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देहातनामा 2 : जब लड़की पैदा होते ही 'मदार' का दूध पिलाकर मार डाला जाता था

डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता. लोक में खास दिलचस्पी, जो आपको यहां दिखेगी. अब से अमरेंद्र हर हफ्ते आपसे रू-ब-रू होंगे. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश है दूसरी किस्त:


अगर कहा जाय कि शहर में सब गलत, तो यह गलत. अगर कहा जाय कि देहात में सब सही, तो यह भी गलत. सही-गलत दोनों जगह. बात जगह से उतनी ज्यादा तय नहीं होती जितनी इंसान की मानसिकता से. समाज की सामूहिक चेतना से. कई बार एक ही सामाजिक बीमारी देहात में पुराने लक्षणों के साथ दिखती हैं तो शहर में पहुंच कर वही थोड़ी आधुनिक-सी होते हुए लोगों को जकड़े हुए मिलती हैं. बेटी के जन्म पर लोगों को मायूसी का करंट लगना भी एक ऐसी सामाजिक बीमारी है जिसका असर गांव हो या नगर, कहीं कम नहीं है. जैसे दूसरी कई चीजों का इतिहास और वर्तमान होता है वैसे ही इन सामाजिक बीमारियों का भी.

‘रे ललनवां’ की टेक लिए एक भोजपुरी ग्राम-गौनई है, बेटी के जन्म पर. भाव के हिसाब से इस गीत के तीन हिस्से हैं. पहले में, बेटी के पैदा हो जाने पर भयानक अफसोस है. हिंसक पछतावा है. दूसरे में, धीरे-धीरे बेटी के बड़े होने के साथ, सास-ननद का उससे लगातार जलना है. लेकिन माई-बाप का लगातार खुश होना भी. तीसरे में, बेटी के ब्याह के समय आई बारात की खुशी है जिसमें पूरा घर खुश है. इस मौके पर सास-ननद ने भी दिया जलाया है. इस गीत का पहला हिस्सा बेटियों के बारे में हमारे समाज के दकियानूसी कन्या-हंता सोच को जाहिर करता है. इस मानसिकता का सफाया आज भी कहां हुआ है!

dehaatnama

सोचिये कि अपने ही अंश को लेकर मनुष्य कितना कठकरेजी हो जाता है. सन्तान पैदा हुई है तो उसकी खुशी होनी चाहिए. सृजन की खुशी! लेकिन उसके मन की टेक तो है, ‘रे ललनवां’ की. जैसे ही पता चलता है कि जन्मी सन्तान बेटा नहीं बेटी है, मन्सूबे औंधे मुंह गिर पड़ते हैं. जिस मां ने जन्म दिया है, वह बकने लगती है : बांस की जड़ से निकलने वाला करील बांस के लिए घातक होता है. जी का जंजाल. पतन की ओर ले जाने वाला. उसी तरह मां की गोद से पैदा हुई बेटी भी मां के लिए वह करील ही है. अगर मैं जान पाती कि बेटी पैदा होगी तो कोई न कोई जतन करके पैदा होने के पहले ही इसे मार डालती. मिर्चा के झाक को पीस कर पी जाती. जिससे यह मर तो जाती!

बंसवा के जरीयांते नीकले करीलवा
अरे बंसवा के जीव के जवाल रे ललनवां
माई की गोदिया में जनमलें बिटियवा
अरे माई के जीव के जवाल रे ललनवां
जब हम जनतीं बेटी लीहाँ जनमवा
अरे पीसि पीतीं मरिचा के झाक रे ललनवां….

बेटी पैदा होना वैसे ही है जैसे बांस के लिए करील का उगना. करील बांस की कोठ के लिए अशुभ संकेत बन कर आता है. मान्यता है कि करील पर कौवा बैठेगा तो कोठ ही सूख जायेगी. सर्वनाश! नवजात बेटी के लिए समाज ने मेटाफर (रूपक) क्या चुना है!

देहाती गीतों में दुखों को बेशक रखा गया है, लेकिन कुछ दुख ऐसे हैं जो नहीं रखे जा सके हैं. शायद वे इतने ज्यादा ‘रियलिस्टिक’ हैं कि गीत-गाने के ‘फोर्म’ में नहीं आ पाते. वे गांवों में, कहानियों में, एक कान से दूसरे कान तक घूमते रहते हैं. लोकगीत में यह तो कहा जा रहा है कि ऐसा पता होता तो मैं मार डालती, लेकिन पैदा होने पर इस तरह मैंने मार डाला, इसका जिक्र मैं नहीं पा सका हूं. हां, बचपन में गांव की एक दाई के बारे में जरूर सुन रखा था जो बच्चा पैदा कराने का काम करती थी. वह उन घरों के लिए अचूक हथियार थी जो अपनी वंश-परंपरा में बेटे ही देखना पसंद करते थे. जन्मते ही बच्चियों को मार डालने के काम में वह बहुत कुशल थी.

