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फ्रांस में शुरू हुआ ये कोर्ट ट्रायल ऐतिहासिक है, लेकिन डरावना भी!

ये घटना साल 2015 की है. 13 नवंबर को फ़्रांस की राजधानी पैरिस में एक दोस्ताना फ़ुटबॉल मैच खेला जा रहा था. फ़्रांस और जर्मनी के बीच. उस शाम 80 हज़ार से अधिक दर्शक नेशनल सॉकर स्टेडियम में इकट्ठा थे. उस वक़्त फ़्रांस के राष्ट्रपति रहे फ़्रांस्वा ओलांद भी मैच देखने पहुंचे हुए थे. स्टेडियम के अंदर और बाहर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद थी.

मैच के बीसवें मिनट तक स्कोर 0-0 से बराबर चल रहा था. तभी एक जोरदार धमाके की आवाज़ सुनाई पड़ी. हालांकि, इससे गेम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. लोगों को लगा कि स्टेडियम के बाहर पटाखे फोड़े जा रहे हैं. लेकिन जब कुछ मिनट बाद दूसरा धमाके की आवाज़ आई तो सिक्योरिटी एजेंट्स राष्ट्रपति को सुरक्षित रास्ते से निकालकर ले गए.

उस समय तक स्टेडियम के अंदर और बाहर की दुनिया दो हिस्सों में बंट चुकी थी. बाहर के हिस्से में तबाही का मंज़र पसरा हुआ था. जबकि अंदर मौजूद दर्शकों को इसका गुमान तक नहीं था. जब मैच खत्म होने की सीटी बजी तब जाकर भेद खुलना शुरू हुआ. एंबुलेंस और पुलिस की गाड़ियों के साइरन की आवाज़ें अंदर पहुंचने लगी थी. साथ-साथ एक ख़बर भी. ख़बर ये कि पूरे शहर में आतंकवादियों ने हमला कर दिया है. कोई भी जगह सुरक्षित नहीं है.

इसके चलते, मैच खत्म होने के बाद भी दर्शक बाहर जाने के लिए तैयार नहीं थे. दो हज़ार से अधिक लोग मैदान के बीचोंबीच जमा थे. ये सब आधे घंटे तक चला. फिर ऐलान हुआ कि अब बाहर जाने पर कोई ख़तरा नहीं है. इसके बावजूद कई लोग लंबे समय तक स्टेडियम में ही जमे रहे. जहां तक मैच की बात है, उसे फ़्रांस ने 2-0 के अंतर से जीत लिया था. लेकिन उस दिन पूरी इंसानी सभ्यता हारी थी. जैसा कि मैच के बाद जर्मनी के कोच जोशिम लो ने कहा था,

‘हम स्तब्ध हैं. मेरे लिए, खेल का महत्व खत्म हो चुका है. ये हम सबका नुकसान है. हमें नहीं पता कि हमें करना क्या है.’

स्टेडियम के बाहर हुआ क्या था?

दरअसल, वहांं रूटीन चेकअप चल रहा था. स्टेडियम में एंट्री से पहले दरवाज़े पर जांच होती थी. पुलिस को एक व्यक्ति पर शक हुआ. उन्होंने उसे अंदर घुसने से रोक दिया. वो व्यक्ति गेट से हटकर पीछे गया. और, उसने अपना सुसाइड वेस्ट डेटोनेट कर दिया. इस घटना में हमलावर समेत दो लोगों की मौत हो गई. ये उस रोज़ हुए हमलों की सीरीज़ का पहला चैप्टर मात्र था. जो आगे खुला तो और वीभत्स होता चला गया.

जब इस पर विराम लगा, तब तक 130 लोगों की मौत हो चुकी थी और तीन सौ से अधिक लोग घायल थे. हमले के दौरान और पुलिस के साथ मुठभेड़ में नौ हमलावर भी मारे गए थे. एक संदिग्ध को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया था. सेकेंड वर्ल्ड वॉर के बाद फ़्रांस की धरती पर हुआ ये सबसे बड़ा हमला था. उस रात पैरिस में और क्या-क्या हुआ था? इन घटनाओं के पीछे किसका हाथ था? और, आज के दिन हम ये कहानी क्यों सुना रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

फ़्रांस के लिए साल 2015 की शुरुआत बेहद खराब रही थी. जनवरी महीने के दूसरे ही हफ़्ते में पैरिस दो बड़ी आतंकी घटनाओं का गवाह बन चुका था. पहले वीकली अख़बार शार्ली हेब्दो का दफ़्तर निशाने पर आया. हमलावरों की पहचान अल-क़ायदा के आतंकियों के तौर पर हुई. शार्ली हेब्दो ने पैगंबर मोहम्मद का कथित तौर पर आपत्तिजनक कार्टून पब्लिश किया था. इसी को लेकर आतंकी शार्ली हेब्दो से ख़फ़ा थे. उन्होंने अख़बार के दफ़्तर में 12 लोगों की जान ले ली थी.

