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दिख रहा है हिंदी साहित्य का सदाबहार रोग नहीं योग

विश्व पुस्तक मेले के चौथे रोज कृष्ण से यह उपदेश ग्रहण करने के बाद कि वर्ग-शत्रु से ज्यादा साहित्य-शत्रु से दूर रहना जरूरी है, शेखर ने मेले के पांचवें दिन क्या किया यह जानने की इच्छा लिए धृतराष्ट्र संजय से बोले :

हे संजय! इस पुस्तक मेले में हिंदी की सदाबहार पुस्तकों का क्या हाल है?

संजय उवाच : हे धृतराष्ट्र! खड़ी बोली हिंदी में अब तक सात उपन्यास सदाबहार कहे गए हैं. साहित्य-संबंधी तमाम रुदन के बावजूद इन सात उपन्यासों के पाठक कभी कम नहीं होते. इन उपन्यासों की वजह से ही हिंदी में वह सदाबहार-योग निर्मित होता है जिसके विषय में मेले के पांचवें रोज कृष्ण ने शेखर को ज्ञान दिया.

कृष्ण उवाच : हे शेखर! मेले में आज भी हिंदी सहित्य के नाम पर जो सात उपन्यास सबसे ज्यादा चाहे जा रहे हैं, उन्हें लिखे लगभग आधी सदी गुजर चुकी हैं. लेकिन अब भी उनका होना ही उनका प्रचार है. आत्मप्रचार के इस युग में तमाम नई-नवेली पुस्तकों के बावजूद ये सात उपन्यास मिल कर हिंदी में एक सदाबहार-योग का निर्माण करते हैं. इनकी महिमा मैं तुझसे एक-एक करके कहूंगा…

1) गोदान : वर्ष 1936 में प्रकाशित प्रेमचंद का यह आखिरी उपन्यास आज भी साहित्य पढ़ना शुरू करने वाले पाठकों की पहली प्राथमिकता बना हुआ है. यह मेले में कई स्टॉल्स पर उपलब्ध है.

2) त्यागपत्र :1937 में प्रकाशित जैनेंद्र की इस तीसरी औपन्यासिक कृति को आज भी मनोभावनाओं और संवेदनाओं को आंदोलित करने में समर्थ पाया जाता है. भरपूर मात्रा में लिखने वाले जैनेंद्र की रचनाओं में सबसे ऊपर मानी जाने वाली यह किताब एक बैठक में पढ़ने लायक है. यह अपने झकझोर देने वाले प्रभाव और कारुणिक अंत के कारण आज तक सदाबहार बनी हुई है.

3) शेखर – एक जीवनी : दो खंडों में प्रकाशित अज्ञेय के इस पहले उपन्यास का पहला खंड 1941 और दूसरा खंड 1944 में आया. अपने दौर की खासी विवादित इस कृति को आज भी साहित्य के युवा पाठकों के लिए अनिवार्य माना जाता है.

4) मैला आंचल : 1954 में प्रकाशित फणीश्वरनाथ रेणु के इस पहले उपन्यास को हिंदी के पहले आंचलिक उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है. इसे पढ़े बगैर भाषा का संगीत क्या होता, यह पता नहीं चलता.

5) बाणभट्ट की आत्मकथा : 1955 में प्रकाशित हजारीप्रसाद द्विवेदी का यह उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में है और आज भी एक कवि के कठिन जीवन की अभिव्यक्ति की वजह से यादगार है. इसकी प्रयोगशीलता, भाषा और परंपरानिष्ठता भी इसे बेहद प्रासंगिक और पठनीय बनाए हुए हैं.

6) झूठा सच : 1958 में ‘वतन’ और ‘देश’ शीर्षक दो खंडों में प्रकाशित यशपाल का यह उपन्यास अपने वैचारिक वैभव और पाठकीय क्षमता को विकसित करने के लिहाज से आज भी बहुत उपयोगी बना हुआ है.

