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कोरोना पर चीन को उसी के लोगों ने धोखा दिया!

दुनिया का एक बड़ा हिस्सा कोरोना वायरस (COVID 19) लॉकडाउन से बंद है. मगर चीन, जहां से कोरोना शुरू हुआ, वो खुल रहा है. हूबे प्रांत के लोग बाहर आ-जा रहे हैं. 8 अप्रैल से वुहान शहर की तालाबंदी भी खुलने लगेगी. ऐसे में चीन के बाहर कुछ सवाल जोर पकड़ने लगे हैं. इनमें सबसे अहम सवाल है कि क्या चीन ने कोरोना संक्रमित और मारे गए लोगों की सही संख्या बताई? ये सवाल नए नहीं हैं. मगर बीते दिनों कुछ ऐसी चीजें हुईं, जिन्होंने इन सवालों को नई जान दी. इनमें सबसे अहम हैं दो चीजें-

पहली-

चीन की एक मीडिया कंपनी ‘केक्सिन’ की रिपोर्ट. इसमें ‘अर्न’ का ज़िक्र है. अंतिम संस्कार के बाद शरीर की बची हुई राख जिस पात्र में रखते हैं, उसी को अंग्रेज़ी में अर्न कहते हैं. एक पात्र, यानी एक आदमी की राख. वुहान प्रशासन ने 30 मार्च से वहां कोरोना (COVID 19) के कारण मारे गए लोगों के अवशेष उनके परिवारवालों को देना शुरू किया. परिवार के लोग घंटों लाइन में लगकर अर्न ले रहे हैं.

वुहान की कुल आबादी है करीब 1 करोड़ दस लाख. आधिकारिक संख्या कहती है, यहां लगभग 50 हज़ार लोग कोरोना संक्रमित हुए. इनमें 2,535 लोगों की जान गई. मगर ‘केक्सिन’ की रिपोर्ट के मुताबिक, अंतिम अवशेष वाले जो पात्र आए हैं उनकी संख्या 2,535 से कहीं ज़्यादा हैं. हज़ारों ज़्यादा. पिछले कुछ समय से कोरोना को देखते हुए चीन में अंतिम संस्कार बंद थे. कोरोना से इतर मरने वालों के भी. तो हो सकता है इनमें से कुछ संख्या तो बाकियों की भी हो. मगर फिर भी, कोरोना से जितनी मौतें चीन बता रहा है, उनपर शंका होती है. इसलिए कि इटली, स्पेन, फ्रांस, ईरान और अमेरिका जैसे देश, जहां ये COVID 19 संक्रमण बाद में पहुंचा, वहां इतनी ज़िंदगियां गई हैं. इतनी तेज़ी से फैला है संक्रमण. देखते ही देखते हज़ारों में होती गई संख्या. ऐसे में चीन, जहां कोरोना शुरू हुआ और शुरुआत के करीब सवा-डेढ़ महीने तक इतनी लापरवाही हुई, वहां चीजें इतनी संभली कैसे रहीं?

'केक्सिन' ने काफी विस्तृत रिपोर्टिंग की है कोरोना पर. इस रिपोर्ट में लिखा है कि कोरोना से मारे गए अपने परिवारवालों के अवशेष लेने के लिए लंबी कतारें लगीं. इससे पहले 'केक्सिन' ने ये भी बताया था कि अवशेष वाले पात्रों की संख्या मृतकों की गिनती के मुकाबले काफी ज़्यादा थी (फोटो: Caixin)
‘केक्सिन’ की इस रिपोर्ट में लिखा है कि कोरोना से मारे गए अपने परिवारवालों के अवशेष लेने के लिए लंबी कतारें लगीं. इससे पहले ‘केक्सिन’ ने ये भी बताया था कि अवशेष वाले पात्रों की संख्या मृतकों की गिनती के मुकाबले काफी ज़्यादा थी (फोटो: Caixin)

दूसरी-

अमेरिका में वाइट हाउस को सौंपी गई एक सीक्रेट खुफिया रिपोर्ट. ‘ब्लूमबर्ग’ नाम के एक मीडिया संस्थान ने तीन टॉप अमेरिकी अधिकारियों से बात की.उन्होंने इस गोपनीय रिपोर्ट के हवाले से बताया कि चीन कोरोना (COVID 19) से मारे गए लोगों की संख्या घटाकर बता रहा है. उनके मुताबिक, सीक्रेट रिपोर्ट का सार ये है कि चीन की बताई संख्या फर्ज़ी है.

