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कोरोना पर काबू पाने वाले देशों में लॉकडाउन खुलने पर क्या हुआ?

जिसे हम सभ्यता कहते हैं, उसके लिए अंग्रेज़ी में शब्द है- सिविलाइज़ेशन. सिविलाइज़ेशन समझिए कि एक सामूहिक पटरी है. एक प्रक्रिया है, जिसके मार्फ़त कोई समाज बेहतरी की ओर बढ़ता है. करीब छह हज़ार साल पुरानी हमारी इंसानी सभ्यता ने यहां तक पहुंचने के रास्ते में कई महामारियां भोगी हैं.

इन्हीं महामारियों में से एक है- प्लेग
ये जरसिनिया पेस्टिस नाम के एक जीवाणु से होने वाला संक्रामक रोग है. यूं तो ये महामारी कई बार फैली दुनिया में. मगर पिछले दो हज़ार सालों में तीन मौके ऐसे आए, जब ये बहुत बड़े स्तर पर फैली. बिल्कुल कोरोना की ही तरह. एक देश से दूसरे देश. एक महादेश से दूसरे महादेश.

पहला चक्र
इसका पहला बड़ा चक्र आया छठी सदी में. तब इसकी शुरुआत मिस्र से हुई थी. ये मिस्र से लेकर तुर्की तक फैल गया.

दूसरी चक्र: ब्लैक डेथ
इसका दूसरा बड़ा चक्र आया 1331 में. इस दफ़ा इसकी शुरुआत हुई चीन में. फिर समंदर के जहाज़ों पर छुपकर बैठे चूहों के साथ ये ब्लूबॉनक प्लेग पहुंचा यूरोप. वहां लोग इसे ब्लैक डेथ बुलाने लगे. 1347 से 1351 के बीच यूरोप की कम-से-कम एक तिहाई आबादी ख़त्म हो गई प्लेग में.

हॉन्ग कॉन्ग के रास्ते भारत आया प्लेग, लाखों मरे
प्लेग का तीसरा बड़ा चक्र शुरू हुआ 1855 में. इस बार भी शुरूआत चीन से हुई. वहां से शुरू होकर ये दुनिया के कई हिस्सों में पहुंचा. 1896 में ये महामारी भारत भी आई. अकेले भारत में इस प्लेग से करीब सवा करोड़ जानें गईं. नेचर मैगज़ीन के मुताबिक, प्लेग के इन तीन महाचक्रों ने दुनिया में करीब 20 करोड़ लोगों की जान ली.रूस जैसे देशों में अब भी इक्का-दुक्का लोग मरते हैं इससे. मगर अब ये पहले जैसा घातक नहीं रहा.

दो रास्ते
ऐसी बीमारियां आमतौर पर या तो दवाओं के और वैक्सीन के सहारे ख़त्म होती हैं. जैसे स्मॉल पॉक्स ख़त्म हुआ. या फिर डर से उकताने के बाद लोग बीमारी के साथ जीना सीख लेते हैं. इस स्थिति में बीमारी और उसका खतरा हमारे बीच बना रहता है. मगर फिर भी हम सामान्य होने लगते हैं. कुछ ऐसा ही कोरोना के साथ भी हो रहा है. ज़्यादातर देश या तो लॉकडाउन ख़त्म कर चुके हैं. या इसे ख़त्म करने की तैयारी में है. मगर क्या लॉकडाउन ख़त्म होने का मतलब ये समझें कि कोरोना का ख़तरा टल गया?

दक्षिण कोरिया: वाहवाही
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए हम पहली मिसाल उठाते हैं दक्षिण कोरिया की. कोरोना से निपटने की उसकी रणनीति ने हर जगह तारीफ़ पाई. लॉकडाउन लगाने की जगह जमकर जांच करना. संक्रमित लोगों को क्वारंटीन में रखना. उनके संपर्क में आए लोगों की सोशल ट्रेसिंग करना. इन तरीकों से दक्षिण कोरिया ने अपने यहां कोरोना पर काबू पा लिया.

लगातार कम होता जा रहा था संक्रमण
संक्रमण के नए मामले लगातार कम होते जा रहे थे. मसलन, 5 अप्रैल से पहले रोज़ सामने आ रहे नए मामलों की संख्या 80-90 के पाले में थी. फिर 6 अप्रैल से ये संख्या कम होकर 40-50 के पाले में पहुंच गई. 10 अप्रैल से घटकर 20-30 के पाले में आ गई. 18 अप्रैल से ये संख्याएं और कम होकर 20 से भी नीचे सरकने लगीं. 21 अप्रैल आते-आते कमोबेश इकाई में पहुंच गई ये संख्या. 1 मई को नौ नए केस. दो मई को छह नए केस. 3 मई को 13 नए केस. 4 मई को आठ नए केस. 5 मई को 3 नए केस. ऐसा लगा, अब जीवन सामान्य हो चला है. 6 मई को साउथ कोरिया ने सोशल डिस्टेन्सिंग के नियमों में भी ढील दे दी. मास्क लगाना अनिवार्य बनाए रखा. एक-दूसरे से हल्की दूरी भी बरतने को कहा. मगर अब 10-12 दोस्तों का ग्रुप कॉफी पीने साथ जमा हो सकता था. सब खुश थे.

