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क्या वैक्सीन के ह्यूमन ट्रायल में हिस्सा लेने वालों को पैसे दिए जाते हैं?

“डॉक्टर परेशां है सारे
झक हकीमों ने मारी
बढ़ती ही जाती है हर दिन
कैसी है ये बीमारी”
मर्ज़ जाता नहीं चैन आता नहीं”

‘राजू बन गया जेंटलमैन’ में शाहरुख़ खान, नाना पाटेकर और जूही चावला ने इस गाने पर ग़दर काटा था. किसे पता था कि ये गाना 28 साल बाद किसी सिचुएशन में एकदम फिट बैठेगा. मतलब गाना सुनने में ऐसा लग रहा है जैसे कोरोना के लिए लिखा गया है. खैर.

कोरोना की दवा और वैक्सीन को लेकर बहुत काम चल रहा है. ICMR ने तो लगे हाथ डेट भी दे दी है. कहा कि 15 अगस्त, 2020 को भारत बायोटेक और ICMR की बनाई हुई कोरोना की वैक्सीन देश के लोगों के हाथ में होगी. लोगों ने सवाल उठाए. कहा कि साहब, इतनी जल्दी कैसे? ICMR ने कहा कि नियम क़ानून और तरीक़ा सबकुछ का पालन कर रहे हैं. ह्यूमन ट्रायल सही से होगा. तभी वैक्सीन लोगों को दे रहे हैं.

तो अब सवाल है कि ह्यूमन ट्रायल होता कैसे है? इसके नियम क्या होते हैं? किसी वैक्सीन के बनने से लेकर आख़िर में उसके आपके-हमारे हाथ में आने के बीच तक में कितना झाम फैला हुआ है? ये सब देखते-जानते हैं, आसान भाषा में.

ह्यूमन ट्रायल से पहले की कहानी क्या होती है?

मान लीजिए कि आप कार कम्पनी के मालिक हैं. और आपने एक नए डिज़ाइन की कार बनाई. आप कार को बेचना चाहेंगे. लेकिन बेचने के पहले कार की सेफ़्टी जांचना चाहेंगे, उसमें जो आपने भर-भरके फीचर डाले हैं, सही से काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी जांच करेंगे. और किसी को टेस्ट ड्राइव के लिए दें, उसके पहले कम्पनी में ही जांच करेंगे. वैक्सीन की कहानी भी यही है. लैब में बना तो ली. वायरस का कमज़ोर रूप लेकर. लेकिन इंसानों पर जांचने के पहले बंदरों पर इसकी जांच करेंगे. क्योंकि बंदरों के जो जीन होते हैं, हम इंसानों के बहुत क़रीब के होते हैं. बंदरों में अगर किसी वैक्सीन ने सही-सही काम कर दिया, तो फिर हमारा नम्बर आता है. और फिर देश-दुनिया की जनसंख्या को निरोग बनाने, सुधारने का ज़िम्मा हमारे कंधों पर. वैक्सीन की जांच हम पर की जाएगी.

वैक्सीन बनाने में मनुष्य से पहले रिस्क लेते हैं ये बंदर. और अक्सर ट्रायल में बहुत सारे बंदरों की जान चली जाती है.

ह्यूमन ट्रायल की शुरुआत कैसे होती है?

भारत के संदर्भ से समझिए. एक संस्था है CTRI. क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ़ इंडिया. किसी भी ह्यूमन ट्रायल, जिसे डॉक्टरी सुविधा में किया गया क्लिनिकल ट्रायल भी कहते हैं. यहां अपने लैब में किए गए सारे प्रयोगों और ग़ैर-इंसानों पर किए गए ट्रायल के रिज़ल्ट के साथ जाना होता है. यहां आपको बताना होता है कि आप कितने चरणों में कितने लोगों पर ट्रायल करेंगे? किस तरीक़े से ट्रायल करेंगे? CTRI देखती है कि आपके परिणाम सही हैं, भरोसा करने लायक है, उसे लगता है कि आप कुछ कमाल कर सकते हैं अपनी वैक्सीन से, आपको मिल जाती है परमिशन. फिर आता है अगला स्टेप.

