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प्लाज्मा थेरेपी को बैन करने में ICMR ने देर कर दी?

बात भारत के कोविड ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल की. वो प्रोटोकॉल, जिसके तहत देश भर में कोरोना मरीज़ों का इलाज किया जा रहा है. ये विषय इसलिए क्योंकि कल यानी 17 मई को इंडियन काउन्सिल फ़ॉर मेडिकल रीसर्च यानी ICMR ने अपने कोविड प्रोटोकॉल में से प्लाज़्मा थेरेपी को बाहर निकाल दिया.

ये निर्णय उस रीसर्च के सामने आने के बाद लिया गया, जिसमें कहा गया था कि प्लाज़्मा थेरेपी से अस्पतालों में भर्ती कोरोना मरीज़ों की ज़िंदगी बचाई जा सके, ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला है. ऐसा ही कनफ़्यूजन रेमडेसिविर और टॉसिलीजुमैब नाम की दवा के बारे में भी देखने को मिलता है.

ऐसे में देश के कोविड प्रोटोकॉल पर सवाल उठते हैं. सवाल ये कि जिस नींव पर कोरोना मरीज़ों का उपचार किया जा रहा है, उसका वैज्ञानिक आधार क्या है? क्या हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?

बात ICMR के कोविड मैनेजमेंट प्रोटोकॉल से शुरू करते हैं

17 मई से चलते हैं 22 अप्रैल को. इस दिन ICMR ने एक और प्रोटोकॉल जारी किया था. कोविड का ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल अमूमन तीन कैटेगरी में बंटा होता है. होम आइसोलेशन के मरीज़, कोविड वार्ड में भर्ती मरीज़ और आख़िर में ICU में भर्ती मरीज़. और इस प्रोटोकॉल में इलाज के तमाम तरीक़ों और दवाओं का उल्लेख होता है कि किस तरह के मरीज़ को किस तरह का ट्रीटमेंट दिया जाए.

अब 22 अप्रैल 2021 वाले इस प्रोटोकॉल को देखें तो आख़िर में प्लाज़्मा, रेमडेसिविर और टॉसिलीजुमैब का उल्लेख किया गया है. साथ में एक नोट नत्थी है – ऑफ़ दी लेबल. ऑफ़ दी लेबल यानी वो दवाएँ और इलाज के वो तरीक़े, जिनके बारे में बहुत सीमित मात्रा में रीसर्च उपलब्ध है. और उन्हें इमरजेंसी यूज अप्रूवल दिया गया है. यहां पर हम बता दें कि WHO की गाइडलाइन ऐसी किसी भी दवा या तरीक़े के लिए क्लिनिकल ट्रायल से अलग इस्तेमाल के लिए परमिशन नहीं देती है.

ऐसे में ICMR का प्रोटोकॉल ही ये बात कहता है कि चाहे प्लाज़्मा हो, रेमडेसिविर हो या टॉसिलीजुमैब हो, उनके कोविड में उपयोग को लेकर बहुत ही सीमित मात्रा में रीसर्च उपलब्ध है. फिर भी ये इलाज में दिए जा रहे हैं.

हमसे बातचीत में डॉक्टर बताते हैं कि पूरी दुनिया में कोरोना से डेढ़ साल की लड़ाई के दौरान बहुत सारे रीसर्च आ गए, कोरोना का नया स्ट्रेन आ गया, लेकिन इंडिया में कोरोना के मरीज़ों के इलाक का तरीक़ा इन बदलावों के साथ नहीं बदला.

भारत में कोरोना के इलाज का प्रोटोकॉल तय कौन से लोग करते हैं?

कोरोना महामारी से निपटने के लिए सरकार ने कई तरह की टीमें बनाई हैं. जो तकनीकी और रणीनीतिक जानकारी देने के साथ-साथ आगे की तैयारियों के लिए भी सलाह देती हैं. इन्हीं सलाहों के आधार पर स्वास्थ्य परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की ओर से समय-समय पर कोरोना संक्रमित मरीजों के इलाज के संबंध में गाइडलाइन जारी की जाती है. कोरोना संक्रमितों के इलाज का प्रोटोकॉल जो संस्थाएं तय करती हैं वो हैं-

1. जॉइंट मॉनिटरिंग ग्रुप
2. ICMR कोविड-19 नेशनल टास्क फोर्स/ AIIMS

पिछले साल जब कोरोना एक देश से दूसरे देश तक पहुंचने लगा तो जनवरी 2020 में एक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक जॉइंट मॉनिटरिंग ग्रुप बनाया. ये ग्रुप स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को तकनीकी मामलों में सलाह देने वाले स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक के नेतृत्व में बनाया गया. इसका काम कोरोना महामारी से जोखिम का आकलन करने, उसके हिसाब से तैयारी और प्रतिक्रिया संबंधी व्यवस्थाओं की समीक्षा करने और तकनीकी दिशानिर्देशों अंतिम रूप देना तय किया गया.

इसी तरह से कोरोना को नियंत्रित करने में सरकार के मार्गदर्शन के लिए ICMR यानी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने भी कोविड-19 नेशनल टास्क फोर्स बनाया. इस टास्क फोर्स के अध्यक्ष नीति आयोग के सदस्य डॉ. विनोद पॉल हैं. जबकि ICMR के डायरेक्टर डॉ. बलराम भार्गव और स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव राजेश भूषण सह-अध्यक्ष हैं.

ICMR नेशनल टास्क फोर्स में AIIMS के डायरेक्टर रणदीप गुलेरिया समेत सरकार और बाहर के तकनीकी क्षेत्र के 21 विशेषज्ञ शामिल हैं. जो रिसर्च के आधार पर तय करते हैं कि कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज किस तरह से हो.

