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कोरोना के केस रोज घट रहे हैं, मौतें क्यों बढ़ती जा रही हैं?

हाल ही में कोरोना को लेकर एक नया ट्रेंड देखने को मिला है. पिछले 14 दिनों से कोरोना संक्रमण (corona infection) के केसेज में लगातार गिरावट हो रही है. पिछले 24 घंटे में देश भर में 2,67,334 नये कोविड केस दर्ज किए गए हैं. जबकि रिकार्ड संख्या में 4529 लागों की मौत हुई है. आपको जानकर हैरानी होगी कि यह किसी भी देश में एक दिन में कोविड से हुई सबसे ज्यादा मौते हैं. जब केस 4 लाख से ज्यादा आ रहे थे, तब भी इतने लोग नहीं मर रहे थे. मरने वालों की संख्या में इज़ाफा परेशान करने वाला ट्रेंड है. इसे लेकर कई लोग सोशल मीडिया पर अपना डर जाहिर कर रहे हैं. क्या है बढ़ती मौतों के पीछे का कारण? आइए समझने की कोशिश करते हैं इस पहेली को.

इस पहेली को समझिए

कोरोना के घटते केसेज और मौत के बढ़ते आंकडे के इस ट्रेंड के लिए मुख्य रूप से दो कारण जिम्मेदार हैं.

# मौतों को रिपोर्ट करने का तरीका
# कोरोना वायरस का गणित

प्रशासन की धीमी रिपोर्टिंग

देश के अलग-अलग राज्यों में लोगों का इलाज करना स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ा मामला है, लेकिन उन्हें रिपोर्ट करना एक प्रशासनिक मामला है. किस राज्य में कब कितनी मौतें हुईं? इसका आंकड़ा प्रशासनिक महकमा जारी करता है. प्रशासन की इस ढिलाई को द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में बखूबी दिखाया है. इससे साफ पता चलता है कि ढिलाई भी अचानक आंकड़ों में बढ़त दिखने में कितनी जिम्मेदारी निभाती है.

इसे महाराष्ट्र के उदाहरण से समझते हैं. 17 मई को वहां कोरोना से 1019 मौतें रिपोर्ट हुईं. इनमें से 289 मौतें 15 से 17 मई के बीच हुई थीं. जबकि 227 मौतें उससे पिछले हफ्ते की थीं. इनमें से भी 484 मौतें उससे पिछले हफ्ते की थीं. इन्हें भी अब तक राज्य में हुई मौतों में शामिल नहीं किया गया था. राज्य ने 19 मौतों को कोरोना की संदिग्ध लिस्ट में रखा था. ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ महाराष्ट्र का मामला है, दूसरे राज्य भी ऐसा कर रहे हैं. कर्नाटक ने 17 मई को अपनी टेली में 476 मौतें बताईं. इनमें से कई मार्च और अप्रैल महीने की थीं.

इस वक्त देश में महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, यूपी और तमिलनाडु औसतन रोज 300 मौतें रिपोर्ट कर रहे हैं. लेकिन 18 मई को इन राज्यों के मुकाबले एक छोटे राज्य उत्तराखंड ने 223 मौतें रिपोर्ट कीं. इनमें से 80 ऐसी थीं जो एक दिन पुरानी थीं.

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कोरोना से होने वाली मौतों का आंकड़ा रिपोर्ट करने में प्रशासनिक देरी हो रही है. कई राज्यों में पिछले कई दिनों में हुई मौतों को एक ही दिन में जारी कर दिया गया. फोटो – पीटीआई (प्रतीकात्मक तौर पर)

कोरोना वायरस का गणित समझिए

मौत के आंकड़ों में इस तरह की बढ़त वायरस संक्रमण से जुड़े खास नियम की वजह से भी होती है. इसे समझने के लिए वायरस के शरीर में पहुंचने और उसकी परिणति तक के चक्र को समझना होगा. वायरस से पीड़ित होने और उसका शिकार हो जाने के बीच एक निश्चित वक्त होता है. इसे डेथ कर्व कहा जाता है. यह वक्त इस बात पर निर्भर करता है कि देश का हेल्थ सिस्टम कितनी जल्दी कोरोना के लक्षणों को पहचान कर उनका इलाज शुरू कर देता है. भारत में यह वक्त लगभग 15 दिनों का है. दुनिया भर में भी यह वक्त इसके आसपास ही है. इसे लेकर एक स्टडी मार्च 2020 में लैंसेंट में छपी थी. जिसमें लक्षण मिलने से जान जाने का वक्त औसतन 17.5 दिन बताया गया था. मोटा-मोटी एक्सपर्ट्स इसे दो हफ्ते का मानकर चलते हैं.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट डॉक्टर के.एस. रेड्डी ने द प्रिंट वेबसाइट को बताया कि

संक्रमण का पता चलने और मृत्यु होने के बीच 15 दिन का गैप अंतर्राष्ट्रीय अनुभव जैसा ही है. जिस दिन भी ज्यादा मौतों के आंकड़े आते हैं, तो उन पर पिछले महीने के केसेज का असर होता है. कोरोना की प्रतिदिन होने वाली मौतों का उससे 15 दिन पहले आए केसेज की संख्या से सीधा रिलेशन है. यह लैग टाइम दुनियाभर में देखा गया है.

