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केजरीवाल खुद पर बनी इस फिल्म से ये पांच बातें सीख सकते हैं

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आगे की बात कहने से पहले एक याद साझा करूंगी. ये अन्ना आंदोलन के वक्त की बात है. उस अगस्त की. मैं दिल्ली में नहीं थी. यहां से करीब 640 किलोमीटर दूर थी. जिला चंबा के भरमौर शहर में. दोपहर की बात है. बाहर बूंदाबांदी हो रही थी. वहां एक मंदिर है. बहुत बड़ा. पुराना. किसी से भी पूछिएगा, बूढ़े देवदार वाला मंदिर कौन सा है. बता देगा. मंदिर पहुंचने का रास्ता बाजार से होकर जाता है. वहीं एक रेस्तरां था. छोटा सा. मैं वहां बैठी मैगी खा रही थी. तभी बाहर से आवाज आई. नारेबाजी की. 50-60 के करीब लोग रहे होंगे. उस संकरे बाजार में तिरंगा झंडा थामे जुलूस निकाल रहे थे. बारिश के नीचे. मैंने साफ सुना था. जिंदाबाद-जिंदाबाद. जन लोकपाल, जिंदाबाद. सोचिए. दिल्ली से इतनी दूर. ऐसे गली-कूचे में. क्या आंदोलन था न वो! क्या तो उसका चार्म था! क्या तो उसका असर था!


केजरीवाल जी,

ये मेरी जिंदगी का पहला ‘खुला खत’ है. हमने किसको वोट दिया, ये बताने की चीज नहीं. मगर यहां मैं शुरुआत में ही बता रही हूं. मैंने आम आदमी पार्टी को चार बार वोट दिया. विधानसभा में दिया. लोकसभा में दिया. नगर निगम में दिया. जब पार्टी के जीतने की उम्मीद थी, तब भी. जब हार पक्की थी, तब भी. आज की तारीख में अगर चुनाव हों, तो भी मैं आपके ऊपर ही भरोसा करुंगी. मेरा वोट AAP को ही जाएगा. इतने समर्थन के बाद भी मुझे आपसे कुछ शिकायतें हैं. मैंने एक डॉक्यूमेंट्री देखी है. एन इनसिग्निफिकेंट मैन. आपके और आपके साथ जुड़े लोगों की शुरुआती राजनीति की कहानी. वो जो शानदार सफर रहा, उसका किस्सा. मैं जानती हूं कि आप फिल्मों के शौकीन हैं. मैं चाहती हूं कि आप हर हाल में ये फिल्म देखें. देखें और समझें. कि कहां कमी रह गई. मैं बहुत ज्यादा मुद्दे नहीं गिनाऊंगी. जो भी कहूंगी, इस फिल्म से जुड़े दृश्यों से ही जुड़ा कहूंगी.

ये डॉक्युमेंट्री एक किस्म का नॉस्टेलजिया देती है आपको. बस AAP समर्थकों को नहीं, बल्कि ये बाकियों को भी देखनी चाहिए. ये समझने के लिए कि लोकतंत्र की ताकत कितने ऊपर की चीज है.
ये डॉक्युमेंट्री एक किस्म का नॉस्टेलजिया देती है. बस AAP समर्थकों को नहीं, बल्कि ये बाकियों को भी देखनी चाहिए. ये समझने के लिए कि लोकतंत्र की ताकत कितने ऊपर की चीज है. फिल्म का नाम भी एकदम सटीक है. एन इनसिग्निफिकेंट मैन. यानी, एक आम आदमी.

फिल्म की शुरुआत की बात है. आप मंच पर आते हैं. माइक के सामने. कई बातें कहीं आपने. उनमें से एक शब्द मेरे कान में रह गया. राजनीति का डिसेंट्रलाइजेशन. मतलब, सारी ताकत एक जगह जमा न हो जाए. आपसे पूछना है ये? इतने साल हुए, क्या ये ‘विकेंद्रीकरण’ हासिल कर लिया? और कहीं नहीं, तो अपनी पार्टी में? मुआफ कीजिएगा, मगर ऐसा लगता नहीं. आज AAP= केजरीवाल है. दिल्ली में, गोवा में, गुजरात में, पंजाब में, हर जगह बस केजरीवाल ही हैं पार्टी के पास. इतने सालों में आप कोई और चेहरा क्यों नहीं आगे बढ़ा सके? AAP में हर जगह बस आप ही आप क्यों हैं? क्या इसको आप विकेंद्रीकरण कहते हैं? सारी सत्ता, सारी ताकत का एक आदमी के हाथों में सिमट जाना! आप शायद कहें कि ये सच नहीं. मगर जहां से मैं देख रही हूं न सर, वहां से तो ऐसा ही दिखता है. (1)

