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देहातनामा 1: गांव का कनफटा जोगी, जो प्रेम सिखाने वाला जोगी है, नफरत सिखाने वाला योगी नहीं

डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी
डॉ. अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी

डॉ. अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी. शिक्षक और अध्येता. लोक में खास दिलचस्पी, जो आपको यहां दिखेगी. अब से अमरेंद्र हर हफ्ते आपसे रू-ब-रू होंगे. ‘देहातनामा’ के जरिए. पेश है पहली किस्त:


शहर की दहकच्चर शाम को थोड़ी देर के लिए अपने घर के एक कमरे में सिमटती हुई लगती है, लेकिन सिमटती नहीं. वह अगले दिन के उसी भागा-दौड़ी के सिलसिले में दौड़कर समा जाती है. महानगर की ज़िंदगी में सुस्ताने का इत्मिनान भरा मौका भी कहां मिलता है! इन व्यस्त दिनों में हम गांववाले उन इत्मिनान भरे दिनों को याद करते हैं. यह यादों का ऐसा मूलधन है, जो उम्रभर नहीं चुकने वाला.

वे निर्धन हैं, जिनके पास यह दौलत नहीं. उनसे भी गए-गुजरे वो हैं, जिनके पास यह है तो सही, लेकिन आधुनिक चकाचौंध में इनसे आंख चुराते हैं, गंवारू यादें समझकर. यादों से आंख मिलाते हैं, तो मन गांव में बिताये दिनों से जुड़ने लगता है. हम पाते हैं कि यादों के पिटारे से निकला एक मोती अपनी जादुई चमक से कुछ ताकत तो जरूर दे जाता है. बैठे हुए, यादों में खोए हुए, एक कप चाय पीते हुए जो ताज़गी मिलती है, वह चाय से ही नहीं, यादों से भी जुड़ी है. यादें जितनी बीते दिनों का सच हैं, उससे कम आने वाले दिनों का नहीं.

dehaatnama

मैं महसूस कर रहा हूं कि कहीं से सारंगी की आवाज़ आ रही है. दूर की तान. ऐसे में मुझे उस सारंगी वाले जोगी की याद फिर ताजा हो आती है, जो गोरखपंथी था. कनफटा, हमारे गांववालों का ‘जोगिया’. संन्यासी कपड़ों में रहता. गुदरी धरे हुए. बेफिक्र. मस्तमौला. नियमित आता था. यह नियम दिन या महीने का नहीं, सालाने का था. ऐसे ही कई दूसरे जोगी भी आते, लेकिन वह उन सबसे अलग होता. हम बच्चों के साथ थोड़ा बच्चा-दिल हो जाने वाला. वह जाने कितने मसले सुना जाता.

उसके आने पर हम बच्चे जिद करते, ‘हे जोगी, सारंगी का दूधभात वाला मसला सुनाओ.’ ‘आच्छा’ कहकर वह हंसता कुछ देर. उसके चारों ओर हम बच्चे इकट्ठा रहते. वह धीरे-धीरे सारंगी के तार कसता. सुर मिलाता. फिर मसला हाजिर करता, जो एक पूरी कहानी होती. वह कहता, ‘ओ सरंगी’. सारंगी बजाता, तो हुंकारी भरने की आवाज़ आती, ‘हूंऊं’.

उसके और सारंगी के बीच एक दिलचस्प बातचीत होती. बातचीत में सारंगी के रिसियाने, उसको मनाने और उसका दूध-भात खाने पर मान जाने के साथ ही कहानी खत्म हो जाती. यह बचपने का ही कौतुक था, जो सारंगी पर हाजिर होता था, जिसमें बच्चे खुद का रिसियाना, मनाया जाना और मान जाना शामिल पाते थे. इस ख़ास फरमाइश का राज़ शायद यही था.

सारंगी और सुर की समझ न होने पर भी जोगी का हाजिर करना इतना मन मोह लेता कि हम सब उससे कहते, ‘फिर से, फिर से’. सारंगी कितनी अपनी लगती है, इन्हीं जोगियों के कारण. सारंगी को लोग शास्त्रीय संगीत पर बात करते हुए याद करते हैं, कोठों पर तवायफों की गायकी पर बात करते हुए याद करते हैं, लेकिन इन जोगियों पर बात करते हुए सारंगी की चर्चा या सारंगी के बहाने जोगियों की चर्चा नहीं के बराबर होती है.

sarangi

गांव और सारंगी का जैसा मिलाप जोगियों ने किया, शायद दूसरों ने नहीं. बहरहाल, वह हमारा जोगिया जो सुनाता, उसमें कविता होती और कहानी भी. कहानी की तरह हममें ‘फिर क्या हुआ’, यह जानने की बेचैनी होती. साथ ही साथ कविता की तरह ‘फिर-फिर’ सुने जाने का लोभ भी. जब हम बड़े हुए, तो हम उसकी सारंगी के सहारे सुनाई जाने वाली कई लोककथाओं पर गौर करने लगे. उनका प्रभाव बड़ा मार्मिक होता. उन लोककथाओं में मन डूबता-उतराता.

