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भारत का अगला विलुप्तप्राय जानवर गाय है!

जब हम-आप और हम जैसे लोग चौथी या पांचवीं कक्षा में रहे होंगे, तो हमसे निबंध लिखवाया जाता था. ये एक्सरसाइज गाय पर निबंध लिखे बिना पूरी नहीं होती थी. हिन्दी में निबंध हो तो शुरुआती लाइनें कुछ इस तरह की होती थीं-

गाय एक पालतू जानवर है. उसके चार पैर होते हैं. उसकी दो सींग और एक पूंछ होती है… वगैरह-वगैरह.

अंग्रेजी के साथ भी ऐसा ही था. Essay लिखने को कहा जाता था. अंग्रेजी वाले भी लिखते थे-

Cow is a pet animal. She has four legs. She has two horns and one tail…

आज भी कमोबेश ऐसा ही होता है. कम से कम सरकारी स्कूलों में तो ऐसे ही हालात है. लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए हिंदी में जो ‘है’ है या फिर अंग्रेजी में जो ‘is’ है, वो था या was में बदल जाएगा. निबंध तब भी लिखे जाएंगे, लेकिन उसके साथ एक और शब्द जुड़ जाएगा विलुप्तप्राय. ये कोई खयाली पुलाव नहीं है. गोरक्षकों ने देश में जिस तरह से माहौल बना रखा है, वो दिन दूर नहीं है, जब लिखा जाएगा कि गाय एक पालतू जानवर थी.

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दूध न देने वाली गायों को लोग खुला छोड़ देते हैं, जो कूड़े से पॉलिथीन खाती नजर आ जाती हैं.

11 नवंबर को राजस्थान के अलवर जिले में एक शख्स की पीटकर हत्या कर दी गई, जबकि दूसरे की हालत गंभीर बनी हुई है. जो बताया जा रहा है, उसके मुताबिक मामला सिर्फ इतना सा है कि हरियाणा-राजस्थान बॉर्डर पर उमर और ताहिर पिकअप ट्रक से हरियाणा के मेवात से गायें लेकर भरतपुर जा रहे थे. रास्ते में भीड़ ने उन्हें रोक लिया और इतना मारा कि उमर की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि ताहिर को अस्पताल ले जाना पड़ा.

आखिर ये कौन लोग हैं, जो किसी को गाय ले जाने नहीं दे रहे हैं. आखिर किसने इन्हें इतनी छूट दे रखी है कि रास्ते में किसी को रोककर उसकी जान ले लें. क्या गाय उनके लिए इतनी कीमती है कि वो उसके लिए किसी की जान ले लें. शायद नहीं, उन्हें गाय से ज्यादा चिंता अपने अस्तित्व की है. उस अस्तित्व की, जिसकी बुनियाद ही गाय की रक्षा से जुड़ी है और इसलिए उन्हें गोरक्षक कहा जाता है.

एक गाय से जुड़ी कितनी परेशानियां होती हैं या हो सकती हैं, एक गाय पालने वाला ही जान सकता है. गोरक्षा के नाम पर कानून बनाने वाला और फिर उन्मादी भीड़ को खुली छूट देने वाला आदमी गाय के बारे में जानता ही कितना है?

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गाय की देखभाल करना बहुत ही मुश्किल काम है.

गाय पालने के लिए पहले तो किसी के पास पर्याप्त जमीन हो, उसे खिलाने के लिए भूसा और अनाज की पर्याप्त व्यवस्थाा हो. एक किलोमीटर या उससे भी दूर बने खेतों से हरा चारा काटकर लाने वाला कोई हो, गाय को नहलाने, टाइम पर खाना देने और गाय के गोबर को हटाने के लिए कोई तत्परता दिखाने वाला हो. सुबह-शाम गाय को दुहने के लिए भी एक आदमी चाहिए, जिसे ये कला आती हो. अगर ये सब करने वाला कोई मौजूद है, तो उसे ये भी देखना पड़ता है कि गाय कभी खूंटे से खुल न जाए. अगर खुली तो या तो घर में तोड़-फोड़ करेगी या फिर किसी के खेत को नुकसान पहुंचाएगी. ये मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी है, क्योंकि मेरे घर में आज भी गाएं हैं.