Hebdo
शार्ली हेब्दो हमले में 12 लोगों की जान गई थी

इस घटना के दो दिन बाद पैरिस के एक बाज़ार में इस्लामिक आतंकियों ने पांच यहूदियों की हत्या कर दी. इन दोनों हमलों के विरोध में पूरे फ़्रांस में रैलियां निकाली गईं. 11 जनवरी को पूरे देश में लगभग 37 लाख लोगों ने प्रदर्शन किया था. फ़्रांस इस सदमे से ठीक से उबरा भी नहीं था कि नवंबर में पहले स्टेडियम के बाहर और फिर पैरिस के अलग-अलग हिस्सों में हमले होने लगे. रात के 9 बजकर 20 मिनट पर पहले सुसाइड बॉम्बर ने ख़ुद को स्टेडियम के बाहर उड़ा लिया था. वो समय डिनर का था. लोग अपने सगे-संबंधियों के साथ रेस्तरां में खाना खाने आए हुए थे. वे अपनी गप में मशगूल थे कि अचानक गोलीबारी शुरू हो गई. उन्हें संभलने का मौका तक नहीं मिला. थोड़ी देर बाद सड़कों पर लाशें पड़ीं थी और ख़ूब का रेला बह निकला था. ये नज़ारा स्टेडियम सहित शहर के कई इलाकों में दिख रहा था.

एक और तबाही

लेकिन अभी भी बड़ी तबाही बाकी थी. नेशनल स्टेडियम से कुछ किलोमीटर दूर बैटाक्लां थिएटर में एक कंसर्ट चल रहा था. ईगल्स ऑफ़ द मेटल बैंड का. बैटाक्लां में पंद्रह सौ लोगों के बैठने की व्यवस्था थी. उस दिन पूरा हॉल खचाखच भरा था. तभी आतंकियों ने अपनी पोलो कार दरवाज़े के अंदर घुसा दी. इसके बाद वे हॉल के अंदर दाखिल हो गए. उन्होंने भीड़ पर गोलीबारी शुरू कर दी. वे अल्लाहू अकबर के नारे लगा रहे थे और लोगों को बंधक बना रहे थे.

रात के साढ़े 12 बजे पुलिस ने हॉल में धावा बोल दिया. पुलिस और आतंकियों के बीच आधे घंटे तक मुठभेड़ चली. तीन आतंकियों ने आत्मघाती बम धमाका कर ख़ुद को उड़ा लिया था. जबकि चौथा आतंकी पुलिस की गोली से मारा गया. बैटाक्लां थिएटर में उस रात 90 आम लोग मारे गए थे. ये 2015 के पैरिस अटैक की सबसे ज़्यादा तबाह हुई जगह थी. उस तबाही के गवाह रहे कई लोग कभी उस त्रासदी से उबर नहीं पाए.

जब बैटाक्लां थिएटर में पुलिस की रेड चल रही थी. उस समय तक इस्लामिक स्टेट ने हमले की ज़िम्मेदारी ले ली थी. IS का कहना था कि फ़्रांस ने पैगंबर मोहम्मद के अपमान और इराक़ और सीरिया में एयरस्ट्राइक का बदला लेने के लिए पैरिस में हमला किया गया. हमले के बाद फ़्रांस में आपातकाल लगा दिया गया. राष्ट्रपति ओलांद ने देशभर में तीन दिनों के राष्ट्रीय शोक मनाने का ऐलान भी किया. उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से बात की. दोनों ने इस्लामिक स्टेट पर हमले तेज़ करने पर सहमति जताई.