मगर फिर एक चूक हो गई…
ये शुरुआती मई की बात है. लंबा वीकेंड पड़ा था. वहां लूनर कलैंडर के चौथे महीने का आठवां दिन होता है महात्मा बुद्ध का जन्मदिन.माने, राष्ट्रीय अवकाश का दिन. इस साल ये छुट्टी पड़ी 30 अप्रैल को. अगला दिन, यानी 1 मई था श्रमिक दिवस. फिर 2 और 3 मई को शनिवार-इतवार की छुट्टी. फुल छुट्टी का माहौल. 2 मई की बात है. एक 29 साल का युवा अपने दोस्तों के साथ नाइटक्लब पहुंचा. उसको था कोरोना. ये बात न उसे मालूम थी, न उसके दोस्तों को. उस नाइटक्लब में मौजूद लोगों से होते हुए ये संक्रमण पास के और भी कई नाइटक्लब्स में पहुंचा.

बार और नाइटक्लब फिर बंद कर दिए गए हैं
इस चूक का असर दिखना शुरू हुआ 8 मई. इस दिन कोरोना के 18 नए मामले मिले. अगले रोज़ ये संख्या 34 पहुंच गई. उस एक लड़के के कारण अब तक 86 नए केस सामने आ चुके हैं. प्रशासन का मानना है कि उस लड़के के कारण करीब 1,500 लोगों के कोरोना संक्रमित होने की आशंका है. इस मामले के बाद दक्षिण कोरिया की राजधानी सोल में सारे क्लब और बार बंद कर दिए गए हैं. उस इलाके में मौजूद सभी लोगों से टेस्ट कराने को कहा गया है. स्कूलों को वापस खोलने का फैसला एक हफ़्ते और टाल दिया गया है. सोशल डिस्टेन्सिंग में ढील दी जाए कि नहीं. किस तरह से और कितनी ढील दी जाए, इसपर फिर से विचार किया जा रहा है वहां.

चीन में क्या हो रहा है?
दूसरी मिसाल चीन से है. 9 मई को वुहान शहर में एक कोरोना संक्रमित मरीज़ की पुष्टि हुई. 3 अप्रैल के बाद ये पहली बार था, जब वुहान में कोरोना का नया केस मिला. 11 मई को पांच और नए मामले मिले कोरोना के. इन पांचों के अंदर कोरोना का कोई लक्षण नहीं था. न ही बाहर से आए किसी इंसान से ही इनका कोई संपर्क हुआ. मतलब, ये विदेश से आए लोगों के कारण संक्रमित नहीं हुए हैं. नए संक्रमणों को देखते हुए वुहान प्रशासन ने अगले 10 दिनों के भीतर यहां करीब एक करोड़ 10 लाख लोगों की कोरोना जांच करने का फैसला किया है. इसके अलावा जिस इलाके में ये नए संक्रमण मिले हैं, उसके मुख्य अधिकारी जांग युक्सिन को बर्ख़ास्त भी कर दिया गया है. उनके ऊपर महामारी फैलने से रोकने में नाकामयाब रहने का आरोप है.

पिछले 24 घंटों में वुहान ने कोई नया केस रिपोर्ट नहीं किया है. एक आशंका ये है कि एक अधिकारी पर गाज गिरने के बाद शायद बाकी लोग डर गए हों. ऐसे में हो सकता है कि स्थानीय प्रशासन नए मामलों की जानकारी छुपा ले जाए. वुहान प्रशासन पर इस महामारी की शुरुआत से ही जानकारियां दबाने का आरोप लग रहा है.

वुहान अकेला शहर नहीं है, जहां बीते दिनों में संक्रमण के मामले तेज़ हुए हों. 10 मई को जिलिन प्रांत स्थित शुलान शहर ने भी हाई रिस्क का ऐलान किया था. वहां एक ही इलाके में 15 से ज़्यादा नए केस मिले कोरोना के. इससे पहले 23 अप्रैल को भी उत्तरी चीन से ऐसी ही ख़बर आई थी. वहां कोरोना के कई नए मामले सामने आने के बाद लोगों की आवाजाही पर कई प्रतिबंध लगा दिए गए थे.

