किया. यह भी कोई अजूबा जैसा नहीं कि इसके बिना पर आप भोजपुरी पर एहसानी भाषा का इस्तेमाल कर दें.

कल्पना जी, आपने कहा है कि आपको ही निशाना बनाया जाता है. सिर्फ आपका ही विरोध होता है. गजब की बात कर रही हैं आप. आपके सलाहकार असल में भोजपुरी में चल रहे प्रयासों से बेपरवाह है. उन्हें नहीं मालूम कि विरोध का यह स्वर कब से उठ रहा है. विरोध का यह स्वर तो बालेश्वर के समय से उठा था. रांची के मेकॉल हॉल में 70 के दशक में बालेश्वर जैसे ही मोटका मुंगड़वा गीत गाना शुरू किए तो विरोध हुआ, आयोजन बंद हुआ. परिवार के संग चल रहे लोगों ने इसे बंद करवाया. हालिया दिनों के विरोध से भी अनभिज्ञ हैं आपके सलाहकार. 

विनय बिहारी एंड कंपनी पर मुकदमा चल रहा था अश्लील गीत के मामले में. अश्लीलता मुक्त भोजपुरी एसोसिएशन यानि अंबा ने मुकदमा किया था आरा में. मालूम करना चाहिए. आपको पता ही होगा कि कुछ माह पहले अंबा ने उसी आरा में खुशबू उत्तम का किस तरह से विरोध किया था, जिसके बाद खुशबू ने वहीं कहा कि वे ऐसा नहीं करेंगी और फिर जैसे ही आरा से पटना पहुंची, अपना स्वर बदल लिया.

खुशबू उत्तम.

फेसबुक देखिएगा, खुशबू का विरोध आपसे कोई कम नहीं हुआ था. सासाराम के ताराचंडी महोत्सव में विनय बिहारी के साथ क्या हुआ था पता कीजिएगा और अभी हाल में जीयर स्वामी के यज्ञ में पवन सिंह के साथ वहां उनके अपने ही शहर आरा के मंच पर से किस तरह से उतारने के लिए पब्लिक खेमे से शोर हुआ, पता कीजिएगा. पिछले साल जब मनोज तिवारी ने ​दिल्ली की शिक्षिका के साथ बदतमीजी की तो विरोध करनेवाले वही लोग थे जो आज आपका विरोध कर रहे हैं. मनोज तिवारी की कुंडली को बांचा गया था. सब दर्ज है.

आपके सहयोगी तो अब यह भी लिख रहे हैं कहीं कि सिर्फ महिला होने की वजह से नहीं, बल्कि पिछड़ी जाति की महिला होने की वजह से आपका विरोध हो रहा है. कितनी जाहिल टाइप बात कर रहे हैं आपके सलाहकार! उन्हें मालूम नहीं कि भरत शर्मा को सर आंखों पर बिठाया जाता है. वे भी पिछड़ी जाति से आते हैं. राम कैलाश यादव को उनके अपने जीवन में कितना सम्मान मिला, यह मालूम नहीं उन्हें. ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं.

हाहाहा, कल्पना जी, एक और गजब की बात कही है आपने! आपने कहा कि आपकी सफलता से लोग परेशान हैं. अभी आप भोजपुरी लोकमानस में शारदा सिन्हा की तरह तो नहीं रची बसी हैं न! उनका विरोध कभी किसी ने क्यों नहीं किया? या आपको भ्रम हो गया है कि आप शारदा सिन्हा से भी ज्यादा मान सम्मान के साथ भोजपुरी लोकमानस में रच बस गई हैं.

भिखारी ठाकुर भोजपुरी में एवरेस्ट जैसा स्थान रखते हैं.

कल्पना जी, आपने कहा कि आप भिखारी के गीतों को देश दुनिया और क्षेत्रीय स्तर पर फैला रही हैं. छोड़ देते हैं साहित्यिक दुनिया, शोध की दुनिया. गीतों की दुनिया पर ही बात करते हैं. आपको नहीं मालूम कि देवी ने कितने साल पहले भिखारी के गीतों पर काम शुरू किया था और गाया था. उस समय यूट्यूब आदि इतना मशहूर नहीं था लेकिन सीडी कैसेट के जरिये देवी के गीत भी आपसे कोई कम लोकप्रिय थोड़ी हुए थे या कि उसका प्रसार कम थोड़ी हुआ था? देवी की पहचान की रेखाओं में एक रेखा भिखारी के गीतों को गाना भी है.

शारदा सिन्हा तो बिदेसिया के गीत वर्षों पहले से गाती रही हैं. किस किस तरह का भ्रम पाल रखा है आपने कि आप पहली गायिका हैं जो गायकी की दुनिया में भिखारी के गीतों को लोकप्रिय करवा रही हैं. आप भिखारी ठाकुर का ‘भि’ भी नहीं शुरू की थी तब से नामचीन कलाकार गा रहे हैं उनके गीत और लोकप्रिय बना रहे हैं. आपके सिपहसलार आपको भ्रम में रख रहे हैं या कि आप खुद ही भ्रम के अंधेरे में मगन हैं?

