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जिसने हिमाचल बनाया, उसके पोते ने चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस को मारी लंगड़ी

राजनीति में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं होता. आज जो उसका है, कल किसी और का होगा. आज जो इस पार्टी में है, हो सकता है कल किसी और पार्टी में हो. चुनाव के टाइम में तो खूब होता है. नेता दूल्हे के फूफा जैसा बर्ताव करने लगते हैं. ऐन चुनाव से पहले पाला बदल लेते हैं. इन दिनों हिमाचल प्रदेश में भी खूब हो रहा है ऐसा. चेतन परमार हैं न. वो, डॉक्टर वाई एस परमार के पोते. वो ही वाई एस परमार, जो हिमाचल में ‘भीष्म पितामह’ माने जाते हैं. यानी, हिमाचल के राष्ट्रपिता. जिन्होंने हिमाचल को हिमाचल बनाया. हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री बने. अब चेतन परमार ने ऐन चुनाव से पहले कांग्रेस को कोहनी मार दी है. बीजेपी में चले गए हैं. नाराज होकर गए हैं.

चेतन परमार टिकट न दिए जाने से नाराज थे. हालांकि बीजेपी से जुड़ने के बाद भी वो इस बार चुनाव नहीं लड़ सकेंगे.
चेतन परमार टिकट न दिए जाने से नाराज थे. हालांकि बीजेपी से जुड़ने के बाद भी वो इस बार चुनाव नहीं लड़ सकेंगे. नामांकन दाखिल करने की तारीख बीत चुकी है.

टिकट नहीं मिलने पर नाराज थे, चले गए
चेतन को टिकट नहीं मिल रहा था. जितना चाहते थे, उतना भाव नहीं दे रही थी कांग्रेस. सो छोड़कर चले गए. अभी ये नहीं पता कि चेतन के जाने से कांग्रेस को कितना फर्क पड़ा है. हां, चेतन के पास एक चीज थी जो शायद हिमाचल में लड़ने वाली पार्टियों के बड़े काम आ सकती है. वाई एस परमार का नाम. उनकी विरासत. चेतन जाते-जाते कह गए हैं. मैं अपने दादा का नाम भी साथ लेकर जा रहा हूं. इससे कांग्रेस को नुकसान और बीजेपी को फायदा होगा या नहीं, ये तो 18 दिसंबर को ही पता चलेगा. वैसे एक बात तो है. सिरमौर जिले में है नाहन. बल्कि, सिरमौर का हेडक्वॉर्टर है. ये ही सिरमौर ही वाई एस परमार का गढ़ रहा. इसके बावजूद ये इलाका हिमाचल के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता है.

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ यशवंत सिंह परमार. हिमाचल प्रदेश में डॉक्टर परमार के नाम की काफी अहमियत है.
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ यशवंत सिंह परमार. हिमाचल प्रदेश में डॉक्टर परमार के नाम का काफी वजन है.

खांटी कांग्रेसी रहा है परमार परिवार
चेतन परमार नाहन विधानसभा सीट से टिकट चाहते थे. कांग्रेस ने नहीं दिया. ये सीट उनका होम ग्राउंड है. चेतन के पप्पा हैं कुश परमार. पांच बार कांग्रेस विधायक रह चुके हैं. तीन बार इस सीट से. और दो बार पॉन्टा साहिब की सीट से. 1993, 1998 और 2007 का चुनाव इस सीट से लड़ा था उन्होंने. 2012 के चुनाव में हार गए थे मगर. बीजेपी के राजीव बिंदल से. करीब 12,824 वोट से हारे थे. इसके बाद कुश परमार ने सन्यास ले लिया. बोले, सक्रिय राजनीति छोड़ता हूं. अब कुश परमार अपने बेटे चेतन के लिए जोर भिड़ा रहे थे. चाहते थे, चेतन को नाहन से टिकट मिले. कांग्रेस के दिमाग में शायद कुछ और चल रहा हो. पार्टी ने सोचा होगा कि पिछली बार जिस सीट से खुद कुश परमार नहीं जीत पाए, वहां से उनके बेटे के जीतने की उम्मीद भी कम ही है. आखिरकार, कुश परमार तो ‘पुराना चावल’ थे. तब भी नहीं बचा पाए थे अपनी पारंपरिक सीट. उसके पहले, यानी 2007 के चुनाव में भी कुश परमार बड़ी मुश्किल से ही जीते थे. ये ही कोई 746 वोट का अंतर था. उनके और हारने वाले के बीच.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ वाई एस परमार के बेटे और पांच बार कांग्रेस विधायक रह चुके कुश परमार.
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ वाई एस परमार के बेटे और पांच बार कांग्रेस विधायक रह चुके कुश परमार (फोटो: फेसबुक)

