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नाक में डालने वाला ये स्प्रे क्या वाकई कोरोना वायरस को मार सकता है?

दिसंबर 2019 से ही चीन के वुहान शहर में रहस्यमय संक्रमण से लोगों के बीमार होने की खबरें आने लगी थीं. बाद में इसे कोरोना संक्रमण नाम दिया गया. तब से अब तक लगभग डेढ़ साल होने को है, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कोरोना का कहर जारी है. इसे कंट्रोल करने के लिए कोई स्पेसिफिक दवा नहीं है. कोरोना से निजात पाने के लिए कई लोग दवाओं से परे भी चीजों को देख रहे हैं. ऐसा ही एक नाम है नाइट्रिक ऑक्साइड नेजल स्प्रे (nitric oxide nasal spray) का. नेजल स्प्रे मतलब नाक में डालने वाला स्प्रे. इसके बारे में उम्मीद की जा रही है कि यह कोरोना का इफेक्टिव इलाज हो सकता है. हाल ही में इसके फेज-2 ट्रायल ने भी उम्मीद जगाई है.

ये स्प्रे आखिर है क्या?

नाइट्रिक ऑक्साइड को बैक्टीरिया, फंगी, हेल्मिन्थ (helminths) प्रोटोजोआ और वायरस के खिलाफ काफी प्रभावकारी माना जाता है. SARS-CoV-2 यानी कोरोना संक्रमण से निपटने में नाइट्रिक ऑक्साइड की क्षमता परखने के लिए शोधकर्ताओं ने कई प्रयोग किए. SARS-CoV-2 वायरस की प्रतिकृति पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन किया. उसके बाद सितंबर 2020 में अपने निष्कर्ष प्रकाशित किए. रिसर्च पेपर के लेखकों में से एक स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एके लुंडकविस्ट (Ake Lundkvist) ने दावा किया था,

हमारी जानकारी में नाइट्रिक ऑक्साइड एकमात्र पदार्थ है, जो अब तक SARS-CoV-2 पर सीधा प्रभाव डालता दिखा है.

फेज-2 ट्रायल में क्या निकला?

Nitric oxide nasal spray को कनाडा के वैंकूवर की बायोटेक कंपनी सैनोटाइज (SaNOtize) ने विकसित किया है. इस काम में ब्रिटेन के सेंट पीटर्स हॉस्पिटल्स, NHS फाउंडेशन ट्रस्ट और बर्कशायर पैथोलॉजी सर्विसेज ने साथ दिया है. SaNOtize के CEO डॉ. गिली रेगेव का दावा है कि Nitric oxide किसी भी तरह के वायरस को मार सकता है. ये स्प्रे नाइट्रिक ऑक्साइड की थोड़ी सी मात्रा नाक में भेजता है, जो SARS-CoV-2 वायरस को मारने में मदद करता है.

Covid
कोविड जांच की सांकेतिक तस्वीर. (फोटो-PTI)

कनाडा और UK में इसके ट्रायल्स हुए हैं. फेज-2 क्लीनिकल ट्रायल्स में 79 इन्फेक्टेड लोगों पर इसका असर परखा गया. परीक्षण में इस नेजल स्प्रे ने 24 घंटों के भीतर वायरल लोड को 95% तक कम कर दिया. 72 घंटों में इसका असर 99% तक देखा गया. इन मरीजों में ज्यादातर ब्रिटेन में पाए गए कोरोना वायरस के नए वैरिएंट से संक्रमित थे. इसके अलावा सात हजार से अधिक लोगों ने खुद से इस दवा का इस्तेमाल किया था. दावा किया गया कि इनमें से किसी में प्रतिकूल प्रभाव के लक्षण नजर नहीं आए, यानी कोई साइड इफेक्ट देखने को नहीं मिला.

इस ट्रायल के चीफ इन्वेस्टिगेटर वायरलॉजिस्ट डॉ. स्टीफेन विंचेस्टर का कहना है कि कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में यह दवा क्रांतिकारी साबित हो सकती है. इस नेजल स्प्रे को लेना और लाना-ले जाना भी आसान है. यह कोरोना वायरस के प्रसार को भी बहुत हद तक कम कर सकती है.

संक्रमण को रोकने में मददगार?

SaNotize के चीफ साइंस ऑफिसर डॉ. क्रिस मिलर का दावा है कि यह पोस्ट एक्सपोज़र की भी रोकथाम कर सकता है. पोस्ट एक्सपोज़र मतलब संक्रमण की चपेट में आने के बाद. साथ ही, वायरस को नाक के जरिए शरीर में जाने से भी रोकता है. ये ठीक वैसा ही है, जैसे हैंड सैनिटाइजर.

