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कोरोना से मरे मरीज़ों का अंतिम संस्कार हॉस्पिटल के स्वीपर्स कर रहे, क्योंकि पूरी फैमिली क्वारंटीन में है

भारत में कोरोना के 14 मई 2020 तक 80 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं. 2500 से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है. हालांकि 27 हजार से ज्यादा लोग ठीक भी हो चुके हैं. 6 मई की हिन्दुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 548 डॉक्टर, नर्सेस और पैरामेडिक कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं. हालांकि इस लिस्ट में फील्ड वर्कर, वार्ड बॉय, सैनिटेशन वर्कर, सिक्योरिटी गार्ड, लैब अटेंडेंट, चपरासी, लॉन्ड्री और किचन स्टाफ शामिल नहीं है. कोरोना की वजह से कई डॉक्टरों की मौत भी हुई है. लेकिन ये आंकड़ा सामने नहीं आया कि देश में कितने डॉक्टरों की जान कोरोना से गई.

डॉक्टर्स, नर्स, मेडिकल स्टाफ सब कुछ दांव पर लगाकर कोरोना के पेशेंट का इलाज कर रहे हैं. इस दौरान उन्हें किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है? उनके सामने चुनौतियां क्या हैं? क्या सावधानियां बरतनी पड़ रही है? ये सब जानने के लिए दी लल्लनटॉप ने कुछ डॉक्टरों और नर्सेस से बात की. उनके अनुभव जानने की कोशिश की.

दिल्ली के गुरुद्वारा बंगला साहिब में डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ ने मत्था टेका. सिख समुदाय के प्रति आभार जताया. डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिए किए जा रहे काम को लेकर उन्हें धन्यवाद दिया.
दिल्ली के गुरुद्वारा बंगला साहिब में डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ ने मत्था टेका. सिख समुदाय के प्रति आभार जताया. डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिए किए जा रहे काम को लेकर उन्हें धन्यवाद दिया. (फोटो-पीटीआई)

अरबिंदो हॉस्पिटल, इंदौर

मध्य प्रदेश का इंदौर. कोरोना का हॉटस्पॉट. यहां के अरबिंदो हॉस्पिटल के डॉक्टर नीरज सेन ने बताया कि पेशेंट का एक्सरे देखते समय जब निमोनिया लगता है तो इसकी संभावना बढ़ जाती है कि पेशेंट कोरोना पॉजिटव हो सकता है. उसे एडमिट करने के बाद दवाइयां शुरू करते हैं. उन्होंने बताया कि उनके अस्पताल में अभी 450 मरीज भर्ती है. इस अस्पताल में डॉक्टर विनोद भंडारी के नेतृत्व में रवि जोशी, प्रकाश जोशी और अन्य लोगों की टीम एक हजार से ज्यादा मरीजों का इलाज कर चुकी है.

डॉक्टर नीरज सेन ने बताया,

ओल्ड एज और दूसरी बीमारियों से संक्रमित पेशेंट के कोरोना पॉजिटव आने पर प्रॉब्लम बढ़ जाती है. मौत के कगार पर खड़े लोगों की फैमिली को हम सूचना दे देते हैं. लेकिन अक्सर वो वहां पर मौजूद नहीं होते हैं. क्योंकि फैमिली की फैमिली क्वारंटीन है. ऐसे में हॉस्पिटल के स्वीपर और अन्य स्टाफ कोरोना से मरने वालों का अंतिम संस्कार करते हैं. पेशंट अगर जिंदा है तो इतना डर नहीं लगता जितना मरने के बाद लगता है. डेडबॉडी पर छिड़काव करते हैं. बैग में पैक करते हैं फिर मॉर्चुरी शिफ्ट कराते हैं. परिवार वाले पेशंट की डेडबॉडी तक लेने नहीं आते. हमारे जो स्वीपर स्टाफ हैं, उनको सैल्युट करते हैं. वो खुद जाकर ऐसे लोगों का अंतिम संस्कार करते हैं.

हालांकि डॉक्टर नीरज का कहना है कि पॉजिटव महिलाओं की डिलिवरी सक्सेसफुल हो रही है ये अच्छी बात है. मेरे लिए ये अच्छा अनुभव था. पूरा परिवार निगेटिव होकर गया. ठीक होने वाले मरीज पॉजिटिव मैसेज दे रहे हैं. काफी अच्छा फील होता है लोगों की सेवा करके. जब लोग ठीक होकर घर जाते हैं तो अच्छा लगता है. सबसे अच्छी बात ये है कि इलाज में लगे डॉक्टर सही सलामत हैं.