जिस नेता ने कुश परमार को हराया था, उसने ही चेतन को गले लगाया
कांग्रेस ने पूरा जोड़-घटाव किया. फिर अजय सोलंकी को नाहन से टिकट दे दिया. जाहिरन, कुश और चेतन दोनों खूब नाराज हुए. इसके बाद ही चेतन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई. कहा, कांग्रेस छोड़ता हूं. और भी बातें बोलीं. कि कांग्रेस ने उनके दादा की परंपरा को खत्म करने में जी-जान लगा दिया. उनका नाम बस वोट मांगने के लिए इस्तेमाल किया. वगैरह, वगैरह. बोल रहे थे कि अपने दादा जी की विरासत को साथ लेकर बीजेपी आ गए हैं. चेतन बीजेपी में आ तो गए हैं. मगर इस बार चुनाव नहीं लड़ पाएंगे. नामांकन का पर्चा भरने की आखिरी तारीख तो बीत चुकी है. इस बार की तो कोई उम्मीद नहीं. देखते हैं, उनको बीजेपी से क्या मिलता है. वैसे, एक दिलचस्प बात पता है. चेतन का बीजेपी में स्वागत किसने किया? राजीव बिंदल. वो ही बिंदल, जिन्होंने पिछले चुनाव में चेतन के पापा कुश परमार को हराया था. है न राजनीति मस्त चीज.

पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम के बेटे अनिल शर्मा भी अभी हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी गए हैं. इसके बाद सुखराम और वीरभद्र सिंह, दोनों के बीच बयानबाजी शुरू हो गई.
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम के बेटे अनिल शर्मा भी अभी हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी गए हैं. इसके बाद सुखराम और वीरभद्र सिंह, दोनों के बीच बयानबाजी शुरू हो गई.

पूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम के बेटे ने भी ऐसे ही छोड़ा कांग्रेस का साथ
इससे पहले सुखराम के लाड़ले ने भी ये ही किया था. अनिल शर्मा. कांग्रेस छोड़कर बीजेपी चले गए. फिर क्या होना था? वीरभद्र सिंह और सुखराम की ठन गई. वीरभद्र और सुखराम दोनों ने एक-दूसरे को ‘आया राम, गया राम’ कहा. ये ‘आया राम, गया राम’ आपको और कहीं नहीं मिलेगा. सिवा भारत की राजनीति के. वो नेता करते हैं न, कभी इस पार्टी तो कभी उस पार्टी. उसी से जुड़ा मुहावरा है ये. इस मुहावरे का भी एक किस्सा है. 1967 की बात है. हरियाणा के एक नेता थे. गया लाल. 15 दिन के अंदर उन्होंने तीन बार पार्टी बदली. कांग्रेस में थे. उसे छोड़कर यूनाइटेड फ्रंट में चले गए. फिर कांग्रेस आए. फिर 9 घंटे के भीतर वापस यूनाइटेड फ्रंट में आ गए. फिर उन्होंने फैसला किया. यूनाइटेड फ्रंट छोड़कर कांग्रेस आने का. तब कांग्रेस के एक नेता थे. राव बीरेंद्र सिंह. वो गया राम को लेकर पत्रकारों के सामने आए. बोले, गया राम अब आया राम है.

हिमाचल प्रदेश को अलग राज्य बनाने के पीछे वाई एस परमार ने बहुत मेहनत की थी. इसी वजह से उन्हें हिमाचल का फाउंडिंग फादर कहा जाता है.
हिमाचल प्रदेश को अलग राज्य बनाने के पीछे वाई एस परमार ने बहुत मेहनत की थी. इसी वजह से उन्हें हिमाचल का फाउंडिंग फादर कहा जाता है.

सुखराम ने कहा, वीरभद्र सिंह ‘ब्लैकमेलर’ हैं
सुखराम कह रहे थे कि वीरभद्र अपनी बात मनवाने के लिए कांग्रेस को ब्लैकमेल करते हैं. बात मानो, वरना दूसरी पार्टी में चला जाऊंगा टाइप. कि कैसे कौल सिंह ठाकुर को हिमाचल प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाने के लिए वीरभद्र ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. पार्टी से कहा कि अगर ठाकुर को नहीं हटाया, तो शरद पवार की पार्टी NCP में चले जाएंगे. मरता क्या न करता. अंत में कांग्रेस ने वीरभद्र के आगे हथियार डाल दिए. ये सब सुखराम ने कहा. अनिल शर्मा मंडी सीट से खड़े हुए हैं. उनका मुकाबला है कांग्रेस के बड़े नेता कौल सिंह ठाकुर की बेटी चंपा ठाकुर से. देखते हैं. जनता किसे जिताती है.


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