इन्हीं में से एक लोककथा है, ‘अइसन जोग भरथरी कीन!’. इस लोककथा की याद आंसू भरी उन आंखों की याद भी है, जो थोड़ी दूर से इन्हें सुनती थीं. आंसू की धारा बहाती नहीं, अंसुवाती आंखें. लेकिन, कामकाज में खुद को व्यस्त रखते हुए कुछ जाहिर नहीं करती थीं. थोड़ी देर बाद भिच्छा देने के लिए थोड़े अनाज रखी मौनी आ जाती थी.

यह लोककथा भाव-विभोर करती है. भरथरी जो कभी राजा थे, वह सब कुछ छोड़कर संन्यास की राह चल पड़ते हैं. रानी पिंगला, जिनसे उनका दिल दुखी हुआ और संसार से वैराग्य हो गया, उसे भी राजपाट की तरह छोड़ देते हैं. गुरु गोरखनाथ की शरण में जाते हैं. गरु गोरखनाथ भरथरी से कहते हैं कि जाओ, पहले अपने घर से भिक्षा लेकर आओ. जब रानी पिंगला तुम्हें बेटा कहकर भिक्षा देंगी, तभी ज्ञान-गठरी सौंपी जाएगी. पिंगला पहले से ही दुखी हैं, संताप में हैं. भरथरी दरवाजे पर आए. पिंगला जोगी भेस धरे राजा को बार-बार समझाने की कोशिश करती हैं. कहती हैं-

छोड़ि के धन दौलत औ माल, काहे बने हौ कंगाल,
कौने कारन बनि के घूमत हौ भिखरिया न…

इंटरनेट पर मौजूद भरथरी का एक काल्पनिक चित्र, जिसमें वह अपने गुरु गोरखनाथ के साथ हैं
इंटरनेट पर मौजूद भरथरी का एक काल्पनिक चित्र, जिसमें वह अपने गुरु गोरखनाथ के साथ हैं

भरथरी कहते हैं, ‘देखो’, अब मैं दूसरा इंसान हो गया हूं. वह तुम्हारा राजा पति मैं नहीं रहा अब. मूड़ मुड़ा लिया है. मेरे भाग्य में योगी होना लिखा है, राजा होना नहीं. धन-दौलत की कोई जरूरत नहीं. जंगल की घास मेरा बिस्तर है. वल्कल मेरा वस्त्र है. कहते हैं-

करम मा लिखा है जोग, कैसे करी राज भोग
हमका नीक न लागै तोहरी सेजरिया ना.
मूड़ तौ मुड़ायन हम, अब न लागी तोर बालम
माता दै दे हमका भीख, न करौ अबेरिया ना
हमैं नाहीं धन कै आस, बिस्तर है जंगल कै घास
बलकल सोइ रहबै करबै हुंवइं गुजरिया ना…

पिंगला बहुत समझाती हैं. भरथरी नहीं मानते. वह अपने इरादे पर अटल हैं. कहते हैं, ‘गोरखनाथ मेरे गुरु हैं. हे माई, वह ज्ञान की गठरी तभी देंगे, जब बेटा कहकर भिक्षा दी जाएगी. भिच्छा दे दो, तुम्हारी फुलवारी हमेशा फली-फूली रहेगी’.

मोरी माता सुनौ कलाम, हमरे गुरु कै गोरख नाम
जे देइहैं हमका ग्यान कै गठरिया ना
जोगी खड़ा है तोहरे द्वार, माता कै दा भिच्छा दान
सब दिन फूली रही तोहरी फुलवरिया ना…

और अंत में भरथरी को बेटा कहकर भिक्षा दी जाती है. पिंगला भिक्षा देते हुए कहती हैं-

बेटवा कहिके भिक्षा दीन, अइसन जोग भरथरी कीन
बनइके कहै मुसरिया दीन, ई झुमरिया ना…

इस लोककथा के खत्म होने के साथ ही जोगी सारंगी को आराम करने के लिए रख देता. मौनी में रखी भिक्षा ले लेता. पूरी दुनिया उसके लिए जैसे ‘पिंगला का संसार’ है, जिससे वह खुद को भरथरी की तरह बार-बार अलग करता है. लोककथा से अपने संन्यासी संकल्प को, वैराग्य को, बार-बार मजबूत करता है. जरूरी भी है, नहीं तो सत्ता-सुख कब किसे योग-भ्रष्ट कर दे.

जब कभी खबरों में योगी, गोरखपुर, गोरखधाम पीठ, और उसके साथ सत्ता-समीकरण देखता-सुनता हूं, तो उस कनफटे जोगी का बेफ़िक्र विरागी चेहरा निगाहों में तैर जाता है, जो जोगीपन, गोरखपंथ, अध्यात्म और संन्यास को कहीं अधिक गरिमामय बनाता था. ऐसे जोगी दुनिया की निस्सारता दिखाने के बावजूद इंसान-इंसान के बीच प्रेम ही सिखाते हैं. नफरत, जिसमें ओछापन, अहंकार, क्रोध-मद-लोभ, सत्ता और शक्ति का खेल होता है, ये नहीं सिखाते. प्रेम वाले जोगी दूसरे होते हैं और नफरत वाले योगी दूसरे.

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