Thelallantop

भारंगम तीसरा दिन: नाटक जारी हैं, सीटें खाली हैं

नाटक गबरघिचोरन के माई का एक दृश्य

भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के तीसरे रोज नाटकों की शुरुआत मनोहर तेली के ‘संक्रमण’ से हुई. तनवीर अख्तर के निर्देशन में इप्टा की प्रस्तुति ‘गबरघिचोरन के माई’, धीरा मलिक के निर्देशन में उड़िया नाटक ‘बाबाजी’, प्रेम मटियानी के निर्देशन में ‘गदल गुंडा’ और रोमानिया से आई प्रस्तुति ‘दि कर्नल एंड दि बर्ड्स’ तीसरे रोज के बाकी आकर्षण रहे.

‘संक्रमण’ दो पीढ़ियों के संघर्ष की कहानी है. पुरानी पीढ़ी का पिता अपने तजुर्बे अपने बेटे को सौंपना चाहता है, लेकिन रोजमर्रा की अपनी मुश्किलों के कारण बेटे के पास पिता के लिए वक्त नहीं है. इस जेनरेशन गैप के बीच पिता-पुत्र दोनों को अपना संघर्ष ज्यादा जटिल लगता है. मां यहां बीच में है और पुल का काम कर रही है. वह पिता और पुत्र का वाद-विवाद देखती है और आखिर में सबसे ज्यादा बलिदान भी उसी को करना पड़ता है.

नाटक बाबाजी का एक दृश्य

बात करें ‘बाबाजी’ की तो यह वरिष्ठ नाटककार जगमोहन का लिखा नाटक है. नाटक एक महंत के जीवन की कहानी बयान करता है जो अंधविश्वासों और कुरीतियों के बारे में समाज में जागृति लाने का प्रयास कर रहा है. एक धनी व्यक्ति और उसके रसोइए के मार्फत परेशान किए जाने पर वह एक मठ में जाता है और बिना भोजन और देखभाल के वहां रहता है. रसोइए को अपनी गलती का एहसास होता है और वह उस महंत से माफी मांगता है. महंत उसे बुरे काम छोड़ने और ईश्वर में विश्वास रखने की सलाह देता है. नाटक बढ़िया जाता है, लेकिन सबटाइटल की व्यवस्था न होने से इसकी भाषा (उड़िया) समझने में दिक्कत होती है.

‘गबरघिचोरन के माई’ में विस्थापन के बहाने एक परिवार की कहानी है. इस सीधी-सादी कहानी को बहुत अलग ढंग से कहने के कौशल ने ही इस प्रस्तुति को खास बना दिया. भिखारी ठाकुर के मशहूर नाटक ‘गबरघिचोर’ को तनवीर अख्तर बहुत साधारण और ठेठ बिहारी भिखारी नाच शैली में प्रस्तुत करते हैं. भिखारी ठाकुर के इस नाटक को जर्मन नाटककार ब्रेख्त के एक नाटक ‘The Caucasian Chalk Circle’ का भारतीय संस्करण भी माना जाता है.

चर्चित रंग-निर्देशक प्रेम मटियानी को श्रद्धांजलि स्वरूप प्रस्तुत ‘गदल गुंडा’ रांगेय राघव की कहानी ‘गदल’ और जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ को एक सूत्र में पिरोने का प्रयत्न है. 45 साल की गदल पति के मर जाने पर अपना पूरा कुनबा छोड़, 32 साल के मौनी के घर जा बैठती है. मन में देवर को नीचा दिखाने का ध्येय है. वही देवर जिसमें इतना बूता नहीं है कि भाई के चले जाने के बाद भाभी को अपना ले.

वहीं ‘गुंडा’ का किस्सा नन्हकू सिंह के इर्द-गिर्द घूमता है. नन्हकू मौजूदा हालातों और आंतरिक भावों के बीच मानवीय मूल्यों को बचाने के लिए संघर्ष करता है. उसका समस्त क्रिया-कलाप आंतरिक रोमानी भाव से संचालित है, जो यथार्थ से टकराकर नैतिक दायित्वबोध से जुड़ जाता है.

‘गदल गुंडा’ को बहुत खराब तरह से डिजाइन किया गया, लिहाजा इसके कंटेंट को धुंधला होना ही था.

रोमानिया से आई तीसरे रोज की आखिरी प्रस्तुति ‘दि कर्नल एंड दि बर्ड्स’ ने कुछ खास असर नहीं छोड़ा. नाटक में एक पागलखाने में एक डॉक्टर का पहुंचना है. वहां चार लोगों का होना है. इन चार में से एक आदमी कर्नल की भूमिका में है और वह तीन महिलाओं को फौजी ट्रेनिग देता है. एक रोज वे पागलखाने से भागने का निर्णय लेते हैं. उर नाम की किरदार इस भागने में उनकी मदद करती है. एब्सर्डिटी के जरिए इस नाटक में पागलपन परोसा गया.

इन प्रस्तुतियों से पूर्व राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के ‘बहुमुख’ सभागार में मास्टर क्लास के अंतर्गत माधवी मुद्गल का ओडिसी नृत्य भी हुआ और ‘सम्मुख’ सभागार में दूसरे दिन हुए इजरायली नाटक ‘अ स्ट्रेंजर गेस्ट’ की निर्देशक वेरा बर्जाक श्नाइडर के साथ डाइरेक्टर्स मीट भी.

मास्टर क्लास में माधवी मुद्गल

आज भारंगम का चौथा दिन है, वीकेंड और मौसम की वजह से उम्मीद की जा रही है कि यह अपनी पुरानी रंगत में लौट आएगा. वैसे 300 और 400 रुपए वाली ही सीटें खाली हैं. इन खाली सीटों को प्रतिबद्ध थिएटर प्रेमियों का प्रतिकार भी माना जा रहा है.

यहां आकर कह सकते हैं कि ऑडीटोरियम्स खाली हैं, नाटक जारी हैं, लेकिन बाहर टिकट नहीं हैं, हैं भी तो 200, 300 और 400 रुपए वाले. इसे अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का गजब प्रबंधन न कहें तो और क्या कहें…

***

इन्हें भी पढ़ें :

रंग महोत्सव सा नहीं, शोक सभाओं सा लग रहा है भारंगम

‘प्रजा प्रिया हो, प्रिया प्रजा हो’ के संदेश के साथ शुरू हुआ 19वां भारंगम

थिएटर प्रेमी तैयार हो जाएं, शुरू होने वाला है नाटकों का महोत्सव

Read more!

Recommended