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लॉकडाउन से डरने वाले लोगो! ये ख़बर पढ़ लो, फिर किसी से डर नहीं लगेगा

एक इंसान के तौर पर हमारी अभिलाषाएं बहुत ज़्यादा हैं. कई बार वो अभिलाषाएं वाजिब भी होती हैं. हम अपनी सरकार की तरफ़ देखते हैं. सोचते हैं कि सरकार अपने पितातुल्य ओहदे का निर्वहन क्यों नहीं करती है? हमें इस लॉकडाउन की भयावह आहट और नंगी आंख से न दिखने वाले वायरस से हो रहे संक्रमण से क्यों नहीं बचा लेती है? 

इतने जटिल पैराग्राफ़ के लिए माफ़ी चाहता हूं. और बातचीत में अपने परिचित सुरेश को लेकर आता हूं. सुरेश ख़ुद दरभंगा का रहने वाला है. नोएडा सेक्टर-16 मेट्रो स्टेशन पर रिक्शा चलाता है. वो मेट्रो स्टेशन, जो देश के सूचना तंत्र के केंद्र को जोड़ता है. सुरेश सवारियों को फ़िल्म सिटी में उनके दफ़्तरों तक ले जाता है.

साल 2020 में जब लॉकडाउन लगा तो सुरेश का फ़ोन आया था मेरे पास. ‘सर, हम घर जा रहे हैं’. इतना कहकर सुरेश ने फ़ोन काटा और घर चला गया. 6 महीने बाद जब वो वापस आया तो भी मेरे पास उसकी आमद का फ़ोन कॉल आया था. ‘सर, हम आ गए हैं’.

मेट्रो में हर बार की तरह भीड़ दिखाई नहीं दी. हालांकि कईयों ने इस सेवा का लाभ उठाया. (फोटो-PTI)
सनसनाती मेट्रो फिर से खुली और उपजे सवाल (फोटो-PTI)

लेकिन अब सुरेश को नहीं पता है कि इस फिर से भयावह होते हालात में क्या किया जाए? वो समझ नहीं पा रहा है कि जब केस नहीं बढ़ रहे थे तो सरकार ने जीवन को लेकर इतना ज़्यादा आसान अप्रोच क्यों शुरू कर दिया? क्यों सिनेमाघर और मेट्रो पूरी कपैसिटी में खोल दिए गए? (और दफ़्तरों में आदेश आ गया कि अपने या दफ़्तरी वाहन से ही ऑफ़िस आना है.) क्यों हवाई जहाज़ों में बीच की सीट ख़ाली नहीं छोड़ी जाने लगीं? क्यों चुनाव की रैलियों में भीड़ होने लगी, और पार्टी के प्रवक्ता उस भीड़ की तस्वीर को बतौर उपलब्धि शेयर करने लगे? क्यों उसके घर-गांव में लोग टीवी पर ये कहते कि यहां पर तो कोरोना है ही नहीं – या भाग गया है. कुछ महीने पहले तक सख़्ती बरपा रहा प्रशासनिक अमला लाठी लेकर क्यों नहीं दौड़ा रहा था? क्यों जनचेतना ग़ायब हो गयी? अवेयरनेस कैम्पेन ख़त्म क्यों हो गए? गांव के जो प्राथमिक विद्यालय क्वारंटीन सेंटर बने हुए थे, वहां पूरी तादाद में कक्षाएं क्यों चलने लगीं? सबकुछ का विकल्प सरकार दे पाने में क्यों असफल रही? 

सुरेश के सवाल, ज़ाहिर है, अनुत्तरित कर देने वाले हैं. ऐसे में जब सुरेश इस चिंता में है कि सरकार फिर से लॉकडाउन न लगा दे तो क्या ग़लत है? सुरेश इस चिंता में भी है कि वैक्सीन लगाने का जो कार्यक्रम चल रहा है, उसे सबके लिए क्यों नहीं खोला जा रहा है? क्योंकि सुरेश की कमाई जो वैसे ही रसातल में चली गयी थी, वो अब और भी संदेह में है. मेट्रो कम लोग पकड़ते हैं, तो रिक्शा और भी कम लोग पकड़ते हैं. सुरेश कहता है,

“सर हमको बस ये जानना है कि जब वैक्सीन है तो सरकार सबको लगाकर सब ठीक कर दे. कोई कमी-वमी है क्या? फिर सब लोग जिएगा और आराम से काम पर जाएगा.”

