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अगर ये कदम उठाए गए तो दिल्ली को स्मॉग से छुटकारा मिल सकता है

दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में जिस स्मॉग ने परेशानी पैदा की है, उसके पीछे की एक बड़ी वजह पराली जलाने से निकले धुएं को माना जा रहा है. लेकिन ये इकलौती वजह नहीं है. फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकलता धुंआ, सड़कों पर दौड़ती और धुआं उड़ाती बड़ी-बड़ी डीजल गाड़ियां और कार-बाइकों से निकलने वाला धुआं और बड़े पैमाने पर चल रहा कंस्ट्रक्शन भी इस स्मॉग के लिए उतना ही जिम्मेदार है. कार-बाइक, ट्रकों और फैक्ट्रियों पर अंकुश लगाने में नाकाम सरकारों के पास आरोप लगाने के लिए बचते हैं किसान, जो सरकार और कोर्ट की रोक के बावजूद पराली जलाने को मजबूर हैं. सरकार की ओर से सख्ती दिखाए जाने और पराली जलाने के आरोप में गिरफ्तार किए जाने पर किसानों का सीधा सा सवाल है-

“अगर पराली जलाकर धान को न निकाला जाए, तो हम गेहूं की फसल कहां बोएंगे. अगर गेहूं नहीं बोया, तो घरों में भूखे मरने की नौबत आ जाएगी.”

किसानों का ये सवाल भी उतना ही जायज़ है, जितना पराली जलाने से निकले धुएं से हो रहा प्रदूषण. इस बात को सुप्रीम कोर्ट में भी रखा जा चुका है.

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दिल्ली-एनसीआर में स्मॉग की एक वजह पराली भी है.

शायद सरकार और लोग इस बात को समझ भी रहे हैं. इसलिए हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस दिक्कत से निपटने के तरीके खोजने पर बात करते है.

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हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल .

लेकिन इसके अलावा और भी कोशिशें हो रही हैं या हो सकती हैं, जिन्हें लागू कर दिया जाए तो शायद दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों को इस स्मॉग से छुटकारा दिलाया जा सकता है.

ऐसी ही एक कोशिश आईआईटी बीएचयू भी कर रहा है.

आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने दो ऐसे फॉर्मूले खोजने का दावा किया है, जिससे पराली जलाने की दिक्कत खत्म हो जाएगी. बीएचयू आईआईटी के स्कूल ऑफ बायोकेमिकल इंजिनियरिंग के प्रो. प्रदीप श्रीवास्तव के मुताबिक बीएचयू अपने खोजे हुए फार्मूले का पेटेंट करवाने जा रहा है.

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आईआईटी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने पराली से एथेनॉल बनाने में सफलता हासिल कर ली है.

पहली तकनीक है यूटिलाइजेशन ऑफ राइस स्ट्रा

पहली तकनीक है यूटिलाइजेशन ऑफ राइस स्ट्रा. इसमें बैक्टीरिया का इस्तेमाल करके खेत में ही पराली से खाद तैयार की जा सकेगी. इसके लिए पराली को न तो खेतों से खोदना होगा और न ही गड्ढा खोदकर उसे दबाना होगा. लैब में इसकी टेस्टिंग हो चुकी है और इसका कमर्शल प्रोडक्शन भी.

दूसरी तकनीक है टेक्सोज और पेंटोस.

इसमें गेहूं और अरहर के डंठल का वाष्पीकरण कर उसमें हाइड्रोक्लोरिक एसिड और सोडियम हाइड्रोक्साइड मिलाया जाएगा. इसके बाद जाइनोमोनॉस नाम का बैक्टीरिया डाला जाएगा, जो इस पूरे घोल को एथेनॉल में बदल जाएगा. इस एथेनॉल को पेट्रोल या डीजल में मिलाकर गाड़ियों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. इस एथेनॉल का इस्तेमाल करने के लिए गाड़ियों के इंजन में भी किसी तरह का बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी.

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सरकार ने बीएस VI ईंधन को अप्रैल 2018 से ही इस्तेमाल करने का आदेश दिया है.

एक लीटर पेट्रोल या डीजल में 100-150 एमएल एथेनॉल मिलाया जा सकता है. इस तकनीक से एथेनॉल बनाने पर मुश्किल से लागत 20-25 रुपये प्रति लीटर आएगी. पराली से एथेनॉल तैयार करने के लिए प्लांट लगाने पर करीब 50 करोड़ रुपये का खर्च आएगा. पंजाब और हरियाणा में अगर ऐसे प्लांट लग जाएं, तो फिर किसानों को पराली जलाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. क्योंकि एक किलो पराली से 200 एमएल एथेनॉल तैयार किया गया है, जिसे अब लैब से बाहर निकालकर खेतों में इस्तेमाल करने की तैयारी चल रही है.

मशीनों का इस्तेमाल भी है बेहतर विकल्प

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हैप्पी सीडर मशीन पराली हटाने और गेहूं को बोने का काम एक साथ कर देती है.

पराली की दिक्कत को दूर करने के लिए कुछ किसान मशीनों का भी सहारा ले रहे हैं. ऐसी ही एक मशीन है हैप्पी सीडर, जो खेतों में लगी पराली के बीच में भी गेहूं के बीज बो देती है. इसे ट्रैक्टर के पिछले हिस्से में लगाया जाता है. जब गेहूं बोने के लिए मशीन खेत में उतरती है, तो ये पराली को काटते हुए चलती है और खाली पड़ी जगह पर गेहूं के बीज डालती रहती है. इस मशीन की लागत करीब एक से सवा लाख रुपये के बीच है, लेकिन छोटे और मझोले किसानों के लिए ये रकम काफी बड़ी होती है.

गाड़ियों में बीएस-VI तकनीक का इस्तेमाल

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भारत में चल रही अभी अधिकांश गाड़ियां बीएस III मानकों की ही हैं.

अपने देश में फिलहाल जो गाड़ियां चल रही हैं, उनमें से अधिकांश में बीएस III तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. बीएस का पूरा नाम बीएसईएस यानी भारत स्टेज इमिशन स्टैंडर्ड है, जो भारत सरकार की ओर से बनाया गया है. इसका मकसद गाड़ियों के धुएं से निकलने वाले प्रदूषण पर ध्यान रखना और उसे नियंत्रित करना है. भारत में पिछले साल से ही कोर्ट और एनजीटी ने बीएस III तकनीक की नई गाड़ियों के बेचने पर रोक लगा दी है और अब सिर्फ बीएस IV गाड़ियां ही खरीदी जा सकती हैं. वहीं अब बीएस IV से बढ़कर बीएस V और बीएस VI तकनीक भी आ गई है. बीएस V और बीएस VI की तकनीक में कोई खास अंतर नही है, इसलिए भारत में अब बीएस VI तकनीक का ही इस्तेमाल किया जाएगा, जिसे 2020 में भारत में लागू किया जाएगा. लेकिन दिल्ली और आस-पास के इलाकों में बढ़ते हुए प्रदूषण को देखते हुए सरकार ने अप्रैल 2018 से भारत में बीएस VI मानक के तेल का इस्तेमाल होने का फैसला लिया था.

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पराली से एथेनॉल बनने लगे या फिर हैप्पी सीडर के जरिए पराली लगने पर भी गेहूं की बुवाई की जा सके और गाड़ियों से निकलते धुएं को अगली साल तक नियंत्रित किया जा सके, तो शायद नवंबर 2018 दिल्ली और उसके आस-पास के लोगों के लिए उतना परेशान करने वाला नहीं होगा, जितना वो इस साल कर रहा है.


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