घाना में क्या हुआ?
एक तीसरी मिसाल अफ्रीकी देश घाना की भी है. वहां सरकार ने कोरोना से निपटने में बहुत तेज़ी दिखाई थी. यहां कोरोना का पहला केस मिला 13 मार्च को. नॉर्वे और तुर्की से लौटे दो लोग कोरोना पॉज़िटिव पाए गए. इसके करीब नौ दिन बाद, 22 मार्च को घाना ने अपनी सीमाएं बंद कर दीं. 28 मार्च को यहां कोरोना के कुल मामले बस 141 थे. सबसे ज़्यादा केस मिले थे यहां के दो सबसे बड़े शहरों- अक्रा और कुमासी में. सरकार ने कोई रिस्क न लेते हुए 30 मार्च को इन दोनों शहरों में लॉकडाउन लगा दिया. हर किसी को घर पर ही रहने की हिदायत दी गई.

लॉकडाउन लगाने के बाद सरकार ने तेज़ी से कोरोना जांच करवाई. जांच का नतीजा जल्द-से-जल्द आए, इसके लिए ड्रोन्स की मदद ली गई. ड्रोन्स के सहारे मरीज़ों से लिए गए नमूने लैब तक पहुंचाए गए. संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की पहचान करना. हॉटस्पॉट की आशंका वाली जगहों की शिनाख़्त करना. कम संसाधनों में काफी मुस्तैदी से काम किया घाना ने. संक्रमण के नए मामलों में कमी आई, तो 20 अप्रैल को लॉकडाउन भी ख़त्म कर दिया गया. इस वक़्त तक यहां कोरोना के केवल 1,042 पुष्ट मामले मिले थे. मरने वालों की संख्या सिर्फ़ नौ थी.

एक आदमी से 533 लोग संक्रमित हुए!
10 मई को उसी घाना से निराश करने वाली ख़बर आई है. घाना के राष्ट्रपति अकूफो अडो ने राष्ट्र के नाम संबोधन में बताया कि एक कारखाने में काम करने वाले सभी 533 लोग कोरोना संक्रमित पाए गए हैं.कारखाने में काम करने वाले एक संक्रमित इंसान के रास्ते बाकी सब भी संक्रमित हो गए. बीते कुछ दिनों से वहां संक्रमण के नए मामलों में तेज़ी आई है. 8 मई को 921 नए केस मिले. घाना में कोरोना संक्रमित मरीज़ों की संख्या बढ़कर 4,700 हो गई है. अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है.

जर्मनी में क्या हो रहा है?
ऐसी ही ख़बर जर्मनी से भी आई है. जर्मनी के सभी 16 राज्यों की लीडरशिप से बात करने के बाद 6 मई को चांसलर एंजेला मर्केल ने लॉकडाउन में कई तरह की छूट देने का ऐलान किया. सारी दुकानें खोल दी गईं. प्रफेशनल फुटबॉल वापस शुरू हो गया. मगर फिर ख़बर आई कि वहां कोरोना के फैलने की रफ़्तार तेज़ हो गई है. 11 मई को वहां कोरोना का रिप्रोडक्शन रेट 1.07 था. रिप्रोडक्शन रेट, माने ये अनुमान कि एक कोरोना संक्रमित इंसान कितने लोगों को संक्रमित कर सकता है.

रिप्रोडक्शन रेट का 1 से कम होना, माने संक्रमण घट रहा है. मगर इस रेट का 1 से ज़्यादा होना ये बताता है कि एक संक्रमित इंसान एक से अधिक लोगों को संक्रमित कर रहा है. जर्मनी का रिप्रोडक्शन रेट 1.07 है. इसका मतलब वहां 100 कोरोना संक्रमित लोग औसतन 107 और लोगों को संक्रमित कर रहे हैं. रिप्रोडक्शन रेट 1 से अधिक होने का ये भी मतलब है कि आपके अस्पतालों पर क्षमता से अधिक बोझ पड़ सकता है. वुहान में जब ये महामारी अपने चरम पर थी, तब वहां इसकी रिप्रोडक्शन रेट थी करीब ढाई पॉइंट. मतलब, एक संक्रमित आदमी दो से अधिक लोगों को बीमार कर रहा था.