लेकिन अगले स्टेप पर जाने से पहले जान लीजिए कि किसी वैक्सीन के ट्रायल के कितने तरीक़े होते हैं?

मोटामोटी दो तरीक़े होते हैं.

पहला तरीक़ा : लोगों को एक्सपेरिमेंटल वैक्सीन का डोज़ दिया गया. उसके बाद उन्हें निश्चित समयांतराल में जिस रोग की वैक्सीन लगायी गयी है, उस रोग का इन्फ़ेक्शन भी अक्सर दिया जाता है. जानबूझकर. और देखा जाता है कि क्या उनमें उस रोग के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई है या नहीं? इसे कंट्रोल ट्रायल कहते हैं. आपको पता है कि किन्हें इंफ़ेक्शन दिया गया. सब आपके कंट्रोल में. लेकिन हर बार इंफ़ेक्शन दिया जाए, ऐसा नहीं होता है. कई बार लैब में काम करने वाले लोगों पर ही इस वैक्सीन का एक्सपेरिमेंट किया जाता है. लेकिन इसके दुष्परिणाम ज़्यादा होते हैं. अक्सर देखा गया है कि इस क़िस्म के ट्रायल में हिस्सा लेने वालों की जान पर बन आती है. इसलिए ये तरीक़ा ज़्यादतर जानवरों में ही इस्तेमाल में लाया जाता है. साथ ही इसमें कम लोग हिस्सा लेते हैं तो वैक्सीन कितनी कारगर है, इसका भी पता नहीं लग पाता है.

दूसरा तरीक़ा : ये है रैंडमायज़्ड ट्रायल. ये एक क़िस्म से लम्बा तरीक़ा है, लेकिन ज़्यादा पक्का है. जिन्हें एक्सपेरिमेंटल वैक्सीन लगायी जाती है, उन्हें उनका रोज़मर्रा का जीवन जीने के लिए छोड़ दिया जाता है. कोरोना जैसे संक्रामक रोग की वैक्सीन है तो लोगों के बीच इंफ़ेक्शन बढ़ने का इंतज़ार किया जाता है. वैक्सीन बनाने वाले वैज्ञानिक समय-समय पर ट्रायल में भाग लेने वालों की जांच करते रहते हैं. क्या वो इंफ़ेक्ट हुए? नहीं हुए तो बहुत अच्छा. और अगर हो गए तो किस हद तक हुए? हो गए तो क्या दूसरों को इंफ़ेक्ट कर सकते हैं? नहीं कर सकते. मामला फ़िट. इसे ब्लाइंड ट्रायल भी कहते हैं, क्योंकि इसमें बहुत सारे लोगों को शामिल किया जाता है और उन्हें बताया नहीं जाता है कि उन्हें वैक्सीन दी गयी है. ये कई चरणों में होता है तो सेफ़ माना जाता है. फ़ायदा भले न हो, रिस्क कम होता है.

कैसे होता है टेस्ट सब्जेक्ट यानी वॉलंटियर्स का चुनाव?

वैक्सीन के ट्रायल के पहले लोगों की भर्ती की जाती है. पहले और दूसरे चरण के लिए. विज्ञान की भाषा में इन्हें टेस्ट सब्जेक्ट कहते हैं, और आम बोलचाल की भाषा में वॉलंटियर्स. इन वॉलंटियर्स को बताया जाता है कि आप अगर इस ट्रायल में हिस्सा लेंगे तो मानव जाति की बेहतरी के लिए योगदान करेंगे.

जेनिफ़र हॉलर के नाम रिकार्ड है. उन्होंने अमरीका की मॉडर्ना द्वारा विकसित की जा रही वैक्सीन के पहले टेस्ट सब्जेक्ट का रोल निभाया. और कोरोना वैक्सीन ट्रायल में हिस्सा लेने वाले पहले मनुष्य के तौर पर जेनिफ़र का नाम दर्ज हुआ. (तस्वीर : AP)

