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अगले हफ्ते से लगनी शुरू होगी स्पूतनिक-वी, इस रूसी वैक्सीन की सबसे जाबड़ बातें जान लीजिए

भारत में 16 जनवरी से कोरोना वायरस (Coronavirus) के ख़िलाफ़ वैक्सीनेशन शुरू हुआ था. करीब 3 महीने तक देशभर में 2 वैक्सीन के ज़रिये टीकाकरण चलता रहा. कोविशील्ड और कोवैक्सीन. फिर केस बढ़ने लगे. दूसरी वेव आ गयी. वैक्सीनेशन तेज़ करने की ज़रूरत लगी तो 13 अप्रैल को देश में एक और वैक्सीन को अप्रूवल दे दिया गया. रूस में बनी वैक्सीन स्पूतनिक-वी (Sputnik-V). हां, इसको स्पूतनिक वी कहते हैं, रोमन गणित के हिसाब से ‘पांच’ नहीं. वी का फ़ुलफ़ॉर्म हुआ वैक्सीन. ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया (DCGI) ने भी इसके इस्तेमाल को मंज़ूरी दे दी. 1 मई को इस वैक्सीन की पहली खेप भारत आ भी गई. और अब ख़बर है कि अगले हफ्ते यानी 17-18 मई के बाद से कभी भी ये वैक्सीन भारतीय मार्केट में उतारी जा सकती है. नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल ने ये बात कही है. जुलाई से तो स्पुतनिक का भारत में उत्पादन भी शुरू हो सकता है.

अब इस मौक़े पर हम आपको बताने वाले हैं इस वैक्सीन के बारे में एकदम ख़ासमखास बातें.

स्पूतनिक का मतलब होता क्या है?

स्पूतनिक मूलत: रूसी भाषा का शब्द है. मतलब है – रास्ते का साथी. हमसफ़र.

साल 1957 में ये शब्द रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़ा. रूस ने इस साल दुनिया का पहला उपग्रह तैयार किया था. नाम रखा गया स्पूतनिक-1. उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजना था. ये वो समय था, जब अमेरिका ख़ुद का उपग्रह नहीं भेज पा रहा था. अमेरिका और रूस, दोनों महाशक्तियों में स्पेस वॉर चल रही थी कि कौन सच में अंतरिक्ष में जाता है. रूस ने मार ली बाज़ी. भेज दिया अपना उपग्रह. स्पूतनिक का लॉन्च इतना सफल रहा कि कहते हैं कि रूस को स्पूतनिक नाम से प्यार हो गया. इसी नाम से तमाम अंतरिक्ष प्रोजेक्ट लॉन्च किए गए. तमाम सफल रहे, कुछ असफल भी हुए. लेकिन ये नाम रूस को कुल मिलाकर फलता गया.

उपग्रह से उतरे वैक्सीन की दुनिया में 

अब जब एक ‘भूतो न भविष्यति’ टाइप की महामारी यानी कोरोना का टीका बनाने की बात आई तो रूस ने कहा कि चलो, जो नाम आसमान में जम रहा था, उसको ज़मीन पर चलाया जाए. इसी स्पूतनिक नाम से रूस ने वैक्सीन की तैयारी शुरू की. स्वास्थ्य मंत्रालय के अलावा रूस का रक्षा मंत्रालय और गामलेया रिसर्च इंस्टिट्यूट भी साथ जुड़ गए. जिस समय पूरी दुनिया में कोरोना की वैक्सीन ट्रायल वाला हिसाब चल रहा था, उस समय रूस ने ऐलान कर दिया कि बन गयी है वैक्सीन. प्रयोग सफल रहा और स्पूतनिक-V दुनिया की पहली रजिस्टर्ड कोविड वैक्सीन के तौर पर सामने आई. रूस में टीकाकरण भी शुरू कर दिया गया था. शुरुआत में बहुत सारे देशों ने इसके इस्तेमाल को इमरजेंसी अप्रूवल नहीं दिया था. लेकिन बाद में बेलारूस, वेनेज़ुएला, UAE और भारत में वैक्सीन के फ़ेज़-3 ट्रायल कराए गए. ट्रायल का अच्छा परिणाम आने के बाद अब स्पूतनिक-V 60 से ज़्यादा देशों में रजिस्टर्ड हो चुकी है. इन देशों में शामिल कुछ नाम हैं – UAE, वियतनाम, वेनेज़ुएला, सीरिया, श्रीलंका, सेशेल्स, कॉन्गो, फिलीपीन्स, ईरान, इराक, पाकिस्तान और भारत.

कैसे तैयार हुई वैक्सीन?

ये वैक्सीन तैयार कैसे हुई? ये जानने के लिए पहले ये समझना पड़ेगा कि एडेनोवायरस (Adenovirus) क्या होता है. जैसे कोरोना वायरस है, वैसे ही एडेनोवायरस भी होता है. ये भी एक फैमिली ऑफ वायरस है, जिसके अंतर्गत तमाम वायरस आते हैं. ये सर्दी-जुकाम या सांस संबंधी बीमारियां पैदा कर सकता है.

