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किसी के हाथ में ये मांसपेशी होती है, किसी में नहीं

बंदर से इंसान बना है, इसके कुछ सबूत आपके शरीर में हैं.

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कहते हैं, इंसान पहले बंदर था. बंदरों से शुरू हुआ सफर इंसान बनने पर खत्म हुआ. फिर किसी ने सवाल किया. कि इंसान अगर सच में बंदर था, तो हमने किसी बंदर को इंसान बनते क्यों नहीं देखा. बात तो सही है. हमने इतने सारे बंदरों को देखा है. मगर किसी बंदर को इंसान बनते तो नहीं देखा है. मतलब वो इवॉल्यूशन जिसकी बात डार्विन ने की, वो क्या ऐसे एकाएक होने वाले बदलाव की बात थी. कि हमारी आंखों के सामने पेड़ पर चढ़कर अमरूद खा रहा बंदर एकाएक इंसान बन सकता है? कि अगर ऐसा हो जाए, तो मान लेंगे कि डार्विन का सिद्धांत सही था?

डार्विन का कहना था कि हम इंसान हमेशा से ऐसे नहीं दिखते थे जैसे अब दिखते हैं. हम सैकड़ों सालों के विकास की प्रक्रिया से गुजरने के बाद ऐसे हुए हैं. हमारा विकास बंदरों से हुआ है.
डार्विन का कहना था कि हम इंसान हमेशा से ऐसे नहीं दिखते थे जैसे अब दिखते हैं. हम सैकड़ों सालों के विकास की प्रक्रिया से गुजरने के बाद ऐसे हुए हैं.

डार्विन को सही साबित करने के लिए कोई आकाशवाणी नहीं होने वाली. उनके सही होने के कुछ सबूत हमारी आंखों के सामने है. हमारे अपने शरीर के अंदर. कुछ ऐसी चीजों की छाप, जिनसे मालूम चलता है कि हम (यानी इंसान) भी कभी बंदर रहे होंगे. फिर धीरे-धीरे हमारे अंदर बदलाव होता गया. और हम इंसान बन गए. ऐसी कुछ चीजें हमारे शरीर में अब भी हैं, जिनकी हमको वैसे कोई जरूरत नहीं. मगर हमारे पूर्वजों को उनकी जरूरत रही होगी. उनके अंदर था, तो हमारे अंदर भी बचा हुआ है. ऐसे दो-चार सबूतों के बारे में नीचे पढ़ लीजिए:

1. रोंगटे खड़े होना
आपने फर वाले जानवरों को देखा है? जब ठंड होती है, तो उनके फर के बाल ऊपर की ओर खड़े हो जाते हैं. ये ठंड से बचने का कुदरती तरीका है. न हो तो इंटरनेट पर कुछ विडियो देख लीजिएगा. बर्फीले इलाकों में रहने वाले जानवरों को देखिएगा. और फिर सोचिएगा. जब हमें ठंड लगती है, तब हमारे रोंगटे क्या उसी तरह खड़े नहीं होते? क्या दोनों का लॉजिक और तरीका एक जैसा नहीं? शरीर की त्वचा पर बाल होते हैं. इन बालों के साथ छोटी मांसपेशियां जुड़ी होती हैं. ठंड लगने पर ये अटेंशन की मुद्रा में आ जाती हैं. वैज्ञानिक कहते हैं कि ये वाला फीचर उसी समय का है जब हम इंसान जानवर हुआ करते थे. ये हमारे विकास की प्रक्रिया के बाद भी हमारे अंदर बचा रहा.

ठंडे इलाकों में रहने वाले जानवरों की त्वचा पर मोटे फर की परत होती है.ये ठंड से बचाने के लिए है. जब ठंड लगती है, बाल खड़े हो जाते हैं. ऐसे ही जैसे हमारे साथ होता है.
ठंडे इलाकों में रहने वाले जानवरों की त्वचा पर मोटे फर की परत होती है.ये ठंड से बचाने के लिए है. जब ठंड लगती है, बाल खड़े हो जाते हैं. ऐसे ही जैसे हमारे साथ होता है.

2. पूंछ (टेलबोन)
आपको फिर इंटरनेट पर मदद तलाशने की जरूरत पड़ेगी. जब बच्चा भ्रूण होता है, तब की फोटो देखिए. करीब चार हफ्तों के भ्रूण को. आपको उसके एक सिरे पर, कूल्हे के पास वाले हिस्से में पूंछ के आकार की कोई चीज दिखेगी. चूहे का भ्रूण भी ऐसा ही दिखता है. कई और पूंछ वाले जानवरों के भ्रूण भी ऐसे ही होते हैं. मगर उनके अंदर ये विकसित होकर पूंछ बनते हैं. जबकि हम इंसानों के अंदर अब इसका विकास नहीं होता. इसीलिए अब हमारे पूंछ भी नहीं होती है.

हमारे शरीर में एक टेलबोन नाम की चीज भी होती है. कुछ के अंदर दो होती है. कुछ के अंदर तीन. वैज्ञानिक कहते हैं कि ये हमारे पूर्वजों के अंदर पाई जाने वाली पूंछ की निशानी है. जिसका निशान अभी भी हमारे अंदर बचा है. बल्कि कई बच्चे ऐसे होते हैं जिनके पैदा होने पर उनके पीछे पूंछ उगी होती है. होता ये है कि भ्रूण के अंदर उसकी पूंछ वाले हिस्से का विकास बंद नहीं हुआ होगा. ये ब्लूप्रिंट है. कि हमारे पूर्वज कैसे थे. और धीरे-धीरे किस तरह हमारा विकास हुआ.