एक हमलावर, जो बच गया

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम पत्ते खोले जा रहे थे. लेकिन घरेलू मोर्चे पर पहली ज़िम्मेदारी थी कि हमले में शामिल लोगों को सज़ा दी जाए. सीधे तौर पर शामिल दस में से नौ हमलावर तो मारे जा चुके थे. लेकिन दसवां हमलावर सलाह अब्देसलाम फ़्रांस छोड़कर बेल्जियम भाग चुका था. अब्देसलाम का जन्म ब्रुसेल्स में हुआ था. लेकिन उसने फ़्रांस की नागरिकता ले रखी थी. वो पहले भी छोटे-मोटे क्राइम में जेल जा चुका था. जेल में उसका संपर्क जिहादियों से हुआ और वहीं से उसकी धारा मुड़ गई.

अगर सब प्लान के मुताबिक चलता तो सलाह अब्देसलाम पैरिस में ही मर चुका होता. उसने पैरिस के हमलावरों के लिए गाड़ी और होटल किराए पर लिए थे. उसे पैरिस के चप्पे-चप्पे की जानकारी थी. इसलिए, हमले की सफ़लता की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर थी. तय किया गया था कि सबसे आख़िर में वो अपने सुसाइड बेल्ट को डेटोनेट करेगा. लेकिन ऐन मौके पर उसका सुसाइड बेल्ट खराब हो गया. उसने उसे रास्ते में ही फेंक दिया.

जब जांचकर्ताओं ने उससे पूछताछ की तो उसने कुछ और ही कहानी बयां की थी. उसने कहा था कि ऐन मौके पर उसका हृदय-परिवर्तन हो गया. लेकिन उसके फ़्लैट से मिले कंप्यूटर पर मिले एक मेसेज ने उसका दावा झूठा साबित कर दिया. इस मेसेज में वो कह रहा था,

‘मैं भी बाकियों की तरह शहीद होना चाहता था लेकिन अल्लाह की मर्ज़ी कुछ और ही थी. मेरे बेल्ट में खराबी थी. और, मुझे उसे फेंकना पड़ा.’

Abdesalam
अब्देसलाम.

जब धरा गया अब्देसलाम 

सलाह अब्देसलाम अगले चार महीने तक छिपा रहा. 15 मार्च 2016 को ब्रुसेल्स में पुलिस रूटीन सर्च पर निकली. उन्हें एक अपार्टमेंट पर शक था. ये रूटीन चेकअप था. उन्हें कतई अंदाज़ा नहीं था कि वहां से अब्देसलाम का पता भी चल सकता है. पुलिस जब अपार्टमेंट में पहुंची तो उनके ऊपर फ़ायरिंग शुरू हो गई. वहां तीन लोग मौजूद थे. पुलिस ने एक को मुठभेड़ में मार गिराया. जबकि बाकी दो वहां से भाग निकले. जब अपार्टमेंट में फ़ोरेंसिक टीम पहुंची तो उन्हें वहां अब्देसलाम का डीएनए मिल गया. इसी सुराग के आधार पर तीन दिन बाद ही ब्रुसेल्स पुलिस ने उसे मोलेनबीक इलाके से अरेस्ट कर लिया.

आशंका थी कि वो ब्रुसेल्स में बड़े हमले की तैयारी कर रहा था. ये आशंका सच साबित हुई. अब्देसलाम की गिरफ़्तारी के चार दिन बाद ही ब्रुसेल्स में एयरपोर्ट और एक मेट्रो स्टेशन पर आत्मघाती हमले हुए. इसमें 32 लोग मारे गए, जबकि 340 से अधिक लोग घायल हो गए. दावा किया गया कि अब्देसलाम को इन हमलों के बारे में पूरी जानकारी थी. लेकिन पुलिस उसे गिरफ़्तार करने के बाद इसका फायदा नहीं उठा पाई.

सलाह अब्देसलाम को अप्रैल 2016 में फ्रांस लाया गया. तब से वो जेल में है. 2018 में बेल्जियम की एक अदालत दूसरे मामले में उसे 20 साल की सज़ा सुना चुकी है.

6 साल पुराने हमले की चर्चा आज क्यों?

दरअसल, आठ सितंबर 2021 को पैरिस हमलों के 20 आरोपियों पर कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई. पहले दिन इकलौते जीवित हमलावर सलाह अब्देसलाम और 13 साज़िशकर्ताओं को कटघरे में पेश किया गया. बाकी छह के ऊपर उनकी अनुपस्थिति में केस चलेगा. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इनमें से पांच सीरिया वॉर के दौरान हवाई हमलों में मारे जा चुके हैं.