आपने कहा है कि गांव की महिलाएं आपको भजन के कारण याद करती हैं. आप भजन के कारण जानी जाती हैं गांवों में. उसी कारण लोकप्रिय हैं. तो इसे खुली चुनौती ही मानिए कि कभी किसी रोज बैठकर कहीं किसी गांव में, कस्बे में, महिलाओं से पूछते हैं. आपके गीतों की चर्चा करते हैं. वे किस तरह से रिएक्ट करती हैं आपके गीत पर और आपको किस गीत के कारण जानती हैं, यह कभी आजमा लीजिएगा. चुनौती है. सच यही है कि आपने पुरूषों की सेक्सुअल कुंठा को शांत करने के लिए गीत गाए और पुरुष भोजपुरी हो या गैर भोजपुरी, अपनी महिलाओं की भावनाओं को रौंद मजा लेता रहा. उसे ही आप श्रोताओं की डीमांड कह रही हैं. मर्दवादी कुंठा को शांत करने के लिए स्त्री के अंग-अंग को रौंदनेवाले गीतों को गाकर आप उसके पाप से मुक्त होने के लिए स्त्रियों की पसंद और उनके बीच अपनी लोकप्रियता और पहचान को ला रही हैं.

कल्पना का दावा है कि उन्हें स्त्री होने की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है.

कल्पना आप कह रही हैं कि क्यों सिर्फ गानेवाले को दोषी माना जाए, लिखनेवाले और सुननेवाले को नही माना जाए. बेशक. आपने नहीं देखा क्या कि किस तरह से उन्हें दोषी माना जा रहा है और आज से नहीं, कई सालों से वे निशाने पर आ रहे हैं. बेशक, सबका विरोध होना चाहिए और हो रहा है लेकिन कोई आपकी तरह ढिठाई से तारनहार बनने की कोशिश नहीं कर रहा. आप तो कभी कह रही हैं कि आप अर्थ नहीं जानती थी तो गा दिया. कभी कह रही हैं कि आप कामुक गीत गाते हुए आनंदित होती हैं. कभी कह रही हैं कि श्रोता और गीतकार जिम्मेवार हैं. हम अच्छा काम कर रहे हैं तो उस पर बात करें. आप रोज अपनी बातें बदलती हैं. आप अच्छा काम कर रही हैं तो उस पर बात करें तो इस फार्मूले पर देखेंगी तो अपने देश में न जाने कितने पापी, कुकर्मी हैं जो अपना फेसवैल्यू बनाने के लिए अच्छा काम करते हैं और असल काम उनका कुछ और होता है.

आप अच्छा कर रही हैं तो अच्छा ही करने का वादा करें न! कहें तो एक बार कि जो किया उसके लिए ग्लानी है, माफी चाहती हूं, आगे नहीं करूंगी. वह भूल थी. आप तो हर बार कहती हैं और फिर तुरंत स्त्री के अंग को छेदने लगती हैं अपने गीतों से. ऐसा इसलिए करती हैं कि पैसे की चाहत ज्यादा है. आपके साल भर भोजपुरी के सरकारी-गैर सरकारी कार्यक्रम चाहिए. उसे लेने के ​लिए आप हर साल अश्लील गंदे गीत गाती रहती हैं, ताकि बाजार बना रहे. पिछले 16 साल से आप वही कर रही हैं. भोजपुरी का इस्तेमाल, शोषण और दोहन.

अब तो यह साबित भी हो गया, क्योंकि इधर कई बार आप भोजपुरी पर एहसान करने जैसी बातें प्रकारांतर से कह रही हैं. और इतने के बाद आप चाहती हैं कि आप साल में अपने बाजार को और शो-कंसर्ट को अपने खाते में करने के लिए जो गा रही हैं, उस पर ध्यान ना देकर अब लोग सिर्फ आपके अच्छे कामों को लेकर चालीसा गान करें. जिन्हें चालीसा गान करना है, जिन्हें आपसे मतलब है, स्वार्थ है, वे कर रहे हैं. जिसे अपनी भाषा से मतलब है, जिसकी अपनी भाषा भोजपुरी है, वह ऐसा नहीं कर सकता. वह अपनी भाषा से ज़्यादा प्यार करेगा, आपसे ज़्यादा.

और हां, कल्पना जी, आखिरी बात. अब आगे स्त्री होने की वजह से वाला तर्क नहीं लाइएगा. आप तो कहती हैं कि अंग्रेजी साहित्य से ग्रेजुएट हैं. आपको नहीं मालूम क्या कि लोकभाषा को सृजने, गढ़ने, बढ़ाने में स्त्रियों की ही भूमिका सबसे ज़्यादा होती है. लोकभाषा के शब्द स्त्रियां ही ज्यादा जनमाती हैं. चाहे वह कोई लोकभाषा हो. स्त्रियां ही लोकगीतों की रचयिता भी रही हैं. पारंपरिक शैली के गीतों में लगभग सारे के सारे गीत स्त्रियों के ही हैं, स्त्रियां ही गायन करती रही हैं. पचरा, कजरी, सोहर, विवाह गीत, रोपनी-सोहनी गीत से लेकर पुरबी तक में जाइयेगा. लोकगीत स्त्रियों की चीज है. स्त्रियों की उसी परंपरा पर महज पैसा बनाने के लिए, अपना नाम चमकाने के लिए आप अपने गीतों से प्रहार कर रही हैं, ध्वस्त कर रही हैं, स्त्रियों का मान मर्दन कर रही हैं, इसलिए आपका विरोध हो रहा है, स्त्री होने की वजह से नहीं.

कल्पना पटवारी के लिखे इसे लेख का ही जवाब दिया है मुन्ना पांडे ने:

मेरे भोजपुरी गानों में अश्लीलता कौन तय करेगा : कल्पना पटवारी

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