कई बच्चे ऐसे होते हैं, जिनके पैदा होते समय उनके पीछे पूंछ होती है. कई लोग अपने अंधविश्वास के चक्कर में उन्हें भगवान मान लेते हैं. मगर असल में होता ये है कि चार हफ्ते तक हर भ्रूण के अंदर एक पूंछ जैसा हिस्सा विकसित हो रहा है. बाद में उसका विकास रुक जाता है. कइयों के अंदर नहीं भी रुकता.
कई बच्चे ऐसे होते हैं, जिनके पैदा होते समय उनके पीछे पूंछ होती है. कई लोग अपने अंधविश्वास के चक्कर में उन्हें भगवान मान लेते हैं. मगर असल में होता ये है कि चार हफ्ते तक हर भ्रूण के अंदर एक पूंछ जैसा हिस्सा विकसित हो रहा है. बाद में उसका विकास रुक जाता है. कइयों के अंदर नहीं भी रुकता.

3. पलमारिस लॉन्गस:
आप अपना हाथ किसी समतल सतह पर रखिए. अब अपनी उंगलियों को उठाकर हथेली को गड्ढे की तरह मोड़िए. आपको अपनी कलाई के बीच में एक मोटी लकीर सी दिखती है क्या? ये एक किस्म की मांसपेशी है. सबके अंदर नहीं होती मगर. कुछ के अंदर होती है, कुछ के अंदर नहीं होती. कइयों के तो एक हाथ में होती है, मगर दूसरे में नहीं होती.

इसके होने या न होने से हमारा कुछ नहीं बिगड़ता. मगर हमारे पूर्वजों को इसकी बड़ी जरूरत पड़ती थी. कुछ पकड़ने में. ग्रिप बनाने में. चीजों के ऊपर पकड़ बनाने में. बहुत काम आती थी ये मांसपेशी. और हमारे पूर्वज बंदर थे. उनको तो पेड़ों पर झूलना पड़ता होगा. एक टहनी से दूसरी टहनी पर जाना होता होगा. ऐसे में उनकी कलाई को मजबूती की काफी जरूरत पड़ती होगी. और ये मांसपेशी इसमें उनकी मदद करती थी.

आप अब भी देखेंगे, तो ये बंदरों के अंदर ये मांसपेशी सबसे लंबी पाई जाती है. गुरिल्ला वगैरह के अंदर इसकी लंबाई छोटी होती है. हम इंसान अब विकसित हो चुके हैं. हमारी जिंदगी और उसकी जरूरतें अलग हैं. हम पैरों के सहारे चलते हैं. हाथों के सहारे उछलने-कूदने की हमको जरूरत नहीं पड़ती. तो हमारे लिए इस मांसपेशी का कोई व्यावहारिक काम नहीं है. मगर फिर भी ये हमारे उस दौर की निशानी के तौर पर मौजूद है. जो लोग कॉस्मेटिक सर्जरी कराते हैं (जैसे ऊपरी होंठ का उभार बढ़ाने के लिए ऑपरेशन), उसमें डॉक्टर अक्सर इस मसल का इस्तेमाल करते हैं. उसे कलाई से निकालकर वहां भरा जाता है, जहां जरूरत होती है.

4. कान के पास की मांसपेशियां (ऑरिकुलरिस ऐंटिरियर, ऑरिकुलरिस सुपीरियर, ऑरिकुलरिस पोस्टीरियर)
ये हमारे कान के आस-पास की मांसपेशियां हैं. हम इनका ज्यादा इस्तेमाल नहीं कर पाते. मतलब, आप बिना छुए अपना कान हिलाने की कोशिश कीजिए. हिलेगा, मगर बहुत मामूली. जानवरों को देखिए. जैसे- कुत्ता, बिल्ली, बंदर, गाय वगैरह. वो अपने कान खूब हिलाते हैं. आपने कभी किसी जानवर को दूर से आ रही किसी आवाज को सुनने की कोशिश करते देखा है. देखिएगा गौर से. जानवर अपने कान बार-बार हिलाएगा. आवाज किस ओर से आ रही है, इसे समझने के लिए उन्हें कान हिलाने की जरूरत पड़ती है. और कान हिलाने के लिए इन मांसपेशियों की. हमको भी जब एकाएक कोई आवाज सुनाई देती है, तो हमारे कान भी हिलते हैं. बाईं ओर से आवाज आएगी, तो बायां कान हिलेगा. दाहिनी तरफ से आई आवाज पर दाहिना कान रिऐक्ट करेगा. ये स्वाभाविक है. हमारे पूर्वजों की आदतों के निशान अब भी हैं हमारे अंदर.

ऐसा एकाएक नहीं हुआ कि बंदर विकसित होकर इंसान बन गए. ये लंबी और धीमी प्रक्रिया थी. इसके कई चरण थे.
ऐसा एकाएक नहीं हुआ कि बंदर विकसित होकर इंसान बन गए. ये लंबी और धीमी प्रक्रिया थी. इसके कई चरण थे.

इंसान का शरीर जैसा है, वैसा बस यूं ही नहीं है. हजारों सालों से हमारा विकास हो रहा है. हमारे खाने, चलने, उठने-बैठने के तरीकों ने समय के साथ-साथ हमारे शरीर की डिजाइनिंग में भी मदद की है. जैसे आर्किटेक्ट जरूरत देखकर घर डिजाइन करता है. तय करता है कि रसोईघर का सिंक कितना ऊपर होना चाहिए. ताकि उसमें बर्तन धोने वाले शख्स को न तो ज्यादा झुकना पड़े. और न ज्यादा उचकना पड़े. ऐसे ही हमारा शरीर. हमारी जरूरतों और विकसित होने के हमारे सफर का ब्लूप्रिंट है इसमें.


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