मध्य प्रदेश का इंदौर शहर. हॉट स्पॉट. कोरोना से ठीक होने के बाद घर जाने मरीज (फोटो-पीटीआई)
मध्य प्रदेश का इंदौर शहर. हॉट स्पॉट. कोरोना से ठीक होने के बाद घर जाते लोग(फोटो-पीटीआई)

सरकारी हॉस्पिटल, दिल्ली

डॉक्टर रौनक राज. सर्जन हैं. उनका कहना है कि WHO और ICMR की गाइडलाइन के मुताबिक, सर्जरी से पहले हर पेशेंट का कोरोना टेस्ट करना है. टेस्ट के रिजल्ट आने में वक्त लगता है. उस केस में पेशेंट को पॉजिटिव मानके कोरोना ऑपरेशन थियेटर में सर्जरी करते हैं. उन्होंने बताया,

कोरोना ऑपरेशन थियेटर में सर्जरी करते हुए PPE किट पहनना पड़ता है. बहुत दिक्कत होती है. किट बहुत ज्यादा हॉट होता है. ऑपरेशन थियेटर में हम एसी नहीं चलाते हैं, क्योंकि पेशेंट को हाइपोथर्मिया का रिस्क होता है. इसलिए ओटी को गर्म रखना पड़ता है. एक बार PPE किट खोलने के बाद दूसरी बार नई पहननी पड़ती है. पहले पेशंट में कलंक वाला डर था, लेकिन वो डर खत्म हो रहा है. पहले ये पता चलने पर कि कोई मरीज कोरोना पॉजिटव हो सकता है वह भागने की कोशिश करता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. जागरूकता बढ़ी है.

डॉक्टर रौनक का कहना है कि अस्पताल स्टाफ को दो या तीन ग्रुप में बांट देते हैं. पहली टीम एक हफ्ते काम करती है फिर रेस्ट. इस दौरान कोई पॉजिटिव हुआ तो उसे रिप्लेस करते हैं. कंपलसरी क्वारंटीन हो रहा है. कई हॉस्पिटल में कोरोना की अलग टीम है. सर्जरी भी वही टीम करती है. कोविड वाले ब्लॉक का स्टाफ नॉन कोविड वाले ब्लॉक में नहीं जाता है. उनका कहना है कि कोरोना के अलावा अन्य मरीज अस्पतालों तक पहुंच नहीं पा रहे हैं, तो मरीजों की संख्या घटी है.

कोरोना के इलाज में लगे डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए सेना ने अस्पतालों पर फूल बरसाए थे. (फोटो-पीटीआई)
कोरोना के इलाज में लगे डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए सेना ने अस्पतालों पर फूल बरसाए थे. (फोटो-पीटीआई)

सरकारी अस्पताल, फिरोजाबाद

डॉक्टर अविरल का कहना है कि जिस कोरोना वॉर्ड में उनकी ड्यूटी लगी थी, वहां 32 मरीज थे. लेकिन किसी को वेंटिलेटर या आईसीयू की जरूरत नहीं पड़ी. अच्छी बात ये है कि सभी लोग ठीक होकर घर जा चुके हैं. उन्होंने बताया,

अस्पताल आने वाले लोगों को लगता था कि मुझे कोरोना हो गया! मुझे महामारी वाली बीमारी हो गई है. मैं बच पाउंगा कि नहीं. हम बार-बार लोगों को समझाते थे कि पैनिक नहीं होना है. क्योंकि रिकवरी रेट बहुत अच्छा है. उनकी टेंशन दूर करना बहुत बड़ी चुनौती थी. उन्हें मेंटली तैयार करना होता था जिससे वो इस बीमारी से लड़ सकें. इलाज शुरू करने से पहले उन्हें समझाते थे कि सामान्य वायरल की तरह ही है. आप ठीक हो जाएंगे.

उन्होंने बताया कि 14 दिन की ड्यूटी करने के बाद 14 दिनों के लिए उन्हें होटल में क्वारंटीन किया गया था. इसके बाद उन्हें घर जाने को मिला. रिस्क तो है, लेकिन लोगों की सेवा करके अच्छा लगता है.

डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की चुनौतियां कम नहीं हैं. उन्हें अपनी मागों के लिए प्रदर्शन करना पड़ रहा है. (फोटो-पीटीआई)
डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ की चुनौतियां कम नहीं हैं. उन्हें अपनी मागों के लिए प्रदर्शन करना पड़ रहा है. (फोटो-पीटीआई)

पीजीआई, लखनऊ

कोरोना वॉर्ड में ड्यूटी कर चुके मेल नर्स उदय भान का कहना है कि ड्यूटी करते समय पहले खुद की सुरक्षा जरूरी है. डॉक्टर भी हमें यही सलाह देते हैं. सबसे जरूरी चीज है PPE किट. पहली बार कोई इसे पहनेगा तो उसे पांच मिनट में ही उतारने की सोचेगा. क्योंकि उसमें इतनी गर्मी होती है कि बर्दाश्त से बाहर है. PPE किट पहनने के बाद हम लोग पेशेंट के पास जाते थे. पूछते थे क्या दिक्कत है. बाहर आने के बाद सेनिटाइज होते थे. उसके बाद PPE किट के मास्क हटा देते थे. क्योंकि उसमें बहुत सफोकेशन होता है.