CIA ने जनवरी में भी सचेत किया था वाइट हाउस को
ये पहली बार नहीं है, जब अमेरिकी खुफिया विभाग ने चीन पर उंगली उठाई हो. ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक, वाइट हाउस अधिकारियों ने जनवरी में ही CIA से कहा था. कि वो कोरोना से जुड़ी चीन की अंदरूनी जानकारियां जुटाए. इसके बाद CIA ने जनवरी में ही ट्रंप प्रशासन को चेता दिया था. कि चीन द्वारा बताई जा रही संख्याओं पर यकीन न किया जाए.

'ब्लूमबर्ग' की इस रिपोर्ट से पहले भी चीन द्वारा दिए गए कोरोना से जुड़े आंकड़ों पर सवाल उठ रहे थे.
‘ब्लूमबर्ग’ की इस रिपोर्ट से पहले भी चीन द्वारा दिए गए कोरोना से जुड़े आंकड़ों पर सवाल उठ रहे थे.

बिना लक्षण वाले मरीज़ों का क्या मामला है?
चीन की बताई कम संख्याओं के पीछे एक और ऐंगल है. ‘केक्सिन’ में 29 मार्च को एक रिपोर्ट आई थी. इसमें जेजैंग प्रांत में मिले एक कोरोना (COVID 19) मरीज़ का ज़िक्र था. इस इंसान को हवाई यात्रा के दौरान संक्रमण हुआ था. आशंका थी कि उसे जिस सहयात्री से इन्फेक्शन मिला, उसमें कोरोना का कोई लक्षण नहीं था. ‘केक्सिन’ की इस रिपोर्ट में लिखा था कि बिना लक्षणों वाले संक्रमित लोगों से जुड़ा कोई डेटा नहीं है चीन के पास. अब इस ख़बर को आइसलैंड से आई एक रिपोर्ट के साथ मिलाकर समझिए. वहां कोरोना जांच कर रही एक कंपनी ने बताया है कि उसके सैंपल में करीब 50 फीसद ऐसे संक्रमित लोग मिले, जिनमें कोरोना का कोई लक्षण नहीं था.

अमेरिका के ‘सेंटर्स फॉर डिज़िज़ कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन’ का भी कहना है. कि कोरोना के लगभग 25 फीसद मरीज़ों में कोई लक्षण नहीं उभरता. मतलब चार में से एक मरीज़. चीन अब तक कोरोना के मरीज़ों की अधूरी गिनती बता रहा था. ऐसे लोग जो कोरोना पॉजिटिव तो हैं, मगर उनमें इसके लक्षण नहीं हैं, उन्हें आंकड़ों में शामिल नहीं किया गया था. काफी मांग करने के बाद चीन ने 1 अप्रैल से इनकी भी गिनती देनी शुरू की है. हालांकि वो अब भी सही संख्या बता रहा है, इसमें शक है. क्योंकि 31 मार्च को आई ‘केक्सिन’ की एक रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से बिना लक्षणों वाले कोरोना पेशेंट्स की संख्या 1,541 बताई गई है. ज़ाहिर है, इसमें पुराना डेटा नहीं है.

