Submit your post

Follow Us

कोरोना के टाइम मुर्गे की टांग का उधार चुकाना पुतिन को पड़ेगा भारी?

21 दिसंबर,1991. रूस के सरकारी टीवी चैनल पर शाम का बुलेटिन आया. प्रेंजेंटर ने कहा-

गुड इवनिंग, पेश हैं आज के समाचार. ‘यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स’ अब नहीं रहा.

ये दिसंबर 1922 में पैदा हुए USSR के मरने का ऐलान था. वहां तख़्तापलट हो चुका था. चार दिन बाद, ठीक क्रिसमस वाले रोज़ सोवियत के आख़िरी राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव को इस्तीफ़ा देना पड़ा. उस शाम ठीक 7 बजकर 32 मिनट पर मॉस्को की क्रेमलिन बिल्डिंग के ऊपर लहराता सोवियत का लाल झंडा आख़िरी बार नीचे उतरा. उसकी जगह ले ली सफ़ेद, नीले और लाल पट्टी वाले रूसी तिरंगे ने.

सप्लाई चेन तकरीबन फेल हो चुका था
गोर्बाचोव ने सोवियत बचाने की बड़ी कोशिश की थी. अमेरिका के साथ सहयोग भी किया. रोनाल्ड रीगन के साथ परमाणु निरस्त्रीकरण संधि की. कोल्ड वॉर भी ख़त्म किया. वेस्ट को गोर्बाचोव में अपना सहयोगी दिखता था. शायद इसीलिए 1990 में गोर्बाचोव को नोबेल शांति पुरस्कार भी मिला. मगर सोवियत की हालत खराब थी. गोर्बाचोव सरकार लोगों का पेट तक नहीं भर पा रही थी. खाद्य आपूर्ति सिस्टम तकरीबन फेल था. पैदावार को बाज़ार पहुंचने में इतना समय लगता कि कई बार वो रास्ते में ही सड़ जाती थी. नतीजा, दुकानों पर मिलतीं सड़ी-गली सब्ज़ियां. पुराना बासी गोश्त. कई बार वो भी नहीं. लोग अपार्टमेंट में मुर्गियां पालने लगे थे.

…और सोवियत के बाज़ार ‘बुश लेग्स’ से पट गए
खाद्य संकट ख़त्म करने के लिए गोर्बाचोव ने कई संधियां कीं. इनमें से एक संधि अमेरिका से भी हुई. डील थी कि अमेरिका का सीनियर बुश प्रशासन अपने इस्तेमाल से बचा चिकन सोवियत भेजेगा. होता क्या था कि अमेरिका में चिकन ब्रेस्ट्स की ज़्यादा खपत है. माने, मुर्गे के पेट और धड़ वाला हिस्सा. बचता था मुर्गे की जांघों और पैरों वाला हिस्सा. ये इतना ज़्यादा होता था कि अतिरिक्त बच जाता था. अमेरिका मदद के नाम पर ये एक्सट्रा हिस्से सोवियत को दे देता. सोवियत के बाज़ार मुर्गे के इन टुकड़ों से पट गए. वहां लोगों ने इनका नाम रख दिया- बुश लेग्स. चिकन के ये हिस्से लोगों का पेट तो भरते थे. मगर ये उनको अपनी बदतर स्थितियों का भी एहसास दिलाते. अमेरिकी मदद पर आश्रित होना उनके लिए अपमानजनक था.

‘बुश लेग्स’ के एक्सपोर्ट पर रोक लग गई
90 का दशक ख़त्म होते-होते रूस की सत्ता बदली. पुतिन आए. पहले प्रधानमंत्री बने. फिर 1999 का साल ख़त्म होते-होते बोरिस येल्तसिन की जगह वो राष्ट्रपति बन गए. रूस की मांसपेशियों में अचानक उभार आने लगा. कच्चे तेल और गैस की बदौलत इकॉनमी बेहतर होने लगी. पुतिन रूस को उसकी खोई जगह दिलाने की कोशिश कर रहे थे. और ये कोशिशें अमेरिका से आ रहे चिकन को ठिकाने लगाए बिना कैसे पूरी होतीं?

