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वो कानून, जो पैसों के लिए बड़का 'शरलक होम्स' बनने वालों को रगड़ देता है!

 

“घर का भेदी लंका ढाए!”

विभीषण एक तरह से जासूस ही थे. यकीनन नेक काज के लिए ही सही, लेकिन उन्होंने अपने घर का भेद सामने वाली सेना को बताया था. विभीषण का ये उदाहरण ही अच्छी जासूसी की चौखट है, जिसके आगे जाने पर ये बुरी जासूसी हो जाती है, जिसका न काम अच्छा, न कारण.

इसी तरह की जासूसी को रोकने के लिए आजकल के जमाने में होते हैं कानून. दिल्ली के फ्रीलांस जर्नलिस्ट राजीव शर्मा को भी ऐसे ही कानून के तहत दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया है. ये कानून है ‘ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट’.राजीव पर आरोप है कि वह देश की सुरक्षा संबंधी तमाम जानकारियां ‘चाइनीज़ इंटेलिजेंस’ को पहुंचा रहे थे.

पत्रकार का मामला नटशेल में

19 सितंबर को दिल्ली पुलिस ने चीन की महिला किंग शी और उसके नेपाली सहयोगी शेर सिंह को गिरफ्तार किया. पुलिस का आरोप है कि ये दोनों फ्रीलांस जर्नलिस्ट राजीव शर्मा को देश की सुरक्षा संबंधी जानकारियां ‘चाइनीज इंटेलिजेंस’ को मुहैया कराने के बदले मोटी रकम देते थे. न्यूज एजेंसी PTI में दावा किया गया- गोपनीय जानकारियां देने के लिए राजीव शर्मा को डेढ़ साल में करीब 40 लाख रुपए दिए गए थे. वह एक जानकारी शेयर करने के बदले एक हज़ार US डॉलर लेते थे.

लुढ़कते-पुढ़कते यूं पका ये कानून

1889 का साल. भारत में अंग्रेजी शासन था. ये वही साल था, जब गुजरात के पोरबंदर में करमचंद उत्तमचंद गांधी और पुतलीबाई के घर बेटा पैदा हुआ था.

और वही साल, जब देश के अख़बार अंग्रेजी शासन के ख़िलाफ भूतो-न-भविष्यति अंदाज में मुखर होने शुरू हो गए थे. अख़बारों की आवाज को दबाने के लिए अंग्रेज एक कानून लाए- Official Secrets Act (Act XIV), 1889. सरकार को अगर लगता कि फलां व्यक्ति अंग्रेजों की ग़लत नीतियों को जनता के सामने ला रहा है, तो उसे इस कानून के तहत जेल में ठूंस दिया जाता था.

1904 में लॉर्ड करज़न के कार्यकाल में इस कानून को और सख़्त बनाया गया. नाम मिला- Indian Official Secrets Act (1904).

फिर 2 अप्रैल 1923 को इसके बदले Official Secrets Act आया. ये एक वेल-क्राफ्टेड एंटी-एस्पियोनाज़ (जासूसी के ख़िलाफ) एक्ट था. जासूसी से लेकर राष्ट्र-द्रोह तक की धाराएं इस कानून में रखी गईं. तबसे ये OSA-1923 अस्तित्व में है.

ओएसए के प्रावधान

अगर देश में या देश से बाहर रहने वाला कोई भारतीय नागरिक इनमें से किसी चीज की जासूसी करता है तो उस पर ओएसए लगता है–

# देश की आंतरिक जानकारियों या सुरक्षा से जुड़ा कोई डॉक्यूमेंट. कोई मॉडल.

# डिफेंस संबंधी कोई जानकारी.

# सरकारी दफ्तर की कोई जानकारी, कोई फोटोग्राफ.

# किसी सरकारी/गैर-सरकारी दफ्तर, जिसमें प्रवेश निषेध हो, में घुसना या घुसने का प्रयास करना.

इसके अलावा कानून के तहत चार कैटिगरी भी बनाई गई हैं– टॉप सीक्रेट, सीक्रेट, कॉन्फ़िडेंशियल और रेस्ट्रिक्टेड. मामले की संजीदगी के अनुसार कागजों को इनमें से किसी कैटेगरी में रखा जाता है. इनमें से किसी भी श्रेणी के कागज-पत्तर, मॉडल, फोटोग्राफ या किसी भी जानकारी की जासूसी की तो ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के दायरे में आ जाता है.