7) राग दरबारी :1970 में प्रकाशित श्रीलाल शुक्ल के इस उपन्यास को हिंदी का सबसे सदाबहार व्यंग्य उपन्यास होने का सुख प्राप्त है. यह एक ऐसी किताब है जिसे एक छात्र खरीदता है और पूरा हॉस्टल पढ़ता है और फिर वही छात्र इसकी बाइंडिंग कराकर अपने जूनियर को पढ़ने के लिए दे देता है. और फिर वह जूनियर पुस्तक मेले में इसकी एक नई प्रति खरीदकर अपने जूनियर को.

हे शेखर! ये परंपरा से प्राप्त किताबें हैं, इन्हें पढ़े बगैर साहित्य के विधार्थी और पाठक का निस्तार नहीं है. इसलिए ही ये सदाबहार हैं और हर मेले की तरह इस मेले में भी खूब चाही जा रही हैं. लेकिन फिर भी यह सदाबहार-योग न बहुत लोकप्रिय के अंतर्गत है, न कम लोकप्रिय के अंतर्गत.

शेखर उवाच : हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, यह प्रचार के वशीभूत हो, खराब उपन्यासों को भी उठा लेता है. उन उपन्यासों को भी उठा लेता है जिनके लेखक इस मेले में ही घूम रहे हैं.

कृष्ण उवाच : हे शेखर! निश्चय ही मन बड़ा चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है. लेकिन यह अभ्यास और अध्ययन से वश में आ जाता है. खराब किताबें समय को ही नहीं, चित्त को भी भ्रष्ट करती हैं. इसलिए अपनी रचनात्मकता की वजह से चर्चित रचनाओं से ही दिल लगाना चाहिए.

शेखर उवाच : हे कृष्ण! इन सदाबहार उपन्यासों के अतिरिक्त आपको हिंदी के हॉल में और कौन-सी किताबें उल्लेखनीय और प्रिय दिख रही हैं?

कृष्ण उवाच : हे शेखर! मैं स्वयं उत्कृष्ट उपन्यासों का एक पात्र हूं. मैं ही कालजयी काव्य का केंद्रीय संवेदन हूं. मैं ही ‘नौकर की कमीज’ का संतू बाबू हूं और मैं ही ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का रघुवर प्रसाद हूं. मैं ही ‘खट्टर काका’ और मैं ही ‘मुझे चांद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ हूं. मैं ही ‘सरोज स्मृति’ का पिता हूं और ‘अंधेरे में’ के नायक का तप भी मैं ही हूं. मैं ही ‘टूटी हुई बिखरी हुई’ की तिरछी स्पेलिंग हूं. मुझमें ही ‘नदी के द्वीप’ हैं और मैं ही ‘रात का रिपोर्टर’ हूं. ‘वॉरेन हेस्टिंग्स का सांड’ भी मैं ही हूं. मैं ही ‘कठगुलाब’ और ‘कलिकथा वाया बाईपास’ हूं. अनामदास भी मैं ही हूं और ‘दूसरी परंपरा की खोज’ भी. मैं ही ‘निराला की साहित्य साधना’ हूं. ‘बढ़ई का बेटा’ भी मैं ही हूं. मैं ही ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ सरीखी  दलितों की आत्मकथा और मैं ही ‘मित्रो मरजानी’ और ‘गुड़िया भीतर गुड़िया’ हूं.

तू समग्र सृजन का सनातन बीज मुझको ही जान. मैं पढ़ने वालों का अध्यवसाय, उनके लिए ‘दोपहर का भोजन’ हूं. न पढ़ने वालों की पढ़ने की कामना भी मैं ही हूं.

सेवा-निवृत्त महानुभावों के लिए मैं ‘लोकायत’ हूं.

हे शेखर! जो मुझे जानते हैं, वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं – मेले में या मेले से बाहर कहीं भी.

आज के लिए इतना ही.

कल चार बजे मिल…

[ टू बी कंटीन्यूड… ]

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