रूस इस वक़्त तक अमेरिका के कुल चिकन निर्यात का करीब 20 से 22 फीसद तक खरीद रहा था. मगर 2002 आते-आते वो अमेरिकी चिकन की क्वॉलिटी पर उंगली उठाने लगा. कहने लगा कि अमेरिका मुर्गों को ऐंटीबायोटिक देता है. और फिर 2010 में पुतिन ने बुश लेग्स पर बैन लगा दिया.

कोरोना: रूस की क्या हालत है?
मगर ये कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती. इसका सिरा, एक बहुत अहम सिरा आकर जुड़ता है कोरोना से. कैसे, आगे बताएंगे. आज तारीख़ है 24 अप्रैल. रूस में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 68 हज़ार पार चली गई है. 615 लोग मर चुके हैं अब तक. पिछले 24 घंटों में 5,849 नए मामले आए सामने.

दुनिया के सबसे बड़े देश रूस के पास भौगोलिक इलाका बहुत बड़ा है. मगर स्वास्थ्य सुविधाएं कम हैं. दूर-दराज़ के इलाकों की स्थिति और बदतर है. अभी 13 अप्रैल की बात है. रूस के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में नॉर्वे की सीमा के पास एक शहर है-मूरमन्स्की. वहां एक बड़े निर्माण स्थल पर कई लोग कोरोना संक्रमित पाए गए. उनके इलाज की सुविधाएं नहीं थीं शहर में. ऐसे में मिनिस्ट्री ऑफ इमरजेंसी ने एक हवाई जहाज को अस्पताल में तब्दील किया और वहां भेजा. साथ में 130 डॉक्टर भी भेजे.

कोरोना की तैयारियां कैसी हैं?
मूरमन्स्की तो फिर भी रिमोट इलाका है. राजधानी मॉस्को के अस्पताल इतने भर गए हैं कि इमरजेंसी डिपार्टमेंट के बाहर मरीज़ों को लेकर आए ऐम्बुलेंसों की लंबी कतारें लग रही हैं. प्रशासन मान रहा है कि कोरोना के मद्देनज़र तैयारियां दुरुस्त नहीं हैं. 19 अप्रैल को रशिया टीवी ने डेप्युटी प्राइम मिनिस्टर तत्याना गोलिकोवा का इंटरव्यू लिया. वो रूस की कोरोना टास्क फोर्स की मुखिया भी हैं. तैयारियों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा-

संक्रामक बीमारियों के इलाज वाली सेवा को किस तरह प्रभावी बनाया जाए. किस तरह उसे कोरोना से निपटने के लिए तैयार किया जाए. इसपर बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं दिया था हमने.

यही तत्याना मार्च में कह रही थीं कि कोरोना का सामना करने के लिए रूस पूरी तरह तैयार है. मास्क से लेकर वेंटिलेटर तक, अस्पतालों के पास पर्याप्त सप्लाई है. फरवरी और मार्च में एकदम रिलेक्स्ड रहा रूस अब पैनिक मोड में है. कुछ दिनों पहले पुतिन ने अपने अधिकारियों से कहा कि उनके पास शेखी बघारने की न तो कोई वजह है. न स्थितियां ही इसकी इजाज़त देती हैं.

रोज़ हज़ारों की तादाद में बढ़ रहा है संक्रमण
पिछले कुछ दिनों से रूस में रोज़ाना हज़ारों की संख्या में संक्रमण बढ़ रहा है. रोज़ पांच-छह हज़ार नए केस आ रहे हैं. ऊपर से रूसी अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन, यानी कच्चा तेल भी पिछले दो दशकों की सबसे कम कीमत पर है. रूस की मुद्रा रुबल की वैल्यू काफी गिर गई है. एक अमेरिकी डॉलर बराबर 74 रुबल हो गया है. जबकि अप्रैल 2019 में ये 65 रुबल के करीब था.