लेकिन सुरेश की ये नादान जिज्ञासा बहुत संदेहास्पद है. जिन ग्राहकों का या कमाई के संसाधनों का या एक कोविड-फ़्री वर्ल्ड की हमारी जिज्ञासाएं हैं, उसमें हम कहां हैं? हम क्यों इतने ज़्यादा कमज़ोर और मनुष्य के तौर पर लाचार हुए? क्यों हमने कहावत ‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’ को उसकी सम्भावना से ज़्यादा चरितार्थ कर दिया? 

लाजिमी है सरकार से सवाल पूछे जाएं. पूछे जाने भी चाहिए. लेकिन ख़ुद के बारे में सोचिए और इन सवालों के जवाब दीजिए :

> सब्ज़ी, फल, किराना, दूध-दही की दुकानों पर आपने पहले कब सफ़ेद गोला देखा था? जो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए उपयोग में लाया जाता है?

> आपने आख़िरी बार किस मॉल या बाज़ार में लोगों को बेहद मुस्तैदी के साथ मास्क पहनकर और बिना जमघट लगाए ख़रीददारी करते देखा था?

> आख़िरी बार कब आपने किसी को या किसी ने आपको मास्क न पहनने के लिए टोका था?

> बाज़ार से सामान लाकर प्रतीकात्मक डिसइंफ़ेक्शन करने के लिए सामान को साबुन से धोने की परिपाटी आपके आसपास कब हुई थी?

> कितने दिन हुए कि घरों में पार्टी होना, पान-चाय की दुकानों पर अड़ी लगना, बार में बैठकर शराब पीना, रेस्तरां में बैठकर खाना खाना एकदम आम दिखाई देने लगे?

> आपके घर पर सामान देने आने वाला मास्क को लेकर कितना मुस्तैद है?

> ऑफ़िस में लंच करते हुए आपने-परिचितों ने कितनी बार खाना शेयर किया?

समस्या तो ये है कि हम हर क़िस्म के नियमों को किंचित क्रूर समझ लेते हैं. उन्हें अपने जीवन में अतिक्रमण समझते हैं और सोचते हैं कि अब कहा नहीं जा रहा है तो मानना कौन-सी मजबूरी है? और साथ ही ये बात भी कि हमने मिसाल क़ायम करने का कोई ठेका नहीं लिया. अब महानगरों की सोसायटियों में घरेलू काम करने आने वाले बंद किए जा रहे हैं. महानगरों से पलायन फिर से शुरू हो चुका है. चीज़ें फिर से बिगड़ रही हैं. लेकिन सबकुछ की आधारशिला हमारी लापरवाहियों पर रखी हुई है. हमने अपनी नकार और बेफ़िक्री के मसाले से बीते कुछ दिनों में वहां पक्का पलस्तर कर दिया. इसलिए जब सबकुछ फिर से लौट आया, तो हम फिर से पैनिक के मोड में हैं. अब सरकार से सवाल पूछने के पहले ध्यानाकर्षण करने की ज़रूरत है. मिसाल क़ायम करने का ठेका उठाना होगा. वरना लॉकडाउन लगा, तो लापरवाही का ज़िम्मेदारी शायद हम पर ही नाज़िल होगी.

अव्वल तो कुछ गया नहीं था. सबकुछ यहीं था. अपने पूरे वजूद में. कोरोना के टेस्ट के नंबर नहीं आ रहे थे, लेकिन सीरो सर्वे के नतीजे तो आ ही रहे थे. जिनमें एंटीबॉडी थी, उनमें से भी कई संक्रमण के शिकार हुए. इस सबकी ख़बरों को अख़बार के बिज़नेस का पन्ना मानकर हमने तज क्यों दिया? सरकार तो इस बात का जवाब देगी नहीं, हम ही देंगे.

समय मुस्तैद होने का है. बेहद संजीदगी से मुस्तैद होने का. किसी की नौकरी नहीं खानी है, न ही ख़ुद की आजीविका गंवानी है. अपनी और दुनिया की मदद के लिए तैयार रहिए. अपने पार्षद, विधायक या सांसद को संपर्क करिए. स्वास्थ्य मंत्री या ज़िलाधिकारी से सवाल पूछिए, ‘साहब, हम तो अपना काम कर रहे हैं, आपसे कहां चूक हो गयी?’


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