वॉलंटियर्स ने ट्रायल में शामिल होने के लिए हामी भर दी. तो उनका हेल्थ चेकअप कराया जाता है. इस बात की तस्दीक़ की जाती है कि वे एकदम निरोग हैं. और उन्हें कोई ऐसी दिक़्क़त नहीं है, जिससे इस वैक्सीन से उन्हें दिक़्क़त हो सकती है. फ़िट निकले तो उनसे एक क़रारनामे पर दस्तखत कराया जाता है. ये क़रारनामा वॉलंटियर्स और वैक्सीन बनाने वाली संस्था के बीच का होता है. इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस, BHU के एक डॉक्टर बताते हैं कि इस क़रारनामे में लिखा होता है कि ट्रायल में शामिल वॉलंटियर ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने का काम नहीं करेगा. और ये भी कि वो अपनी मर्ज़ी से इसमें हिस्सा ले रहा है. और भी दूसरी शर्तें लिखी होती हैं, जिनसे वैक्सीन के ट्रायल में पास होने की सम्भावना को बढ़ावा मिले.

कई देशों में इन वॉलंटियर्स का बीमा कराया जाता है. कई केसों में वालेंटियर्स को एक निश्चित धनराशि भी दी जाती है. ताकि अगर इस ट्रायल में उन्हें कुछ हो जाए, तो उनके घरवालों और उनके आश्रितों को मुआवज़ा मिल सके. साथ ही उनकी पहचान गुप्त रखी जाती है. लेकिन पहचान को ज़ाहिर करने या छिपाने का पूरा अधिकार इन वॉलंटियर्स के पास होता है.

कितने चरणों में होता है वैक्सीन का ट्रायल?

इसके कुल चार चरण हैं. फ़ेज़ 1 से लेकर 4.

फ़ेज़ 1 : इस फ़ेज़ में अमूमन 5-10 लोग हिस्सा लेते हैं. जिन वॉलंटियर्स का चुनाव किया जाता है, उन्हें वैक्सीन की एक निश्चित मात्रा लगाई जाती है. कई केसों में वैक्सीन का डोज़ 15 दिन से 1 महीने के बीच में दुहराया भी जाता है. उसके बाद देखा जाता है कि उनमें वैक्सीन के कोई साइड इफ़ेक्ट तो नहीं पैदा हो रहे हैं? नहीं हो रहे हैं तो अगले फ़ेज़ की तरफ़ बढ़ा जाता है. हो रहे हैं तो ट्रायल यहीं फ़ेल. इसमें अकेले 1-2 महीने का समय लगता है.

फ़ेज़ 2 : इस फ़ेज़ में तक़रीबन 100-1000 लोग हिस्सा लेते हैं. यहां भी वॉलंटियर्स की भर्ती होती है. लेकिन इन पर पहले फ़ेज़ वाले वॉलंटियर्स जैसा रिस्क नहीं होता है. क्योंकि वैक्सीन से कोई दिक़्क़त नहीं हो रही है, ये तो पता चल गया है. बस अब रोग से बचा रही है या नहीं, इसकी जांच की जानी होती है. तो मुआवज़ा और बाक़ी जो बीमा है, उस सबकी सुविधा यहां कम हो जाती है. पहले फ़ेज़ वाले तो शामिल होते ही हैं, नए वाले वॉलंटियर्स भी जुड़ जाते हैं. आधे लोगों को वैक्सीन लगायी जाती है, और आधे लोगों को धोखे का इंजेक्शन. जी हां. इस धोखे वाले इंजेक्शन को प्लसीबो (placebo) कहा जाता है. इसमें अक्सर केवल इंजेक्शन वाला पानी होता है. तो जिन्हें वैक्सीन दी गयी है, और जिन्हें ये प्लसीबो दिया गया है, उनमें होने वाले परिवर्तनों को देखा जाता है. सब सही निकला तो आगे की बात. इस चरण में 4-5 महीने का समय लग जाता है. इस समय में देखा जाता है कि कितने वॉलंटियर्स रोग से इंफ़ेक्ट हुए, कितने नहीं.