पुतिन कहां हैं?
मॉस्को समेत देश के कई हिस्सों में लॉकडाउन है. पहले से ही ख़राब अर्थव्यवस्था के कारण ये स्थिति लोगों की जेब पर भारी पड़ रही है. कारोबारियों से लेकर छोटे दुकानदार तक दिवालिया होने की आशंका जता रहे हैं. 20 अप्रैल को दक्षिणी रूस में लॉकडाउन के विरोध में एक रैली निकाली गई. हमेशा फ्रंटफुट पर दिखने वाले पुतिन बैकस्टेज हैं. पिछले कई दिनों से वो मॉस्को के बाहर अपने आधिकारिक आवास में ही बंद हैं. वहीं से चीजों पर नज़र रख रहे हैं.

लॉकडाउन
रूस के बाहर और भीतर, हर जगह लोग कह रहे हैं कि सरकार ने कोरोना को बहुत हल्के में लिया. रूस की करीब 4,184 किलोमीटर लंबी ज़मीनी सीमा जुड़ी है चीन से. इसके अलावा कई यूरोपीय देशों से भी सीमाएं मिलती हैं उसकी. चीन से निकलकर कोरोना पूरे यूरोप में फैला. एशिया और यूरोप, दोनों तरफ से रूस के पड़ोसी कोरोना की चपेट में थे. मगर रूस कह रहा था, उसके यहां चीजें पूरी तरह से नियंत्रण में हैं.मगर मार्च के आख़िर में आकर चीजें खिसकने लगीं. 30 मार्च को हड़बड़ी में लॉकडाउन लगाना पड़ा. पहले लोगों से कहा गया कि एक हफ़्ते की पेड लीव है. उसी पेड लीव के बीच मॉस्को में लॉकडाउन लग गया. फिर सरकार ने कहा, 30 अप्रैल तक काम पर नहीं आना है.

रूस ने अमेरिका को मदद भेजी
इस पॉइंट पर आकर रूस के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या था? शायद मेडिकल सप्लाई? मगर रूस ने मेडिकल सप्लाई का इंतज़ाम करने की जगह कुछ और ही काम किया. क्या किया? इसका जवाब उसी ‘बुश लेग्स’ वाली कहानी से जुड़ा है, जिसे कोरोना वाले ज़िक्र से ठीक पहले हम बीच में छोड़ आए थे.

1 अप्रैल को रूस का एक मिलिटरी विमान करीब साढ़े पांच हज़ार किलो वजन की मेडिकल सप्लाई लेकर अमेरिका पहुंचा. मास्क, वेंटिलेटर. तमाम ज़रूरी मेडिकल उपकरण थे इसमें. रूस ने मानवीय सहायता के नाम पर ये खेप अमेरिका भेजी थी.

अमेरिका के अलावा किस-किस को भेजी मदद?
सवाल है क्यों? क्योंकि करीब तीन दशकों बाद जाकर रूस को अमेरिका के भेजे उन मुर्गे के टुकड़ों का एहसान उतारने का मौका मिला था. ये ख़बर रूस के सरकारी न्यूज़ चैनल पर भी दिखाई गई. इस मानवीय सहायता के लिए अमेरिका ने रूस को शुक्रिया कहा. मगर वाहवाही की जगह रूस में लोग नाराज़ हुए. क्योंकि वहां डॉक्टरों तक को मास्क नहीं मिल पा रहा है. रूस से मदद लेने पर ट्रंप की भी आलोचना हो रही थी. ऐसे में मॉस्को के विदेश मंत्रालय ने कहा कि मेडिकल सप्लाई का बिल दोनों देशों ने 50-50 बांट लिया है. ये भी कहा कि आगे जब हमको ज़रूरत पड़ेगी, तब अमेरिका भी करेगा हमारी मदद.

रूस ने अमेरिका के अलावा सर्बिया और इटली को भी मदद भेजी. ऐसे में ये भी कहा जाने लगा कि मदद भेजकर रूस ने ख़ुद को साबित करने की कोशिश की. दिखाने की कोशिश की कि जहां बाकी देश मेडिकल सप्लाई की कमी से परेशान हैं, वहीं उसके पास इन चीजों की इतनी उपलब्धता है कि वो औरों की भी मदद कर सकता है.