अब चूंकि डेथ कर्व 2 हफ्ते का है, तो इसलिए संक्रमण के आंकड़े गिरने के कुछ दिन बाद ही मौतों के आंकड़े गिरना शुरू होते हैं. भारत में हो सकता है अभी कुछ दिन और मौत का आंकड़ा बढ़ता दिखे. इसे भी उदाहरण से समझिए. आसानी से समझने के लिए उन दिनों को लेते हैं जब आंकड़े छोटे थे. पिछले साल 23 मार्च 2020 को भारत में 103 नए कोरोना केसेज रिपोर्ट किए गए. ऐसा पहली बार था कि देश ने 100 का आंकड़ा पार किया हो. इसके 13 दिन बाद यानी 9 अप्रैल को 48 मौतें दर्ज हुई थीं. यह उस वक्त कोरोना से मरने वालों की सबसे बड़ी संख्या थी.

वहीं 26 मार्च 2020 को देश में 76 नए मामले दर्ज किए गए थे. इसके 13 दिन बाद यानी 8 अप्रैल को 20 मौतें दर्ज की गईं थीं.

दोनों उदाहरणों में मृत्युदर तकरीबन 30 फीसदी है. यह एक ऐसी महामारी की मृत्युदर थी जिसके बारे में हम बहुत कम जानते थे. जैसे-जैसे कोविड मैनेजमेंट बेहतर हुआ मरने वालों की संख्या में तेजी से कमी आई. लेकिन संक्रमित होने और मरने के बीच का गैप निश्चित बना रहा. यह वही 2 हफ्ते का गैप है, जिसकी हम पहले चर्चा कर चुके हैं.

Coronavirus India
कोरोना मरीज के अस्पताल में भर्ती होने से लेकर उसकी मौत के बीच का भी एक गणित है. (प्रतीकात्मक तस्वीर- पीटीआई)

बहुत नाज़ुक है बैलेंस

डेथ कर्व या लैग टाइम का मामला बहुत नाजुक है. अगर इस 2 हफ्ते के लैग टाइम में कोई बदलाव आता है तो मामला बिगड़ सकता है. यह बदलाव दिखाता है कि कोरोना संक्रमण के मैनेजमेंट में हेल्थ सर्विसेज नाकाम साबित हो रही हैं. कोरोना की पहली लहर में जब केसेज तेजी से बढ़े तब मामला गड़बड़ाया था.

11 सितंबर 2020 को तब के सबसे ज्यादा 97,655 कोरोना केस रिपोर्ट हुए. हालांकि इसके सिर्फ 5 दिन बाद यानी 15 सितंबर को ही कोरोना से मौतों का सबसे बड़ा आंकड़ा 1281 आ गया. इसका मतलब साफ था कि कोरोना संक्रमण के डिटेक्शन में देरी हुई है. क्योंकि हम देख चुके हैं कि डेथ कर्व तकरीबन 2 हफ्ते का होता है. इसके बाद सरकार हरकत में आई और डिटेक्शन पर जोर बढ़ा.

सेकेंड वेव में केस तेजी से बढ़े. तेजी से बढ़ते केसेज में जिन राज्यों ने डिटेक्शन में जितनी तेजी दिखाई, वहां डेथ कर्व 10 से 15 दिन के बीच रहा. मिसाल के तौर पर 18 अप्रैल 2021 में महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा 68,631 नए केसेज सामने आए. इसके 11 दिन बाद यानी 28 अप्रैल को एक दिन में मरने वालों का सबसे ज्यादा आंकड़ा 1035 सामने आया.

एक बात और जहां मामले बढ़ रहे हैं, वहां इसका ठीक उलटा पैटर्न दिखेगा. यानी रोज़ के मामले तो ज़्यादा होंगे, मगर मौतें उस दिन की संख्या के हिसाब से कम होंगी. शुरुआत में इसी ट्रेंड के कारण यह ख़ुशफ़हमी फैली कि मौजूदा वायरस संक्रामक तो ज़्यादा है लेकिन घातक कम. मगर वह भ्रम निकला.

कोरोना केसेज पर लगातार नजर बनाए हुए डॉक्टर विपिन वशिष्ठ का कहना है कि

लोग सिर्फ एक दिन के आंकड़े देख कर मिलान न करें. उन्हें कोरोना के डेथ कर्व को समझना होगा. उस गैप को समझना होगा, जिसमें लोग संक्रमण का शिकार होते हैं और उनकी मौत हो जाती है. इस गैप को समझ कर ही मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी को समझा जा सकता है. हो सकता है अगले कुछ दिन और मौतों के आंकड़ें बढ़ें, लेकिन वह पिछले संक्रमण का परिणाम होगा न कि किसी नई मुसीबत का.

ये सभी उदाहरण और गणित एक बात साफ करते हैं कि कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या और उससे मरने वालों की संख्या में एक खास रिलेशन है. जिस दिन केसेज पीक पर पहुंचते हैं उस दिन के 11 से 15 दिन को भीतर ही मौत के आंकड़े सबसे ज्यादा होते हैं. अभी जो आंकड़े दिखाई दे रहे हैं वह तब के हैं जब रोज 4 लाख या उससे ज्यादा केसेज आ रहे थे. अभी कुछ दिनों तक मौत के आंकड़े बढ़ सकते हैं. इसके बाद ये धीरे-धीरे कम होने शुरू हो जाएंगे. उम्मीद है आप इस पहेली को अच्छी तरह से समझ गए होंगे. अगर कुछ कंफ्यूजन हो तो कमेंट बॉक्स में लिखें. हम उसका जवाब खोजकर लाएंगे.


वीडियो – UP में कोरोना से हुई मौत के आंकड़ों से बहुत ज्यादा हैं डेथ सर्टिफिकेट की संख्या

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