अब यहां पर एक पॉज़ ले सकते हैं. कोरोना की वैक्सीन के संदर्भ में बात करें तो ये दोनों चरण एक साथ किए जा रहे हैं. अगर इन्हीं दो चरणों में आशाजनक परिणाम मिल गए और ट्रायल की अनुमति देने वाली संस्था मान गयी, तो ट्रायल यहीं रोक सकते हैं. और वैक्सीन का प्रोडक्शन शुरू कर सकते हैं. फिर भी 4-5 महीने कम से कम लग ही जाते हैं. लेकिन अगर ट्रायल की अनुमति देने वाली संस्था नहीं मानी, तो अगले चरण के ट्रायल करने होंगे. फिर आता है फ़ेज़ 3.

फ़ेज़ 3 : अब वॉलंटियर्स की भर्ती का काम ख़त्म. लोगों की संख्या बढ़कर कई हज़ार में पहुंच जाती है. लोगों को धकापेल वैक्सीन लगाई जा रही है. जल्दबाज़ी इसलिए क्योंकि इन्हीं लोगों को बचाने के लिए वैक्सीन बनाई भी गयी है. लोग घुलमिल रहे हैं. रोग फैल रहा है. 10-12 महीने बीत गए. वैज्ञानिक देख रहे हैं कि वैक्सीन वाले कितने लोगों को रोग हुआ, और कितनों को नहीं. मनमाफ़िक आंकड़े आ गए. तो फ़ेज़ 3 के बाद ही सीधे वैक्सीन का निर्माण शुरू कर सकते हैं. और नहीं आए तो आख़िर में आता है फ़ेज़ 4.

फ़ेज़ 4 : ये 1-5 साल या उससे ज़्यादा भी चल सकता है. रोग-रोग के हिसाब से ये टाइमलाइन बदल सकती है. इस फ़ेज़ में लाखों की संख्या में लोग भाग ले रहे हैं. काम यहां भी वही. वैज्ञानिक अब बस देख रहे हैं कि कितने लोग रोग से सुरक्षित बचे. ज़्यादा लोग बच गए. वैक्सीन काम कर गयी.

कैसे पता चलता है कि वैक्सीन सफल है?

पहले तो ये बात साफ़ होनी चाहिए कि वैक्सीन लेने का मतलब ये नहीं होता है कि आपको ये रोग कभी नहीं होगा. क्योंकि तमाम वैक्सीन 100 प्रतिशत कारगर नहीं होती हैं. पोलियो जैसे रोग की मुंह से देने वाली वैक्सीन को 95 प्रतिशत तक ही कारगर माना गया है. यानी इस वैक्सीन को लेने वाले 5 प्रतिशत बच्चों को पोलियो हो सकता है. यही हाल दूसरे रोगों की वैक्सीन का भी है. तो एक ख़ास प्रतिशत तक अगर वैक्सीन लोगों को रोगी होने से बचा रही है, तो मामला फ़िट है.

कुल इतने चरणों के बाद वैक्सीन किसी रोग के लिए मुफ़ीद समझी जाती है. बड़ी संख्या में वैक्सीन को इधर से उधर ले जाने के लिए पैकेजिंग तैयार की जाती है. शीशे की बोतलें, पैकेट, सिरींज और वैक्सीन को लोगों की भलाई के रवाना कर दिया जाता है.

बोनस का ज्ञान :

आप किसी रोग से बच जाएं तो क्या इस धरती के सारे लोगों को वैक्सीन लगवाना चाहिए? जवाब है, नहीं. वैज्ञानिक कहते हैं कि हर्ड इम्यूनिटी यानी पूरी मानव प्रजाति में रोग से लड़ने की क्षमता विकसित हो, इसके लिए कुल जनसंख्या के 60 प्रतिशत लोगों को वैक्सीन लगाने से काम हो जाएगा. यानी इतने लोगों को लगा दिया तो संक्रमण की साइकिल आउट. और वायरस का काम ख़त्म.

चलते-चलते वो गाना, जिससे इस पूरे ज्ञान की शुरुआत होती है. और आख़िर में एक सवाल : ICMR और भारत बायोटेक कैसे एक महीने में वैक्सीन का ट्रायल पूरा कर लेंगे?


लल्लनटॉप वीडियो : कोरोना वैक्सीन लॉन्च करने की डेडलाइन पर ICMR ने अब ये कहा है

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