रूस के बाहर-भीतर के लोग सरकार को लगातार आगाह कर रहे थे. मॉस्को के मेयर सेरगी सोबियेनिन लगातार अलार्म बजा रहे थे. मगर पुतिन सरकार रिलेक्स्ड दिखती रही. 26 मार्च को क्रेमलिन ने कहा कि असलियत में महामारी जैसी कोई स्थिति नहीं है. अब वहां संक्रमण काफी तेज़ी से फैल रहा है. मगर तैयारियों और संसाधनों की काफी कमी है. ऐसे में आम लोग अमेरिका भेजी गई मेडिकल सप्लाई पर सवाल उठा रहे हैं. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट में एक महिला की ख़बर पढ़ी. वो दवा दुकान पर मास्क खरीदने गई थीं. मास्क नहीं मिला, तो बोलीं-

हमने सारे मास्क शायद अमेरिका भेज दिए.


दुनियादारी: कोरोना संकट के दौर में पूर्वी अफ्रीका के इन देशों पर रेगिस्तानी टिड्डों का धावा

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

ये क्विज जीत नहीं पाए तो तुम्हारा बचपन बेकार गया

ये क्विज जीत नहीं पाए तो तुम्हारा बचपन बेकार गया

आज कार्टून नेटवर्क का हैपी बड्डे है.

रणबीर कपूर की मम्मी उन्हें किस नाम से बुलाती हैं?

रणबीर कपूर की मम्मी उन्हें किस नाम से बुलाती हैं?

आज यानी 28 सितंबर को उनका जन्मदिन होता है. खेलिए क्विज.

करीना कपूर के फैन हो तो इ वाला क्विज खेल के दिखाओ जरा

करीना कपूर के फैन हो तो इ वाला क्विज खेल के दिखाओ जरा

बेबो वो बेबो. क्विज उसकी खेलो. सवाल हम लिख लाए. गलत जवाब देकर डांट झेलो.

रवनीत सिंह बिट्टू, कांग्रेस का वो सांसद जिसने एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे का प्लॉट तैयार कर दिया!

रवनीत सिंह बिट्टू, कांग्रेस का वो सांसद जिसने एक केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे का प्लॉट तैयार कर दिया!

17 सितंबर को किसानों के मुद्दे पर बिट्टू ऐसा बोल गए कि सियासत में हलचल मच गई.

मोदी जी का बड्डे मना लिया? अब क्विज़ खेलकर देखो उनको कितना जानते हो मितरों

मोदी जी का बड्डे मना लिया? अब क्विज़ खेलकर देखो उनको कितना जानते हो मितरों

अच्छे नंबर चइये कि नइ चइये?

KBC में करोड़पति बनाने वाले इन सवालों का जवाब जानते हो कि नहीं, यहां चेक कर लो

KBC में करोड़पति बनाने वाले इन सवालों का जवाब जानते हो कि नहीं, यहां चेक कर लो

करोड़पति बनने का हुनर चेक कल्लो.

विधायक विजय मिश्रा, जिन्हें यूपी पुलिस लाने लगी तो बेटियां बोलीं- गाड़ी नहीं पलटनी चाहिए

विधायक विजय मिश्रा, जिन्हें यूपी पुलिस लाने लगी तो बेटियां बोलीं- गाड़ी नहीं पलटनी चाहिए

चलिए, विधायक जी की कन्नी-काटी जानते हैं.

नेशनल हैंडलूम डे: और ये है चित्र देखो, साड़ी पहचानो वाली क्विज

नेशनल हैंडलूम डे: और ये है चित्र देखो, साड़ी पहचानो वाली क्विज

कभी सोचा नहीं होगा कि लल्लन साड़ियों पर भी क्विज बना सकता है. खेलो औऱ स्कोर करो.

सौरव गांगुली पर क्विज़!

सौरव गांगुली पर क्विज़!

सौरव गांगुली पर क्विज़. अपना ज्ञान यहां चेक कल्लो!

कॉन्ट्रोवर्सियल पेंटर एमएफ हुसैन के बारे में कितना जानते हैं आप, ये क्विज खेलकर बताइये

कॉन्ट्रोवर्सियल पेंटर एमएफ हुसैन के बारे में कितना जानते हैं आप, ये क्विज खेलकर बताइये

एमएफ हुसैन की पेंटिंग और विवाद के बारे में तो गूगल करके आपने खूब जान लिया. अब ज़रा यहां कलाकारी दिखाइए.