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श्रीदेवी से बढ़िया नागिन हिंदी सिनेमा के इतिहास में न हुई है, न होगी

जब-जब भी कहीं बीन की सुनाई देती है, मुझे फटाक से श्रीदेवी याद आ जाती है. क्यों? क्योंकि मेरे ज़हन में एक तस्वीर अटकी हुई है. सफ़ेद ड्रेस में अपनी दोनों हथेलियों को नागिन के फन की तरफ फैलाए और आंखों में कहर भरके खड़ी हुई श्रीदेवी. आंखें फैला रखी हैं और न जाने किस रंग के कांटेक्ट लेंसेस हैं, जो आंखों को डरावना बनाने की कोशिश कर रहे हैं.

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इस तस्वीर को दिमाग ने यूं जज़्ब कर लिया है कि बीन की आवाज़ से सीधे यही दिखाई पड़ती है. और यहां आकर इस आर्टिकल की हेडिंग जस्टिफाई हो जाती है. वाकई श्रीदेवी से ज़्यादा अच्छी तरह नागिन का किरदार किसी ने भी नहीं निभाया है. फिर भले ही आप रीना रॉय का नाम क्यों न ले आएं. हालांकि ये निजी राय ही है और आपको इससे असहमत होने का पूरा अधिकार है.

1986 में आई ‘नगीना’ ने परदे पर नागिन कैसी दिखनी चाहिए इसके स्टैण्डर्ड सेट किए. ज़हर सिर्फ रगों में नहीं आंखों में भी कैसे हो सकता है, इसका ट्युटोरियल था श्रीदेवी का ये रोल. ये गाना तीन दशक बाद भी विजुअली इतना स्ट्रांग है कि इसे लूप पर देखा जा सकता है.

तांत्रिक भैरोनाथ को भनक लगी है कि राजीव के घर में किसी नागिन की रिहाइश है. राजीव की मां उन्हें लाई है. राजीव की पत्नी रजनी ही नागिन है. बाबा ने भांप लिया है. न सिर्फ ये कि वो नागिन है बल्कि ये भी कि वो इच्छाधारी है. उसके पास से वो मणि मिलेगा, जिसकी भैरोनाथ को बरसों से तलाश है. अब बस इतना करना है कि नागिन को काबू में कर लेना है. बाबा इसीलिए आया है. पूरी तैयारी के साथ. अपने तमाम चेले-चपाटे और बीन लेकर.

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बीन बजने लगती है और रजनी का अपने शरीर पर से कंट्रोल छूटने लगता है. बेहोशी की आगोश में पहुंचने से पहले वो प्रतिकार करना चाहती है. उस कब्ज़े से आज़ाद होना चाहती है जिसका जाल भैरोनाथ बिछा रहा है. साथ ही उसे चेताना भी चाहती है कि उससे पंगा लेना ठीक नहीं. सपेरे बाबा को लेने के देने भी पड़ सकते हैं. इस पूरी प्रक्रिया के फिल्मांकन से हिंदी सिनेमा के हाथ लगा एक नायाब गीत. ‘मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा’ से बेहतर नागिन गीत आजतक हिंदी सिनेमा के परदे पर नहीं आया है. इस कैटेगरी में एवरेस्ट का दर्जा रखता है ये गीत.

श्रीदेवी, उनका डांस, उनकी ड्रेस और सबसे बढ़कर उनके एक्सप्रेशंस. सब कुछ वाह-वाह था इस गाने में. आनंद बख्शी के लिखे बोलों के साथ पूरा न्याय किया है श्रीदेवी ने.

जब वो कहती है,

“आज का बदला मैं बस लूंगी
छेड़ न मुझको मैं डस लूंगी”

तो हमें पता होता है कि ये किसी भी पल होने की संभावना है. इन मोहतरमा को न छेड़ने में ही भलाई है. पता नहीं कैसा अहमक है ये तांत्रिक, जो आने वाले ख़तरे को भांप नहीं पा रहा है. वो चेता भी रही है कि उसका डसा हुआ पानी नहीं मांगता, फिर भी मूर्खों की तरह उसे काबू करने की कोशिशें किए जा रहा है. मरेगा कम्बख्त!

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रजनी ने साफ़-साफ़ घोषणा कर दी है.

“देखेगा न तू कल का सवेरा”

हर दर्शक को भरोसा है कि ये महज़ गीदड़ भभकी नहीं है. भविष्यवाणी है. सपेरे ने कल का सूरज नहीं ही देखना है. होता भी ऐसे ही है. भैरोनाथ रजनी को काबू में करने और मणि हासिल करने के सपने देखता हुआ फानी दुनिया से रुख्सत हो जाता है.

लिरिक्स, म्यूजिक, गायन, डांस, फिल्मांकन हर मुहाज़ पर ये गाना ‘ए प्लस’ स्कोर हासिल करता है. श्रीदेवी ने अगर अपनी पूरी ज़िंदगी में सिर्फ यही एक गाना किया होता तो भी उन्हें इतनी शोहरत मिलती ऐसा मेरा दावा है.

भले ही इस गाने को आनंद बख्शी ने बेहद दक्षता से लिखा हो,
लता मंगेशकर जैसी स्वर कोकिला ने डूबकर गाया हो,
या लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का कर्णप्रिय म्यूजिक इसकी ख़ासियत हो,

मेरे लिए ये गाना सिर्फ और सिर्फ श्रीदेवी का रहेगा. और किसी का ये हो ही नहीं सकता.

वी लव यू श्रीदेवी!

देखिए पूरा गाना:


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