केजरीवाल जी, ये डॉक्युमेंट्री देखते हुए कई बार मेरे रौंगटे खड़े हुए. पता है क्यों? मैंने आजादी की लड़ाई नहीं देखी. जेपी आंदोलन नहीं देखा. मगर मैंने आपका सफर देखा है. ‘एन इनसिग्निफिकेंट मैन’ देखते हुए उस सफर के कई यादगार हिस्से मेरी आंखों के आगे से गुजरे. फिल्म में खुद को सुनिएगा. तब, जब आप व्यक्तिवाद खत्म करने की बात कर रहे हैं. सर, आपको वो पल याद है? बहुत वक्त हो चला, तो शायद भूल गए होंगे. वरना ऐसा तो नहीं होता. बीजेपी से मोदी याद आते हैं. कांग्रेस से राहुल गांधी. समाजवादी पार्टी से मुलायम-अखिलेश. तृणमूल कांग्रेस से ममता बनर्जी. जनता दल (यूनाइटेड) से नीतीश. और सर, इसी पांत में हैं आप. AAP का नाम लो, तो बस आप ही याद आते हैं. क्या आप औरों जैसा बनने के लिए इस सिस्टम में घुसे थे सर? आप तो अलग करने आए थे न. (2)

आप फिल्म देखते हुए महसूस करेंगे कि संगठन की शक्ति क्या होती है. ये भी कि जनता के मन को छू लो, तो वो कैसे सिर-आंखों पर बिठा लेती है.
आप फिल्म देखते हुए महसूस करेंगे कि संगठन की शक्ति क्या होती है. ये भी कि जनता के मन को छू लो, तो वो कैसे सिर-आंखों पर बिठा लेती है.

फिल्म देखते वक्त मैं कई बार भावुक हुई. शायद आप भी भावुक हो जाएंगे. वो सीन देखिएगा. अनशन के दौरान आप कमरे में अकेले लेटे हैं. कुछ महिलाएं आपके पास आती हैं. कहती हैं:

हम आपके साथ हैं. आपको कुछ हुआ, तो हम भी जान दे देंगे. वायदा है हमारा.

मुझे यकीन है कि आप इस मुहब्बत, इस भरोसे से जुड़ी जवाबदेही समझते हैं. मेरा सवाल मगर इस जवाबदेही से नहीं जुड़ा है. कोई और जरूरी बात है. मान लीजिए कि मैंने और मेरे दोस्त ने मिलकर कोई मकान बनाया. दोनों ने अपनी पूंजी लगाई. मेहनत की. फिर मेरा किसी बात पर (या बातों पर) उस दोस्त से मतभेद हो जाए. ऐसे में क्या मुझे हक है कि मैं उसे घर से निकाल दूं? क्या घर पर उसका भी बराबर अधिकार नहीं? ये सवाल योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण से जुड़ा है. आपने उन्हें पार्टी से कैसे निकाला? उनका योगदान क्या आपके योगदान से कम था? पार्टी को खड़ा करने में उन्होंने क्या कम झोंका था? और क्या आपको नहीं लगता कि उनसे अलग होकर आपने बहुत कुछ खोया है? इस फिल्म को देखते वक्त याद कीजिएगा पिछला दौर. आप मंच पर होते थे और योगेंद्र पार्टी की जवाबदेही निभाते थे. (3)

2013 चुनाव से पहले एक जगह कार्यकर्ताओं को कह रहे थे योगेंद्र:

अरविंद केजरीवाल और AAP एक ही चीज हैं.

केजरीवाल जानते होंगे. उन्होंने जनता ने जितने खुले हाथों से दिया, वो हाल के सालों में किसी नेता को नसीब नहीं हुआ. उनका सफर ऐसा था, जैसे कोई अजनबी रात के दूसरे पहर दरवाजे पर आए और घर का मालिक, उसका पूरा परिवार अजनबी को गले लगा ले.
केजरीवाल जानते होंगे. उन्होंने जनता ने जितने खुले हाथों से दिया, वो हाल के सालों में किसी नेता को नसीब नहीं हुआ. उनका सफर ऐसा था, जैसे कोई अजनबी रात के दूसरे पहर दरवाजे पर आए और घर का मालिक, उसका पूरा परिवार अजनबी को गले लगा ले.