ये केस अगले नौ महीने तक चलेगा. इस दौरान पूर्व राष्ट्रपति फ़्रांस्वा ओलांद समेत तीन सौ से अधिक गवाहों के बयान दर्ज़ किए जाएंगे. संभावना जताई जा रही है कि मई 2022 में इसका फ़ैसला आ जाएगा. दोष साबित होने पर अब्देसलाम समेत 12 लोगों को आज़ीवन कारावास की सज़ा हो सकती है.

इसे फ़्रांस के आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा मुकदमा बताया जा रहा है.

इस मुकदमे को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार ने कई खास इंतज़ाम किए है. पैरिस के इल दि ला सिटे आईलैंड पर स्थित ‘पैलेस दि जस्टिस’ के भीतर उच्च-सुरक्षा वाला एक स्पेशल कोर्टरूम तैयार किया गया है. इसके मुख्य कमरे में साढ़े पांच सौ लोगों के बैठने की व्यवस्था है. इसके अलावा भी 12 और कमरे भी हैं. जिनकी कुल क्षमता लगभग दो हज़ार लोगों की है. मेन कोर्टरूम में आठ कैमरे भी लगाए गए हैं. जो अदालत की पूरी कार्रवाई को रिकॉर्ड करेंगे. हालांकि, ये रिकॉर्डिंग पब्लिक डोमेन में नहीं लाई जाएगी. बाद में इन्हें अदालत के आर्काइव में जमा कर दिया जाएगा.

जो भी वादी हियरिंग में मौजूद नहीं होंगे, उन तक आंखों-देखा हाल पहुंचाने के लिए स्ट्रीमिंग रेडियो की व्यवस्था की गई है. ये ऑडियो लिंक 30 मिनट की देरी से कोर्ट के अंदर चल रही कार्रवाई सुनाएगा. इसके अलावा, सरकार ने एक साइकोलॉजिकल हेल्पलाइन का इंतज़ाम भी किया है. इस पूरी तैयारी में दो साल का वक़्त लगा और सरकारी खजाने पर लगभग 50 करोड़ रुपये का भार आया है.

पहले दिन की सुनवाई में क्या हुआ?

पहले दिन जज ने इकलौते जीवित हमलावर सलाह अब्देसलाम से अपनी पहचान बताने के लिए कहा. उसने अल्लाहू अकबर के नारे के साथ अपना नाम बताया. जब जज ने उससे पेशे के बारे में पूछा, तब उसने ज़िद्दी लहजे में जवाब दिया, मैंने इस्लामिक स्टेट का सिपाही बनने के लिए बाकी सारे काम छोड़ दिए.

उसने जेल में अपने साथ हो रहे व्यवहार के लिए कोर्ट के अंदर नाराज़गी भी प्रकट की. उसने कहा कि जेल के अधिकारी मेरे साथ कुत्तों जैसा बर्ताव करते हैं. इस पर कोर्ट के अंदर मौजूद कई लोगों ने आपत्ति जताई. उन्होंने चिल्ला कर कहा कि हमारे साथ हुए अन्याय का क्या? छह बरस पहले 130 लोगों को बर्बरता से मारा गया, उनकी क्या ग़लती थी?

भारत में न्याय मिलने में देरी को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं. इस मामले को देखकर लगता है कि फ़्रांस भी इससे अछूता नहीं है. पैरिस हमले के छह बरस पूरे होने को हैं. लेकिन अभी भी पीड़ित परिवारों को और इंतज़ार करना पड़ेगा. इस देरी की कई वजहें हैं. मसलन, संदिग्धों की तलाश और उनकी गिरफ़्तारी, गवाहों और सबूतों को जमा करना, ट्रायल का ब्लूप्रिंट तैयार करना और स्पेशल कोर्टरूम तैयार करने में लगा वक़्त. यहां पर ये सवाल आता है कि क्या सरकार इन कामों को और तेज़ी से निपटा सकती थी? ये सवाल हमेशा बना ही रहेगा.

कईयों के लिए ये ट्रायल पुराने ज़ख्मों को कुरेदने जैसा है. उन्हें लगता है कि जिस दर्द से वे उबरने की कोशिश कर रहे हैं, वो फिर से हरे हो जाएंगे. उन्हें फिर से नई शुरुआत करनी पड़ेगी. लेकिन बहुतों के लिए ये उन आतंकी हमलों के पीछे का निष्पक्ष सत्य जानने का अवसर भी है.


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