चीन ने 1 अप्रैल से बिना लक्षण वाले कोरोना मरीज़ों को भी डेटा में शामिल करना शुरू किया है (फोटो: Caixin)
चीन ने 1 अप्रैल से बिना लक्षण वाले कोरोना मरीज़ों को भी डेटा में शामिल करना शुरू किया है (फोटो: Caixin)

क्या स्थानीय प्रशासन ने चीन की सरकार को भी अंधेरे में रखा?
एक और पहलू बताया जा रहा है इस मामले का. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA के कई जासूस हैं चीन में. NYT के मुताबिक, इन जासूसों से मिली ब्रीफिंग एक दिलचस्प ऐंगल की तरफ इशारा करती है. इसके मुताबिक, शायद चीन की सरकार भी सही संख्या नहीं जानती. अपने यहां कोरोना से मारे गए लोगों की संख्या के बारे में चीन भी उतने ही अंधेरे में है, जितनी बाकी दुनिया. इसकी वजह स्थानीय प्रशासन और नौकरशाह बताए जा रहे हैं.

कैसे, इसको ली वेनलियांग की मिसाल से समझिए.
ली डॉक्टर थे वुहान में. दिसंबर 2019 में उन्होंने अपने साथी डॉक्टरों से कहा. कि शायद सार्स जैसा ही ख़तरनाक वायरस उभरा है. स्थानीय प्रशासन को इसकी ख़बर लगी. पुलिस ने हिरासत में लेकर ली को धमकाया. कहा, वो अफ़वाह फैलाना बंद करें. फरवरी में ली की भी कोरोना से मौत हो गई. लोगों की नाराज़गी के बाद इस मामले की जांच हुई. अब 4 अप्रैल को चीन में राष्ट्रीय शोक मनाया जा रहा है. सुबह 10 बजे तीन मिनट का मौन रखा जाएगा पूरे देश में. उन 14 लोगों के लिए, जो कोरोना से लड़ते हुए शहीद हुए. इन ‘शहीदों’ में ली का भी नाम शामिल है. हो सकता है दुनिया में हुई किरकिरी के बाद चीन दिखावा कर रहा हो सम्मान देने का. मगर फिर भी, ली का केस स्थानीय प्रशासन की बदनीयती की एक मिसाल है.

ये हैं डॉक्टर ली वेनलियांग. उन्होंने 30 दिसंबर को अपने साथी डॉक्टरों के एक ग्रुप में कोरोना पर अलार्म बजाया था. मगर प्रशासन ने उल्टा ली पर कार्रवाई की. उनसे जबरन कबूलनामे पर दस्तख़त लिए. इसपर लिखा था कि उन्होंने अफ़वाह फैलाई और अव्यवस्था फैलाने की कोशिश की (फोटो: रॉयटर्स)
ये हैं डॉक्टर ली वेनलियांग. उन्होंने दिसंबर में ही कोरोना पर चेताया था. मगर प्रशासन ने उल्टा ली पर कार्रवाई की. उनसे जबरन कबूलनामे पर दस्तख़त लिए. इसपर लिखा था कि उन्होंने अफ़वाह फैलाई और अव्यवस्था फैलाने की कोशिश की (फोटो: रॉयटर्स)

लोकल अथॉरिटीज़ पर कुछ गंभीर आरोप
कहा जा रहा है कि शायद इसी तरह स्थानीय प्रशासन ने केंद्रीय कमांड को अंधेरे में रखा. इस डर से कि अगर असल संख्या बताएंगे, तो शायद उनपर कार्रवाई हो. उनसे उनका ओहदा छीन लिया जाए. स्थानीय प्रशासन ने चीजें छुपाईं, इसके कुछ स्पष्ट साक्ष्य हैं. मसलन-

– कोरोना को शुरुआत में ‘रहस्यमय न्यूमोनिया’ कहा जा रहा था. ‘फाइनैंशल टाइम्स’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 30 दिसंबर को चीन में सोशल मीडिया पर ‘वुहान सार्स’ ट्रेंड हुआ. लोग इसी संक्रमण की बात कर रहे थे. मगर प्रशासन ने ऐसे पोस्ट्स को ही सेंसर कर दिया.