प्रतीकात्मक फोटो (Reuters)
प्रतीकात्मक फोटो (Reuters)

दाई जो नवजात कन्या मार देने का काम करती, उसमें संतान की मां की रजामंदी रहे या न रहे, लेकिन उसके घर के बड़ों की रजामंदी जरूर होती थी. दाई का यह पाप उन माओं के जरिये बाद में बाहर आ जाता था, जो उस समय घर के फैसले के खिलाफ नहीं जा पाती थीं, सब समझते हुए भी चुप रहती थीं, लेकिन कभी अपनी ममता की हत्या को भूल भी नहीं पाती थीं. वे ही माएं बताती थीं कि उनकी नवजात बेटी को दाई ने कैसे मारा. किसी के पास पानी में डुबा देने की कहानी होती थी तो किसी के पास मदार के दूध को मुंह में डाल कर मार डालने की कहानी. ये मारी गयी बेटियां वहीं आसपास जमीन में गड्ढ़ा करके दबा दी जातीं. जाने कितनी बेटियों को जाने कितने तरीकों से मार डाला, दाइयों ने, घरों ने. नवजात आवाज को सदा के लिए खामोश कर दिया.

मातृत्व मरता भी कहां है! गांव में एक ऐसी भी मां थी जिसने अपने तरीके से अपने मातृत्व को जिला रखा था. उसे वह जगह पता थी जहां उसकी सन्तान को तोपा गया था. उसने वहां फूल के पौधे रोप दिये थे. यह मातृत्व का दूसरा सृजन था. वह पौधों को पानी देती. देख-भाल करती. पालती-पोसती. उन्हें खिलने का हर जतन करती. उसने उन हंसते फूलों में खामोश कर दी गयी, आवाज की खिलखिलाहट सुनने का अपना तरीक़ा खोज लिया था. मातृत्व धरती का रूप ले लेता. हरा-भरा, हंसता आकाश भी हो जाता. धरती से आकाश के बीच में जीवन अपना रास्ता ढूंढ़ लेता था!

कथाकार अमृतलाल नागर का एक उपन्यास है, ‘शतरंज के मोहरे’. उसमें मदार के दूध से नवजात कन्या को मार डालने के अमानवीय कर्म का उल्लेख हुआ है. भले कोट थोड़ा लंबा है लेकिन स्तब्ध कर देने वाला प्रसंग यहां हाजिर है :

“कंडौर अवध का एक गांव है. वहां के जमींदार लाल साहब कहलाते हैं, उनकी पहली पत्नी ने चार कन्याओं और एक पुत्र को जन्म दिया था. पुत्रियां जन्मते ही मार डाली गईं. अब दूसरी पत्नी की यह पहली सौरी है. लाल साहब की मां, विधवा बहन और दायी कंडौर (कंडा रखने की कोठरी) में छोटी ठकुरानी को घेरे बैठी हैं. दायी पृथ्वी पर नये जीवन का स्वागत करने को तत्पर खड़ी है. दीया जल रहा है, बड़ी उमस है.
दायी के हाथों में नयी जिन्दगी आ गयी. अम्मी और काकी उत्सुक हुईं.
‘‘करमुही आय, जनै वाली की कोख जरै, रेकवारेन के घर की बिटेवा, यू असगुन जनमि के पसरी है! भरौ मु मां मदार!’’
लाल साहब की मां और चाची जल-भुनकर चल दीं. लाल कुंवर सिंह की नवजात कन्या के पहली ‘कुआं-कुआं’ करते ही दायी ने उसके मुंह में मदार का दूध टपकाना आरम्भ कर दिया था. बच्ची को मदार का दूध पिलाकर उसके मुंह में गर्भ का मल भर दिया. जच्चा की खाट के पास जल्दी-जल्दी गड्ढा खोदकर जैसे तैसे शिशु का शव तोप दिया.”

नवजात बेटियों की यह दुर्दशा सवर्णों में अधिक थी. नयी पीढ़ी के लोग आज गांवों में यह जघन्यता शायद देखने को न पाएं. बीसवीं सदी के खत्म होते-होते यह भी खत्म होने लगी. पहले बहुत प्रभावी रूप में थी. लेकिन, क्या समाज से यह मानसिकता खत्म हुई? क्या बेटियों के प्रति वैसी स्वीकार भावना आयी जैसी बेटों के प्रति? देहात से लोगों के शहरों में पलायन के साथ-साथ यह मानसिकता अपने नगरीय रूप में दिखायी देने लगी. लोग आधुनिक युग की प्रगति का लाभ लेते हुए जन्म के पहले ही लिंग की जांच करा कर बच्चियों को भ्रूणहत्या का शिकार बना देते हैं. पहले पैदा होने के बाद जो होता था वह अब पैदा होने के पहले ही हो जाता है. दाइयों की जगह ‘एक्सपर्ट’ नर्स और डॊक्टर्स ने ले ली है. कन्या भ्रूणहत्या रोकने के ढेरों सरकारी व गैर-सरकारी प्रयास हैं, फिर भी लोग बाज नहीं आते. पाप करने से नहीं चूकते. यह सामाजिक बीमारी, गांव हो या नगर, हर जगह से खत्म हो गयी है, हम यह कहने की हालत में नहीं हैं.


पहली किस्ते पढ़िए :

देहातनामा 1: गांव का कनफटा जोगी, जो प्रेम सिखाने वाला जोगी है, नफरत सिखाने वाला योगी नहीं

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