गामलेया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने एडेनोवायरस फैमिली के दो वायरस लिए. Ad 5 और Ad26. दोनों को लैब में निष्क्रिय किया गया. अब जब एक व्यक्ति को वैक्सीन की पहली डोज़ के रूप में निष्क्रिय Ad26 और दूसरी डोज़ के रूप में निष्क्रिय Ad5 दिया गया तो देखा गया कि ये दोनों निष्क्रिय वायरस मिलकर शरीर में वो स्पाइक प्रोटीन बनाने में कामयाब हुए, जो कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ सके. या संक्रमण के ख़िलाफ एंटीबॉडी तैयार कर सके.

Sputnik V
स्पुतनिक-V वैक्सीन के 21 दिन के अंतराल पर दो डोज़ लेने ज़रूरी होते हैं. (फाइल फोटो)

यानी Ad5 और Ad26 मिलकर शरीर में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ इम्युनिटी तैयार करने में सफल रहे. ऐसे में भविष्य में अगर वो व्यक्ति कोरोना वायरस के संपर्क में आता भी है तो संक्रमित होने की संभावना कम रहती है. संक्रमित हो भी गया तो ये संक्रमण गंभीर नहीं होगा. आसानी से रिकवर हो सकता है.

इसी कॉन्सेप्ट पर चलते हुए स्पूतनिक-V की पहली डोज़ में Ad5 और दूसरी डोज़ में Ad26 दिया जाता है. दोनों डोज़ लगने के बाद कोरोना के ख़िलाफ़ मामला दुरुस्त हो जाता है.

वैक्सीन कितनी कारगर?

रशियन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट फ़ंड (RDIF) का कहना है कि वैक्सीन की एफ़िकेसी करीब 92 फीसदी है. हालांकि इस वैक्सीन के भी दो डोज़ ज़रूरी हैं. लेकिन कोविशील्ड और कोवैक्सीन की तुलना में कम दिनों के अंतराल पर इस वैक्सीन के डोज़ लगाए जा सकते हैं. करीब 21 दिनों के अंतराल पर. रही बात वैक्सीन के स्टोरेज की तो पाउडर फ़ॉर्म में इसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के बीच रखा जा सकता है. लेकिन लिक्विड फ़ॉर्म में इसे स्टोर करने के लिए माइनस 18 डिग्री तापमान चाहिए होगा.

अब इस वैक्सीन के साथ भी साइड इफ़ेक्ट का पुछल्ला जुड़ा हुआ है. ख़बरें बताती हैं कि रूस में ही इस वैक्सीन लेने के बाद 4 लोगों की मौत हो गयी थी और ब्राज़ील ने कह दिया है कि ये वैक्सीन हम अपने यहां नहीं लगवाएँगे. क्योंकि हमारे यहां क्लिनिकल ट्रायल हुआ नहीं है. ब्राज़ील वाली बात को तो राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन साइड इफ़ेक्ट पर रूस ने कहा है कि साइड इफ़ेक्ट के केस बहुत ही कम हैं और इससे वैक्सीन की क्षमता पर कोई असर नहीं पड़ता है. इस बात का कई वैज्ञानिकों ने भी समर्थन किया है.

अब वैक्सीन के भारत आने की प्रक्रिया के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अप्रैल को ट्वीट किया है. और आभार प्रकट किया है. उन्होंने कहा,

“मेरे दोस्त प्रेज़िडेंट पुतिन से काफी सार्थक बात हुई. हमने कोविड-19 की स्थितियों पर बात की. रूस इस महामारी में भारत की जो मदद कर रहा है, उसके लिए भी मैंने धन्यवाद कहा. स्पूतनिक-V वैक्सीन को लेकर हमारा साथ मानवता को इस महामारी से उबरने में मदद करेगा. हम आगे बातचीत को रक्षा और विदेश मंत्रालय के स्तर पर भी बरकरार रखने पर सहमत हुए.”

भारत में कौन उत्पादन कर रहा?

भारत में हैदराबाद की मशहूर मेडिकल लैब डॉ. रेड्डीज़ इसका उत्पादन कर रही है. RDIF ने बताया है कि पांच और भारतीय कंपनियां इसका उत्पादन करेंगी. ये पांच कंपनियां हैं ग्लैंड फ़ार्मा, हेटरो बायोफ़ार्मा, पैनसीआ बायोटेक, स्टेलिस बायोफ़ार्मा, विरचोव बायोटेक.

अब बात स्पुतनिक के दाम की. डॉ रेड्डीज़ के मैनेजिंग डायरेक्टर जीवी प्रसाद ने इस बारे में कहा था कि स्पूतनिक के दाम के बारे में अभी बात जारी है. मई में वैक्सीन भारत पहुंचेगी. फिर मार्केट में उतारने से पहले इसके दाम को लेकर स्थिति स्पष्ट की जाएगी. फिलहाल वैक्सीन के एक डोज़ की क़ीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 10 डॉलर यानी क़रीब 750 रुपए बताई जा रही है. भारत में प्रोडक्शन और रखरखाव का हिसाब जोड़ दें, तो दाम में कुछ बदलाव हो सकता है. लेकिन यहां पर एक कैच है. अगर वैक्सीन का जल्द से जल्द भारत में बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू हो जाता है तो ये दाम कम भी हो सकते हैं. फिलहाल मई के पहले हफ्ते में भारत में 5 करोड़ से अधिक डोज़ आने की उम्मीद है.


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