कितनी सज़ा?

अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रविरोधी नीयत से जासूसी में संलिप्त पाया जाता है और उस पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत केस साबित हो जाता है तो तीन साल से लेकर 14 साल तक की सज़ा हो सकती है.

OSA vs RTI

ओएसए को हटाने की मांग समय-समय पर उठती रही है. RTI आने के बाद से यह मांग और तेज हो गई है. दरअसल इन दोनों कानूनों के बीच एक टकराव है. RTI एक्ट सरकारी कागजों को सार्वजनिक करने के लिए लाया गया, जिससे जनता सरकार के कामकाज पर निगरानी रख सके और सवाल भी उठा सके. दूसरी तरफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट है, जो राष्ट्र-हित का हवाला देकर सरकारी कामकाज को सीक्रेट रखने के लिए है. 2015 में सरकार ने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट की जांच के लिए एलसी गोयल की अध्यक्षता में कमेटी बनाई थी. पर कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला.

RTI एक्ट की धारा 8(2) के अनुसार, ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के विरुद्ध जाकर सरकारी कागज़ात को पब्लिक किया जा सकता है. लेकिन ऐसा तभी किया जा सकता है, जब कागजों की सूचना को सार्वजनिक करना ‘पब्लिक इंट्रेस्ट’ में हो. मतलब आम जनता के हित में हो. लेकिन सारा खेल इसी ‘पब्लिक इंट्रेस्ट’ पर ही खेला जाता है. क्योंकि कौन सी चीज जनता के हित में है, कौन सी नहीं है, इसका ज़िक्र किसी कानून में नहीं है.

आया हूं तो किस्सा सुनाके जाऊंगा

पाठक कहता है कि ज्ञान मत दो, अपना ही नहीं झेला जा रहा. हमें किस्सा सुनाओ, तब्बी पल्ले पड़ेगा. हम कहते हैं- व्हाय नॉट.

तो जाते-जाते ओएसए से जुड़ा किस्सा सुन लीजिए. चित्तर वेंकट नारायण का. पॉपुलर नाम- कूमर नारायण. केरल के वडक्कनचेरी में पैदा हुआ. बॉम्बे की एक इंजीनियरिंग और ट्रेडिंग कंपनी का अधिकारी. 18 की उम्र में आर्मी की पोस्टल सर्विस में हवलदार बनता है. छह साल बाद उस सर्विस से निकला तो SLM मानेकलाल इंडस्ट्रीज में रीजनल मैनेजर बन जाता है. रिपोर्ट्स बताती हैं कि वो वाणिज्य मंत्रालय में सिविल सर्वेंट रहा. इससे उसकी जान-पहचान सरकारी महकमे में बढ़ गई. रीजनल  मैनेजर बनने के बाद करीब 20 साल तक उसने अलग-अलग देशों के अधिकारियों को भारत के डिफेन्स सीक्रेट बेचे.

बाद में इंटेलिजेंस ब्यूरो ने ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई.

1985 में गिरफ्तारी के बाद केस चला. फरवरी 1986 में कूमर नारायण ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. ये भी बताया कि उसने अपनी जासूसी से उस जमाने में लगभग 10 लाख डॉलर कमाए. 2002 में कोर्ट का फैसला आया. 13 लोग दोषी करार दिए गए. दोषियों को 10 साल से लेकर 14 साल तक सज़ा हुई. कूमर को सजा नहीं हुई, क्योंकि उनकी 2000 में मौत हो चुकी थी.

तो ओएसए की बात हमने बता दी. कूमर नारायण के बारे में और जानना हो तो यहां पढ़ सकते हैं.


चीन की ये कम्पनी भारत के 10 हज़ार से ज्यादा लोगों की जासूसी क्यों कर रही है?

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