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दिल्ली चुनाव के बीच ये 'रिंकिया के पापा' की बात क्यों हो रही है?

दिल्ली चुनाव सामने है. सीएम कैंडिडेट पर चर्चा के बीच ‘रिंकिया के पापा’ भी चर्चा में है. इस भोजपुरी गाने ने हिंदी बेल्ट में पहले ही काफी धूम मचा रखी है. इस बार चर्चा में तब आया, जब सीएम अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी सांसद मनोज तिवारी के बारे में एक चुभने वाली बात कह दी. ताना मारा कि ये दिल्ली के सीएम कैंडिडेट बनेंगे, ‘रिंकिया के पापा’ गाना सुना है आपने…

पहले ‘रिंकिया के पापा’ गाने की चीर-फाड़

बहुत पॉपुलर भोजपुरी गीत है. क्या बच्चे, क्या बड़े, सबकी जुबान पर चढ़ चुका है. गाने के बोल में ‘रिंकिया’ के अलावा ‘जोतिया के पापा’ भी आता है. गांव-देहात में नाम के संबोधन में कई बार एक आकार एक्स्ट्रा लगा देते हैं. इसी से रिंकी  का रिंकिया  हुआ, ज्योति  का जोतिया हुआ. मनोज तिवारी ने गाया है. गाने के वीडियो एलबम में एक्टिंग भी की है.

म्यूजिक के बीच गाना इस लाइन से शुरू होता है:

चट दनी मार देलीं खींच के तमाचा
हीं हीं हीं हीं हंस देलीं रिंकिया के पापा

इस पूरे गाने को सुनकर मन में जो तस्वीर खिंचती है, वो इस तरह है. कोई गांव का भोला-भाला आदमी है, जिसे ‘मॉडर्न’ बीवी मिल गई है. बीवी ने किसी बात पर खींचकर तमाचा मार दिया और रिंकिया के पापा ने बस हंस दिया. वो महिला अपने पति को नाम लेकर बुलाती है. पति से ही चाय की फरमाइश भी करती है.

‘खींच के तमाचा’ में कोई हिंसा नहीं है. बस पति-पत्नी का प्यार है. ‘हीं हीं हीं हीं’ हंसने से ये बात साफ है. कुल मिलाकर, गीत में कुछ भी बुरा नहीं है. टोटल मस्ती है. तभी तो इतना पॉपुलर भी हुआ.

अब असल मुद्दे की बात

दरअसल, दिल्ली चुनाव को लेकर ये चर्चा हो रही है कि किस पार्टी से सीएम कैंडिडेट कौन होगा. AAP की ओर से सीएम उम्मीदवार कौन होगा, इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं बची है. लेकिन बीजेपी का स्टैंड अब तक साफ नहीं है. ये भी क्लियर नहीं है कि बीजेपी इस बार किसी चेहरे को सामने रखेगी या केवल पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर ही चुनाव लड़ेगी. इतना जरूर है कि बीजेपी से सीएम कैंडिडेट के जिन नामों पर अटकलें लग रही हैं, उनमें मनोज तिवारी का नाम ऊपर चल रहा है.

और अरविंद केजरीवाल को चुटकी लेने का मौका यहीं मिल जा रहा है. ये बीजेपी के सीएम कैंडिडेट बनेंगे… ‘रिंकिया के पापा’ गाना सुना है आपने.

क्या किसी का गायक-कलाकार होना लीडरशिप के लिए अयोग्यता है?

ये बेसिक सवाल है. क्या सीएम या पीएम बनने के लिए ये जरूरी शर्त है कि वो गायक या एक्टर न हो. या पहले कभी न रहा हो. क्या किसी की लीडरशिप क्वालिटी सिर्फ इस बात से आंकी जा सकती है कि उसने कितने गाने गाए हैं या कितनी फिल्मों में ठुमके लगाए हैं? कितनी हिट या फ्लॉप फिल्में दी हैं? कितनी ऊंची डिग्री ले रखी है?

दरअसल, ये राजनीति है. इसमें विरोधियों को किसी भी तरह घेरने की गलत ‘परिपाटी’ चल पड़ी है. कभी ये कहकर कि ये तो फिल्मों में नाचने-गाने वाली है. कभी ये कहकर कि ये तो गांव की महिला है. कभी ये कहकर कि इसे तो ढंग से साइन करना भी नहीं आता. असल सवाल गायब कि क्या इसमें लोगों को साथ लेकर चलने की क्षमता है? या क्या इसमें लोगों की बेहतरी के लिए योजनाएं बनाने और उसे जमीन पर उतार पाने लायक क्षमता है?

ऊंची डिग्रियों का नेतृत्व क्षमता से ताल्लुक है क्या?

चूंकि लोग किसी काम को आसान बताने के लिए बात-बात में कहते देते हैं, ‘ये कोई रॉकेट साइंस है क्या?’ इसलिए एक ऊंची योग्यता और कठिन काम का ही उदाहरण लेते हैं. मान लें कोई रॉकेट साइंटिस्ट है, तो उसे ग्रैविटी, ग्रैविटेशनल फोर्स, एस्केप वेलोसिटी, पीएसएलवी, जीएसएलवी जैसी असंख्य चीजों की बेहतर जानकारी होगी. रॉकेट के तमाम पार्ट-पुर्जे एक-दूसरे से किस तरह जुड़कर काम करते हैं, ये भी मालूम होगा.

लेकिन इससे क्या ये भी पता लगाया जा सकता है कि उसमें समाज के सभी तबके को सबको साथ लेकर चलने की कितनी क्षमता है. क्या इन योग्यताओं के आधार पर कोई ये कह सकता है, बड़े लाजवाब सीएम कैंडिडेट हैं, जरा देखिए, कितना बढ़िया रॉकेट साइंस जानते हैं.

हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि जिसकी पढ़ाई-लिखाई दुरुस्त है, जो दूरदर्शी है, देश-दुनिया के मुद्दों की बेहतर समझ रखता है और लोकप्रिय भी है, वो काबिल नेता हो सकता है. मतलब, जब नेता चुनने की बात हो, तो नेतृत्व क्षमता पर बात हो. रिंकिया के पापा  की बात करने से तमाम असली मुद्दे कहीं खो जाते हैं.


वीडियो- जब लल्लनटॉप अड्डा पर आये भोजपुरी सिंगर और BJP नेता मनोज तिवारी और हुआ बवाल

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