– ‘वुहान सेंटर फॉर डिज़िज़ कंट्रोल ऐंड प्रिवेंशन’. इस संस्था पर वुहान शहर में ऐसी बीमारियों को रोकने का जिम्मा है. दिसंबर में ही उसे स्थानीय डॉक्टरों ने संक्रमण की रिपोर्ट दी थी. मगर उसने कुछ नहीं किया.

– चीन की सरकारी न्यूज़ एजेंसी ‘शिन्हुवा’ ने बताया था कि 11 जनवरी को ‘रहस्यमय न्यूमोनिया’ का इलाज कर रहा डॉक्टर भी बीमार हो गया. ये इंसानों से संक्रमण फैलने का इशारा था. ‘केक्सिन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अकेले 15 जनवरी को ही वुहान के सरकारी अस्पताल में इस संक्रमण के 50 नए मामले आए थे. मगर इन रिपोर्ट्स पर ध्यान नहीं दिया गया. उल्टा अस्पतालों को निर्देश दिया गया कि वो इस बीमारी के बारे में सार्वजनिक तौर पर कुछ न कहें.

– ‘वुहान म्यूनिसिपल हेल्थ कमीशन’ ने 16 जनवरी को ही शहर के मेयर झो शियेनवांग को बता दिया था. कि ये वायरस इंसानों से फैलता है. फिर भी प्रशासन ने लोगों को आगाह नहीं किया.

– 23 जनवरी को आख़िरकार जब वुहान में लॉकडाउन हुआ, तब तक करीब 50 लाख लोगों को शहर से निकलने दिया जा चुका था.

अब समझिए कि ये जानकारियां क्यों ज़रूरी थीं.
संक्रमण कैसे फैलता है. कितनी तेज़ी से फैलता है. कितने समय में कितने लोग संक्रमित हुए. किन लोगों पर ज़्यादा खतरा है. मरने वालों का अनुपात क्या है. अगर इन सबकी ठोस जानकारी होती, तो बाहर के देश बेहतर तैयारी कर सकते थे. यात्रा प्रतिबंध लगाना. सार्वजनिक जगहों पर लोगों के जमा होने पर पाबंदी. सोशल डिस्टेन्सिंग. ये सारे फैसले जल्द लिए जा सकते थे. जैसा कि वाइट हाउस की कोरोना टास्क फोर्स की मुखिया डॉक्टर डेबरा बर्क्स ने 31 मार्च को कहा-

चीन ने जो डेटा दिया, उससे दुनियाभर की मेडिकल कम्यूनिटी ने ये समझा कि ये वायरस गंभीर तो है, मगर उतना जानलेवा नहीं है. क्योंकि हमें पूरे आंकड़े नहीं मिले थे. आंकड़ों का एक बड़ा हिस्सा गायब था.

अमेरिका के ‘सेक्रटरी ऑफ स्टेट’ माइक पॉम्पेओ ने भी ऐसी ही बात कही.

इन सारे पहलुओं से इतर कुछ स्पष्ट सत्य हैं. जो चीन की सरकार को कतई बरी नहीं करते. चीन ने आंकड़ों से जुड़ी पारदर्शिता ही बरती होती अगर, तो भी दुनिया को बहुत मदद मिलती. उसने वन्यजीवों का व्यापार बंद करवाया होता, तब शायद ये संक्रमण ही न फैलता.

चीन की तानाशाही आंतरिक मामला बताकर अपनी सीमा में कई आपत्तिजनक चीजें करती है. मसलन, उइगरों पर किया जाने वाला अत्याचार. वो भारत समेत कई देशों को सीमा विवाद के एकतरफा दावे करके परेशान करती है. मगर इस बार उनकी लापरवाही, उनका जानकारी छुपाना, इस वजह से 3 अप्रैल की दोपहर तक दुनिया में 53 हज़ार से ज़्यादा लोग मर चुके हैं. बदतर ये है कि अभी और मौतें होंगी. क्या ये चीजें नज़रंदाज़ की जा सकती हैं?


दुनियादारी: क्या चीन के खान-पान संस्कृति की वजह से वुहान में शुरू हुआ कोरोना वायरस?

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