उन्होंने कहा,

नेजल स्प्रे थोड़ी मात्रा में नाइट्रिक ऑक्साइड रिलीज करता है. इसका काम नाक के अंदर वायुमार्ग में वायरस को मारना होता है. यदि आप बाहर हैं, लोगों की भीड़ में हैं और संक्रमित होने की आशंका हैं, तो आप स्प्रे का उपयोग कर सकते हैं. ये नाक में वायरस जाने की संभावना को कम कर देता है. हमने देखा है कि जब लोगों पर वायरस का बहुत अधिक लोड होता है, तब भी ये स्प्रे वायरल लोड को काफी कम कर सकता है.

क्या इसे किसी तरह की मंजूरी मिली है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिकमंडेशन के बाद देशों की सरकारी संस्थाएं दवाओं के EUA यानी emergency use authorization, हिन्दी में कहें तो आपातकालीन उपयोग की मंजूरी देती हैं. डॉ. रेगेव के अनुसार, इजरायल और बहरीन ने इस स्प्रे को मेडिकल डिवाइस के रूप में इस्तेमाल की मंजूरी दी है. डॉ. विनचेस्टर का कहना है कि डेवलपर्स ने यूके में भी इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाजत मांगी है. इसके तीसरे फेज के परीक्षण की योजना भी बनाई जा रही है. हालांकि तीसरे चरण के ट्रायल की जरूरत है कि नहीं, ये रेग्युलेटर को तय करना है. डॉ. रेगेव के अनुसार, डेवलपर्स भारत में भी कुछ दवा कंपनियों के साथ चर्चा कर रहे हैं.

Who Director
WHO के डायरेक्टर-जनरल टेड्रोस अधानोम गेब्रेसियस. (तस्वीर: एपी)

भारत में वैज्ञानिक इसे किस रूप में देख रहे हैं?

CSIR यानी काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च के कोविड स्ट्रेटजी ग्रुप के चेयरमैन हैं प्रोफेसर राम विश्वकर्मा. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, उनका कहना है कि एक वैज्ञानिक के रूप में हम इस डेवलमेंट के लिए ओपन हैं. भारतीय कंपनियां भी इसी तरह के आइडिया पर काम कर रही हैं.

उन्होंने कहा-

हम रोजाना कई तरह के नए डेवलपमेंट पर चर्चा करते रहे हैं. वैज्ञानिक रूप से यह एक दिलचस्प विचार है. रेग्युलेटर इस पर क्या कॉल लेते हैं, हम उसका इंतजार कर रहे हैं. भारत की भी कई कंपनियों ने इस तरह के आइडिया पर काम शुरू किया है. नाइट्रिक ऑक्साइड की एंटीवायरल क्षमता पर कोई सवाल नहीं है. मैंने रिपोर्ट और परिणाम देखे हैं. SaNotize पहली कंपनी नहीं है. दुनिया भर में कई परीक्षण चल रहे हैं.

दी लल्लनटॉप से बातचीत में वैक्सीन एक्सपर्ट डॉ. विपिन वशिष्ठ ने कहा,

जहां तक मुझे जानकारी है, इस तरह के स्प्रे इंडियन मार्केट में भी आ रहे हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये इफेक्टिव हैं. इसके फेवर में उस तरह के एविडेंस नहीं हैं जिन पर भरोसा किया जा सके. इसके बारे में तब तक कुछ नहीं कहा जा सकता, जब तक कि पूरे एविडेंस ना हों. जो इंटरेनशल अथॉरिटी हैं, जैसे WHO, यूरोपियन मेडिसिन एजेंसी, अगर इनसे रिकमेंडेड ना हो तो इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. बहुत सारी चीजें इफेक्टव हैं, लेकिन कितनी इफेक्टिव हैं, जब तक ट्रायल पूरे नहीं होते, कुछ कहना मुश्किल है.

कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि नाक के जरिए कोरोना शरीर में एंट्री करता है, इसलिए नेजल स्प्रे असरदार साबित हो सकता है. कोरोना की नेजल वैक्सीन के लिए भारत में भी परीक्षण चल रहे हैं. कोवैक्सिन बना रही भारत बायोटेक कंपनी ने अपनी नेजल वैक्सीन कोरोफ्लू के ट्रायल्स जनवरी में ही शुरू कर दिए थे. भारत बायोटेक के फाउंडर डॉ. कृष्णा एल्ला के मुताबिक, अब तक हुई रिसर्च में यह बेहतर विकल्प साबित हुई है. इसके लिए कंपनी ने वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के साथ करार किया है. बहरहाल, देखना ये है कि कोरोना से बचाव का कोई पुख्ता इंतजाम हो पाता है या नहीं, और होता है तो कब तक.


दुनियादारी: कोरोना वैक्सीन से ‘हर्ड इम्युनिटी मिलने के दावे को झटका क्यों लगा है?

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