एक और सीन है. आपने चुनाव के लिए विज्ञापन तैयार कराया है. जो टीवी पर और इंटरनेट पर आएगा. योग्रेंद उसपर अपनी राय दे रहे हैं. कुछ कमियां नजर आईं उनको, मगर उनके शब्द ये थे:

केवल अरविंद भाई हों (ऐड में)

उस इंसान का चेहरा देखिएगा सर. उसमें जलन नहीं थी. भरोसा था. वो ही भरोसा वो कार्यकर्ताओं में बांट रहा था. वो आपको फोकस दे रहा था. सारी रोशनी आपके ऊपर जमा होने दे रहा था. आप थोड़े नाटकीय हो जाते थे. अब भी हो जाते हैं. (वैसे पिछले कुछ समय से कम किया है आपने इसको और मैं बहुत खुश हूं इससे). योग्रेंद व्यावहारिकता देखते थे. खरी-खरी कहते थे. आप जनता से वादे करते थे. और आपके वादों पर सफाई देने, उसे स्पष्ट करने की जवाबदेही निभाते थे योगेंद्र. आप कई बार जोश-जोश में अति उत्तेजित हो जाते थे. ऐसे में योगेंद्र जमीन पकड़कर रखते थे. वो आपका संतुलन थे सर. थिंक टैंक थे आपका. क्या उनको निकालने के बाद आपने कभी ये महसूस नहीं किया है सर? ऐसा क्यों है कि आप मतभेद बर्दाश्त नहीं कर पाते? क्यों मतभेदों का अंत अलगाव पर होता है? मतभेदों के बिना लोकतंत्र कैसा? (4)

कई लोग होंगे जो कहते होंगे कि उन्हें केजरीवाल से अब कोई उम्मीद नहीं रही. मगर मैं उस जमात का हिस्सा नहीं. मुझे उनसे बहुत उम्मीदें हैं. लोकतंत्र में इस उम्मीद के सिवा मेरे हाथ में कुछ और नहीं है. मैं उम्मीद नहीं छोड़ सकती.
कई लोग होंगे जो कहते होंगे कि उन्हें केजरीवाल से अब कोई उम्मीद नहीं रही. मगर मैं उस जमात का हिस्सा नहीं. मुझे उनसे बहुत उम्मीदें हैं. लोकतंत्र में इस उम्मीद के सिवा मेरे हाथ में कुछ और नहीं है. मैं उम्मीद नहीं छोड़ सकती.

एक और दृश्य है सर इसमें. रामलीला मैदान में आप CM पद की शपथ ले रहे हैं. योगेंद्र यादव नीचे हैं. बच्चों की उंगली थामे हुए. स्टेज से आपकी आवाज आती है. इंकलाब. नीचे खड़ा वो शख्स संगत देता है नीचे से. जिंदाबाद कहकर. आप लोगों को कसम दिलाते हैं. और आपके शब्दों को पीछे-पीछे दोहराने वालों में वो शख्स भी शामिल होता है. उसके होंठ आपके शब्द बुदबुदाते हैं. आप लोकतंत्र में बहुत यकीन रखते हैं न. तो फिर बताइए, ये कैसा लोकतंत्र है? मतभेद और विरोध होने पर बाहर का रास्ता दिखा देता है? ये आपकी बहुत बड़ी कमी है सर. आप शक आसानी से कर लेते हैं. आपका भरोसा बहुत जल्दी टूट जाता है. आपके अंध-विरोधियों की बात नहीं कर रही. मगर आपकी आलोचना करने वाला हर शख्स बुरा इंसान नहीं होता. समर्थक भी हो सकता है. मेरे जैसा. क्या फीडबैक देने वाला शक का पात्र हो जाता है? (5)

शायद अब आप समझ पाएं कि मैंने शुरुआत में ही क्यों साफ कर दिया था कि मैं AAP की वोटर हूं. मगर फिर भी आपकी कमियां साफ देख पाती हूं. इसीलिए कह रही हूं कि ये फिल्म देखने जरूर जाइएगा. उन पुराने दिनों को देखिएगा. याद कीजिएगा, कहां से शुरू किया था. क्यों शुरू किया था. और फिर खुद को नंबर दीजिएगा. आपको अभी और बेहतर होना है सर. पता है क्यों? क्योंकि आप इस राजनीति में ऐसे थे मानो कोई निरा अजनबी रात के दूसरे पहर किसी के दरवाजे पर दस्तक दे. और घर का मालिक मय परिवार बाहर आकर उसे सीने से चिपका ले. इतना प्यार बहुत कम नेताओं को नसीब होता है सर. वरना राजनीति और लोकतंत्र तो बहुत जालिम चीज है.


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