इतनी मशक्कत उस गाय के लिए तो की जा सकती है, जो दूध देती है. लेकिन अगर कोई गाय दूध न देती हो तो उसका क्या. एक या दो गाय की सेवा तो बिना फायदे के कोई कर सकता है, लेकिन इससे ज्यादा. इससे ज्यादा एक औसत किसान के लिए तो किसी भी सूरत में संभव नहीं है. वो खुद के खाने के लिए अनाज पैदा करने में नाकों चने चबा रहा है, गाय को खिलाने के लिए वो अनाज कहां से लाएगा और वो भी ऐसी गाय, जिससे कोई फायदा भी न मिलता हो.

इसके अलावा एक और भी दिक्कत है. दिक्कत ये कि अगर गाय को बच्चा हुआ और वो बछिया हुई तब तो ठीक है, लेकिन अगर वो बछड़ा हुआ, तो उसका क्या. पूरी खेती-किसानी ट्रैक्टर और मशीनों से होने लगी है. ऐसे में बछड़े की जरूरत किसी को भी नहीं है. दूध देने वाली गाय को पालना ही मुश्किल होता जा रहा है, बछड़ा पालने के लिए पैसे कहां से लाएं. गाय की केवल चिंता करने वाले लोग कहते हैं कि पाल नहीं पाते, तो उन्हें खुला छोड़ दो. चलो भाई आपकी बात मान ली, उन्हें खुला छोड़ दिया. अब क्या. उन्हें खाना कहां मिलेगा? वो किसी के खेत में ही तो जाएंगी, उनकी फसल चरेंगी और जिस आदमी की फसल का नुकसान होगा, वो लट्ठ लेकर आपके दरवाजे पर खड़ा होगा. आप क्या करेंगे?

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गोशालाओं में गाएं बेहतर स्थिति में नहीं है. उनके खाने के लिए पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं.

कुछ लोग गोशालाओं का उदाहरण देते हैं कि जो गाय आपके काम की नहीं है, वहां भेज दो. तो पहली बात तो ये है कि गोशालाएं इतनी संख्या में हैं ही नहीं कि उन गायों का पालन कर सकें. और दूसरी बात, इक्का-दुक्का गोशालाओं को छोड़ दें, तो उनकी हालत इतनी खराब है कि गाएं वहां तिल-तिलकर मरती हैं. यूपी के बहराइच से लेकर राजस्थान के सिरोही के नंदगांव गोशाला तक के उदाहरण देख लीजिए. सब साफ हो जाएगा. अब एक बार को मान लेते हैं कि चलो गोशालाएं बेहतर स्थिति में ही हैं और गोपालक या कोई किसान अपनी पुरानी हो चुकी गाय या फिर बछड़े को इन गोशालाओं तक ले जाना चाहता है. ऐसे में उनके रास्ते में आकर खड़े हो जाते हैं ये कथित गोरक्षक, जिनके पास गायों को बचाने या उन्हें खिलाने का उपाय नहीं होता है. उनके पास होती है एक उन्मादी भीड़, जो किसी भी गाय ले जाने-ले आने वाले को पीटकर मार डालने के लिए आमादा होती है. अभी पहलू खान की हत्या की बात लोग भूले भी नहीं हैं, जिसकी हत्या किसने की, किसी को नहीं पता है. जिनपर हत्या का आरोप लगा, उन्हें क्लीन चिट मिल गई है.

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गाय लेकर जा रहे किसी शख्स पर अक्सर कथित गोरक्षक हमला कर उसकी जान ले लेते हैं.

फिर क्या करे कोई. इतनी मशक्कत कर गाय पाले या फिर गोरक्षकों से जान बचाए. उपाय तो यही है कि ना कि वो गाय पालना बंद कर दे. दूध नहीं मिलेगा, इस बात से समझौता कर ले. सरकार का दावा है कि उज्ज्वला योजना से गांवों में घर-घर तक गैस पहुंच गई है. ऐसे में गांवों के लोगों को उपलों की भी जरूरत नहीं है. तो फिर इकलौते दूध के लालच में जान गंवाने से तो बेहतर ही है कि वो गाय पालना बंद कर दे. फिर हमारी आने वाली पीढ़ियों को पढ़ाया जाएगा-

एक समय की बात है. एक गांव में किसान रहता था. वो गाय पालता था.

या फिर बताया जाएगा-

एक समय की बात है, जब भारत में गाय हुआ करती थी. 

आप कौन सी स्थिति चाहते हैं, तय कर लीजिए, लेकिन तय करने से पहले एक बार कूड़े से पॉलिथिन खाती गायों पर भी नज़र ज़रूर मार लीजिएगा.


वीडियो में देखें गांव की प्रधान मोदी से नाउम्मीद क्यों है

ये भी पढ़ें:

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गाय पर एक निबंध

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