पहले प्लाज़्मा पर सवाल उठाए गए थे?

यानी सरकार के पास मॉनिटरिंग और प्लानिंग की तैयारी पूरी है. और इसी सिस्टम ने बारहा प्लाज़्मा थेरेपी जैसे किंचित अवैज्ञानिक तरीके की ज़रूरत को फ़्लैग भी किया था. जी. सितम्बर 2020 में ही सबसे पहले प्लाज़्मा पर सवाल उठाए गए थे. इसके बाद अक्टूबर 2020 में ख़ुद ICMR ने भी कहा था कि प्लाज़्मा थेरेपी की वजह से कोरोना के बढ़ाव और मृत्यु को कम करने में कोई मदद नहीं मिलती है. और इस सबके पहले ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने अप्रैल महीने में राज्यों से कह दिया था कि वो अपने यहां प्लाज़्मा डोनेशन और प्लाज़्मा बैंक की अच्छी व्यवस्था विकसित करें. सवाल है कि अगर पहले से ही उठ रहे सवालों पर ग़ौर करके प्लाज़्मा ट्रीटमेंट को प्रतिबंधित कर दिया गया होता, बेजा की दवाओं का लोड ख़त्म कर दिया गया होता, तो देश का कितना सारा वक़्त और कितने संसाधनों को बचाया जा सकता था. लोग प्लाज़्मा के लिए सोशल मीडिया पर गुहार लगाते थे, हम सभी कोशिश करते थे कि प्लाज़्मा मिल जाए. कई की जानें बचती थीं, कईयों को नहीं बचाया जा सका था. तो क्या हम ग़लत इलाज की दिशा में आगे बढ़ रहे थे? क्या ये ग़लत फ़ैसले नहीं हुए होते, या सही फ़ैसले थोड़ा और जल्दी ले लिए गए होते तो क्या कुछ और जानें बचायी जा सकती थीं?

इसी क़िस्म की दुविधा रेमडेसिविर, आइवरमेक्टिन और स्टेरॉइड के इस्तेमाल के समय भी दिखाई देती है. कोरोना में इलाज के लिए WHO ने इन दोनों के ही इस्तेमाल पर रोक लगा रखी है. लेकिन तमाम चेतावनियों के बावजूद इलाज के इन तरीक़ों का भारत में बदस्तूर इस्तेमाल जारी है. 24 घंटे पहले आए प्लाज़्मा को प्रतिबंधित करने के आदेश के बाद भी प्लाज़्मा के SOS कॉल अब भी आ रहे हैं. रेमडेसिविर और दूसरी दवाओं, जिनका WHO के प्रोटोकॉल में कोई ज़िक्र नहीं है, की भी खोज जारी है. क्या ऐसा है कि ICMR और AIIMS के ये निर्देश ज़मीन पर मौजूद डॉक्टरों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं? डॉक्टर ये दवाएँ लगातार क्यों लिख रहे हैं?

यानी साफ़ है कि डॉक्टर ख़ुद बहुत ज़्यादा दबाव में हैं. औरAcज़ाहिर सी बात है कि कोरोना एकदम नयी बीमारी है. और जानकार बताते हैं कि किसी भी नयी बीमारी को क्लीनिकली साधने में थोड़ा समय लगता है. यानी पक्का इलाज सामने आने में वक़्त लगता ही लगता है. लेकिन इस इलाज के मानक क्या होने चाहिए? क्या सबकुछ ट्रायल एंड एरर पर टिका हुआ है? किस संस्था के रीसर्च या प्रोटोकॉल को आधार बनाकर इलाज का सलीक़ा निर्धारित करना चाहिए?

दुनिया में क्या प्रोटोकॉल चल रहा?

ऐसे में WHO का नाम सबसे पहले आता है. उनका क्या सोचना है, वो तो हमने आपको बताया. वहां पर तो कोरोना के इलाज में एंटीबायोटिक भी प्रतिबंधित है. अब यूनाइटेड किंगडम चलते हैं. वहां पर कोविड का ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल क्या है? UK के नेशनल हेल्थ सर्विसेज़ की वेबसाइट पर जाने पर पता चलता है कि UK में भी कोरोना मरीज़ के इलाज के लिए रेमडेसिविर, स्टेरॉइड और टॉसिलीजुमैब दवाओं का भी इस्तेमाल होता है, वो भी ख़ास परिस्थितियों में.

यूके के बाद चलते हैं अमरीका. यहां पर CDC यानी सेंटर फ़ॉर डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रीवेन्शन ने भी अपने यहाँ कोरोना के इलाज में भी इन दवाओं को शामिल किया है. ठीक वैसे ही, जैसे भारत और दूसरे देशों में किया गया है. यानी ऑफ़ दी लेबल. इस बारे में जानकारी देते हुए डॉक्टर बताते हैं कि WHO से अलग गाइडलाइन बनाने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है?

बात कुछ हद तक साफ़ है. प्रोटोकॉल कोई विश्वव्यापी रूलबुक नहीं है. ये दुनिया के अलग अलग हिस्सों में इमरजेंसी के हिसाब से तय होता है. इस तरह के सारे प्रोटोकॉल का मक़सद साफ़ है. मक़सद ये कि लोगों की ज़िंदगी बचायी जा सके. फिर भी एक मुस्तैदी और एक तेज़ डिसीजन मेकिंग दरकार है, जिससे हम अपने संसाधनों को और संचित कर सकें.


विडियो- लॉकडाउन लगने के बावजूद कोरोनावायरस के मामले क्यों बढ़ रहे हैं?

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