WHO क्या कह रहा है?
वुहान, साउथ कोरिया, घाना और जर्मनी. ये चारों देश मिलाकर तीन महादेशों की तस्वीर मिल गई हमें. एशिया, यूरोप और अफ्रीका. ये चारों ऐसी मिसालें हैं, जिन्होंने कोरोना के आगे प्रभावी रणनीति दिखाई. कोरोना पर काफी हद तक काबू पा लिया. अब यहां फिर से कोरोना में तेज़ी आ गई है. जानकारों का कहना है कि ये ख़तरा बाकी देशों के आगे भी है. इन जोखिमों को देखते हुए WHO ने अपील की है कि सभी देश छोटे-छोटे कदम बढ़ाएं. आर्थिक नुकसान के बावजूद लॉकडाउन ख़त्म करने में बहुत जल्दबाजी न दिखाएं. महामारी विशेषज्ञों का कहना है कि लॉकडाउन से बाहर निकलते हुए कुछ चीजें ध्यान में रखनी ज़रूरी हैं. क्या हैं ये चीजें?

1. संक्रमण की रफ़्तार को काबू में लाना.
2. अपने स्वास्थ्य तंत्र को इस स्थिति में पहुंचाना कि इलाज की ज़रूरत वाले मरीज़ों को इलाज मिल सके.
3. तेज़ी से कोरोना जांच करना. संक्रमित लोगों के संपर्क में आए लोगों की पहचान करके उन्हें क्वारंटीन में रखना.

अगर संक्रमण पर काबू पाए बिना ही लॉकडाउन खोल दिया गया, तो इन्फेक्शन में तेज़ी आएगी. उस स्थिति में शायद हमारा हेल्थ केयर ढांचा उतने मरीज़ों का बोझ न उठा सके. ऐसे में कई लोगों को ज़रूरी इलाज नहीं मिल पाएगा. और चीजें हाथ से बाहर चली जाएंगी.

जाते-जाते

चीन में महामारियों का पुराना अतीत रहा है. शायद इसीलिए 1949 में जब माओ त्से-तुंग ने आधुनिक चीन की नींव रखी, तो उन्होंने महामारी कंट्रोल करने को काफी वरीयता दी. इसके तहत कई तरीके अपनाए गए. इनमें से एक था- फोर पेस्ट्स कैंपेन. इस कैंपेन के निशाने पर थे चार जीव- चूहे, मक्खियां, मच्छर और गोरैया. माओ ने कहा, इन चारों को ख़त्म कर दो. इस कैंपेन के रास्ते फिर और भी वन्यजीव निशाने पर आए.

हम जानते हैं कि खाद्य श्रृंखला में एक जीव की मौजूदगी बाकी जीवों के अस्तित्व से जुड़ी है. आप खाद्य श्रृंखला का बैलेंस बिगाड़ेंगे, तो पूरा पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ जाएगा. ऐसा ही कुछ चीन में हुआ. मसलन, गोरैया कम हुई, तो टिड्डे बढ़ गए. उन टिड्डों ने फसलें बर्बाद कर दीं. रही-सही कसर सरकार की ग्रेट लीप नीति ने पूरी कर दी. खेती के लिए ज़मीन घटा दी गई. लाखों किसानों को खेत छोड़कर खदानों और कारखानों में लगा दिया गया.

नतीजा, चीन में भयंकर अकाल पड़ा. 1958 से 1961 के बीच पड़े अकाल में करीब डेढ़ करोड़ लोग मारे गए. ये सरकारी आंकड़े हैं. कई जानकार कहते हैं मरने वालों की असल संख्या शायद साढ़े चार करोड़ थी. ये पूरी तरह से इंसानों की लाई आपदा थी. इको सिस्टम से साथ हुए खिलवाड़ ने लोगों को भूखों मार डाला. कहते हैं कि अकाल में मर रहे लोग पेट भरने के लिए इंसानों का मांस खाने लगे.

इसका एक ज़िक्र मिला एक लीक हुई सरकारी रपट में. इस रिपोर्ट में चीन के अनहुई प्रांत की आपबीती दर्ज थी. वहां फेंगयांग नाम का एक इलाका था. जहां करीब 21 गांव बसे थे. अकाल के कारण इन 21 गांवों की पूरी आबादी मारी गई. एक भी इंसान नहीं बचा. रपट बनाने वाले सरकारी अधिकारियों को यहां इंसानों द्वारा इंसानों को खाए जाने, यानी केनिबलिज़म के 63 मामले भी मिले थे.

आपदाओं का दुष्चक्र देखिए. जब खाने की कमी पड़ी, तो चीन में वन्यजीव खाने का चलन बढ़ा. वन्यजीवों को मवेशियों की तरह पाला जाने लगा. भालू, चमगादड़, पेंगोलिन जैसे जानवरों का मांस खुलेआम बिकने लगा. और इन्हीं वन्यजीवों के रास्ते इंसानों को कई महामारियां मिलीं. कोरोना उन्हीं में से एक है.


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