उन्होंने बताया,

PPE किट पहनने के बाद आपको खाना,पानी, नेचर कॉल सब रोकना पड़ता है. उसे उतारने के बाद ही आप कुछ कर सकते हैं. PPE किट आसानी से मिल जाता था. एक फॉर्म भरना होता था बस. डॉक्टर राउंड पर होते हैं. वो बताते हैं कैसे क्या होगा, लेकिन मेडिसीन का सारा हमें ही देखना पड़ता है. एक साथ एक वॉर्ड में तीन डॉक्टर रहते हैं. एक वार्ड में अधिकतम आठ मरीज रख सकते हैं. तीन डॉक्टर और पांच नर्स की ड्यूटी. टोटल आठ लोगों का स्टाफ होता है. उसी में बारी-बारी से रोटेट करते रहते हैं.

उन्होंने बताया कि ड्यूटी खत्म होने के बाद हॉस्पिटल में 14 दिन क्वांरटीन रहना पड़ता है. उसके बाद आप घर जा सकते हैं. फिर 15 दिन बाद जरूरत पड़ी तो ड्यूटी लगती है.

Ambulance
कोरोनाके मरीजों के इलाज के लिए डॉक्टर दिन रात मेहनत कर रहे हैं. (फोटो-पीटीआई)

 एम्स, पटना

मेल नर्स कंवरपाल का कहना है कि पटना एम्स में तीन-चार आइसोलेशन वार्ड बनाए गए हैं. उसमें होल्डिंग एरिया भी है. होल्डिंग एरिया का मतलब अगर कोई मरीज आता है तो पहले वहां उसका चेकअप होता है. उसके बाद उसे अलग-अलग वार्ड में शिफ्ट किया जाता है. निगेटिव आने पर तीन-चार दिन में डिस्चार्ज कर दिया जाता है. उसमें हमारी भी ड्यूटी लगी है. सैंपलिंग का काम डॉक्टर भी करते हैं. हम भी करते हैं. हमें ट्रेनिंग दी गई है.

उन्होंने बताया,

सैंपल कलेक्ट करने से पहले हम मरीजों को बताते हैं कि आपको पैनिक नहीं होना है. हम आपके दो सैंपल लेंगे. नाक और मुंह से सैंपल लेते हैं. दो स्टिक होती है. नाक की अलग और मुंह की अलग. दो वायल होती है. उसमें सैंपल कलेक्ट करते हैं. एक पॉलीबैग होता है, उसमें बंद करते हैं. फिर बाहर से एक बड़ा डब्बा होता है उसमें पैक किया जाता है. फिर आइस वाले डिब्बे में पैक किया जाता है. तीन जगहों पर मरीज का नाम, एड्रेस लिखा जाता है. ताकि मिसमैच ना हो.

हमारे यहां एक दिन ड्यूटी, एक दिन ऑफ चला शुरू में. उसके बाद 14 दिन क्वारंटीन किया गया. लेकिन अब नोटिस आया है कि क्वारंटीन नहीं दिया जाएगा. खास कर उन एरिया में जहां पॉजिटिव केस नहीं है. हमारे यहां चार पॉजिटिव केस आए थे. उनमें से एक ठीक हो चुके हैं और तीन का इलाज चल रहा है.

कोरोना के टेस्ट के लिए सैंपल लेने में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है. (फोटो-पीटीआई)
कोरोना के टेस्ट के लिए सैंपल लेने में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है. (फोटो-पीटीआई)

एम्स भुवनेश्वर, ओडिशा

कोरोना वॉर्ड में काम करने वाले मेल नर्स ने दीपक मिश्रा ने बताया कि इमरजेंसी में आने वाले पेशेंट के बारे में नहीं पता होता कि वह पॉजिटिव है या निगेटिव. हम लोग स्कैनिंग करते हैं. जानकारियां लेते हैं. लक्षण दिखने पर सैंपल लेते हैं. एम्स कैंपस में ही सैंपल टेस्ट हो रहा है तो रिपोर्ट जल्दी आ जाती है. पॉजिटिव मरीज के साथ कोई दक्कत नहीं है. क्योंकि हमें पता है कि सामने वाला पॉजिटिव है तो क्या करना है. दिक्कत तब होती है जब हमें ये नहीं पता होता कि सामने वाला पॉजिटव है कि नहीं.

उन्होंने अपना एक अनुभव शेयर किया.

इमरजेंसी में मेरी ड्यूटी लगी थी. एक ड्रक ड्राइवर मुंबई से ट्रैवल करके आया था. एक्सिडेंट हुआ उसका, ब्लीडिंग हो रही थी. हमने उसकी स्टिचिंग की, सब कुछ किया. बाद में पता चला कि वो पॉजिटिव हैं. ऐसे में रिस्क बढ़ जाता है. हमें दो-तीन दिन के लिए क्वारंटीन दिया था. लेकिन स्टाफ कम होने की वजह से बुला लिया गया. लेकिन टेस्ट नहीं हुआ. सात दिन ड्यूटी के बाद फिर से जनरल ड्यूटी दी जाती है. मैं सिंगल रहता हूं कि ड्यूटी के बाद घर चला जाता हूं. लेकिन फैमिली वाले स्टाफ के लिए होटल में क्वारंटीन की व्यवस्था की गई है.


दिल्ली के उत्तरी निगम के अस्पतालों में काम कर रहे मेडिकल स्टाफ को सैलरी नहीं मिल रही!

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